लेखन एवं अनुवाद कार्य

लोक, शास्त्रीय, पॉप, जेज़, रॉक…… परिभाषाएं बेशक अलग अलग शब्दों, सीमाओं में बांध दें, लेकिन अंततः यह सभी एक ही कला के भिन्न-भिन्न रूप हैं। जिसे हम संगीत के नाम से जानते हैं। ये एक आवाज है, जो एक आत्मा से निकलती है और सारी सरहदें तोड़कर दूसरी आत्मा को डुबो देती है, अलौकिक आनंद के दरिया में। इसे सुनने के लिए किसी भाषा विशेष के ज्ञान की नहीं बस आवश्यकता होती है स्वरों में बहते भावों को हौले से थाम लेने की। और जिस क्षण, जो मन इन्हें बांधना, इन्हें थामना सीख जाता है, उस क्षण रचना और रचयिता का भेद समाप्त हो जाता है. भाव स्वयं ही प्रकट होने लगते हैं; कभी भाषा, कभी स्वर के रूप में…

1948 में महात्मा गांधी के न रहने पर रविशंकर से एक दुखभरी धुन बनाने के लिए कहा गया, जिसमें उन्हें तबले का प्रयोग नहीं करना था। भावुकता भरे उस समय में ऐसी धुन बनाना एक चुनौती थी, जिसमें पीड़ा, दुख, पुकार….सब एकसाथ शामिल हों। धुन के बारे में सोचते हुए यकबयक एक दिन रविशंकर की सोच ‘गांधी’ ने नाम पर जाकर ठहर गयी। सरगम का तीसरा, छठवाँ, सातवाँ सुर क्रमश: गा, धा, नी…. तो नाम में ही शामिल थे। फिर क्या था सोच को एक दिशा मिल गयी और यूँ जन्म हुआ एक नए  राग ‘मोहनकौस’ का…

upma.vagarth@gmail.com