शंभुनाथ

दलितों का आंदोलन फिर सैकड़ों साल पीछे चला गया है। इससे निश्चय ही एलीटवर्गीय दलितों को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हाल की अनगिनत घटनाओं से साफ है कि आम दलितों और दलित स्त्रियों की दशा पहले से ज्यादा बुरी हुई है, क्योंकि गरम बातें काफी नहीं हैं। कई बार सिर्फ अपने समुदाय के लिए लड़ना अनजाने अपने ही विरुद्ध लड़ना हो जाता है। बल्कि अपने लोगों के अलावा बाकी को ‘दूसरा’ समझने की प्रवृत्ति औपनिवेशिक परियोजना की सफलता है। इधर ‘अछूत’ की एक विपदजनक कैटेगरी बनी है- जो ‘दूसरा’ या ‘असहमत’ है वह अछूत है!

क्या देश के दलित आंदोलन और विमर्श में एक ठहराव आया है? हिंदी क्षेत्र में दलित आंदोलन कभी जोर नहीं पकड़ सका और साहित्यिक विमर्श एक विलंबित मामला रहा है। फिलहाल लगता है कि उसमें फुले, अंबेडकर और दलित पैंथर्स के दौर की न ऊंचाइयां बन पा रही हैं और न अर्थवान तीखापन है। बुद्ध, तिरुवल्लुवर, बसवण्णा, कबीर, गुरुग्रंथसाहिब, फुले, अंबेडकर की परंपराएं जैसे फिर ठहर गई हैं। यह वैश्वीकरण के दौर में नव-आर्थिक वर्गारोहण और धार्मिक पुनरुत्थानवाद के दबाव का नतीजा हो सकता है। यह एक जटिल समय की किंकर्तव्यविमूढ़ता हो सकती है। यह भी संभव है कि छोटी-छोटी घृणाओं को एक बड़ी घृणा ने निगल लिया हो। घृणा के उत्सव में अंततः यही होता है, विचारों की दुनिया में तर्क पर उत्तेजनात्मक बातें भारी पड़ जाती हैं। अंततः सबसे अधिक घृणा करनेवाला, सबसे बड़ा अतार्किक ही दिग्विजयी होता है।

किसी समय दलित विचारों के संसार में शिक्षा के असर से अंधविश्वासों और निर्बुद्धिपरकताओं के उन्मूलन पर जोर था, जीवन की कृत्रिमताओं और खुदगर्जी से मुक्ति की बेचैनी थी और दलित स्त्री की मुक्ति का प्रश्न भी प्रधान था। उसमें राष्ट्रीय सामंजस्य के लिए भी ‘स्पेस’ था। सामंती अत्याचारों के अलावा साम्राज्यवाद को लेकर प्रश्न थे। अब शिक्षा का वैसा असर नहीं है। इसलिए दलित चिंतन में नए द्वार नहीं खुल पा रहे हैं, बल्कि अधिकाधिक आत्मसंकुचन और दलित आवाज का होमोजीनियस होते जाना एक चिंताजनक मामला बनता जा रहा है।

फिर भी यदि कोई बड़ा सच है तो वह है अवमानना की आग, जिसमें भारत के दलित हजारों साल से जलते रहे हैं और आज भी जल रहे हैं। वे आज भी भीषण अत्याचारों की दुनिया से बाहर नहीं लाए जा सके हैं। उनके जीवन में आधुनिकीकरण का जितना भी प्रवेश हुआ हो या नए अवसर जितने सुलभ हुए हों, आम दलित अब भी बेहाल हैं।

डूबते का तिनके का सहारा ढूंढते हुए मगरमच्छ पकड़ना

सामाजिक न्याय एक बड़ी अवधारणा है। सामाजिक न्याय के लिए लड़ाई का अर्थ विलंबित न्याय हासिल करने के अलावा जाति प्रथा, धार्मिक कट्टरता और बहुराष्ट्रीय व्यापारिक साम्राज्यवाद के विरोध तक जाता है। सामाजिक न्याय का ही एक रूप सभी मनुष्यों के प्रति प्रेम है। यह राजनीतिक मोलभाव, प्रति-घृणा और चंद व्यक्तियों की महत्वाकांक्षाओं में बंद चीज नहीं है। सामाजिक सौहार्द बढ़ाने की जगह हर पांच साल पर जाति समीकरण बदल लेना सामाजिक न्याय नहीं है। कई बार डूबते हुए लोग तिनके का सहारा ढूंढते-ढूंढते मगरमच्छ पकड़ लेते हैं!

