शंभुनाथ

1918 में भारत में स्पेनिश फ्लू नाम से आई महामारी ने भारतीय स्थितियों में दो बड़े परिवर्तन ला दिए थे। एक, इसने दमनमूलक अंग्रेजी राज के प्रति लोगों के मन में असंतोष भर दिया, जिससे प्रथम सत्याग्रह आंदोलन के लिए जमीन मिली।

दूसरे, देश में एक अनोखा नजारा देखने को मिला। कई धार्मिक और जाति केंद्रिक संगठन भेदभावों से ऊपर उठकर जगह-जगह राहत कार्य करते नजर आए। उन्होंने दवाखाने खोले, शव हटाए और शव-संस्कार की व्यवस्था की। छोटे हास्पिटल बनाए, चंदा संग्रह करके कपड़े, भोजन और दवाएं बांटीं। उस दौर की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘भारत के इतिहास में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। महामारी में समाज के शिक्षित और प्रतिष्ठित लोग बड़ी संख्या में सामने आए। उन्होंने अपने गरीब देशवासियों को उनके इस दुख के समय मिलकर मदद दी।’ यह एक अनोखे नागरिक परिसर के उभरने का संकेत है।उसी समय ‘समाजसेवा’ शब्द भी लोकप्रिय हुआ। लोग धर्म के दायरे से बाहर निकलने लगे और जातियों की दीवारें टूटने लगीं- नागरिक परिसर के बनने में तेजी आई।

1918 की महामारी भारत के लिए एक बड़ी विपत्ति थी, जो रास्ता दिखा गई। मई1918 में प्रथम विश्वयुद्ध से लौटे सैनिक बंबई बंदरगाह में यह बीमारी लेकर आए थे। अंग्रेजों ने सख्ती करने के अलावा राहत-कार्य से प्राय: हाथ झाड़ लिया था। देश के लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। गांधी उस समय साबरमती आश्रम में थे और कई आश्रमवासियों सहित खुद बुखार से पीड़ित थे। वे सिर्फ इतना कह पाए थे, ‘जिंदा रहने की सारी रुचि मिट गई थी।’ उन्होंने अपना बड़ा बेटा खो दिया था। उन्हीं दिनों निराला ने गांव में अपनी पत्नी सहित परिवार के कई व्यक्तियों को खो दिया था और गंगा में बहती लाशें देखी थीं। कोई आश्चर्य नहीं, यदि महामारी ने छायावादियों के‘आकाश-से उन्मुक्त मन’की रचना में एक प्रेरणा का काम किया हो।

महामारियां सिर्फ विनाश नहीं लातीं

बाल गंगाधर तिलक ने ‘केसरी’ (22 अक्तूबर 1918) में सवाल उठाया था, ‘बड़े शहरों में डाक्टर, स्वयंसेवक और अस्पताल की व्यवस्था है भी, पर ये सुविधाएं गांवों में कैसे पहुंचेंगी? क्या यह उचित नहीं है कि सरकार चलायमान दवाखानों की व्यवस्था करे?’ उस समय बंबई के कई बड़े लोग और अफसर बर्फीले पहाड़ों पर आनंद के लिए चले गए थे। इस पर ‘यंग इंडिया’ ने व्यंग्य किया था कि ‘जनता को ईश्वर की कृपा पर छोड़ दिया गया है।’ तिलक ने 1896-97 की महामारी के समय भी औपनिवेशिक दमन की तीखी आलोचना की थी। उस समय सावित्री फुले की जान प्लेग के शिकार एक युवक की जान बचाने के दौरानगई थी। वे उसे अपनी पीठ पर लाद कर सेवा के लिए खोली गई क्लिनिक में ले आईथीं। उस दौर में भी महामारी ने सामाजिक स्वयंसेवकों को धर्मऔरजाति-दृष्टियों से ऊपर उठाया था।

