कविता, शार्ट फिल्म, पत्रकारिता, अनुवाद में रुचि। प्रकाशित कविता संग्रह- ‘सफेद लोग’।

मराठी के चर्चित दलित कवि। अद्यतन कविता संग्रह ‘बिघडलेले होकयंत्र’

1-कॉकटेल

गुटबाजी की राजनीति देखकर
अब हम थक गए हैं बहुत
आखिर मैंने
सारे के सारे आंदोलनों को
गिलास में डालकर
घूंट दर घूंट
हलक में उतार लिया
अब एक ही डर है
कहीं कॉकटेल न हो जाए!

2-लड़ाई

रास्ते थे आगे ही आगे बढ़नेवाले
हम चलते रहे रास्तों पर
सहयोगी बदलते रहे मार्ग अपना-अपना
बचे रहे बस हम चारों यार
बिना किसी समझौते के
मार्ग में चलना जारी रहा
चौराहे पर पहुंचकर
हम चलने लगे चार रास्तों पर
हम कमजोर होते चले गए।

3-कार्यकर्ता की पत्नी

घर पर कदम रखते ही
जरूरत की चीजें उधार लाकर
पत्नी करती है स्वागत
नन्हे बच्चे देखते हैं आशा से
घर पर नहीं है छौंक के लिए तेल
चाय के लिए चीनी
और नहीं है स्टोव में घासलेट
ऐसे में आ धमकते हैं पांच-सात कार्यकर्ता
करते हैं मोर्चा पर चर्चा
किसी ने ली है देसी तो किसी ने महुआ
घर में भर गई है बास
कोई जाकर ले आता है किलो भर चीनी
घासलेट आ जाने पर पत्नी स्टोव सुलगाती है
चाय लाती है सादगी से
ऐसे में चर्चा उफान चढ़ती है अपने दल की
वह केवल उम्मीद लगाए देखती रहती है राह
घर की गरीबी खत्म होने की
उसे नहीं कुछ लेना-देना आंदोलन से
तब भी लगी रहती है ऐसे ही
आंदोलन में योगदान समझकर
कार्यकर्ता की पत्नी जो ठहरी!

संपर्क अनुवादक : बी-602, श्रीनिवास ग्रीनलैंड काउंटी, मानाजी नगर, नरहे गांव, पुणे-411041 महाराष्ट्र मो.9765404095