एक तरह से देखा जाए तो दलितों का आंदोलन फिर सैकड़ों साल पीछे चला गया है। इससे निश्चय ही एलीटवर्गीय दलितों को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हाल की अनगिनत घटनाओं से साफ है कि आम दलितों और दलित स्त्रियों की दशा पहले से ज्यादा बुरी हुई है, क्योंकि गरम बातें काफी नहीं हैं। कई बार सिर्फ अपने समुदाय के लिए लड़ना अनजाने अपने ही विरुद्ध लड़ना हो जाता है। बल्कि अपने लोगों के अलावा बाकी को ‘दूसरा’ समझने की प्रवृत्ति औपनिवेशिक परियोजना की सफलता है। इधर ‘अछूत’ की एक विपदजनक कैटेगरी बनी है- जो ‘दूसरा’ या ‘असहमत’ है वह अछूत है!

अब अपने को दलितों का हितचिंतक साबित करने की राजनीतिक होड़ में भी कमी नहीं है। दलित के घर भव्य कारवां के साथ पहुंचकर बना-बनाया भोजन करना फैशन में है। इससे भी नहीं माना जा सकता कि सामाजिक दूरियां मिट जाएंगी।

फिर भी आज प्रेमी युगल हैं जो मुसीबतें उठाकर जाति तोड़ रहे हैं, अन्यथा जाति आज सर्वव्यापक रूप से स्वार्थप्रेरित तात्कालिक राजनीति का हथियार है। इस बिगड़े माहौल में दलित युवा आज भी एक बड़ी आशा हैं। काफी विद्यार्थी हैं जो रूढ़ियों से बाहर निकलकर अपने और अपने देश के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। ऐसे शांतिप्रिय और प्रगतिकामी व्यक्तियों की कमी नहीं है, जो धर्मों और जातियों के छाते को बड़े-छोटे अपराधियों के राजनीतिक शरणस्थल के रूप में देख रहे हैं। नव-उदारीकरण के इस दौर को भी समझने की कोशिश की जा रही है, जिसमें आरक्षण के अवसर सीमित हो चुके हैं। एक तरह से सभी चिंतनशील शांतिप्रिय लोग उद्विग्न हैं, किंकर्तव्यविमूढ़ता में नई राहें खोजते हुए।

शायद बहुत-से बुद्धिजीवी अब ऐसे इकहरे मूल्यांकनों से बाहर निकल रहे हैं कि दलितों की मुक्ति सिर्फ हिंदू धर्म की मौत में है। कांचा इलैया (पोस्ट-हिंदू इंडिया) को सोचना चाहिए, धर्म इस तरह नहीं मरा करते। इसलिए बाकी धर्मों की निर्बुद्धिपरकताओं पर चुप रहते हुए सिर्फ हिंदू धर्म की मौत की कल्पना करने से ज्यादा अर्थपूर्ण है सांप्रदायिक कट्टरताओं, कूपमंडूकता और उत्तर-सत्य से लड़ना।

ज्योतिबा फुले और किसान

हम पहले के कुछ दलित चिंतकों के विचारों, आंदोलनों और विद्रोहों में तीखेपन के अलावा व्यापक मानव मन की छवियां देख सकते हैं। ज्योतिबा फुले (1927-1890) ने देश में दलितों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ सबसे पहले असरदार आवाज उठाई थी। उन्होंने दलितों की समस्या पर केंद्रित पुस्तक ‘गुलामगिरी’ के अलावा एक अन्य किताब भी लिखी- ‘किसानों का कोड़ा’। इसमें ‘दलित’ की कैटेगरी का अतिक्रमण कर उन्होंने किसानों की समस्याओं को भी प्रधानता दी। उन्होंने कहा था, ‘जिनकी मेहनत पर सरकारी फौजी लवाजमा, गोला-बारूद, गोरे कर्मचारियों की हद से ज्यादा ऐयाशी और काले सरकारी कर्मचारियों को हद से ज्यादा वेतन, पेंशन और दान-दक्षिणा मिलती है, उन कृषकों को क्या पान-बीड़ी का भी सम्मान न मिलना चाहिए? भैया, जो सभी देशवासियों के सुख के आधार हैं, उनके इतने बुरे हाल हैं?’