तिलक ने 1918 की महामारी के दौरान चिंता व्यक्त की, ‘आम लोगों का यथार्थ शुभेच्छु कौन है? इस समय भारत के विभिन्न समुदायों में परस्पर प्रेम है या घृणा? पिछड़ी जातियों (अस्पृश्यता के कारण सबसे ज्यादा इनके लोग मारे जा रहे थे) की देखभाल कौन कर रहा है? क्या भारत के लोगों में इस समय अपनी जिम्मेदारी का बोध है और इतनी ऊर्जा है कि वे खुद कुछ काम अपने हाथों में लें और उन्हें पूरा करें और कितने लोगों में इस जिम्मेदारी का बोध है?’ (केसरी, 1918)। ये सारे प्रश्न एक हिंदू नेता के हैं, जिनसे शायद ही बड़ा हिंदू आज कोई हो।

देखा जा सकता है कि 20वीं सदी के उन आरंभिक दशकों में किस तरह स्वत:स्फूर्त राहत कार्यों और समाचार पत्रों में औपनिवेशिक व्यवस्था की आलोचना के बीच से एक उदार नागरिक परिसर बनने लगा था।

सवाल हैं, 2020-21 की कोरोना महामारी के दौरान जन्मे जन-असंतोष से कौन से नए परिवर्तन आएंगे, उदार नागरिक परिसर कितना विस्तृत होगा और  राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के पथ क्या होंगे? कहा जा सकता है कि  महामारियां सिर्फ विनाश नहीं लातीं, जीवन की नई राहें भी खोलती हैं।

समुदाय और नागरिक परिसर में फर्क

हम देख सकते हैं कि आपस में विभाजित आमलोगों के उदार लोकवृत्त या नागरिक परिसर में बदलने का एक इतिहास है। इसका संबंध साझी संवेदना और साझाज्ञान से है, संकीर्ण घेरेबंदियों से निकलने से है और ‘पिछले कलंक- वर्तमान संकट’ को समझकर निर्माणात्मक उद्देश्यों की ओर बढ़ने से है। छोटे-छोटे समुदायों के, वे चाहे धार्मिक हों, चाहे जातिगत या जातीय समुदाय हों, अपने खास नियम-आदर्श-आराध्य हो सकते हैं, पर ऐसा नहीं है कि  सिर्फ आधुनिक युग में, पहले भी भारतीय साझापन की खोजें हुई हैं। निश्चय ही पहले भी भेदभाव और वर्चस्व की कोशिशें कम शक्तिशाली नहीं थीं। उदाहरण के तौर पर पिछली सहस्राब्दियों में जब भक्ति आंदोलन चल रहा था, ‘सारी नदियों  के एक समुद्र में मिलने का भाव’ फैल रहा था। भक्ति एक साझी अनुभूति थी। समानांतर रूप से एक ही धर्म में शैव-वैष्णव मतवादी संघर्ष और अन्य कई तरह के सांप्रदायिक संघर्ष थे। कहना न होगा कि वे सत्ता संघर्ष के खेल थे।

चिंताजनक यह है कि 21वीं सदी में  ‘भारतीय साझेपन’ की जगह पुराना ‘सामुदायिक भेदभाव’ प्रबल है और उदार नागरिक परिसर का निर्माण महामारी तक के दौर में गत्यवरोध का शिकार है।

