युवा कवि।अद्यतन कविता संग्रह ‘भयक्षेत्र में उतरते हुए’।

तलाश में शब्द

किसी प्रार्थना को
अनुकूल शब्द नहीं मिल रहे
कोई शब्द है जो न जाने कब से
किसी प्रार्थना में शामिल होने को प्रतीक्षारत है

जब संसार की समस्त प्रार्थनाओं को
उपयुक्त शब्द
और सारे सही शब्दों को
किसी प्रार्थना में शरण मिल जाएगी
सभ्यता का सफर पूरा होगा।

सफर में हैं शब्द

जब मैंने एक शब्द लिखा
और तुमने उसे कहा
वह शब्द ‘वही’ शब्द नहीं रह गया
उसमें तब थोड़ा मेरा स्पर्श समा जाता है
थोड़ी तुम्हारी ध्वनि घुल जाती है
हम दोनों का अंश पाकर
शब्द कुछ और बृहत्तर हो जाता है
कुछ और सघन, और अर्थसंकुल
यह शब्द की विकास-यात्रा है
जो मुझसे और तुमसे होकर गुजरती है।

लौटेंगे शब्द

आखिर ऐसा क्या था एक शब्द में
कि जिसके हटते ही
पूरा वाक्य जिंदगी की तरह हिल गया
एक शब्द किसी बच्ची के हाथ से छूटकर गिरा
और वह फूट-फूटकर बेसाख़्ता रोने लगी
एक शब्द सीने से चिपक गया मेरे
और मैं तालाब में पत्थर की तरह
एकदम से निढाल बैठ गया
कवियों से अनुरोध है मेरा
उस शब्द को वापस अपने वाक्य तक पहुँचा दें!

रात का राग

गांव हो या महानगर
समान स्वर में भूंकते हैं कुत्ते
रात का राग आलापते
एक कुत्ता जब आवाज लगाता है
दूर से कोई दूसरा हमेशा ही
लौटाता है उसकी पुकार
मूल स्वर कातर हो तो प्रतिध्वनि भी कातर
आक्रोश की सह-ध्वनि आक्रोशमय
बेचैनी लौटती है
एक और बेचैन आवाज के साथ

भूगोल बदले या मौसम
प्रहर केवल रात्रि का होना चाहिए
यह साहचर्य है स्थायी
ऐसा कम ही होता है
कि कोई कुत्ता आधी रात में
इंसानों की तरह
बस अकेला रोता हो!

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