देखा जा सकता है कि फुले को किसानों और पूरे देश की चिंता है। वे फौजी लवाजमावाले अंग्रेजी साम्राज्यवाद के प्रति भी क्रिटिकल हैं और ‘ऐयाशी’ पर आधारित कृत्रिम जीवन पर आक्रमण करते हैं। क्या आज के किसी दलित नेता ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट और एक खास वर्ग की ‘ऐयाशी’ पर कभी कठोर टिप्पणी की? मुक्त बाजार द्वारा दिखाए जा रहे स्वप्न आदमियत के कत्लगाह हैं, क्या उन्हें कभी ऐसा लगा? अपनी ऐयाशी को अवसर मानना, यह ज्योतिबा फुले या सावित्री बाई की दलित चेतना में नहीं था।

ज्योतिबा फुले ने अपने आंदोलन में ब्राह्मण-प्रभुत्ववाद के विरोध और दलित मुद्दे को प्रधानता देते हुए ‘किसान’ जैसी एक बड़ी कैटेगरी को महत्व दिया था, जो आज के लिए भी एक सबक है। इसके अलावा, वे महाराष्ट्र के सुधार आंदोलन की सामान्य लहरों से कटे हुए नहीं थे। वे सामुदायिक ‘विशिष्टता’ के साथ सर्वभारतीय ‘सामान्य मुद्दों’ से भी रिश्ता रखते थे। यह तथ्य कम महत्वपूर्ण नहीं है कि महाराष्ट्र के उच्च जातियों के सुधारकों ने स्त्री को अपने आंदोलन के केंद्र में रखने के बावजूद, लड़कियों के लिए पहला स्कूल (1848) फुले ने खोला।

हम फुले के पास क्यों नहीं आते?

हंटर कमीशन के सामने अपने बयान में ज्योतिबा फुले ने एक ब्राह्मण सुधारक विष्णुशास्त्री चिपलूणकर द्वारा खोले गए स्कूल के लिए बेहिचक सरकारी अनुदान की सिफारिश की, ‘कई निजी विद्यालय ऐसे हैं जिन्हें सरकारी अनुदान दिया जा सकता है। वे सक्षम रूप से सेवा दे सकते हैं’। इसके अलावा, वे उपर्युक्त बयान में औपनिवेशिक शिक्षा की आलोचना करते हैं, ‘सरकारी हाई स्कूलों में दी जा रही शिक्षा का स्वरूप बिलकुल उपयोगी नहीं है और न ही सामान्य जीवन की जरूरतों के लिए वह जरूरी है। वह महज क्लर्क और स्कूल शिक्षक बनाने के लिए है।… शिक्षण के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम में ऐसे व्यावहारिक पक्ष नहीं हैं जो छात्रों के भविष्य, उनके स्वतंत्र ढंग के जीवनयापन के लिए उपयोगी हों।’ जाहिर है, उनकी चिंता सिर्फ दलितों के हित तक सीमित नहीं है। उनके दृष्टिकोण को वर्तमान स्थितियों में लागू करते हुए देखा जा सकता है कि आज की शिक्षा भी व्यावहारिक स्तर पर कितनी सीमित है। यह नौजवानों को कॉल सेंटर जैसी जगहों पर बड़ी कंपनियों का सूचना- मालवाहक बनने से आगे बढ़ने नहीं दे रही है। यह बौद्धिक-सांस्कृतिक उन्नति की तरफ तो अग्रसर ही नहीं कर रही है।

फुले अंग्रेजी राज में सारे शिक्षित नौजवानों की बेकारी को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं, ‘शोर मचा हुआ है कि बाजार में ऐसे शिक्षित व्यक्तियों की संख्या बढ़ गई है जिन्हें वेतनवाली नौकरियां नहीं मिल रही हैं।’(वही)। फुले ‘बेकार शिक्षित नौजवान’ की एक नई श्रेणी सामने लाते हैं, जिससे दलित चेतना का समानुभूतिपूर्ण संबंध है।

विधवा पुनर्विवाह का समर्थन तथा बाल विवाह के विरोध में फुले भी थे। एक ब्राह्मण विधवा काशीबाई को फुसला कर गर्भवती बना दिया गया। उसने बच्चा जनने के बाद लोक लज्जावश अपनी संतान को मार डाला। इस पर उसे सजा हुई। वह स्त्री ब्राह्मण थी, यह देखकर फुले चुप नहीं रह गए। वे क्षुब्ध हुए, ‘मैं अंग्रेजी शासन से निवेदन करता हूँ कि वह कठोर वैदिक विधान से विधवाओं को मुक्त कराए।… किसी भी बाई को इन अभागी ब्राह्मण विधवाओं का मुंडन करने की अनुमति न हो। अगर विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार न हो तो विधुरों को क्यों हो?’ उन्होंने जघन्य पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर भी समान रूप से चोट की। आज आमतौर पर जो जाति व्यवस्था पर आक्रमण में स्पेशलिस्ट है, वह पितृसत्ता पर चुप रहता है और जो पितृसत्ता पर आक्रमण में स्पेशलिस्ट है, वह जाति व्यवस्था पर मौन धारण किए रहता है। यह एकांगी साहस है, जो उग्रता के बावजूद अंततः अकेला करता है।

