जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध छात्र।

राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ (1823-1895) का लेखन अपने समय के अंतर्विरोधों से घिरा नजर आता है।नवजागरण के आगोश में नित नए चिंतन तथा नई खोजों के दौर में उनके लेखन में किसी एक दृष्टि का बोलबाला नहीं है, बल्कि घटनाएं, परिस्थितियां तथा परिवेश मिलकर उनकी ऐतिहासिक दृष्टि के निर्माण में सहायक बने हैं।इतिहासकार ई.एच. कार कहते हैं, ‘नई खोजें और नए दृष्टिकोण इतिहास को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में पैदा होते रहते हैं।इतिहासकार स्वयं भी इस प्रक्रिया से प्रभावित होता है।’ राजा शिवप्रसाद भी प्रारंभ में भारत के अलिखित और गुमनाम इतिहास से संबंध रखने वाली जानकारियों के प्रति आकर्षित होते हैं।उनकी इतिहास दृष्टि पर विलियम जोंस, मैक्समूलर जैसे प्राच्यविदों का असर स्पष्ट देखा जा सकता है।वैभव सिंह ने लिखा है, ‘प्राच्यवादी इतिहास लेखन में एक ओर विभिन्न साम्राज्यों के इतिहास, राजाओं और उनके कालक्रम के निर्धारण के प्रयास मिलते हैं तो दूसरी ओर धर्म-संस्कृति को आधार बनाकर सामाजिक, बौद्धिक इतिहास लिखने पर भी खासा ध्यान दिया गया है।’ (इतिहास और राष्ट्रवाद)।

शिवप्रसाद का लेखन गहरे रूप से प्राच्यवादियों के सिद्धांतों से प्रभावित है।वे संतुलन के बावजूद अतीत के गौरव गान का मोह नहीं छोड़ पाते।उदाहरण के लिए, ‘मानवधर्म सार’ पुस्तक के उस अंश को देखा जा सकता है, जहां तमाम अनार्य स्थितियों की आलोचना के बावजूद वे आर्यों की महिमा का बखान करना नहीं भूलते, ‘ये बुद्धि के मानो पुंज थे।उनके हृदय क्षेत्र में मानो उसी समय से एक बड़ी विधा के बीज अंकुरित होने लगे थे।एक मनुस्मृति को देखने से ही यह बात प्रकट हो जाती है कि उन्होंने कैसे अच्छे-अच्छे सांसारिक व्यवहार चलाने के लिए प्रबंध बांधे थे।आर्य लोग संसार के सब मनुष्यों में श्रेष्ठ गिने जाते थे।यहां तक कि होते-होते आर्य का अर्थ ही श्रेष्ठ हो गया।’  

सितारेहिंद की एक इतिहास पुस्तक ‘इतिहास तिमिरनाशक’ है, जो उन्होंने स्कूल के विद्यार्थियों के लिए तैयार की थी।इसमें प्राच्यवादी दृष्टि की स्पष्ट झलक है।राजा शिवप्रसाद ने कथानकों का गुणगान करने के लिए कहीं-कहीं तथ्यों को ताक पर रख दिया है।कालक्रम का निर्धारण उनके इतिहास में भले ही ऊपर-नीचे हो सकता है, परंतु घटनाओं के महिमा गान से उनका इतिहास लेखन भरा हुआ है।भारत का इतिहास लिखते समय शिवप्रसाद दो प्रयासों का एक साथ तालमेल करते नजर आते हैं।एक ओर वे अंग्रेज शोधकर्ताओं के तर्ज पर इतिहास को कोरे गप्प और अंधविश्वासों से मुक्त कर आधुनिक ढंग का इतिहास लिखना चाहते हैं तो दूसरी ओर प्राचीन अतीत को हिंदू गौरव का माध्यम बनाने की कोशिश में कई अवैज्ञानिक धारणाओं के जाल में वे फंसते नजर आते हैं।

