झारखंड के चर्चित लेखक, अद्यतन उपन्यास ‘मिशन होलोकास्ट’

 

हिंदी में ऐतिहासिक घटनाओं और चरित्रों को लेकर साहित्य रचने की परंपरा रही है। श्रीनिवास दास, वृंदावनलाल वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, रांगेय राघव, अमृतलाल नागर से लेकर भीष्म साहनी और संजीव तक। ‘परीक्षागुरु’, ‘गढ़कुंडार’, ‘चित्रलेखा’, ‘मानस का हंस’, ‘मुर्दों का टीला’, ‘सुहाग के नुपूर’, ‘तमस’ से लेकर ‘सूत्रधार’ और ‘प्रत्यंचा’ तक। नाम और भी हैं…।

पिछले दशक से इतिहास आधारित साहित्यलेखन की एक नई प्रवृत्ति उभरकर आई है… ‘हिस्ट्री फ्रॉम बिलो’ इतिहास के निचले स्रोतों के आधार पर साहित्य लेखन। परंतु…

इतिहास के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि इतिहास हमेशा सच ही नहीं बोलता।

सिकंदर… जो यूनानी नहीं था, बल्कि मकदूनियां का निवासी था, यूरोपीय इतिहासकारों ने सिकंदर को यूनानी बना डाला, जबकि सिकंदर ने सबसे पहले यूनान को ही अपने अंगूठे के नीचे दबाया था।

अंग्रेजी इतिहासकारों ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्राप्य को भी महान इंगलिस्तान द्वारा अपने गुलामों को उदारतापूर्वक अर्पण या सत्ता के स्वैच्छिक हस्तांतरण की भांति दर्ज किया है। तथ्यों की हेराफेरी कर इतिहास की वस्तुगतता की बलि चढ़ाने वाले इतिहासकारों ने कई ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया है।

इंगलैंड के जेम्स द्वितीय की सत्ता को चुनौती दी गई तो इतिहासकारों ने इसे इंग्लैंड की महान क्रांति (ई.सन 1688) लिखा। इनोवर राजवंश के जार्ज तृतीय के विरुद्ध जहाजों पर चाय की पेटियां लादने वाले गुलामों की बगावत के साथ शुरू हुए अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम के अभ्युदय को ‘बोस्टन टी पाटी (ई.सन 1773) जैसा सभ्यशिष्ट नाम दिया गया। लुई सोलहवें के विरुद्ध भूमिहीन किसानों-बेरोजगारों ने “फ्रांसीसी क्रांति’ (ई.सन 1789) का सूत्रपात किया तो साम्राज्यवादी सत्ता के विरुद्ध चीन में ‘चीनी क्रांति’ (ई.सन 1911) हुई। रूस के जार निकोलस द्वितीय के विरुद्ध किसानों-श्रमिकों का जनांदोलन इतिहास में ‘रूसी क्रांति’  (ई.सन 1917)  के नाम से दर्ज किया जाता है। यहाँ तक कि रंगभेद की नीति के कारण साइबेरिया के ठंडे रेगिस्तानों से भागे विद्रोही रूसी सैनिकों की स्वदेशी सत्ता के विरुद्ध बगावत भी एक क्रांति ही कहलाई, परंतु विदेशी साम्राज्यवादी शक्ति के विरुद्ध भारतीय सैनिकों के ‘रिवोल्यूशन’ (क्रांति) के लिए ‘म्यूटिनी (विद्रोह) की शब्दछलना गढ़ी जाती है.. ‘सिपाही विद्रोह’।

साम्राज्यवादियों का वह ‘सिपाही विद्रोह’ बीते दशक के आखिरी वर्षों में राष्ट्रवादियों का, बल्कि इतिहास का ‘प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ बन चुका है।

