सुपरिचित कथाकार, संपादक औरलोक-इतिहास के गंभीर अध्येता और लेखक।लोकरंगसे जुड़े।अद्यतन पुस्तक भील विद्रोह

अठारह सौ सत्तावन का विद्रोह, कई गुमनाम नायकों को छिपाए अभी भी किंवदंती बना हुआ है।अभी भी बहुत से गुमनाम नायकों के त्याग और बलिदान से हम अनभिज्ञ हैं।यहां, ऐसे ही एक गुमनाम सैनिक के विद्रोह के बारे में उल्लेख करना चाहूंगा, जिसका नाम मातादीन था।

अठारह सौ सत्तावन की चर्चा होती है तो मंगल पांडेय और मातादीन भंगी का जिक्र आता है।हम यहां उसी समय काल के एक और महत्वपूर्ण विद्रोही सैनिक, मातादीन के बारे में बताने जा रहे हैं जो अभी तक अनजान थे।इस नए बागी मातादीन के बारे में जानकारी मुझे मातादीन भंगी के बारे में जानकारी जुटाने की प्रक्रिया में प्राप्त हुई है।इससे लगता है कि 1857 विद्रोह के उन रणबांकुरों का इतिहास अभी अधूरा है जिन्होंने नाना साहेब एवं अन्य विद्रोहियों के इशारे पर ब्रिटिश सेना के विरुद्ध बगावत की थी।ब्रिटिश समाचारों में एक घुड़सवार सेना के सिपाही मातादीन एवं उसके कुछ साथियों के बगावत का संदर्भ मिलता है जिसने 5 ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों की हत्या कर उनके सिर काट लिए थे।यह घटना कानपुर-कन्नौज मार्ग पर स्थित चौबेपुर नामक स्थान के करीब की है।

तात्कालीन दो ब्रिटिश अखबारों से इस संबंध में पुख्ता जानकारी मिलती है।सबसे पहले 29 मार्च, 1857 को बैरकपुर छावनी (वर्तमान पश्चिमी बंगाल) में स्थित 19 वीं नेटिव रेजिमेंट में विप्लव की ज्वाला भड़की थी, जहां मंगल पांडेय ने चर्बी लगे कारतूसों को धर्मविरुद्ध मानते हुए हिंसक बगावत की थी और जल्द दूसरी रेजिमेंटों में भी बगावत की गंध फैल गई थी।34वीं रेजिमेंट, 19वीं रेजिमेंट के साथ जुड़ी थी और दूसरे ग्रेनेडायर्स के जवानों में भी अशांति देखी गई।अधिकारियों ने जल्द बैरकपुर की 19वीं रेजिमेंट के 5,000 जवानों को निशस्त्र करने को योजना बनाई और उसे बड़ी सावधानी और गोपनीयता से अंजाम दिया।सबसे पहले बर्मा से ब्रिटिश पैदल सेना की 84वीं बटालियन और कलकत्ता से 53वीं बटालियन की एक टुकड़ी को बैरकपुर की ओर रवाना करने का निर्देश दिया गया।ये टुकड़ियां 31 मार्च, 1857 तक बैरकपुर छावनी पहुंच गई थीं।मद्रास तोपखाना को बैरकपुर छावनी में रोके रखा गया था।दमदम से एक अन्य बटालियन को बुलाया गया था।इसके अलावा घुड़सवार सेना की एक टुकड़ी और 12 बंदूकें तुरंत बैरकपुर कैंटोनमेंट में मंगवाई गईं।इनमें से ज्यादातर तैयारियां 30 मार्च तक पूरी कर ली गई थीं।बुलाई गई टुकड़ियों को मेजर जनरल हर्सेय (कशरीीशू) के सैन्य कमांड में रखा गया था।योजना के अनुसार छावनी में यूरोपियन और नेटिव इन्फेंट्री को एक ओर रखा गया।चार नेटिव रेजिमेंट को उसके दूसरी ओर रखा गया तथा 19वीं रेजिमेंट को मध्य में रखते हुए मेजर जनरल हर्सेय ने 19वीं रेजिमेंट को अपराधी घोषित कर दिया और बिना किसी रक्तपात के उसे हथियार सौंप देने को कहा।इस प्रकार बागी हो चुकी 19वीं रेजिमेंट से हथियार छीन लिए गए।

