संपादकीय अक्टूबर  2021 : बिग मीडिया और साहित्यिक पत्रिकाएं

संपादकीय अक्टूबर 2021 : बिग मीडिया और साहित्यिक पत्रिकाएं

शंभुनाथ वैश्‍वीकरण और डिजिटल क्रांति ने बहुत-सी मूल्यवान चीजों को मनुष्य के हाथ से बाहर कर दिया है, उन्हें पुनः उपलब्ध करना कठिन बना दिया है। दोनों मिलकर तरह-तरह से ‘तर्क’, ‘मूल्य’, ‘सच’, ‘न्याय’ जैसी चीजों का ध्वंस कर रहे हैं। उनसे सबसे ज्यादा प्रभावित मीडिया है। कभी...
संपादकीय सितंबर  2021 : हिंदी की आत्मपहचान कितनी सुरक्षित है

संपादकीय सितंबर 2021 : हिंदी की आत्मपहचान कितनी सुरक्षित है

शंभुनाथ कोई भाषा जब आत्मपहचान खोती है तो वह पहले भीतर से दरिद्र होती है। उसमें ज्ञान और संवेदना का ह्रास होने लगता है। हिंदी का सिद्ध-नाथों से लेकर कबीर-तुलसी और भारतेंदु-प्रेमचंद-निराला से होते हुए आज तक एक बुद्धिदीप्त, समावेशी और हृदय की भाषा के रूप में विकास होता...
अफ़गानिस्तान की कविताएं

अफ़गानिस्तान की कविताएं

1अफ़गानिस्तान की बेटी : नदिया अंजुमन (1980-2005) मैं नहीं चाहती कि अपनी जुबां खोलूंआख़िर खोल भी लूं, तो बोलूंगी क्या?(क्योंकि) मैं वो हूं, जिससे उसकी उम्र भी नफरत करती रहेगी ताउम्रभले मैं कुछ बोलूँ या नहींमेरी उम्र मुझसे करती रहेगी नफरत ताउम्र मैं कैसे गाऊं गीत शहद...
संपादकीय अगस्त 2021 : मीडिया का स्वराज

संपादकीय अगस्त 2021 : मीडिया का स्वराज

शंभुनाथ   एक तरह से आज का मीडिया बाजार और राजनीति के बीच सैंडविच है। मीडिया निर्मित उत्तेजनात्मक खबरों का मालवाहक बनता जा रहा है। पत्रकार तो बिलकुल असहाय है- हायर एंड फायर! हर पाठक-दर्शक को सही खबर जानने का अधिकार है, जबकि आज के मीडिया का लक्ष्य है पाठक-दर्शक के...
संपादकीय जुलाई 2021 : नागरिक परिसर में बुद्धिजीवी

संपादकीय जुलाई 2021 : नागरिक परिसर में बुद्धिजीवी

शंभुनाथ समाज में मानुष भाव, नागरिक भाव या भारतीय उदारवाद का विघटन क्यों हुआ। इसके लिए एलीट बुद्धिजीवी और उदारवादी राजनीतिज्ञ खुद कितने जिम्मेदार हैं, इस पर सोचने का यह समय है। कई बार जरूरी होता है अपने को सुधारना और अपनी पुरानी मूर्ति के बाहर आना – उसे तोड़कर।...