शंभुनाथ

भारत में अति-विकसित टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अति-पिछड़े मानस द्वारा हो रहा है। वैज्ञानिक मानसिकता का चरम अभाव है। समस्या यह है कि बाजार और राजनीति पर मानवीय नैतिकता का जरा भी नियंत्रण नहीं है। ये दोनों अब निरंकुश हैं। ये यथार्थ को अपने उद्देश्य के अनुरूप ढालने में कुशल हैं, करिश्माई हैं और साधारण लोगों को प्रलोभनों से सम्मोहित करने में सक्षम हैं। ऐसे में विज्ञान के स्वच्छंद होने की संभावना बहुत कम रह जाती है। उसकी स्वायत्तता खो जाती है। वह बंधुआ मजदूर से ज्यादा नहीं होता, उसके उपयोग की हदें बांध दी जाती हैं। आज एक बड़ा सवाल है कि मंगल ग्रह पर जाने और तमाम तरह के वायरसों की समझ बढ़ाने में क्या अधिक जरूरी था? कोरोना मामले में विज्ञान क्यों पीछे रह गया?

विज्ञान का आज दुनिया में जितने बड़े पैमाने पर स्वार्थ-भरा इस्तेमाल हो रहा है, शायद मानव इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ होगा। रोजाना उपभोग की चीजें तैयार करने का मामला हो या कृत्रिम मेधा (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) बनाकर मानव-श्रम की कटौती का मामला हो या संहारक युद्ध उपकरण बनाकर सैन्य-शक्ति प्रदर्शन उद्देश्य हो। सूचना संसार पर कब्जे का मामला हो या पेटेंट कराने की होड़ हो। कुछ नहीं तो नई तकनीक से चोरी-डकैती, बेईमानी या इमेज मैंनेजमेंट का इरादा हो। अब विज्ञान का बड़े पैमाने पर ऐसे ही उद्देश्यों से उपयोग किया जा रहा है। देखा जा सकता है कि टेक्नोलॉजी को विकसित करने के लिए ही विज्ञान का दोहन होता है।

ठीक इसी समय धर्म, पर्यावरण सजगता, अंधविश्वासों-कुरीतियों और आम सभ्यता के प्रश्नों पर विज्ञान को दरवाजे के बाहर रोक दिया जाता है। क्योंकि इन मामलों में वह स्वार्थों की रक्षा में सहायक नहीं होता। विज्ञान को बाजार की वस्तुओं के मामले में प्रोत्साहन देना और मानव चेतना की प्रगति के मामले में अवरुद्ध करना हमारे समय की एक बड़ी विडंबना है।

सैकड़ों साल पहले से, चाहे वह भारत में आर्यभट्ट, वराहमिहिर का युग हो या यूरोप में गैलेलियो-ब्रूनो का, सत्ताएं आमतौर पर वैज्ञानिक चेतना के विरुद्ध रही हैं। वे मिथकों को ही विज्ञान बताती रही हैं और कई बार हिंसक हो उठी हैं।

विज्ञान और सत्ता के बीच भौतिक लाभ के लिए किन तरीकों से संबंध बने, यह हम अंग्रेजी राज के कुछ औपनिवेशिक उदाहरणों से समझ सकते हैं। भारत में अंग्रेज शुरू में आंधी-तूफान, प्राकृतिक विपदाओं और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से भयंकर रूप से परेशान थे। इसलिए 1785 में कलकत्ता के फोर्ट विलियम में मौसम विज्ञान का केंद्र खुला। बाद में बंबई, त्रिवेंद्रम, शिमला जैसी जगहों में भी मौसम-संबंधी तथ्य संग्रह किए जाने लगे। ग्रामीण लोगों का काम तो घाघ कवि जैसों से चल जाता था। अंग्रेजों को समुद्री रास्ते से आना-जाना पड़ता था और उन्हें व्यापारिक लूट करनी थी। इसलिए खासकर 18वीं सदी में कर्नल पियार्स और 19वीं सदी की शुरुआत में जेम्स प्रिंसेप ने उनके लिए मौसमवैज्ञानिक सेवाएं मुहैया कराईं ।  कलकत्ते में प्रिंसेप के नाम पर गंगाघाट अभी भी है।

