लेखक और अनुवादक।

यूनिवर्सिटी ऑफ केंट से अंग्रेजी और उत्तरऔपनिवेशिक साहित्य के रिटायर्ड प्रोफेसर अब्दुलरजाक गुरना का जन्म 1948 में तंजानिया के जंजीबार में हुआ था| 1960 के दशक में परिस्थितियों ने उनके नाम के साथ शरणार्थी की पहचान जोड़ दी| उसी पहचान को लेकर वे यूनाइटेड किंग्डम पहुंचे| निश्चित तौर पर इस पहचान के साथ जीवन सरल नहीं था, लेकिन गुरना ने उसे अपने लिए कठिननहीं बनने दिया| इसी संकल्प का नतीजा है कि अब तक दस उपन्यास लिख चुके गुरना 120 वर्ष के इतिहास में नोबल साहित्य सम्मान से सम्मानित चौथे अश्वेत लेखक हैं|  21 वर्ष की उम्र से लेखन से जुड़े गुरना के उपन्यास जहां एक ओर मानवीय करुणा और समस्याओं से संवादरत नजर आते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी विशिष्ट लेखन शैली के लिए भी पाठकों को आकर्षित करते हैं| यह आकर्षण उनकी मनोवैज्ञानिकदृष्टि से समृद्ध होने के कारण अधिक गहन हो जाता है, क्योंकि तब जो बीत गया और जो बीत रहा है इसके बीच फैली उस खाई को समझना अधिक सरल हो जाता है, जिसके बारे में गुरना का संपूर्ण लेखन है और शायद जीवन भी…!

इस दुनिया में सब कुछ कार्य-कारण की एक लंबी शृंखला का हिस्सा है| यानी जो बातें हमें बहुत औचक-अचानक प्रतीक होती हैं, उन्हें भी जीवन के रंगमंच पर प्रकट होने से पहले तपना पड़ता है समय की हांडी में| वहन करना पड़ता है अपनी जड़ों में रूपांतरण का इतिहास और थामकर रखनी पड़ती हैं अपनी स्मृतियां ताकि जो बीत गया और जो बीत रहा है; उन दोनों के बीच फैली खाई को समझा और समझाया जा सके|

अक्तूबर के पहले सप्ताह में जब विश्व प्रतिष्ठित नोबल साहित्य सम्मान 2021 की घोषणा हुई, तो कैंटरबरी में यूनिवर्सिटी ऑफ केंट के रिटायर्ड प्रोफेसर और 10 उपन्यासों के लेखक की पहचान लेकर जी रहे अब्दुलरजाक गुरना अचानक चर्चा में आ गए| इसके साथ शुरू हुआ दुनिया भर में अनगिनत संवाद, प्रति-संवाद, व्याख्या और व्याख्यानों का दौर! लेकिन क्या वाकई 73 वर्षीय गुरना का नोबल के लिए चयनित होना इतना ‘औचक’ था? नहीं… आज गुरना की आवाज़ को जो वैश्विक मंच मिला है, उसके मूल में गुरना की लंबी लेखन-यात्रा है| यह उन तमाम लोगों की स्मृतियों का दंश और उनके संघर्षों का भार संभाले हुए है, जिन्हें अक्सर सिकोड़ दिया जाता है, कभी ‘एक अश्वेत’, कभी ‘एक शरणार्थी’ की पहचान तले|

नोबल साहित्य सम्मान 2021 की घोषणा होने के तुरंत बाद नोबल प्राइज आउटरीच के चीफ़ साइंटिफ़िक ऑफिसर एडम स्मिथ के साथ हुई टेलीफोनिक बातचीत में गुरना ने अपनी इसी पहचान से जुड़ी बृहत कथा पर प्रकाश डालते हुए कहा, ‘यह कोई नई कहानी नहीं है| हमारे पास ऐसी कई-कई सदियां हैं| यूरोप में लोग शरणार्थियों के साथ एक तरह की कृपणता के साथ व्यवहार करते हैं| जबकि वे लोग जिन्हें हम शरणार्थी कहते हैं, खाली हाथ नहीं आते| साथ में उनकी प्रतिभा, ज्ञान और ऊर्जा भी आती है| बहुत कुछ होता है, उनके पास देने के लिए और यही सोच का दूसरा रास्ता है, जो हमेशा से था| हम उन्हें ‘गरीबी’ के कारण के तौर पर लेते हैं| ठीक है, यह एक पक्ष हो सकता है लेकिन इन्हीं लोगों के बीच बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो काफी योगदान दे सकते हैं| मगर सारी बात नज़रिए की है|’