समुदाय और नागरिक परिसर(पब्लिक स्फीयर) में फर्क है। समुदाय में कोई आदमी स्वेच्छा से शामिल नहीं हो सकता है, वह ब्राह्मण या दलित जाति समुदाय हो, बंगाली या मराठी जातीय समुदाय हो या नगा जनजातीय समुदाय। समुदाय में निजी इच्छा या व्यक्तिगत स्वतंत्रता कोई मायने नहीं रखती। हर समुदाय विशिष्ट होता है। वह व्यक्ति पर समूह को प्रधानता देता है। उसमें अपनी विशिष्टता और ‘दूसरे’ से पृथकता का बोध होता है, भले हमेशा कठोरता न हो। समुदाय की एक खूबी है कि इसके लोगों की आपस में सहज निकटता होती है, जैसे तोता तोते के साथ या कौवा कौवे के साथ उड़ता है। समुदाय से बंधे लोग एक धर्म, एक जाति, एक जातीयता या भाषा के होते हैं। समुदाय आदमी को आकर्षित करता है, शरण देता है, सहानुभूति रखता है और निचोड़ लेता है। 19वीं सदी  के नवजागरण काल में समुदाय पिघलकर  समाज बनने लगे थे। बिना अपने समुदाय को छोड़े भी एक आम नागरिक परिसर तैयार होने लगा था। यह ‘भारतीय राष्ट्र’ के रूप में पुनर्गठित होने का एक नया अनुभव था। क्या हम आज उस अनुभव से गुजर पा रहे हैं?

नागरिक परिसर एक गतिशील जगह है। इसमें सभी को शामिल होने की स्वतंत्रता है। इसमें निजी इच्छा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मायने हैं। कानून की नजर में भी सभी समान होते हैं। भेदभाव नहीं किया जा सकता, यदि कानून का पालन हो रहा हो। समुदायों के खुलेपन, गतिशीलता, अंतर्विलयन और एक सार्वजनिक  क्षेत्र के निर्माण से बृहत्तर समाज अस्तित्व में आता है। समाज में ऐसा कॉमन प्लेस एक बड़े मन से बनता है। यह जागरूक और दायित्वशील लोगों की जगह है, जहां असहमति के प्रति आदर होता है। समाज झुंड से एक अलग जगह है, जहां ‘उन्माद’ की जगह ‘बुद्धिपरक सोच’ की प्रधानता होती है। हमारे समाज में ‘कामन प्लेस’ कितना बचा है?

संकीर्णताओं के शिकंजे से कितना बाहर निकला पब्लिक स्फीयर

21वीं सदी की महामारी के दौर में भी आम लोग ‘ईश्वर की कृपा’ पर ज्यादा छोड़ दिए गए। राष्ट्र-राज्य ने लापरवाहियां बरतीं। हर महामारी की तरह इस महामारी में भी अंधविश्वासों का प्रचार जमकर हुआ। गोमूत्र पीने, गोबर से नहाने और यज्ञ करने को कहा गया। एक आयुर्वेद कंपनी ने कोरोना के उपचार का भ्रम फैलाकर सिर्फ बिजनेस किया। इस बार अंग्रेजों का राज न था, फिर भी हर तरफ एक लावारिसपन देखने को मिला। इस बार भी गंगा में लाशें बहने लगीं। ऐसे उदाहरण सामने आए कि सरकारी तौर पर लाशें जलाने की लकड़ियों के लिए जो पैसे मिले थे, उनके लालच में दायित्वप्राप्त लोगों ने लाशें जलाने की जगह उन्हें नदी में बहा दिया। अस्पताल के बेड नोट छापने वाली मशीन बन गए। महामारी की दूसरी लहर के समय दुनिया के किसी भी देश की तुलना में भारत में अमानवीयताओं के अधिक घृणित रूप सामने आए- विश्वगुरु का असली चेहरा दिख गया।

इसमें संदेह नहीं कि अमानवीयताओं के समुद्र में परदुख कातरता और दयालुता के कई द्वीप थे। अनगिनत डाक्टरों और चिकित्सा-कर्मियों ने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। सिखों ने आगे बढ़कर सेवा की, लेकिन धनाढ्य मंदिर और मस्जिद पत्थर बने रहे।निजी स्तर पर  संस्थाओं, गली-मुहल्लों के लड़कों-लड़कियों ने जरूरतमंदों को भोजन पहुंचाया। सभी धर्मों के आम नागरिक आगे आए। लेकिन हमारे ज्यादातर फिल्मी हीरो-हिरोइनें और अमीर खिलाड़ी छिपे रहे। खैर, जो आगे आए उन्होंने सेवा करते हुए किसी का धर्म नहीं पूछा, जाति नहीं पूछी।

