कविता
युवा कवयित्री। सहायक प्राध्यापिका। नई तालीम मां के जमाने की चीजें खुरदुरी होती गईंजिस आंगन के पोर पोर मेंमां के हाथ गीली मिट्टी में छप जाते थेवहां चमकदार पत्थर जड़े गएजिस ओखली में कूटते हुए मांअपने जीवन का तमाम गुस्सा कूट देती थीवह अब धूल फांके चित हैजिस...
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