निश्चय ही सारी बात नजरिए की है| अन्यथा जल तो सदैव जल होता है| अलग-अलग देश-काल-परिस्थिति में भले उसका रूप बदलता हो, लेकिन जलत्व नहीं बदलता| उसी तरह ‘जड़ों से जुड़े लोग हों’ या ‘मजबूरी में जड़ों से उखड़ गए लोग’ मूलतः दोनों एक जैसे होते हैं| इसीलिए

भले गुरना को ‘संस्कृतियों और महाद्वीपों की खाई में उपनिवेशवाद के प्रभावों के लेखन के लिए’ साल 2021 के नोबल साहित्य सम्मान के लिए चुना गया हो, लेकिन वे समाज के दोनों हिस्सों के बीच किसी भी ‘विभाजक रेखा’ की मौजूदगी को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने का अर्थ है उस सर्वव्यापी उदासीनता को वहन करना, जिससे परे रहने के लिए उन्होंने लेखन को चुना|

एक वेबपोर्टल पर ‘सांस्कृतिक-खाइयों’ के प्रश्न का उत्तर देते हुए गुरना ने कहा, ‘ऐसा इसलिए है क्योंकि इन विषयों पर अक्सर न कोई बात की जाती है, न कोई बात बताई जाती है| लिहाजा आपके पास एक ओर आपकी विद्वता होती है जो प्रभावों, परिणामों और नृशंसताओं के सभी पक्षों को जांचती रहती है| दूसरी ओर होती हैं प्रचलित बातें, जो इस बारे में बहुत ‘सलेक्टिव’ होती हैं कि क्या याद रखना है और क्या भूल जाना है| मुझे लगता है इस खाई को पाटने के लिए कहानियां पुल बन सकती हैं|’

गुरना अपनी पहली किताब ‘मेमोरी ऑफ डिपार्चर’ से लेकर अपनी नवीनतम कृति ‘आफ्टर लाइव्स’ तक बार-बार उन कहानियों को दोहराते हैं, जिनमें एक ‘सीधी, और करुणामय पैठ’ प्रतिध्वनित होती है| तथापि ‘‘उनके पन्नों में ‘अंधेरों’ की कोई जगह नहीं है| वे हमें मध्य-युग के अंधेरों और उजालों, खूबसूरत जंगलों और खतरनाक दाख लताओं व सांपों और कपटी व्यापारियों व एक-दूसरे से दुश्मनी निभाते जागीरदारों की एक-दूजे में घुलती हुई ऐसी तसवीर सौंपते हैं, जो बाक़ी सबसे ज्यादा सच्ची लगती हैं और ज्यादा सही|’ (आलोचक एलन चेउसे)

