कविता
दौलत राम महाविद्यालय, दिल्ली की छात्रा। चारकोल मैं रोज देखती हूँ तुम्हेंसिर्फ तुम्हें नहींतुम्हारे चेहरे पर छाईझुर्रियों के सिलवटों मेंदबे अतीत को भीमुझे दिखता हैकि उस अतीत में जब-जबतुमने सजाना चाहा कोई ख्वाबतब-तब खिली दोपहरी के बीचतुम्हारी आंखों के...
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