1835 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज खुला। लंबे समय तक हिंदीभाषी उसे मटिया कालेज बोलते रहे हैं। इसी समय मद्रास में आधुनिक चिकित्सा केंद्र खुला था। इन सबका लक्ष्य भारत में रहनेवाले अंग्रेज प्रशासकों, व्यापारियों और सैनिकों के स्वास्थ्य की देखभाल करना था। अंग्रेजों के कृपापात्र जमींदार भी लाभ उठाते थे। इसमें संदेह नहीं कि अंग्रेज शुरू से विज्ञान का उपयोग अपने साम्राज्य-विस्तार और सिर्फ अपने लाभ के लिए कर रहे थे। उस दौर में भौतिक और रसायनशास्त्र की तुलना में उनकी दिलचस्पी धातु, खनिज और वनस्पति शास्त्र में ज्यादा थी, क्योंकि उन्हें भारत का प्राकृतिक दोहन करना था।

उदाहरणस्वरूप हावड़ा में 1787 में बोटेनिकल गार्डेन स्थापित हुआ। इसको शुरू करने का उद्देश्य बर्मा वुड के लिए सैगौन का पेड़ लगाना था, ताकि समुद्री यातायात के लिए जहाज बन सकें। मिलिटरी विभाग के रबार्ट रीड ने मूलत: इसी उद्देश्य से यह जगह चुनी थी। आगे चलकर इसका उद्देश्य हो गया औपनिवेशिक उपयोग के लिए भारतीय वनस्पतियों का वैज्ञानिक अध्ययन। जाहिर है, विज्ञान के किस रूप का विकास करना है और किस रूप का नहीं करना है, इसकी प्राथमिकता औपनिवेशिक स्वार्थों की दृष्टि से तय की जा रही थी।

यहां दो-तीन और उल्लेख जरूरी हो सकते हैं। 1837 में आविष्कृत टेलीग्राफ (तार) का भारत में औपनिवेशिक उपयोग युद्ध और विद्रोह के समय सैनिक संपर्क के लिए शुरू किया गया। टेलीग्राफ ने घुड़सवारों की जगह ले ली। लार्ड डलहौजी ने सबसे पहले कलकत्ता, बंबई और दिल्ली के बीच टेलीग्राफ की लाइन शुरू करने का निर्देश दिया था। विज्ञान और सत्ता के संबंध के शुरुआती रूप ऐसे ही रहे हैं, बाद में ये सारी चीजें भले जनसुलभ हो गए हों।

उपर्युक्त के अलावा, नृविज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) -संबंधी क्षेत्रकार्य भारत में आर्य-द्रविड़ जैसे नस्लीय भेदों को निर्मित करने के उद्देश्य से शुरू हुए। इसी तरह भाषा वैज्ञानिक खोजें भारतीय जातीय विविधता को भिन्नतावाद के रूप में प्रदर्शित करने के उद्देश्य से शुरू की गईं। उपनिवेशवाद जहां-जहां गया, वहां-वहां उपर्युक्त दोनों अध्ययन-शाखाओं का जमकर नकारात्मक इस्तेमाल हुआ। ये ‘फूट डालो और राज करो’ में सहायक थीं। तुर्रा यह कि इन्हें विज्ञान कहा गया, अर्थात् ‘अकाट्य सत्य’! जबकि इन अध्ययनों में ओरियंटलिस्ट आत्मपरकता की पूरी गुंजाइश रही है, बल्कि यह खेल ही ज्यादा चला है।

विज्ञान का वही रूप अंतिम नहीं है, जो सत्ता के लक्ष्यों के अनुरूप बनता है। बहुतों के जीवन में विज्ञान एक साधना है, मानव-उत्थान की प्रयोगशाला है। लेकिन आज विज्ञान का ज्यादा इस्तेमाल उपनिवेशवाद के तौर-तरीकों से सीखकर कूट उद्देश्यों से हो रहा है। यह हम खासकर सूचना-क्रांति, उपग्रह प्रक्षेपण और युद्ध तकनीक के क्षेत्र में देख सकते हैं। ऐसे विज्ञान के भीतर अविज्ञान का अंधकार भरा होता है। उस पर बहुराष्ट्रीय बाजार और राजनीति का प्रभाव इधर बढ़ता जा रहा है।

आज एक बड़ा सवाल है कि मंगल ग्रह पर जाने और तमाम तरह के वायरसों की समझ बढ़ाने में क्या अधिक जरूरी था? कोरोना मामले में विज्ञान क्यों पीछे रह गया?

