
युवा लेखक तथा टिप्पणीकार। सेठ आनंद राम जयपुरिया कॉलेज कोलकाता में शिक्षण।
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लेखक की जिम्मेवारी समाज के प्रति होती है। जिन सवालों और मुश्किलों से समाज परेशान और जूझ रहा होता है, लेखक उन्हीं सवालों और मुश्किलों से परेशान होता है। |
कहानीकारों की चुनी हुई कहानियों के संग्रह आते रहते हैं और वे समग्र गुणवत्ता में उन्हें देखने-समझने का अवसर देते हैं। इस परंपरा में शंकर की ‘पच्चीस कहानियां’ उनकी नई किताब है। यह संग्रह इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें संकलित कहानियों में पिछले दस-बारह सालों में भारतीय समाज की राजनीतिक-सामाजिक परिणतियों का पूरा रोजनामचा है। यदि साहित्य को किसी खास ऐतिहासिक समय के प्रयोगों से बनी निर्मिति के रूप में पढ़ा जाए तो शंकर की ये कहानियां हमारे समय की राजनीति का ज्वलंत दस्तावेज हैं। हम उनको प्रेमचंदीय पंरपरा का कथाकार कह सकते हैं।
हिंदी कहानियों की कथा का वर्तमान परिदृश्य प्रेम, मनोरंजन, भोगविलास और आनंद की कहानियों से भरा है। सामाजिक पक्षधरता और प्रतिबद्धता को लेकर बहुत दिनों बाद कोई कहानीकार इस तरह आया है। इस संग्रह में दंगों पर कहानियां हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि दंगों और बढ़ रहे सांप्रदायिक विद्वेष पर शंकर ने एक से अधिक कहानियां लिखी हैं। दंगे होना सांप्रदायिक विद्वेष का जनता, प्रशासनिक व्यवस्था और आमलोगों के मन तक पैठ बनाना नई राजनीतिक कोशिशों में शामिल है। शंकर ने अपनी कहानियों में उन्हें करीने से प्रकट किया है। ‘ठिकाने’ कहानी में दो अलग धर्म के पीड़ित दंगों के बाद एक-दूसरे की रोटी और सुरक्षा के लिए जिस तरह साथ खड़े होते हैं, वह समाज के आम स्वभाव को व्यक्त करने वाला है। असल में दंगे ऊपर से थोपे जाते हैं। ‘ध्वजा’ कहानी में शोषित-पीड़ित, रोटी के लिए धर्म बदल चुके, सदानंद से सादिक हो चुके सदानंद के धर्म के ठेकेदार ‘घर वापसी’ कराते हैं, लेकिन धार्मिक जुलूस में ध्वज लेकर चलते सदानंद का व्यवहार सत्तावादी भाषा का विलोम रचता है। सादिक से सदानंद बना चुके लोग ही उसे अपने साथ खाना नहीं खिलाते, पानी नहीं पिलाते, यह वह देखता है। वह जब सदानंद था, तब भी जानता था कि बड़े लोग उसका छुआ नहीं खाते-पीते। सदानंद होकर भी पानी पीने वह फिर वहीं जाता है जहां वह जब सादिक था तब पीता था।
शंकर इसलिए भी महत्वपूर्ण कथाकार ठहरते हैं कि इस युग की लगभग हर समस्या को उन्होंने कहानियों के लिए चुना है। नोटबंदी ले लेकर कोरोना तक पर उन्होंने मजबूती से कहानियां लिखी हैं। ‘रोजे का दिन’ इसी श्रेणी की कहानी है। एक व्यक्ति को जब परिवार-पड़ोस के लोग, व्यवस्था, राहगीर छोड़ देते हैं; एक गरीब रिक्शेवाला उसे अस्पताल पहुंचाता है। ‘गुलकारी’ में एक ब्राह्मण परिवार को गुल नामक एक मुस्लिम स्त्री को मजबूरी में घर की नौकरानी रखना पड़ता