विदेशी बगावतें ‘द्रोह’ नहीं थीं… क्रांतियां थीं, परंतु अपने जल-जंगल-जमीन और स्वशासन के नैसर्गिक अधिकारों के लिए भारत की जनजातियों के मुक्तिकामी संघर्षों को ‘विद्रोह’ के खाते में दर्ज किया जाता रहा। ‘पहाड़िया विद्रोह’, ‘संताल विद्रोह’, ‘कोल विद्रोह’… आदि-आदि।

यूरोपीय इतिहासकारों ने अपने तत्कालीन उपनिवेशों के साथ बड़ी-बड़ी बेईमानियाँ की हैं और हमारे कई देसी इतिहासकार अपनी स्वतंत्र देसी इतिहास-दृष्टि विकसित करने की बजाय यूरोपीय इतिहासकारों का अनुसरण करते रहे।

अमरीकी या फ्रांसीसी क्रांति पर सैकड़ों-हजारों किताबें लिखी गई हैं। उनके नामवर और गुमनाम क्रांतिकारियों की जीवनियां, उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि, आगे के समय में उन आंदोलनों के प्रभाव… सबका विशद अध्ययन उपलब्ध है। इसके विपरीत भारतीय इतिहासकारों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थितियों का औपनिवेशिक इतिहास कभी लिखना ही नहीं चाहा।

‘विजेताओं का, विजेताओं के द्वारा इतिहास लेखन के उपनिवेशवादी दर्शन ने भारतीय आदिवासी संघर्षों को ‘क्रांति’ या ‘आंदोलनों’ को ‘विद्रोह’ लिख-लिख कर विरूपित कर दिया है।

इतिहास लेखन की ऐसी ऐतिहासिक विडंबनाएं सायास भी गढ़ी गई हैं। विशेषकर आदिवासी आंदोलनों के संदर्भ में लिखते हुए मुख्यधारा के इतिहासकारों ने बार-बार डंडी मारी है। हर बार कम तौला है।

…तो क्या भारत का इतिहास आधारित साहित्य भी इसी विडंबित इतिहास-लेखन की तर्ज पर लिखा जाना चाहिए?  कतई नहीं! यह इतिहास की साजिश है। खंड-खंड पाखंड है। यह भारत की जनजातियों के महान स्वतंत्रता संघर्ष की गरिमा और महत्व को धुंधलाने का ऐतिहासिक षड्यंत्र है।

जब भारतीय राजे-रजवाड़े-नवाब अंग्रेजों से मित्रता या ‘सबसिडियरी अलाउआंस’ (सहायक संधि) की आत्मछलना का शिकार होकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद के समक्ष घुटने टेक रहे थे,… सन संतावन की लड़ाई के नायकों में परिगणित बाबू कुंवर सिंह, बाजीराव पेशवा, अवध के नवाब या रानी लक्ष्मीबाई आदि आदि… अपनी पेंशन बचाने-बढ़वाने या अपनी गोद ली संतान के उत्तराधिकार की मान्यता हेतु याचनाएं कर रहे थे, उसके पूर्व… बहुत पहले, लगभग सौ साल पहले ही झारखंड के आदिवासी समाज ने न सिर्फ अपने दुश्मन को पहचान लिया था, वरन शत्रु के विरुद्ध लामबंद भी हो चुके थे… ईस्वी सन 1781 में।

अकादमिक इतिहास की किताबों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अधिकांश श्रेय प्राय: शिष्ट समाज या प्रभु वर्ग के नायकों को दिया गया है, जबकि ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकर है’ के पूर्व यह प्रभु वर्ग पूर्ण स्वराज का पक्षधर था भी नहीं। यह वर्ग तो स्वशासन से ही संतुष्ट रहने वाला था। मात्र शासन अपना : राज इंगलिस्तान का।

इतिहास रहा है कि दासता के विरुद्ध जितने भी आंदोलन, संघर्ष, क्रांति या विद्रोह हुए उनकी शुरुआत प्रभु वर्ग ने कभी नहीं की। दुनिया के किसी कोने में, हर बार ऐसी शुरुआत पददलित, शोषित और वंचित समाज ने ही की है। भारत में भी …

