लघुकथा
महेश अपने बरामदे में टहल रहा था। वह अपने ही ख्यालों में डूबा हुआ था। मैं उसके नजदीक पहुंचा, पर उसे पता नहीं चला। मेरी आवाज को सुन मेरी ओर मुखातिब हो बोल पड़ा ‘तुम कब आए सुदेश? आओ आओ बैठो यार।’ पर उसकी बातों में वह खनक नहीं थी, जो उसकी पहचान थी। जिगरी था मेरा। बीस...
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