फुले की दलित चेतना का नैतिक पहलू कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने ‘सत्य शोधक समाज’ बनाया था और 1889 में सत्य आचरण के 33 सूत्र दिए थे। इनमें कहा गया है कि अंधविश्वास, अन्याय, निम्न जाति के लोगों का अनादर, हिंसा, चोरी, झूठ, मतभिन्नता के कारण दूसरे की हानि, विद्रोही विचारों का दमन, आत्मप्रदर्शन, दूसरों में फूट डालने आदि प्रवृत्तियों को छोड़ना ही सत्य मार्ग पर चलना है। फुले ने कहा, ‘जो किसी भी प्रकार चोरी नहीं करता और भ्रष्ट व्यक्तियों की मदद नहीं करता, उसे सत्य मार्ग पर चलनेवाला मानना चाहिए।’ निश्चय ही उस युग से दलित आंदोलन का क्षेत्र आज काफी व्यापक हुआ है, उसकी मात्रा में वृद्धि हुई है। दलित पहले से अधिक शिक्षित हैं, पर क्या वे पहले से अधिक सचेतन भी हैं?

दलितों के प्रवक्ताओं को आत्मनिरीक्षण की जरूरत महसूस होनी चाहिए कि दलितों के भीतर का सामाजिक स्तर भेद कितना मिटा है, धार्मिक कूपमंडूकता से संघर्ष किस स्तर पर है, सारी पिछड़ी और निम्न कही जानेवाली जातियों की एकता ‘दलित’ श्रेणी में कितनी मूर्त हुई है और दलित नेताओं ने फुले का ‘सत्य मार्ग’ कितना अपनाया। निराला ने कहा था, ‘धोबी, पासी, चमार, तेली/खोलेंगे अंधेरे का ताला/ एक पाठ पढ़ेंगे टाट बिछाओ।’ वह पाठ साम्राज्यवाद-सामंतवाद के विरोध का था।

पेरियार ई.वी.रामास्वामी का दृष्टिकोण

भारत में एक खास उद्देश्य से अंग्रेजों ने जो जनसर्वेक्षण (1871) शुरू कराया था, उसमें जाति की कठोरता स्थापित करने के साथ नस्लीय दृष्टिकोण प्रधान होता गया था। स्कॉटिश मूल के भाषाशास्त्री राबर्ट काल्डवेल (1814-91) के प्रति तमिल लोगों के मन में बड़ा आदर है। उनकी एक बड़ी मूर्ति चेन्नई के मरीना तट पर है। उन्होंने तमिल भाषा के लिए तो काफी काम किया ही था, यूरोपीय नृवैज्ञानिकों के प्रचार में आकर ‘द्रविड़ नस्ल’ का सिद्धांत भी प्रतिपादित किया था। द्रविड़ अलगाववाद की जमीन तैयार करते हुए वे आर्यों और तमिल ब्राह्मणों को विदेशी कहते थे और दविड़ों को उत्तर भारत से अलग करके देखते थे।

आर्य-द्रविड़ नस्लीय विभाजन पैदा करने में फ्रेंच नृवैज्ञानिकों-जोसेफ आर्थर गोबिने (1816-82) और पाल टोपिनार्ड (1830-1911) के अलावा पहले जन सर्वेक्षण (1871) के अधिकारी हर्बट रिस्ले की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इन सबका ही औपनिवेशिक असर है कि 20वीं सदी में रावण, महिषासुर, नरकासुर आदि को मिथक समझने की जगह द्रविड़ मामले से जोड़ते हुए ‘ऐतिहासिक नायक’ बनाने की परंपरा स्थापित हुई। अन्यथा प्राचीन तमिल साहित्य में ये कहीं नायक नहीं थे, दलित माने जानेवाले तमिल कवियों के प्राचीन लेखन में भी नहीं।

