रमेश यादव

रमेश यादव

      युवा कवि। संप्रति अध्यापन।   पलायन शहर!जिसकी गुर्राहटइनके पुरखों के कानों में गूंजती थीएक घृणा भरी दूरी के साथवही शहरअब इनके सपनों में बसने लगा हैमजबूरियों की तमाम फेहरिस्तोंऔर शिकायतों के बाद भीजिसके आगोश मेंतिल-तिल करछूट रही थीं गांव की...
रमेश यादव

रमेश यादव

      युवा कवि। संप्रति अध्यापन। मेरे बेटे बेटे!मशीन बनती दुनिया मेंतुम मनुष्य बने रहनाइतना बचे रहनाकि जब दूर कहीं कोयल कूकेतो ठहर कर उसकी आवज सुन सकोआसमां में चांद मुस्कुरा रहा होतो थोड़ी देर रुक कर उसके साथ मुस्कुरा सकोरात में जब तारे अठखेलियां कर रहे...