ग़ज़ल : श्रवण कुमार सेठ

ग़ज़ल : श्रवण कुमार सेठ

      युवा कवि।विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।सरकारी सेवा में। चलो उधर से ज़रा गुजर के देखते हैंपानी गहरा है कितना उतर के देखते हैं सुना है ख्वाब दिखाने का हुनर रखता हैएक बार उसे नज़र में भर के देखते हैं तमाम उम्र चलते रहे मंज़िल की चाह मेंसफ़र...
दान : श्रवण कुमार सेठ

दान : श्रवण कुमार सेठ

‘भैया..! जरा कंबल दिखाइए।’ ‘कैसा कंबल चाहिए भाई साहब…? कितने तक का दिखाऊं, ओढ़ने के लिए या बिछाने के लिए?’ ‘अपने यूज़ के लिए नहीं चाहिए।’ ‘फिर? भिखारियों को दान-वान के लिए तो नहीं चाहिए न…?’ ‘हां… बिल्कुल सही, दान के लिए ही चाहिए था।’ ‘तो ऐसे कहिए ना...