पैदल चलते मजदूर : दिव्या श्री

पैदल चलते मजदूर : दिव्या श्री

युवा कवयित्री| साझा काव्य संग्रह ‘नीलांबरा’| संप्रति- छात्रा| मैं अभी-अभी दिल्ली आई हूँसुबह के आठ बजे हैंपक्षियों के झुंड के समानआदमी सरपट भाग रहा हैहाथ में थैला लिए, फोन पर बातें करते हुएकैब में बैठी एकटक देख रही हूँऔर वह दृश्य मेरे साथ चल रहा है सूरज-सामैं घबराकर...