थोड़ासा संवेदनशील होना
बहुतबुरा नहीं है

हालांकि गुरना की पुरानी संपादक अलेक्जेंड्रा प्रिंगल को इस बात की शिकायत है कि ‘गुरना के वर्तमान में सबसे बेहतरीन अफ्रीकी लेखकों में से एक होने के बावजूद किसी ने उनपर गौर नहीं किया|’ पर गुरना इसे उस तरह नहीं देखते| शायद उन्हें लगता है कि मैं ज्यादा बेहतर का हक़दार था, ‘पर मुझे कभी नहीं लगा कि मेरी उपेक्षा की गई| मैं हमेशा उन पाठकों से संतुष्ट हो गया, जो मेरे पास थे| पर हां मैं इससे बेहतर कर सकता था|’ लेकिन अब जबकि उनके पास ‘अनुभव’ भी है और ‘वैश्विक स्वीकार’ भी, तब वे इसे कैसे देखते हैं? इस सवाल के जवाब में गुरना अपने चिर-परिचित सपाट, लेकिन चौकस अंदाज़ में कहते हैं, ‘इसे मैं अपनी प्रगति के रूप में ले सकता हूं| आज मेरे आसपास बहुत भीड़ है| मिलने के लिए, बात करने के लिए इतने लोग हैं| बस इतना ही… इसके अलावा और क्या कह सकता हूं मैं! जो भी है, फ़िलहाल मुझे अच्छा लग रहा है| लेकिन हां, मुझे लगता है कि इसके बाद शरणार्थी संकट और उपनिवेशवाद के मुद्दों पर दुनिया का ध्यान पहले से ज़्यादा जाएगा| उनपर चर्चा की जाएगी| ये ऐसी चीजें हैं, जो हर दिन हमारे साथ घटित होती हैं| लोग मर रहे हैं| दुनिया भर में लोग आहत हो रहे हैं| इसलिए हमे ऐसे मुद्दों पर संवेदनशील होना चाहिए| जबकि दुनिया पहले से ज़्यादा हिंसक होती जा रही है|’

और जैसा कि नोबल समिति के चेयरमैन अंदेर्स ओल्सन ने अपने बयान में लिखा, ‘गुरना का सत्य के प्रति समर्पण और सरलीकरण के प्रति उनकी विरक्ति असाधारण है| यह उन्हें स्पष्ट और गैर-समझौतावादी बनाता है| उनके उपन्यास पारंपरिक विवरणों से अलग नए और गोपन स्थानों पर दृष्टि ले जाते हैं, जो अभी तक दुनिया से ओझल रहे|’

गुरना का लेखन हमें अलग-अलग रास्तों से, अलग-अलग पात्रों के साथ, अलग-अलग घटनाओं के सहारे वहां ले जाता है जहां शोषण, अपमान, हिंसा, विघटन, संघर्ष, गरीबी, नस्लवाद जैसी जीवन की तमाम भयावह त्रासदियां बसती हैं| जहां कहीं कोई पात्र जड़ों के बगैर परेशान नज़र आता है, तो कहीं कोई दूसरा पात्र अपनी जड़ों को छिपाता दिखाई पड़ता है|

बेशक इन सब घटनाओं, पात्रों, रास्तों, बेचैनियों की नींव में गुरना का अपना द्वंद्व है, जो एक ‘अश्वेत शरणार्थी’ के रूप में उन्होंने जिया| 2004 के अपने एक आलेख ‘राइटिंग एंड प्लेस’ में इसी अनुभव को साझा करते हुए गुरना लिखते हैं, ‘जब मैंने घर छोड़ा था, मेरी ख्वाहिशें बहुत सरल थीं| ये बेचैनी और कठिनाइयों का दौर था| डर और अपमान की अवस्था… 18 की उम्र में मैं बस यही चाहता था कि कहीं और चला जाऊँ और थोड़ी-सी सुरक्षा, थोड़ी-सी तृप्ति तलाश लूँ| लेकिन लिखने के ख्याल से मैं कभी दूर नहीं हो सका| हालांकि कुछ साल बाद इंग्लैंड में जो बातें पहले सरल लगती थीं, उनके बारे में चिंता करते हुए मैंने इस बारे में अलग ढंग से सोचना शुरू किया, लेकिन इसके पीछे उस जबरदस्त अजनबीयत और अलग-थलग होने की भावना का बड़ा हाथ था, जो मैंने वहां महसूस किया| ऐसा नहीं है कि मैं वह सब कुछ समझ रहा था, जो मेरे साथ हो रहा था| और इसीलिए मैंने लिखने का फैसला किया हो| बल्कि मैंने यूं ही लिखना शुरू किया था| बगैर किसी योजना के… लेकिन फिर मुझे लगा मैं अपनी स्मृतियों को दर्ज कर रहा था| गाढ़ी, विस्तृत स्मृतियों को! यहां की अजनबीयत ने लापरवाही के साथ पीछे छोड़े गए उस जीवन और लोगों की कीमत को बढ़ा दिया था, जिन्हें मैंने हमेशा के लिए खो दिया था|’ शायद इसीलिए गुरना के लिए लेखन ‘मनोरंजन नहीं’ एक प्रतिबद्धता है| एक प्रयास और एक प्रतिध्वनि, जिसे वे बार-बार सुनना चाहते हैं और सुनाना भी|