उल्लेखनीय है कि भारत में अति-विकसित टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अति-पिछड़े मानस द्वारा हो रहा है। वैज्ञानिक मानसिकता का चरम अभाव है। समस्या यह है कि बाजार और राजनीति पर मानवीय नैतिकता का जरा भी नियंत्रण नहीं है। ये दोनों अब निरंकुश हैं। ये यथार्थ को अपने उद्देश्य के अनुरूप ढालने में कुशल हैं, करिश्माई हैं और साधारण लोगों को प्रलोभनों से सम्मोहित करने में सक्षम हैं। ऐसे में विज्ञान के स्वच्छंद होने की संभावना बहुत कम रह जाती है। उसकी स्वायत्तता खो जाती है। वह बंधुआ मजदूर से ज्यादा नहीं होता, उसके उपयोग की हदें बांध दी जाती हैं।

विज्ञान के संबंध में यह भ्रम दूर कर लेना चाहिए कि एकमात्र उसने ही मानव जाति को बर्बरता से सभ्यता तक पहुंचाया। आज कहीं-कहीं यह अहंकार है कि सिर्फ विज्ञान से मानव विकास हुआ है। निश्चय ही विज्ञान ने भी सभ्यता के उसी तरह कुछ बुरे उदाहरण दिए, जिस तरह धर्म ने दिए। दूसरी तरफ धर्म, कलाओं और साहित्य की तरह विज्ञान की भी मानव विकास में एक बड़ी भूमिका है।

लेकिन समझ लेना चाहिए कि विज्ञान अकेले सभ्यता का निर्माता नहीं है, वह कई बार बर्बरता का हथियार बना है। इन दिनों देखा जा सकता है कि धार्मिक-राजनीतिक पाखंडों को महिमामंडित करने के लिए वैज्ञानिक साधनों का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। विज्ञान पराधीन है। इन सारी स्थितियों में यह जरूरी हो जाता है कि विज्ञान की आजादी की मांग उठे। उसके मूल्यों की समझ में व्यापकता आए। विज्ञान आजाद हो जाए तो धर्म, अर्थव्यवस्था और राजनीति गुलाम नहीं रह जाएंगे!

विज्ञान परंपरागत और वर्तमान ज्ञान का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने के लिए है। वह प्रश्न देता है, नई परिकल्पना के मार्ग पर खड़ा करता है और प्रयोगशाला बनता है। वह फिजिक्स, केमेस्ट्री, बॉटनी, इंजीनियरिंग, मेडिकल आदि की दुनिया तक सीमित मामला नहीं है। हमारा खुद का जीवन या पूरा देश एक प्रयोगशाला है। हम इसमें विज्ञान के मूल्य और महत्व को समझ सकते हैं। चाहें तो स्थापित कर सकते हैं। यह समझना जरूरी है कि विज्ञान को महत्व देने का अर्थ मानवता को महत्व देना है, क्योंकि इसके निर्माण में उसकी भूमिका है।

विज्ञान सवाल उठाने के अधिकार को मान्यता देता है। इससे ज्ञान बढ़ता है और विज्ञान की प्रगति होती है। लगभग 500 साल पहले लोग मानते थे कि ब्रह्मांड के केंद्र में पृथ्वी है। सूर्य सहित सभी ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। कोपरनिकस ने इस धारणा पर सवाल खड़ा किया। कालांतर में ईसाई व्यवस्था के कठोर अवरोधों के  बावजूद तथ्य न सिर्फ जगजाहिर हुआ, बल्कि आम लोगों की धारणा बदलती गई।

कहने का आशय यह है कि कठोर धार्मिक वातावरण विज्ञान को स्वतंत्र ढंग से पनपने नहीं देता। कई बार वह पुष्पक विमान को एयरक्राफ्ट, गणेश जी के सिर को प्लास्टिक सर्जरी और ऐसे ही कई अन्य विश्वासों को खास उद्देश्य से विज्ञान बना देता है। विज्ञान की एक खूबी यह है कि यह बड़े से बड़े वैज्ञानिक पर भी प्रश्न उठा सकता है। यह बताता है कि कोई खोज अंतिम नहीं है। विज्ञान में कट्टरता के लिए जगह नहीं होती। कोई अकारण आग्रह नहीं करता। हर वैज्ञानिक ही अपनी यात्रा यहाँ से शुरू कर करता है कि वह सर्वज्ञ नहीं है। वह जिस चीज के बारे में अच्छी तरह नहीं जानता, उसके बारे में साफ कहेगा, ‘मुझे नहीं मालूम’। इसका अर्थ यह नहीं है कि जो नहीं मालूम है, उसे जानने की इच्छा न हो।