काडवेल के नस्लीय औपनिवेशिक सिद्धांतों को विकसित करके पेरियार ई.वी. रामास्वामी (1879-1973) ने द्रविड़ आंदोलन की शुरुआत की। इसका  ब्राह्मणवाद और वैदिक परंपरा के साथ-साथ उत्तर भारत से विरोध था। दरअसल तमिलनाडु प्रांत में बड़े जमींदार ब्राह्मण थे। वे निम्न जातियों पर जिस किस्म के अत्याचार करते थे, उससे राबर्ट काडवेल और पेरियार ई.वी. रामास्वामी को ‘विदेशी ब्राह्मण’ की धारणा और समग्रतः उत्तर भारत के विरोध को सामाजिक आधार देने में आसानी हुई।

उल्लेखनीय है कि अंबेडकर आर्य-आक्रमण के नस्लीय सिद्धांत को नहीं मानते थे। यह भी देखा जा सकता है कि पेरियार रामास्वामी के ‘द्रविड़नाडु’ की धारणा को आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल ने अपनी स्वतंत्र जातीय चेतना के कारण स्वीकार नहीं किया। उनके प्रमुख शिष्य अन्ना दुरै ने भी 1962 के बाद पेरियार से अपना रास्ता अलग कर लिया। एक तथ्य यह भी है कि पेरियार के द्रविड़ आंदोलन के बावजूद हिंदू देवी-देवताओं में विश्वास, बल्कि कई मामलों में घनघोर अंधविश्वास किसी अन्य राज्य से तमिलनाडु में कम नहीं है, हालांकि सांप्रदायिकता न्यूनतम है।

पेरियार रामास्वामी ने ‘द्रविड़नाडु’ की विचारधारा के तहत आत्मसम्मान आंदोलन चलाया था, जिससे तमिल लोग बड़े पैमाने पर पुरोहितवाद के प्रपंच से बाहर निकल पाए थे। इसके अलावा, उन्होंने अपने दलित आंदोलन के भीतर एक बड़ा स्वप्न रचा था, ‘नई दुनिया में किसी को चोरी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सभी के पास आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी। न कोई किसी की हत्या करने का विचार अपने दिमाग में लाएगा। दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे। किसी को आर्थिक बर्बादी झेलनी नहीं पड़ेगी। आत्मसम्मान से भरे समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा। ऐसे समाज में जीवन और सेक्स संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार और मानवीय होगा। स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावना का सम्मान करेंगे। स्त्री की दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी।’ इन विचारों से पेरियार अपनी उदारवादी विश्वदृष्टि का निर्माण करते हैं, जैसा उस युग के चिंतनशील व्यक्ति किसी न किसी जमीन पर जरूर सोचते थे।

ई.वी. रामास्वामी आक्रोश में कहते हैं, ‘उस ईश्वर को नष्ट कर दो जो तुम्हें शूद्र कहता है।’ यदि अन्य कई धर्मों के ईश्वर बचे हों तो अकेले हिंदू धर्म का ईश्वर कैसे नष्ट हो सकता था! धर्मग्रंथों को भी जला देने भर से निर्बुद्धिपरक मानसिकता बदल नहीं सकती थी। दरअसल एक तरह की निर्बुद्धिपरकता का दूसरी तरह की निर्बुद्धिपरकता खड़ी करके सामना नहीं किया जा सकता, क्योंकि तब एक तीसरी तरह की निर्बुद्धिपरकता का रास्ता खुल जाता है!

केरल के दलित आंदोलन की खूबियां

केरल को धार्मिक पागलखाना कहा गया था। इस प्रदेश में दमनमूलक जाति व्यवस्था कम मजबूत नहीं थी। इसका मुख्य तर्क भाग्यवाद था। फिर भी बड़े अनोखे ढंग के दलित आंदोलन इस प्रदेश में चले। उनका उद्देश्य वस्तुतः भाग्यवाद में विश्वास को बदल डालना रहा है। केरल में नंबूदिरी ब्राह्मण-वर्चस्व को दी गई चुनौतियों में देखा जा सकता है कि उनमें प्राचीन भारतीय परंपराओं से पूर्ण विच्छेद नहीं है। दरअसल भारत की स्थानीय विशिष्टताओं के अनुसार दलित जागरण की विविधता को समझने की जरूरत है।

