आदिवासियों की भाषा ही अब उनका तीर है : मृत्युंजय

आदिवासियों की भाषा ही अब उनका तीर है : मृत्युंजय

प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी। गुजरात के आदिवासी कवि हैं चामूकाल राठवा।उनकी एक कविता ‘आदिवासी’ का एक अंश है, ‘इस शब्द को वे/इस तरह बोलते हैं/जैसे यह किसी/ महामारी का नाम हो/…इस शब्द को सुनकर/वे ऐसे देखते हैं/जैसे उन्होंने/आकाश में उड़ती/रकाबी देख ली...
हिंदी लोकवृत्त की समस्याएं 3 : प्रस्तुति रमाशंकर सिंह

हिंदी लोकवृत्त की समस्याएं 3 : प्रस्तुति रमाशंकर सिंह

रमाशंकर सिंह भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में 2018 से 2020 तक फेलो। समाज, संस्कृति, राजनीति पर वायर हिन्दी, क्विंट हिन्दी और जनपथ जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर लगातार लेखन। ‘हिंदी लोकवृत्त की समस्याएं’ विषय पर आयोजित बहस के अंतर्गत पाठकों ने अबतक अजय कुमार,...
हिंदी लोकवृत्त की समस्याएं 3 : प्रस्तुति रमाशंकर सिंह

हिंदी लोकवृत्त की समस्याएं 3 : प्रस्तुति रमाशंकर सिंह

रमाशंकर सिंह भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में 2018 से 2020 तक फेलो। समाज, संस्कृति, राजनीति पर वायर हिन्दी, क्विंट हिन्दी और जनपथ जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर लगातार लेखन। ‘हिंदी लोकवृत्त की समस्याएं’ विषय पर आयोजित बहस के अंतर्गत पाठकों ने अबतक अजय कुमार,...
उत्तर-कोरोना प्रभाव : समाज और संस्कृति / प्रस्तुति : विनोद कुमार यादव

उत्तर-कोरोना प्रभाव : समाज और संस्कृति / प्रस्तुति : विनोद कुमार यादव

प्रस्तुति : विनोद कुमार यादव शोध छात्र, विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर कोरोना ने पूरे विश्व को हिला दिया है। अब वैक्सिन आने के बावजूद उसका दूसरा आक्रमण सामने है। दुनिया में जिस एक मुद्दे पर हाल के दशकों में सबसे ज्यादा चर्चा हुई है, वह कोरोना से होनेवाली क्षति और...
दलित चेतना की नई मंजिलें : मधु सिंह

दलित चेतना की नई मंजिलें : मधु सिंह

प्रस्तुति : मधु सिंह विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर में एम.फिल. की शोध छात्रा। कोलकाता के खुदीराम बोस कॉलेज में शिक्षण। आधुनिक युग विमर्शों का युग है। इस काल में शिक्षा और विज्ञान की प्रगति ने लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत किया है। फलस्वरूप साहित्य में...