इस बार भी मानवता की नदियां सूखी नहीं थीं, लेकिन आमस्वयंसेवक आक्सीजन, वेक्सिन और बेड तो नहीं जुटा सकते थे! धधकती चिताओं की कतारों ने भारत की अंतरात्मा को हिला दिया। देखने की जरूरत है कि संकीर्णताओं के शिकंजे से आखिरकार कितना बाहर निकल पाया हमारा पब्लिक स्फीयर?

महामारी की भयंकरता के बावजूद आज भी विज्ञान की तुलना में धर्मांधता ज्यादा बड़ी सामाजिक शक्ति है। कोरोना से लड़ने के लिए जिस वैज्ञानिक और नागरिक मानस की जरूरत है, उसे पिछले कुछ दशकों से किस बुरी तरह ध्वस्त किया गया है, यह हमने देखा है। कोरोना महामारी का सबक है, आम लोगों के  मानस को वैज्ञानिक और लिबरल बनाया जाए। इस समय जो जन-असंतोष है, उसके भीतर से ऐसे मानस का कितना निर्माण हो रहा है, यह आत्मनिरीक्षण का मामला है।

नागरिक परिसर के समक्ष चुनौतियां

सवाल सिर्फ हिंदी जनमानस का नहीं है। वह इतिहास  में सबसे ज्यादा छला गया है और वस्तुत: अपनी सांस्कृतिक महानताओं से सबसे अधिक विच्छिन्न कर दिया गया है। हमारा ध्यान नागरिक परिसर के समक्ष उपस्थित नई चुनौतियों की तरफ जाना चाहिए। चिंताजनक यह है कि इतनी भयंकर महामारी के दौर में भी ‘भारतीय साझापन’ और एक प्रखर ‘उदारवाद’ को लेकर गंभीरता दिखाई नहीं पड़ रही है। देश पर किस्म किस्मकी स्वार्थपरता भारी है। विविधता स्वार्थपूर्ण भिन्नता में बदलती जा रही है। विविधता एक शक्ति तभी बन सकती है, जब उसमें समावेशी अखंडता हो। उन्माद की जगह बुद्धि की प्रधानता हो। आखिरकार कहीं पर तो हिंदू-मुसलमान, तमिल-बंगाली-हिंदी-मराठी, ब्राह्मण-पिछड़ा- दलित आदि की झुंडवृत्ति से मुक्ति हो- एक कॉमन प्लेस हो। हम अतीत के कीचड़ से बाहर निकलें और वहां से लोकमंगल की चीजें चुनें। हमारे समय में मानसिकता कछुआ-सी और भौतिक इच्छाएं जिराफ की तरह हैं।

देखा जा रहा है कि बड़ी बारीकी से मानवता, धर्मनिरपेक्षता और नागरिक-परिसर की धारणाएं पृष्ठभूमि में जा रही हैं। एक नया परिदृश्य बन रहा है, महासंकीर्णता कई अन्य संकीर्णताओं को चुपचाप उभार रही है। उदारवाद बीमार है और संकट में है। ऐसे में सबसे बेचैन करनेवाला प्रश्न है कि विविधता का स्वार्थपूर्ण भिन्नतावाद से अलग नैरेटिव कैसे बने?

सौ साल पहले भी भारत एक मृत्यु-आंधी से, महामारी से बाहर निकला था। उसमें आज से बहुत-बहुत ज्यादा डेढ़ करोड़ लोग मारे गए  थे। पर उसके भीतर से एक देश जैसे किसी नींद से जगा था। इस बार भी महामारी को जाना होगा। सवाल है, हम कैसे भारत की अगवानी के लिए खड़े हैं?