उदाहरण के तौर पर नारायण गुरु एझवा जाति के थे, जिनका पेशा ताड़ी निकालना है। केरल ताड़ और नारियल के वृक्षों से पहचाना जाता है। नारायण गुरु (1854-1928) ने एक अलग शिव मंदिर की स्थापना की और नदी से एक पत्थर लाकर शिवलिंग की स्थापना कर दी। इसपर ब्राह्मणों द्वारा विरोध होने पर उन्होंने जवाब देते हुए कहा- ‘ये एझवा लोगों के शिव हैं, आपके नहीं!’ उनकी प्रधान शिक्षा है, ‘मनुष्य के लिए एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वरवाला सनातन धार्मिक दृष्टिकोण ही हमारा धर्म है।’ उन्होंने 1916 में जोर देकर कहा था, ‘मनुष्य-निर्मित जाति विभाजन का कोई महत्व नहीं है। वह दूषित है, उसका कोई मूल्य नहीं है। उसे मिटा देना चाहिए।… किसी के भी धार्मिक विचारों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।… किसी को यह कहने का हक नहीं है कि मेरा धर्म सत्य है और बाकी धर्म असत्य हैं। सभी धर्मों में सत्य का अंश है।’ उन्होंने यह भी कहा, ‘आवश्यक है तो छोटा मंदिर बनाएं। अब स्कूल ही प्रमुख देवालय हों।’ उनका दलित आंदोलन रचनात्मक, शैक्षिक और सामाजिक कामों से जुड़ा हुआ था।

नारायण गुरु ने 1924 में ब्राह्मणों के नियम तोड़ते हुए वायकोम के शिव मंदिर के रास्ते पर चलकर सत्याग्रह किया। इसकी वजह से शराब पिए हुए सवर्णों ने उनपर हमला कर दिया। इस सत्याग्रह के संदर्भ में नारायण गुरु और गांधी के बीच संवाद हुआ था। यह आंदोलन भीतरघात, सवर्णों के बल प्रयोग और अंग्रेजों की चालाकी भरी उदासीनता के कारण कुचल दिया गया। गांधी को भी नंबूदिरी ब्राह्मणों द्वारा अपमानित होना पड़ा। उन्हें टकराव की भयंकरता को देखकर पीछे हटना पड़ा। मंदिर प्रवेश 1934 में संभव हो पाया। वायकोम सत्याग्रह की व्याख्या कई तरह से की जाती है।

त्रावणकोर राज्य में निम्न जातियों की स्त्रियों को कमर के ऊपर वस्त्र पहनने और वक्ष ढकने की मनाही थी। नग्न वक्ष उच्च जातियों के प्रति सम्मान प्रदर्शन का चिह्न था। वक्ष ढकने के लिए राज्य के राजा को टैक्स देना पड़ता था। ऐसी कू्ररता हिंदी प्रदेशों में नहीं थी। दलितों ने संघर्ष किया तो 1859 में स्त्रियों को वक्ष ढकने की अनुमति दी गई। दरअसल उन्हें कभी कुछ भी संघर्ष किए बिना नहीं मिला, भले धीरे-धीरे कई विवेकवान सवर्ण उनके आत्मसम्मान और अधिकारों के समर्थक होते गए। हालांकि शॉर्ट कट रास्ता अपनाते हुए दलित ‘प्रतीक’ भी बना दिए गए, बस एक या दो व्यक्तियों को ऊपर बैठा दो!

केरल में जाति विभाजन का वीभत्स रूप रहा है। फिर भी ब्राह्मणों के दंभ और विशेषाधिकारों को तरह-तरह से चुनौती दी गई। इस प्रदेश में हर दीगर जाति के लोगों के लिए नियम बने हुए थे कि किस जाति के लोगों को ब्राह्मणों से कितने फुट की दूरी पर रहना चाहिए। 1893 में अय्यनकलि उच्च जाति के लोगों जैसे कपड़े पहन कर अपनी बैलगाड़ी लेकर उन सड़कों पर निकल पड़े जिन पर निम्न जातियों के लोगों के आने की मनाही थी। ऊँची जातियों के लोगों ने रोकने की कोशिश की, पर वे सफल नहीं हुए। इस सफलता से निम्न जातियों के लोगों में आत्मविश्वास पैदा हुआ। अय्यनकलि ने लोकगीतों और नाटकों के जरिए दलित स्वाभिमान और सामाजिक बराबरी का प्रचार किया था।

निम्न जाति के बच्चों के पढ़ने पर पाबंदी थी। अय्यनकलि ने कहा, ‘यदि आप हमारे बच्चों को स्कूल में पढ़ने नहीं देंगे तो आगेे से कोई भी आपके खेतों में काम नहीं करेगा और वहां घास उगेगी।’ 1913 में खेतिहर मजदूरों की हड़ताल को नेतृत्व देने के कारण वे ट्रेड यूनियन आंदोलन के जनक के रूप में भी देखे जाते हैं। यह दलित आंदोलन और श्रमिक आंदोलन में संबंध का उदाहरण है।

