संपादकीय मई 2021 : अंबेडकर को पढ़ते हुए

संपादकीय मई 2021 : अंबेडकर को पढ़ते हुए

शंभुनाथ ‘‘शिक्षा से अधिक शील को महत्व दें। साथ ही, अपनी शिक्षा का प्रयोग दीन-दुखी जनता के उद्धार के लिए न करके यदि केवल ‘अपनी नौकरी भली-अपना परिवार भला’ की भावना के साथ करेंगे तो समाज को आपकी शिक्षा से लाभ ही क्या?’’ अंबेडकर 1933 में ‘हंस’ के एक मुखपृष्ठ पर अंबेडकर की...
संपादकीय अप्रैल 2021 : दलित चिंतन में ऊंचाइयां

संपादकीय अप्रैल 2021 : दलित चिंतन में ऊंचाइयां

शंभुनाथ दलितों का आंदोलन फिर सैकड़ों साल पीछे चला गया है। इससे निश्चय ही एलीटवर्गीय दलितों को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हाल की अनगिनत घटनाओं से साफ है कि आम दलितों और दलित स्त्रियों की दशा पहले से ज्यादा बुरी हुई है, क्योंकि गरम बातें काफी नहीं हैं। कई बार सिर्फ अपने...
संपादकीय मार्च 2021 : भाषा पर है कैसा संकट

संपादकीय मार्च 2021 : भाषा पर है कैसा संकट

शंभुनाथ पश्चिम में बाबेल की मीनार की एक कथा है। उसका संबंध भाषाओं की भिन्नता से है। कभी पूरी दुनिया में एक ही भाषा थी। सभी एक भाषा बोलते थे। लोगों ने ईंटें पकाईं। उन्होंने एक अच्छा शहर और एक ऊँची मीनार बनानी शुरू की, ताकि वे स्वर्ग तक पहुंच सकें। वे सभी श्रमिक...
संपादकीय जनवरी-फरवरी 2021 : इंडिया में किसान

संपादकीय जनवरी-फरवरी 2021 : इंडिया में किसान

शंभुनाथ ‘जेठ की चढ़ती दोपहरी में खेतों में काम करनेवाले भी अब गीत नहीं गाते हैं।… कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जाएगी क्या?’ (रसप्रिया) ‘रखिए अपना पुरुख वचन, खूब सुन चुकी हूँ पुरुख वचन! चालीस साल से और किसका वचन सुन रही हूँ!’ (तीर्थोदक) ‘जाति बहुत बड़ी चीज...
संपादकीय दिसंबर 2020 : विज्ञान की आजादी

संपादकीय दिसंबर 2020 : विज्ञान की आजादी

शंभुनाथ भारत में अति-विकसित टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अति-पिछड़े मानस द्वारा हो रहा है। वैज्ञानिक मानसिकता का चरम अभाव है। समस्या यह है कि बाजार और राजनीति पर मानवीय नैतिकता का जरा भी नियंत्रण नहीं है। ये दोनों अब निरंकुश हैं। ये यथार्थ को अपने उद्देश्य के अनुरूप ढालने...