भारत में विदेशी साम्राज्यवाद के विरुद्ध पहली बुलंद आवाज राजमहल की पहाड़ियों से उठी थी। बाबा तिलका मांझी की आवाज, जिसे ‘पहाड़िया विद्रोह कह कर आजादी के इतिहास में हाशिए भर जगह भी नहीं दी गई। आगे उससे भी बड़ी और संगठित आवाज झारखंड के संताल समाज की अगुआई में उठी। इसे भी विद्रोह के खाते में ही डाल दिया गया… ‘संताल विद्रोह’।

प्रश्न यह है कि ‘दांडी विद्रोह’ क्यों नहीं कहा जाता? ‘चौरीचौर विद्रोह’ क्यों नहीं लिखा गया? ‘चंपारण विद्रोह’ या ‘सविनय अवज्ञा विद्रोह’ क्यों नहीं कहा जाता? इन्हें आजादी के सुदीर्घ संघर्ष के विभिन्न चरण कह कर इतिहास में दर्ज किया गया है। फिर क्यों ‘पहाड़िया विद्रोह’  (ई.सन 1781) क्यों ‘चुहाड़ विद्रोह’  (ई.सन 1795), क्यों ‘तमाइ विद्रोह’  (ई.सन 1798) ‘मुंडा विद्रोह’  (ई.सन 1820), ‘कोल विद्रोह’  (ई.सन 1831), ‘मुंडा विद्रोह’  (ई.सन 1831), या ‘चेरो खरवार-भोगता विद्रोह’  (ई.सन 1857) क्यों आखिर…?

यह क्यों नहीं कहा जाना चाहिए कि झारखंड की जनजातियों का स्वाधीनता संग्राम तिलका मांझी से टाना भगत (ई.सन 1943) तक अनवरत चलता रहा और इस लंबी लड़ाई में स्वाधीनता की मशाल एक हाथ से दूसरे हाथ में स्थानांतरित होती रही।

डेढ़ सौ वर्षों से भी अधिक समय तक लगातार चलने वाले आदिवासी संघर्ष को खंड-खंड दर्ज कर आदिवासी समाज के क्रांतिधर्मी चरित्र, साम्राज्य विरोधी चेतना और स्वाधीनता संघर्ष में इस समाज की भूमिका को धुंधलाने के प्रयास किए गए हैं। एक बड़ी लड़ाई के विभिन्न चरणों को क्षेत्रीयता की परिधि में सीमित कर छोटे-छोटे अल्पकालिक विद्रोह की यूरोपीय परिभाषा में कोष्ठबद्ध कर दिया गया है।

एक दूसरे में गुंथे आंदोलनों को, रक्तरंजित संघर्षों की… स्वाधीनता की इस लंबी लड़ाई को टुकड़ों-टुकड़ों में इतिहास बद्ध किया गया है। मात्र इसलिए ताकि इन्हें ‘विद्रोह’ की उस यूरोपीय परिभाषा में कैद किया जा सके, जो कहती है कि यदि कोई बगावत सफल रहती है तो वह क्रांति है… रिवोल्यूशन है और यदि क्रांति का दमन कर दिया जाता तो वह सिर्फ विद्रोह है, म्यूटिनी है, अपराइजिंग है, इंवरेकशन है… रिवोल्ट है।

“आजादी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ या ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कालजयी नारों की भांति अपनाया गया है। जब चिर-स्वाधीन पहाड़िया समाज के बाबा तिलका मांझी ने यह बात कही… ‘हमारे जंगल से वापस जाओ” तो उसे विद्रोह क्योंकर कहा गया?

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद या सुभाषचंद्र बोस के योगदान को सर्वोच्च बलिदान और श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। इन बलिदानियों ने वही तो किया था जो इनसे सौ साल पहले सिदो-कान्हू-चांद-भारव भाइयों ने किया था या महान बिरसा मुंडा ने किया था… बहिरागत विदेशी सत्ता के विरुद्ध संगठित सशस्त्र संघर्ष। फिर इन्हें स्वाधीनता संग्राम के नायकों जैसी प्रतिष्ठा क्यों नहीं मिल सकी?

