कविता
वरिष्ठ कवयित्री। काव्य संग्रह- ‘बस कह देना कि आऊंगा’, ‘मनरंगना’। मुस्कराना जब उन्होंने कहा‘लड़की होकर इतना बोलती हो?’मैंने होंठों पर रख लीआधी मुस्कानजिसमें पूरा इतिहास थासती सावित्री और सीता का जब मेरी रोटियांथोड़ी मोटी बन आईंमैंने आंच में नहीं,अपने मन...
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वरिष्ठ कवयित्री। काव्य संग्रह- ‘बस कह देना कि आऊंगा’, ‘मनरंगना’। पिता आसान नहीं है उसके लिएउस पीठ और उस कंधे को भुलानाजिस कंधे पर बैठ करदुनिया के हर मेले को देखता आया अब तकउस पीठ की अंतहीन मौन आवाजेंआज भी सुनाई देती हैं उसे वह अंधेरे में भी पहचान लेता...
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वरिष्ठ कवयित्री। ‘बस कह देना कि आऊंगा’, ‘मनरंगना’ (काव्य-संग्रह)। शहर के बीच बहती वह नदी शहर के बीचो-बीच बहती वह नदी!जिसकी पथराई आंखों में आज भीजिंदा थे बीते कल के सपनेवह नदी इन दिनों जाने कहांगुम हो गईढूंढ़ रही हूँ गूगल पर शायद मिल जाए पिछले जेठ की ही तो...
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युवा कवयित्री। काव्य संग्रह- ‘बस कह देना कि आऊंगा’। नदियों का अंतर्नाद नदी!उस गुमशुदा औरत की तरह हो गई हैजिसके होने के निशान तो मिलते हैंपर वह नहीं मिलती हमने उसे मृत घोषित कर दिया हैऔर अब शेष बचेउसके अवशेषों को भरने की कर रहे हैं साजिश हम आते हैं...
कविता
काव्य संग्रह ‘पुकार’। झारखंड सरकार में कार्यरत। मानव होना पड़ता है रोटियां तवे पर फूलती रहती हैंबिना जाति और धर्म देखेवे नहीं पूछतीं-किसने बेली हैं औरकौन सेक रहा है उन्हें दवाइयां भीबिना जाति-धर्म पूछेहलक से नीचे उतरती रहती हैं नदियां नहीं पूछती हैंतैरने...
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