संपादकीय जुलाई 2021 : नागरिक परिसर में बुद्धिजीवी

संपादकीय जुलाई 2021 : नागरिक परिसर में बुद्धिजीवी

शंभुनाथ समाज में मानुष भाव, नागरिक भाव या भारतीय उदारवाद का विघटन क्यों हुआ। इसके लिए एलीट बुद्धिजीवी और उदारवादी राजनीतिज्ञ खुद कितने जिम्मेदार हैं, इस पर सोचने का यह समय है। कई बार जरूरी होता है अपने को सुधारना और अपनी पुरानी मूर्ति के बाहर आना – उसे तोड़कर।...
संपादकीय जून 2021 : महामारी और नागरिक परिसर

संपादकीय जून 2021 : महामारी और नागरिक परिसर

शंभुनाथ 1918 में भारत में स्पेनिश फ्लू नाम से आई महामारी ने भारतीय स्थितियों में दो बड़े परिवर्तन ला दिए थे। एक, इसने दमनमूलक अंग्रेजी राज के प्रति लोगों के मन में असंतोष भर दिया, जिससे प्रथम सत्याग्रह आंदोलन के लिए जमीन मिली। दूसरे, देश में एक अनोखा नजारा देखने को...
संपादकीय मई 2021 : अंबेडकर को पढ़ते हुए

संपादकीय मई 2021 : अंबेडकर को पढ़ते हुए

शंभुनाथ ‘‘शिक्षा से अधिक शील को महत्व दें। साथ ही, अपनी शिक्षा का प्रयोग दीन-दुखी जनता के उद्धार के लिए न करके यदि केवल ‘अपनी नौकरी भली-अपना परिवार भला’ की भावना के साथ करेंगे तो समाज को आपकी शिक्षा से लाभ ही क्या?’’ अंबेडकर 1933 में ‘हंस’ के एक मुखपृष्ठ पर अंबेडकर की...
संपादकीय अप्रैल 2021 : दलित चिंतन में ऊंचाइयां

संपादकीय अप्रैल 2021 : दलित चिंतन में ऊंचाइयां

शंभुनाथ दलितों का आंदोलन फिर सैकड़ों साल पीछे चला गया है। इससे निश्चय ही एलीटवर्गीय दलितों को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हाल की अनगिनत घटनाओं से साफ है कि आम दलितों और दलित स्त्रियों की दशा पहले से ज्यादा बुरी हुई है, क्योंकि गरम बातें काफी नहीं हैं। कई बार सिर्फ अपने...
संपादकीय मार्च 2021 : भाषा पर है कैसा संकट

संपादकीय मार्च 2021 : भाषा पर है कैसा संकट

शंभुनाथ पश्चिम में बाबेल की मीनार की एक कथा है। उसका संबंध भाषाओं की भिन्नता से है। कभी पूरी दुनिया में एक ही भाषा थी। सभी एक भाषा बोलते थे। लोगों ने ईंटें पकाईं। उन्होंने एक अच्छा शहर और एक ऊँची मीनार बनानी शुरू की, ताकि वे स्वर्ग तक पहुंच सकें। वे सभी श्रमिक...