1937 में जब गांधी केरल के दौरे पर गए, वे अय्यनकलि से बैंगलोर में मिले। गांधी ने उनसे कहा, ‘हम दोनों आजादी के लिए लड़ रहे हैं।’ अय्यनकलि ने कहा, ‘मैं आपके प्रेम को भूल नहीं सकता।’ गांधी ने उनसे पूछा, ‘आपको और क्या चाहिए?’ अय्यनकलि ने जवाब दिया, ‘मैं चाहता हूूँ कि मरने से पहले दलित जातियों में कम से कम दस ग्रेजुएट देख सकूँ।’ इस बातचीत से इसका बोध होता ही है कि ‘राष्ट्रीय आंदोलन’ और उसके ‘हाशिए’ के बीच संवाद था। इसका भी पता चलता है कि उस काल के दलित व्यक्तियों के स्वप्नों, इच्छाशक्ति और संघर्ष में कितनी व्यापकता थी। वे समझ रहे थे कि किसी एक जाति या समुदाय में होने का अर्थ दूसरी जाति या समुदाय के लोगों से स्वार्थपूर्ण या शत्रुतापूर्ण संबंध रखना नहीं है। वे कठिन मौकों पर चुप रह जानेवाले या अवसरवादी होकर रास्ता बदलते रहनेवाले नहीं थे।

दलित जागरण के दौर में, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों सहित पूरे देश में जिन भेदभाव-विरोधी संगठनों या संस्थाओं का निर्माण हुआ, वहां आगे चलकर जड़ता आ गई। कोई नई चेतना जब अपनी प्रखर गतिशीलता खोकर गुड़ की ढेली समान बन जाती है तो वह मोटी-चमकीली मक्खियों का बसेरा हो जाती है।

अंबेडकर के बाद दलित चिंतनशीलता के नए दरवाजे नहीं खुल पाए। सत्ता संघर्षों में तात्कालिक फायदे के लिए ‘भिन्नता’ का उग्र महिमामंडन प्रधान हो गया। पुरानी धार्मिक रूढ़ियों और सामाजिक दीवारों को तोड़ने की मूल भावना पृष्ठभूमि में चली गई। ऊपर से कइयों के सुख, आराम और विलासितापूर्ण जीवन  ने उनके बड़े लक्ष्यों को धुंधला कर दिया। पेट गुड़गुड़ाने पर आम आदमी भी सोचता है कि उसने पिछले दिन क्या खाया था। बौद्धिक दुनिया में ऐसे आत्मनिरीक्षण की मति कमजोर हो गई। सबसे बड़ा अभाव हिंदी क्षेत्र के नेतृत्व से आदर्श उदाहरणों की कमी है।

देखा जा सकता है कि पिछले दशकों में राष्ट्रीयता, लोकतंत्र, वामपंथ और सामाजिक न्याय के आदर्श सिकुड़ते गए हैं। आधुनिकता का संबंध दृष्टि से नहीं रह गया  है, सिर्फ फैशन से है। इसलिए सवाल खड़ा होता है कि जाति, धर्म, प्रांतीयतावाद आदि को लेकर संकीर्णताओं के खिलाफ जो संघर्ष 19वीं सदी और 20वीं सदी के पूर्वार्ध में चले थे, क्या उनसे लोकतांत्रिक चेतना-संपन्न दलों की शक्ति वृद्धि का संबंध जरा भी बना रह सका है?

सत्ता में लंबे-लंबे समय तक रहते हुए स्वातंत्र्योत्तर उदारवादियों ने जाति और धर्म-संबंधी रूढ़ियों को सचमुच कितना तोड़ा? क्या उन्होंने सांस्कृतिक सुधारों को आगे बढ़ाया और वे अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से ऊपर उठ सके? क्या उन्होंने अपने जीवन में सादगी और नैतिकता का परिचय दिया, जैसा कभी दलित आंदोलनकारियों के साथ-साथ पुराने दौर के उदार राष्ट्रवादियों और वामपंथियों ने दिया था?

नतीजा यह हुआ कि आधुनिकीकरण के भौतिकवादी-सुखवादी प्रवेश के लिए तो सभी बंद दरवाजे टूट गए, लेकिन उसके बुद्धिपरक मानवीय प्रसार को रोकने के लिए लौह दीवारें बन गईं!