बहुत दिनों बाद ही सही, एक भूल-गलती सुधारी गई है। बिरसा महान को मान्यता देनी पड़ी है। संसद भवन के केंद्रीय हॉल में बिरसा मुंडा की भव्य तस्वीर, संसद के परिसर में बिरसा की प्रतिमा (16 अक्टूबर 1989) और बिरसा मुंडा की डाक टिकट (15 नवंबर 1989) जारी किया गया है। बिरसा को मान्यता देनी पड़ी, क्योंकि विवशता थी।

जब पराजय अतिभव्य हो जाती है और उसे इतिहास से खारिज करना असंभव हो जाता है तो उसे शिष्ट इतिहास का परिशिष्ट बना लिया जाता है अन्यथा हाशिए पर डाल दिया जाता है। ‘उलगुलान’ के पूर्व के आदिवासी संघर्षों के साथ अब भी यही किया जा रहा है।

इतिहास बहुत विश्वसनीय चीज नहीं है, क्योंकि विजेता अपना मनोवांछित इतिहास लिखवाते रहे हैं।… क्योंकि हर इतिहास ‘अंतरिम’ (एडहॉक) होता है, जिसे चुनौती दी जा सकती है, जिसे संशोधित-परिवर्धित किया जा सकता है। …क्योंकि सत्ता के बदलते ही इतिहास दर्शन भी बदल जाता है। नहीं बदलता तो लोक…!

अजर-अमर होता है लोक! इसलिए जब इतिहास को साहित्य में रूपांतरित करना हो तो सिर्फ इतिहास पर निर्भरता के बजाय हमें लोक के पास भी जाना चाहिए। लोक-गीतों, लोक-श्रुतियों, लोक-कथाओं यहाँ तक कि दंत कथाओं का संज्ञान भी लेना चाहिए, क्योंकि इतिहास पराजितों द्वारा नहीं लिखे जाते। क्योंकि पराजितों की पीड़ा और व्यथा-कथा की अभिव्यक्ति लोक में ही होती है।

आदिवासी संघर्षों के विरूपित इतिहास पर वर्षों तक उंगली नहीं उठी, परंतु अब भारतीय हिंदी साहित्य में आदिवासी संघर्षों के परिप्रेक्ष्य को सही करने की कोशिशें सामने आने लगी हैं।

इतिहास लेखन तथ्यों के सत्यापन और प्रमाणीकरण का मुंहताज होता है, जबकि साहित्य में आने वाला इतिहास अकादमिक पाठ्यपुस्तकों में आने वाले इतिहास की भांति हठ नहीं करता। साहित्य में उपस्थित होने वाला इतिहास क्षेत्र-विशेष के जनजीवन से जुड़ी आस्थाओं, विश्वासों, लोक गीतों, लोक-कथाओं आदि-आदि का भी संज्ञान लेता है। इन सबसे अनुप्राणित होता है, इनकी उपेक्षा कर इतिहास की बड़ी किताब भले लिख ली जाय… बड़ा साहित्य नहीं रचा जा सकता।

इतिहास आधारित साहित्य में तिथियां, घटनाएं और चरित्र तो वास्तविक होते हैं, परंतु इतिहास के रिक्त स्थानों को भरने के लिए लेखक को कुछ ऐसी स्थितियां परिकल्पित भी करनी होती हैं, जो वस्तुत: कभी घटित नहीं हुई होतीं, परंतु तत्कालीन समय के सूत्र उस परिकल्पित गढंत के घटित हो सकने की गवाही देते प्रतीत होते हैं। लेखक को ऐसी संभाव्यताओं का आवाहन करना होता है। काल्पनिक यथार्थ की सृष्टि करनी होती है। यह रचनाकार की शक्ति भी है और सीमा भी क्योंकि सच भी कभी-कभी असंभाव्य प्रतीत होता है और काल्पनिक गढ़ंत को यथार्थ की भांति स्थापित और स्वीकृत कराना ही रचनाकार की चुनौती होती है।