कैसे खुद खोजें और खुद पाएं

इस बात के विस्तार के तौर पर मैगिल वेबपोर्टल पर प्रकाशित एक लंबे साक्षात्कार में गुरना की टिप्पणी को पढ़ा जा सकता है| इसमें वे कहते हैं,  ‘लिखना अपने आप में बाध्यकारी और सम्मोहक है| कुछ ऐसा जो दशकों तक हमें एक ही रास्ते पर चलने को उकसाता है| मुझे लगता है, लेखन में गढ़ने का आनंद भी है और देने का भी| इसमें कुछ पाने का सुख है, देने का सुख, अपनी बात रखने और विश्वास दिला पाने का!  यही वज़ह है कि मैं कभी नहीं कहता कि ये किताब इस बारे में हैं और वो उस बारे में| क्योंकि अव्वल तो यह ‘दावा’ करने जैसी बात है, जो सही नहीं| दूसरे मुझे लगता है कि इन चीजों को हमें अपने पाठकों पर छोड़ देना चाहिए| वे ख़ुद खोजें और ख़ुद पाएं|’ इसी साक्षात्कार में जब आगे उनसे पूछा गया, ‘आधुनिक समय में जब इंटरनेट ने हमें चारों ओर से घेर रखा है| आप इस नई दुनिया में जहां हम रहते हैं, किताबों को कैसे देखते हैं?’ तो उन्होंने कहा,

‘मैं निश्चित तौर पर नहीं जानता, मगर मैं देख सकता हूं कि कैसे यह घटना तकनीकी पत्र-पत्रिकाओं को प्रभावित कर रही है| मैं यह देख सकता हूं कि कैसे आज बहुत-सी चीजें इंटरनेट के जरिए साधी जा रही हैं| लेकिन मुझे लगता है, कल इन सबसे फ़र्क पड़ेगा|

मिसाल के तौर पर कीमत की वजह से किताबों को प्रकाशित करवाना कठिन है, तो आप ऑनलाइन मैगजीन शुरू कर सकते हैं| मैंने बहुत से लोगों को इस दिशा में अच्छा काम करते देखा है| आज अनगिनत पत्र-पत्रिकाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं| मुझे लगता है, निश्चय ही इससे क़ीमतों पर असर पड़ेगा या हो सकता है पहले ही पड़ने लगा हो| लेकिन मैं ऐसे कुछ लोगों को जानता हूं जो इस दिशा में ज़्यादा महत्वाकांक्षा के साथ ‘संभावनाओं’ पर विचार कर रहे हैं| वे ऑनलाइन किताबें प्रकाशित करते हैं, जिसे आप ‘टाइप-स्क्रिप्ट’ नहीं, किताब के रूप में डाउनलोड भी कर सकते हैं| और मैं एक ऐसी वेबसाइट को जानता हूं जो अगर आप एक किताब ख़रीदना चाहते हैं, तो आपके लिए एक किताब प्रिन्ट करके पोस्ट के माध्यम से आपको भेज देते हैं| जाहिर तौर पर वे आज ऐसा कर सकते हैं, क्योंकि तकनीकी रूप से यह सरल है|’

और लेखक की भूमिका क्या है

‘मुझे लगता है कि लेखक की एक भूमिका नहीं, बहुत-सी भूमिकाएं होती हैं| इस विषय पर हम सबकी सोच अलग-अलग हो सकती है कि लेखक क्या करते हैं, या लेखकों को क्या लिखना चाहिए, लेकिन मुझे अच्छा लगता है अपने पाठकों और समाज के साथ संवाद करना|’

गुरना उन चंद लेखकों में से हैं, जो नक्शों से भी बातें कर लिया करते हैं और उनके लिहाज़ से यह बात उतनी अजीब नहीं, जितनी सुनने में लगती है| क्योंकि आख़िर नक्शों से पहले ये दुनिया बेनक्श थी| असीम… और गुरना के पूरे लेखन को इस आख़िरी वाक्य की रोशनी में पढ़ा और समझा जाना चाहिए|