10 मई 1857 को मेरठ के सिपाहियों ने विद्रोह किया था और दिल्ली मार्च कर 11 मई को अपदस्थ शासक बहादुर शाह जफर को पुन: शासक घोषित कर दिया।बहुत जल्द बगावत की ज्वाला, दिल्ली, आगरा, कानुपर और लखनऊ के बैरकों में पहुंच गई थी।

लखनऊ कैंट में 30 मई 1857 को विप्लव की चिनगारी फूटी थी, मगर उससे तीन दिन पहले 28 मई को लखनऊ कैंट से एक सैन्य टुकड़ी ‘द ग्रेट ट्रंक रोड’ को खुला रहने के लिए निकल पड़ी थी।उस टुकड़ी में कुल 500 के लगभग जवान थे।उस सैन्य टुकड़ी को पेंशन पे-मास्टर मेजर मैरिएट  को फतेहगढ़ कैंट (जिला-फर्रूखाबाद) तक एस्कॉर्ट भी करना था, जहां नौकरी से निकाल दिए गए पेंशनभोगियों (सैनिकों) ने अपने वेतन के लिए हंगामा मचाया हुआ था।लखनऊ से अलग हुई उस सैन्य टुकड़ी में 7वीं बंगाल लाइट कॉवलरी (घुड़सवार सेना) की दो टुकड़ियां शामिल थीं।कुछ इररेगुलर हार्स भी थे जो कैप्टन स्टाप्लस, लेफ्टिनेंट बॉल्टन और मार्टिन के नेतृत्व में प्रस्थान किए थे।ये सभी अधिकारी ७वीं बंगाल लाइट कॉवलरी के थे।उनके साथ 48वीं नेटिव इन्फेंट्री के सैनिक, अपने अधिकारियों, कैप्टन बर्मस्टर और लेटिनेंट सी.एम.फार्कहरसन के नेतृत्व में थे।पूरा का पूरा सैन्य दल, पेंशन पे-मास्टर मेजर मैरिएट के अधीन था।उनके साथ लेफ्टिनेंट हचिंसन भी थे जो पेशे से इंजीनियर और पोलिटिकल एजेंट थे।सभी अधिकारी और सैन्य दल अवध के सड़क मार्ग से गंगा की ओर बढ़े थे।उन्हें कन्नौज के निकट मेंहदीघाट से गंगा नदी पार करनी थी, जिससे उरवुल डाक बंगले के पास ग्रैंड ट्रंक रोक पर पहुंचा जा सके।मेंहदीघाट, कानपुर के उत्तर पश्चिम में 40 मील दूर पड़ता था।

30 मई को ईद-उल-फितर का पर्व था और उसी रात, अधिकारियों को सूचना मिली कि लखनऊ कैंट में बंगाल और अवध के सैनिकों में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी है।यह सुन सभी अधिकारी भयभीत दिखे।उन्हें विद्रोह के तेज होने और देशी सैनिकों और अधिकारियों द्वारा बगावत करने का भय सता रहा था।लखनऊ में विद्रोह फैलने की सूचना उन तक 31 मई को भी पहुंची।इसलिए वे और सतर्क हो गए।उनके द्वारा गंगा नदी पार करने में सावधानी बरती गई।सबसे पहले मेजर मैरिएट और लेफ्टिनेंट फार्कहरसन ने गंगा नदी पार किया।उसके बाद उन्होंने जल्द बाकी अधिकारियों और सैन्य दल को पार कराने हेतु नावों की व्यवस्था की और उन्हें जल्द उस पार भेजा।अधिकारी डरे हुए थे और सेना को छोटी-छोटी टुकड़ियों में नदी पार कराया जा रहा था।सभी को नदी पार करा लेने के बाद मेजर मैरिएट को खबर मिली कि फतेहगढ़ के सभी सैनिकों, यानी पेंशनरों को, जो वहां के अधिकारियों और उनके सहायकों के साथ तैनात थे और जिन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था, उनको वेतन दे दिया है।दरअसल सेना की बगावत को रोकने के लिए बागी सैनिकों को नौकरी से बर्खास्त कर तत्परता से पेंशन देकर हटाया जा रहा था।

उसी दिन मैरिएट को लेफ्टिनेंट हचिंसन से एक नोट प्राप्त हुआ कि ‘सतर्क रहें, सैन्य टुकड़ी शरारत कर सकती है।वह अपने अधिकारियों की हत्या कर उसी रात दिल्ली की ओर प्रस्थान कर सकती है।मेजर मैरिएट ने उस नोट को युवा फार्कहरसन को दिखाया और वहां से तत्काल चल देने की सलाह दी।