वैभव सिंह का कहना है, ‘शिवप्रसाद ने जिस अपेक्षित सावधानी और आलोचनापरक दृष्टिकोण से डेढ़ हजार साल पुराने महान सांस्कृतिक गौरव को याद किया, लगभग उतने ही पूर्वग्रह से मध्यकालीन इतिहास के बारे में लिखा है। …बड़े ही तिरस्कार से मध्यकालीन इतिहास को केवल दो धर्मों के परस्पर टकराव तक सीमित कर देने की प्रवृत्ति की हिंदी क्षेत्र में सर्वप्रथम अभिव्यक्ति ‘इतिहास तिमिरनाशक’ के माध्यम से मिली।’ 

हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांस्कृतिक समन्वय तथा सहयोग की किसी भी संभावना को अस्वीकार करने वाली इतिहास दृष्टि राजा शिवप्रसाद के लेखन में इस प्रकार झलकती है, ‘महमूद गजनवी और उसके साथियों ने सोमनाथ पत्तन और कन्नौज का जो हाल लिखा है उससे मालूम होता है कि उस समय यह देश दुनिया के और सब देशों से किसी बात में कम नहीं था।लेकिन हाय अफसोस इन मुसलमानों ने इस देश को उसी हालत में दबा रखा है और योरोप और अमेरिका को वहां वालों ने बुद्धिबल से कहां से कहां पहुंचा दिया।’ (इतिहास तिमिरनाशक)।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘इतिहास तिमिरनाशक’ की समीक्षा करते हुए कहा था ‘लेखक (सितारेहिंद) सिक्के का सिर्फ एक पहलू दिखता है।दूसरे पहलू को छुपाकर ईमानदारी नहीं बरतता।उसने मुस्लिम शासन का वर्णन करते हुए अकबर, जहांगीर और शाहजहां में सिर्फ बुराइयां दिखाईं, जबकि उन्होंने अपने समय में अच्छे काम भी किए थे।धार्मिक मामलों में उन्होंने सहिष्णुता का प्रचार-किया था जो उस समय तक सभ्य यूरोप में नहीं था।लेखक ने मुसलमान शासकों का जो वर्णन किया है, वह अच्छा है, फिर भी स्कूली पाठ्यक्रम की किताब में इसे नहीं रखना चाहिए था।इससे दो समुदायों के बीच नफरत बढ़ेगी, जबकि ब्रिटिश शासन के तहत हम सबको मिलकर उन्नति करनी चाहिए।’ (उद्धृत, रस्साकशी, वीर भारत तलवार)।यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है।

राजा शिवप्रसाद की मुसलमानों के प्रति नफरत से केवल मध्यकालीन इतिहास की घटनाएं ही प्रभावित नहीं दिखाई देती हैं, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यांकन में भी उनके पूर्वग्रह, उनकी निजी धारणाएं तथ्यों पर हावी दिखाई देती हैं।1857 के विद्रोह को वे महज अभिलाषी मुसलमानों तथा लालची हिंदुओं का संक्षिप्त विद्रोह मानते हैं, जिसे बहादुर अंग्रेजों ने क्षण भर में बिना किसी परेशानी के दबा दिया।सिपाही विद्रोह के वास्तविक कारणों पर विचार करने की दृष्टि से भी शिवप्रसाद ने किसी गहरी समझ का परिचय नहीं दिया।इस घटना को उन्होंने केवल कारतूस पर चर्बी चढ़ाए जाने से जोड़ दिया।उन्हें विद्रोह के पीछे या तो इस्लामिक राज्य की पुनर्स्थापना की साजिश नजर आई या फिर हिंदुओं का बेवकूफीपन नजर आया।असल में जब किसी खास दृष्टि से घटनाओं को परखा जाता है तो वह एक सीमित दायरे को पार नहीं कर पाती।राजा शिवप्रसाद ने भी मध्यकालीन इतिहास तथा मुस्लिम वर्ग के प्रति ऐसी ही पूर्वग्रह युक्त धारणाओं को प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया है।यह उनके इतिहास लेखन की प्रमुख प्रवृत्ति और सीमा है।       