जनजीवन पर लिखने के मामले में आजकल एक गड़बड़ यह होने लगी है कि आदिवासी साहित्य में हाथ आजमाना किसी फैशन की भांति लिया जाने लगा है। इस शौकिया लेखन में आदिवासी समाज और संघर्षों पर लिखते हुए इतिहास के साथ मनमाने छेड़छाड़ भी की जा रही है।

बिना पर्याप्त शोध और बगैर प्रतिबद्धता के, इस प्रकार का भ्रामक लेखन आगे चल कर इतिहास के सच की भांति साहित्य बन जाता है। यह अगंभीर, शौकिया और गैर-जिम्मेदार लेखन न सिर्फ ऐतिहासिक मात्र एक उदाहरण…

पलामू (झारखंड) के ‘चेरो-खरवार-भोगता आंदोलन (ई. सन 1857-1859) के लिए ओमैली ने पलामू गजेटियर में लिखा है… ‘नीलांबर एंड पीतांबर शाही वेयर इवेंचुअली कैप्चर्ड, ट्राएड एंड हैंग्ड!’ साहित्यकारों-इतिहासकारों ने भी इसे अलग-अलग ढंग से व्याख्यायित किया है।

पलामू के लेखक स्व. ब्रजकिशोर पाठक जी ने ‘ट्राएड’ शब्द की उपेक्षा करते हुए नीलांबर-पीतांबर को गिरफ्तारी के बाद सीधा फांसी पर लटका दिया है। पलामू के ही स्व. सत्यनारायण नाटे ने भी दोनों भाइयों को अप्रैल 1859 में गिरप्तार और फिर नीलांबर-पीतांबर के गांव चंमोसनेया में ही बरगद वृक्ष से लगाकर फांसी देने की बात लिखी है। नाटे जी ने भी ‘ट्राएड’ शब्द का संज्ञान नहीं लिया है।

‘झारखंड इंसाइक्लपीडिया खंड-1’ (संपादक : रणेंद्र-सुधीर पाल) झारखंड : इतिहास और संस्कृति (बाल मुकुंद वीरोत्तम) ने आधी भूल तो सुधार दी है कि नीलांबर-पीतांबर को फांसी चेमो-सनेया में नहीं, बल्कि लेस्लीगंज में दी गई थी, परंतु समय की चूक इनसे भी हो गई है। शहादत का समय अप्रैल 1859 ही लिख गए हैं।

एक अर्धसत्य इतिहास में भी पूर्ण सत्य की भांति दर्ज कर दिया गया है।

अपने नायकों को देवता बनाने की लगन में लेखकों ने इस इतिहास को विरूपित कर दिया है कि नीलांबर-पीतांबर ने आत्मसमर्पण किया था। आगे का सच यह है कि लेस्लीगंज की अदालत में बेदी नीलांबर शाही, पीतांबर शाही, कुमार शाही (नीलांबर शाही के पुत्र), शिवचरण मांझी, रूदन मांझी, रतन साह, भानुप्रताप सिंह, भूरना साह समेत अन्य डेढ़ सौ लोगों पर राजद्रोह, लूट, हत्या, आगजनी, सरगारी कर्मचारियों को प्रताड़ना, सरकार के विरुद्ध सेना संगठन आदि के मुकदमे चलाए गए थे। इन मामलों में अंग्रेज सरकार की ओर से लेफ्टिनेंट ग्राहम और सरकारी वकील जगदंब सहाय ने जिरह की थी। बंदी विद्रोहियों की ओर से बाबू नंदराम दत्त और अखौरी इंजोरी लाल मुख्तियार थे।