हचिंसन अभी गंगा पार नहीं किए थे और लखनऊ की ओर ही थे।नोट पढ़ने के बाद भयभीत मैरिएट एक बार फिर गंगा पार कर लखनऊ की ओर आकर मि. हचिंसन के कैम्प में पहुंच गए जहां अधिकारी सैनिकों के मार्ग की निगरानी में लगे हुए थे और पार कर रहे सैनिकों पर अधिकारी निगरानी रखे हुए थे।मैरिएट ने हचिंसन के नोट से अधिकारियों को अवगत कराते हुए कहा कि वे सैनिकों के साथ नदी पार न करें और जितनी जल्दी हो सके उनसे दूर हो जाएं।

कैप्टन स्टापल्स और अन्य अधिकारियों ने हचिंसन द्वारा मेजर मैरिएट को लिखे नोट को पढ़ा और हचिंसन की आशंका को काल्पनिक समझा।आखिर वे सभी एक साथ गंगा पार कर गए।बाद में सभी अधिकारियों ने आपस में विमर्श किया।उन्हें लगा कि सैन्य दल विद्रोही हो सकता है इसलिए अब आगे फतेहगढ़ की ओर बढ़ने के बजाए उन्हें कानपुर की ओर मोड़ना चाहिए।उनकी इस आशंका को सैन्य दल के देशी अधिकारियों ने समझ लिया।उनके मन में बगावत की चिनगारी सुलगने लगी थी।तभी इन्फेंट्री और कॉवलरी का एक दल आगे बढ़कर अधिकारियों से बोला कि वे कानपुर की ओर नहीं जाना चाहते हैं।वे उत्तर-पश्चिम की ओर यानी दिल्ली की ओर बढ़ना चाहते हैं।अधिकारी उन्हें समझाने में उलझे रहे।उधर गंगा पार, अवध की ओर कैम्प कर रहे मैरिएट का विचार था कि अब सैन्य टुकड़ी को समझाने से ज्यादा जरूरी अपनी जान बचाना है।उन्होंने अधिकारियों तक संदेश भिजवाया कि अधिकारी अपनी जान बचाएं।वे सैन्य टुकड़ी को उनके हाल पर छोड़ दें।सैन्यदल को जहां जाना हो, वहां जाए।अधिकारियों ने मैरिएट की बातों का अनुसरण नहीं किया।उन्हें लगा कि मैरिएट डर रहे हैं।वे अपनी जिम्मेदारियों को छोड़ना नहीं चाहते थे।सभी अधिकारियों ने कैप्टन स्टाप्ल्स के नेतृत्व में जो सैन्य टुकड़ी थी, उस पर कानपुर चलने का दबाव बनाया।तभी उन्हें कानपुर का सड़क मार्ग असुरक्षित लगा।ऐसी स्थिति में कैप्टन स्टाप्लस, अन्य अधिकारियों के साथ बाध्य होकर नदी पार कर अवध की ओर मि. हचिंसन के कैम्प में आ गए।उन्होंने एक बार फिर एक जासूस को गंगा पार कर अन्य अधिकारियों को समझाने के लिए भेजा और उन्हें खतरे की जानकारी दी।उन्हें बताया कि वे अपने सैन्यदल को छोड़कर उसी रात स्वयं को दूर कर लें।

इस बार भी अधिकारियों ने जासूस की बात नहीं मानी और वह लौट आया।३ जून तक मेंहदीघाट पर पड़ाव डालने के बाद अधिकारियों ने एक बार फिर गंगा पार कर कानपुर की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लिया।जब अधिकारी मेंहदीघाट पर पड़ाव डाले थे तभी सैन्यदल से 50 घुड़सवार और 7 इन्फेंट्री जवान अलग होकर दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गए थे।शेष सैन्य टुकड़ी दो भागों में विभक्त कर दी गई थी और उसे चौबेपुर के लिए प्रस्थान कराया गया।चौबेपुर, कानपुर-कन्नौज मार्ग पर पड़ता था, जो कानपुर से 12 मील और बिठूर से ३ मील दूर था।चौबेपुर में 7 या 8 जून को सैन्य टुकड़ी ने मातादीन के नेतृत्व में बगावत कर दिया।मातादीन 7वीं कॉवलरी का घुड़सवार था।उसकी टुकड़ी आगे नहीं जाना चाहती थी।कैप्टन बर्मस्टर के सूबेदार ने बागियों को समझाने का प्रयास किया, जिससे सैनिकों को बिठूर की ओर चलने को राजी किया जा सके, लेकिन उसने मातादीन द्वारा बागियों को हिंदू होने का कसम खिलाते देखा तो स्थिति की गंभीरता को समझ गया।सूबेदार ने अधिकारियों को गंगा पार कर लखनऊ की ओर सुरक्षित स्थिति में चले जाने को कहा मगर अधिकारियों ने बागियों को भरसक समझाने का प्रयास किया।कहा कि अगर वे उनके आदेशों का अनुपालन नहीं करना चाहते तो बेशक जहां जाना चाहते हों, जाएं।उस दिन अधिकारी परेशान रहे और चार बजे अपराह्न में भोजन किया।