ध्यान देने की चीज है कि प्राच्यवादी इतिहास दृष्टि में अतीत के गौरवगान को प्रमुखता से वरीयता दी जाती है, जबकि साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से जुड़े इतिहासकारों का नजरिया अलग था।वैभव सिंह के अनुसार, ‘भारत में ब्रिटिश शासन को अधिक औचित्यपूर्ण और तर्कसंगत दिखाने के लिए भारत को एक पिछड़ी, अंधविश्वास से ग्रस्त, अविकसित एवं अराजकता की शिकार सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करना अनिवार्य था।’

भारत में इतिहास को साम्राज्यवाद के चश्मे से देखने के लिए जेम्स मिल की रचनाओं का विशेष उल्लेख किया जाता है।राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद ने ‘इतिहास तिमिरनाशक’ में भले ही व्यापक रूप से साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से इतिहास को परिभाषित किया है, परंतु उनके ‘बनारस अखबार’ में अंग्रेजों की खुशामद तथा भारतीयों की वर्णित पतित संस्कृति के अंशों की झलक इस प्रकार देखी जा सकती है,  ‘ईश्वर की बड़ी कृपा हुई कि ऐसे समय में इस देश के दरमियां अंग्रेजी अमलदारी हो गई।सूखे खेत फिर लहलहाए, अस्त हुए तारे फिर उदय हो गए, अंग्रेजी हुक्मरानों से पहले हिंदुस्तान में था ही क्या….खाने को चार दाने या फिर कोरे फांके!… इन अमलदारों ने हिंदुस्तानियों की चाल-चलन और रहन-सहन ही कुछ की कुछ कर दी।’ (बनारस अखबार, सितंबर 1867)।अंग्रेजों की मुक्त प्रशंसा उनके लेखन में देखी जा सकती है।इतिहास लेखन में जिस तटस्थता और बहुआयामी वैज्ञानिक पद्धति की आवश्यकता होती है, उसका पालन राजा शिवप्रसाद ने बहुत कम मात्रा में किया है।

19वीं सदी के इतिहास लेखन में राष्ट्रीयता की भावना के साथ धर्म के घालमेल से पैदा होने वाली सांप्रदायिक चेतना स्पष्ट नजर आती है।शायद यही कारण है कि राजा शिवप्रसाद का इतिहास निष्पक्षता के बजाए मुस्लिम विरोधी लगता है।वस्तुतः 19वीं सदी के मध्य तक राष्ट्रवादी दृष्टि इतनी परिपक्व नहीं हो पाई थी कि वह व्यापक भारतीय हितों के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की प्रत्यक्ष आलोचना कर सके।इस समय के इतिहासकार तथा लेखक अपनी राजभक्ति को बनाए रखकर राष्ट्रीय चेतना को सींचने में लगे थे।राजा शिवप्रसाद के लेखन में राजभक्ति का गहरा प्रभाव दिखाई देता है, परंतु शैशवावस्था धारण की हुई राष्ट्रवादी दृष्टि भी उनके लेखन में है।फिर चाहे ‘बनारस अखबार’ का बेबाकीपन हो या धार्मिक-सुधार, गोरक्षा तथा भाषा-लिपि में सुधार जैसे मुद्दे हों।इनमें राष्ट्रीय चेतना के लक्षण देखे जा सकते हैं।

इस प्रकार राजा शिवप्रसाद के लेखन में इतिहास की विभिन्न दृष्टियों का संगम है, परंतु अगर प्रचुरता की बात की जाए तो प्राच्यवादी दृष्टि ही उनके इतिहास लेखन पर हावी है। ‘इतिहास तिमिरनाशक’ के तीन खंडों की भूमिका में उन्होंने लिखा है, ‘मैं अनेक ख्याति प्राप्त लोगों, जैसे सर विलियम जोन्स, जेम्स प्रिंसेप, डॉ. हॉग, कनिंघम और प्रो. मैक्समूलर को धन्यवाद देना चाहूंगा।इनकी नई सामग्री से मेरे लेखन को विस्तार मिला है। …इन्हीं की प्रेरणा से मेरी इतिहास के प्रति समझ बन पड़ी है।’

इतिहास की नई सामग्री के उपयोग से उन्होंने हिंदी की प्रथम इतिहास पुस्तक का ज्ञानात्मक खजाना तैयार किया था।यह अपने समय में विभिन्न जानकारियों का प्राथमिक स्रोत बना था।

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