जून-जुलाई 1859 में एक-एक कर सजाएँ सुनाई गई थीं। 11 अक्टूबर 1859 को लिखे पत्र द्वारा बंगाल सरकार के अंडर सेक्रेटरी लार्ड एच.यू.ब्राउन ने छोटानागपुर के आयुक्त को लेफ्टिनेंट गवर्नर द्वारा सजाओं की पुष्टि की सूचना दी थी और तब सजाएं अमल में लाई गर्इ थीं।

फांसी की सजा सिर्फ नीलांबर को हुई थी। पीतांबर को काला पानी का दंड दिया गया था। पलामू के लेखकों ने दोनों भाइयों को फांसी पर चढ़ा दिया, कुछ ऐसा ही तथ्यहीन भ्रामक लेखन बाबा तिलका मांझी पर भी लिखा गया है। बहरहाल,

अकादमिक इतिहास का बयान है कि विदेशी साम्राज्यवाद के विरुद्ध शुरू हुई भारत की आजादी की पहली लड़ाई 10 मई 1857 को शुरू हुई और मात्र एक सौ चौंतीस दिनों बाद… बादशाह बहादुरशाह जफर, बेगम जीनत महल और शाहजादे जवांबख्त के आत्मसमर्पण के साथ यह लड़ाई खत्म हो गई।

आगे के सच पर ‘विद्रोह’ की चादर डाल कर यह इतिहास ढक दिया गया कि दिल्ली सल्तनत के पतन के बाद भी… अगले दो सालों तक यह लड़ाई चलती रही थी… पलामू में।

पलामू के भोगता आदिवासी इस हारी हुई लड़ाई को लड़ते रहे थे। पलामू का ‘चेरो-खरवार-भोगाता आंदोलन’ सन 1857 के महासमर का आखिरी क्षेपक था, जिसे सन संतावन के महासमर के इतिहास में हाशिए का मान भी नहीं मिल सका। इसे भी एक छोटे क्षेत्रीय और अल्पकालिक विद्रोह के रूप में इतिहास के नीम अंधेरे कोने में धकेल दिया गया जबकि छोटानागपुर के तत्कालीन कमिश्नर एडवर्ड ट्वीट डाल्टन के पत्र गवाह हैं कि पलामू की यह जनक्रांति भी सन संतावन की क्रांति से जुड़ी हुई थी। इतिहासकारों की अपेक्षा डाल्टन ने अधिक ईमानदारी से स्वीकार किया है… ‘हजारी में यह मुख्यत: सिपाही विद्रोह मात्र था, लेकिन मानभूम, आधुनिक रांची क्षेत्र और पलामू में विद्रोह ने जनविद्रोह का रूप ग्रहण कर लिया था। (एडवर्ड ट्यूट डाल्टन/ओल्ड इंगलिश कॉरेस्पॉडेंस/संख्या 202 खंड-रांची/संख्या 17 (1017-आर 14 डी.) दिनांक 5 नवंबर 1958 : बंगाल सरकार के सचिव आर.यंग को प्रेषित डाल्टन का पत्र)

इतिहास को साहित्य में रूपांतरित करना अतीतजीवी हो जाना या मात्र अतीत का अवगाहन करना नहीं होता, बल्कि यथासंभव तथ्यों पर आधारित साहित्य और बीते समय के चरित्रों को पुर्नजीवित करना भी है। कैनवास के खाली कोनों में संभाव्यता के रंग भर कर कैनवास को पूर्ण करना भी है… और यह किसी इतिहास के वश की बात नहीं, इसे साहित्य ही संभव कर सकता है।

क्योंकि एक बार जब इतिहास समय की भूल-भुलैया में खो जाता है या विरूपित कर दिया जाता है और उसके निशान तक मिटा दिए जाते हैं तो सौ साल बाद इतिहास के खंडहरों की खुदाई करना और इतिहास की टूटी बिखरी कड़ियों को जोड़ कर एक मुकम्मल जंजीर की शक्ल देना बहुत–बहुत मुश्किल काम होता है। लगभग असंभव लगता है।

इतिहास आधारित साहित्य इसी असंभव को संभव करने की कला है।