
युवा कवि और नाट्यकर्मी। पेशे से डॉक्टर। विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।
दीवार पर टंगी स्मृतियां
एक दिन सारी स्मृतियां खााक हो जाएंगी
एक दिन उठूंगा
और सब भूला जा चुका होगा
आने वाला कल भी भुला दिया जाएगा एक दिन
यही तो होगा उन सब का
जिनका खूब खयाल रखा गया
कभी छिप-छिपाकर
तो कभी मन के लिविंग रूम में लगी
सामने की दीवार पर
शान से टांग कर
भूला जा चुका होगा सबकुछ एक दिन
वो भी जिसने दीं सैकड़ों उन्नींदीं रातें
और वो भी जो खूब याद रखा गया
रह-रहकर वो जो झरता रहा आहिस्ता आहिस्ता
और वो भी जिसे याद रखने के लिए
जमा की गईं कई आवारा बेतरतीब स्मृतियां
‘भूलना’ भुला दिया जाएगा एक दिन
और भुला दिया जाएगा याद रखना
एक दिन।
संपर्क :165, कृष्णा परिसर, डी मार्ट के सामने, इंदौर रोड, उज्जैन–456010 (म.प्र) मो.6265697278


Your words have a way of making me see things from a new perspective.”