दुनिया का बदलना अभी रुका नहीं है

देखा जा सकता है कि रवींद्रनाथ, प्रेमचंद और गांधी के दौर से ही जाति और धार्मिक समुदाय पर आधारित राष्ट्रवाद के विरोध का एक अटूट सिलसिला रहा है। यह भी साफ है कि आम जनमानस में बड़े पैमाने पर मौजूद जातिवाद, धार्मिक रूढ़ियों और सामंती निरंकुशता को आजादी के बाद दूर करने का सचेत रूप से व्यापक प्रयास नहीं किया गया, बल्कि उन्हें पाला-पोसा गया।

यह भी देखा जा सकता है कि एलीट बुद्धिजीवियों ने प्राचीन और नवजागरणकालीन सांस्कृतिक विरासत के प्रति उच्छेदवादी दृष्टिकोण का परिचय दिया। जबकि सामाजिक भेदभाव बढ़ानेवाले निर्बुद्धिपरक संस्कारों और विश्वासों को इसी देश के उच्च सांस्कृतिक आदर्शों और महान साहित्य पर सकारात्मक चर्चा करके मिटाया जा सकता था। दरअसल अपने हजारों साल के इतिहास और संस्कृति से सृजनात्मक साझापन न रखना और उच्छेदवादी उग्रता दिखाना भूमंडलीकरण के दौर में कुछ अधिक निस्सहाय कर सकता है।

भारत की बहुलता में श्रेष्ठता के काफी तत्व हैं। उन्हें अब भी खोजकर  उपयोग में लाया जा सकता है। लेकिन आज भी देखा जाए तो दलितों पर अत्याचार को लेकर चिंता, सांस्कृतिक सुधारों और भारतीय एकता के प्रयत्नों की जगह चुनावी समीकरण के जरिए निजी शक्ति वृद्धि ही प्रधान लक्ष्य है और हर तरफ कलह बढ़ रहा है। देखा जाए तो आमतौर पर भारत के नेता ही भारतीय जनता की एकता और सांस्कृतिक सुधार के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा हैं। इसलिए चिंता होती है कि पता नहीं अतीत के प्रेत आधुनिकतम औजारों से अब और कैसे-कैसे संकट लाएंगे, मनुष्य की विवशता किस हद तक बढ़ती जाएगी और हमारे नेता कब सुधरेंगे।

अंबेडकर ने यह भी कहा था, ‘हम ब्राह्मणों के विरुद्ध नहीं हैं। हमारा आक्रमण ब्राह्मणवाद पर है। हमें ब्राह्मणवाद-ग्रस्त ब्राह्मणेतर आदमी दूर प्रतीत होता हैै और ब्राह्मणवाद रहित ब्राह्मण नजदीक लगता है।’ वे देखते थे कि सभी जातियों में आजादी, समता और बंधुत्व का अभाव है। कहते थे, ‘पहले भारतीय आखिर में भारतीय और भारतीयता से परे कुछ नहीं चाहिए।’ (संपूर्ण वाङ्मय, खंड-39)। अंबेडकर ने दलित आंदोलन में पुरानी रूढ़ियों और संस्कारों के विरोध के साथ सभी किस्म के भेदभावों का विरोध किया था। ऊपर के कथन से यह भी स्पष्ट है कि उनके चिंतन में ‘कॉमन प्लेस’ की धारणा मौजूद थी,  क्योंकि सवर्ण हों या दलित- वे बदलना शुरू कर चुके थे। कैसी विडंबना है कि आज मार्केट प्लेस के बाहर कुछ भी ‘कॉमन’ नहीं है!

कहना न होगा कि वर्तमान विद्वेष, खाई और  बढ़ती हिंसा के माहौल में बाजार के बाहर भी ‘कामन प्लेस’ की जरूरत है, जहां असहमत लोग भी खड़े हो सकें, सभी संवाद कर सकें और एक-दूसरे को शत्रु न समझें। ऐसा कॉमन प्लेस बनाने की जिम्मेदारी सबसे अधिक उनपर है जो विविध तरह से उत्पीड़ित हैं।

यह देखना महत्वपूर्ण है कि हमारे पास क्या चीजें ज्यादा हैं- अतीत की बुरी स्मृतियां या भविष्य के बड़े स्वप्न। इसी पर निर्भर करेगा कि भारत के भावी इतिहास में अंधेरा है या उजाला। इस समय न वैश्वीकरण एक जाति और एक धर्म को लेकर चल सकता है और न लोकतंत्र एक जाति और एक धर्म को लेकर चल सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि दुनिया का बदलना अभी रुका नहीं है। इसलिए पुरानी खाइयां और जंजीरें अंतिम सत्य नहीं हैं।