कविता
युवा कवयित्री और शोधार्थी। दादा जी दरख़्त हैंइस घर के दरख्त घर के आंगन मेंजमा है बरसों सेबहुत गहरे तक फैली हैंदरख्त की जड़ेंयहां तक कि दीवारों में भीधंस गई हैं वेऔर दिलचस्प है किइन दीवारों को दे रही हैं सहाराजिसके चलते ‘अब गिरी कि तब’दिखने वाली दीवारें जस की तस हैंएक...
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