भोजन करने के बाद उन्होंने आगे बढ़ने के लिए अपने टैंट और सामान बांध लिए थे।उनकी बंदूकें और पिस्तौलें उनके बिस्तरों पर थीं।वे सभी एक पेड़ के नीचे तोप के साथ बैठे थे तभी उन्हें दिन में बिगुल बजने की आवाज सुनाई दी।अधिकारियों ने जानना चाहा कि किसके आदेश पर बिगुल बजा है?

उन्हें बताया गया कि घुड़सवार सैनिकों और सिपाहियों ने आदेश दिया है।बागियों का कहना था कि वे जहां चाहेंगे वहां जाएंगे मगर कानपुर की ओर नहीं जाएंगे।कैप्टन स्टाप्लस ने विद्रोहियों के नेता मातादीन से पूछा कि अगुवा कौन है? इस प्रश्न का उत्तर, मातादीन ने अनुचित तरीके से दिया।हिंदुस्तानी तहजीब की तरह वह उत्तर नहीं था।कैप्टन ने उसे घोड़े से अलग हो जाने को कहा तो मातादीन ने कहा कि यह आपके बाप का घोड़ा है? लगातार अनुरोध करने के बाद भी मातादीन नहीं माना और उसने कैप्टन स्टाप्लस पर गोली चला दी जिससे वह मारा गया।मातादीन ने सैनिकों से कहा-फिरंगी सालों को मारो।कैप्टन बॉल्टन अपने घोड़े पर थे और मातादीन के करीब खड़े थे।उन्होंने मातादीन पर गोली चला दी और अपना घोड़ा कुदाते हुए भाग गए।मातादीन के मारे जाने के बाद बागी सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और गोलीबारी कर अन्य चार अफसरों की हत्या कर दी।क्वार्टर मास्टर सरजेंट, 7वीं कॉवलरी भी मारे गए, जिनका नाम अज्ञात है।7वीं कॉवलरी के कैप्टन स्टाप्लस, लेफ्टिनेंट मार्टिन, 48वीं नेटिव इन्फेंट्री के कैप्टन बर्मस्टर और लेफ्टिनेंट फार्कहरसन मारे गए।सभी मारे गए अधिकारियों के सिर काट कर कपड़ों में बांध दिया गया।उन सिरों को मेहतरों के द्वारा बिठूर तक ले जाया गया जहां बागियों के अधिकारियों और उनके नौकरों द्वारा फिर पहचाना गया।उसके बाद उन सिरों को कानपुर के नाना साहिब के पास भेज दिया गया।नाना साहिब 1857 के विद्रोह के केंद्र में थे।कुछ दिनों से सैनिकों ने उन्हीं के निर्देशन में बगावत शुरू की थी और एक-दूसरे तक खबर भिजवाई थी।

इस प्रकार 7 या 8 जून को चौबेपुर में मातादीन ने ब्रिटिश सेना में रहते हुए बगावत कर अपनी शहादत दी।इस विद्रोह में शामिल बाकी घुड़सवार सैनिकों के नाम नहीं मिलते।उस बगावत में कुल 5 ब्रिटिश अफसरों की हत्या की गई।1857 के विद्रोह में ब्रिटिश अधिकारियों के सिर काटकर नाना साहिब के पास भेजने जैसा कृत्य कम देखने को मिलता है।

संदर्भ :
1. वेलिंगटन जर्नल, 23 मई 1857
2. फेंड ऑफ इंडिया एंड स्टेट्समैन, 2 अप्रैल 1857 और 7 जनवरी 1858)

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