ऐसा नहीं कि वैज्ञानिक के गुण सिर्फ विज्ञान की दुनिया के लोगों के लिए हैं, आम शिक्षित लोगों के लिए नहीं। किसी भी शिक्षा का अर्थ है विज्ञान को साथ लेकर चलना। क्योंकि जो सचमुच शिक्षित है वह जानता है कि वह सर्वज्ञ नहीं है और जो नहीं मालूम है उसे जानना है। दुर्भाग्यवश आज के अधिकांश शिक्षितों में अहंकार और स्वार्थ ज्यादा है। इसलिए कूपमंडूकता भी ज्यादा है। वे वस्तुतः डिग्रीधारी और हुनरमंद हैं, शिक्षित नहीं।

विज्ञान की प्रगति पहले की धारणाओं को तथ्यों के आधार पर अंशतः या पूर्णतः अस्वीकार करके होती है। विज्ञान नए ज्ञान की ओर बढ़ने की राह है। इसकी कोई आखिरी मंजिल नहीं है। ज्ञान में जो असंगत चीजें हैं उन्हें स्वीकार करना विज्ञान के विरुद्ध है। इसलिए वह सबसे पहले ‘अलौकिक’ के अस्तित्व को अस्वीकार करता है, क्योंकि यह एक ‘निर्मित भ्रांति’ है। अलौकिक यदि कोई अनुपलब्ध यथार्थ हो, कोई महान आनंद हो या कोई बड़ा स्वप्न, तो वह मौजूद होता है लौकिक अनुभव के भीतर ही। वह पृथ्वी और बृहद सृष्टि से दूर अलग संसार नहीं होता।

विज्ञान अनगिनत रूढ़ियों, अंधविश्वासों और बाबाओं के चमत्कारों से लड़ता रहा है, हालांकि समाज में विज्ञान की तुलना में राजनीति, बाजार और धार्मिक रूढ़िवाद की ताकतें ज्यादा सक्रिय हैं। आज वैज्ञानिक तरीके से बड़े पैमाने पर अज्ञानता का निर्माण एक उद्योग बन चुका है।

फिर भी देखा जा सकता है कि विज्ञान ने कई रहस्यों से पर्दा हटा दिया है। उदाहरण के तौर पर सांप के काटने या किसी बीमारी पर अब आदमी झाड़-फूंक की जगह डाक्टर के पास जाना चाहता है। अब वह सूर्यग्रहण को राहु का ग्रास न मानकर एक प्राकृतिक लीला के रूप में देखता है। कई अपशकुनों और वर्जनाओं की अब परवाह नहीं की जाती। सेक्स के मामलों में पकड़े जाने के कारण बाबाओं से काफी मोहभंग हुआ है। चमत्कारों से पर्दा पूरी तरह उठ चुका है। फिर भी आज समाज में तंत्र-मंत्र, ग्रह-शांति, ज्योतिष की भविष्यवाणियों पर विश्वास और दबंग बाबाओं-महंतों का समाज पर काफी प्रभाव है।

विज्ञान सिर्फ इसलिए नहीं है कि इसके बल पर चालाकियां की जाएं या जीवन के सुखों और सुविधाओं को इकट्ठा किया जाए। इसका मुख्य उद्देश्य जीवन की समस्याओं का भिन्न तरीके से समाधान निकालना भी है। इसकी प्रधान शिक्षा है, मनुष्य बिना सोचे-समझे या बिना ठीक से जांचे-परखे किसी चीज को आंख मूंदकर न माने। लेकिन विज्ञान की शिक्षाओं पर समाज के वे प्रभुत्वशाली व्यक्ति क्यों चलें जिनके स्वार्थों और लोभों की राह में विज्ञान की शिक्षाएं वस्तुतः बाधक हैं। हम यह भी कैसे मानें कि वैज्ञानिक दृष्टिसंपन्न होने का दावा करनेवाले बुद्धिजीवी विज्ञान की शिक्षाओं पर चलते हैं। यदि वे सर्वज्ञ होने के अहंकार से भरे हैं, उनके शब्द तथा कर्म के बीच दूरी है और उनमें बौद्धिक सहृदयता नहीं है। दरअसल इनसे अधिक वैज्ञानिक हैं गांवों-शहरों के वे साधारण लोग जिनमें लोकज्ञान, ‘कॉमन सेंस’ और  बौद्धिक सहृदयता है।

हरिशंकर परसाई ने अपनी एक व्यंग्य कथा में लिखा है- एकबार मैं एक मार्क्सवादी मित्र के घर गया। देखा, वे सत्यनारायण बाबा की कथा सुन रहे थे। मुझे लगा, मैं एंबुलेंस के ही नीचे आ गया हूँ!