है। कैसे सिर्फ पोंछा लगाने के लिए रखी गई गुल बीमार मांजी की सेवा करने से लेकर मंदिर की मूर्ति को स्पर्श करने तक का अधिकार पा जाती है। यह कहानी अपने समय की बड़ी आलोचना है। धार्मिक वर्चस्व के बढ़ने से जाति बंधन मजबूत होंगे, साथ ही छुआछूत भी बढ़ेगा। छुआछूत को केंद्र में रखकर लिखना असल में वर्तमान सत्ता की विचारधारात्मक अवस्थितियों को चिह्नित करके उसकी आलोचना करना है। इस मायने में यह एक महत्वपूर्ण कहानी है।
असल में शंकर की कहानियां ऊपर-ऊपर अत्यंत सरल लगती हैं। शिल्प के स्तर पर वह कोई नया प्रयोग नहीं करते तथा समाज की विसंगतियों और परिणतियों को चिह्नित करके सब सीधी शैली में प्रकट करते हैं। परंतु सामाजिक अवस्थिति में सच को इतने नग्न रूप में रख देने से उनकी कहानियां साधारण शिल्प के बावजूद असाधारण हो जाती हैं। शर्त बस यह है कि शंकर की इन कहानियों को संदर्भ के साथ पढ़ना होगा। ‘विसर्जन’ कहानी कोरोना में भूख से तड़पते श्रमजीवी वर्ग की आदमियत की कथा कहती है, लेकिन पृष्ठभूमि में कोरोना की भयावहता और लाशों को नदी में बहाने की क्रूरता को भी व्यक्त करती है। यह अचानक नहीं है कि शंकर ने हिंदू-मुस्लिम समस्या पर इतनी कहानियां लिखी हैं, बल्कि कोरोना और अन्य समस्याओं पर लिखते वक्त भी मुस्लिम पात्रों को कथा में प्रमुख स्थान दिया है। असल में घृणा की राजनीति को वे दो धर्मों के मध्य संवादहीनता और अपरिचितिकरण की दीवार को तोड़कर रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं।
‘तीस किलो गेहूं’ को भी सरकारी योजनाओं के खोखलेपन और आम आदमी की मरणासन्न स्थिति के संदर्भ में ही पढ़ना चाहिए। ‘मरता हुआ पेड़’, ‘बालकनी’ अपनी जड़ों से उखड़ चुके आदमी की भीतरी दरिद्रता की कहानियां हैं।
शंकर दंगों की कहानियों में एक खास तरीके का इस्तेमाल करते हैं। दंगों और परिणामस्वरूप उपजी स्थितियों का नग्न वर्णन करते हैं, परंतु अंत-अंत तक पात्रों के मध्य सांप्रदायिक सौहार्द के बिंदु पर ही कहानी खत्म करते हैं। ऐसा लगता है कि वे पाठकों को एक वैकल्पिक जीवन का सुझाव दे देना चाहते हैं। उन्हें स्थितियों की भयावहता में सुख नहीं मिलता। उनके पास आदर्श देने की एक ऐसी छटपटाहट है जो बताती है कि वर्तमान के हत्यारे रूप से वे कितने दुखी हैं। यही विशेषता उन्हें प्रेमचंदीय परंपरा का सशक्त कथाकार घोषित करती है।

जिज्ञासा: लंबे अर्से बाद किसी कहानीकार की दंगों पर इतनी कहानियां देख रहा हूँ। यथार्थ मुद्दों की जगह सत्ता द्वारा निर्मित बहस को कहानी के लिए चुनने वाले कथाकारों के संबंध में आप क्या कहेंगे? आपके यहां सांप्रदायिक विद्वेष और किसान दोनों मुद्दे प्रमुखता से हैं जबकि हिंदी कहानियों की एक बड़ी दुनिया से यह मुद्दे गायब हैं।
शंकर: लेखक की जिम्मेवारी समाज के प्रति होती है। जिन सवालों और मुश्किलों से समाज परेशान और जूझ रहा होता है, लेखक उन्हीं सवालों और मुश्किलों से परेशान होता है। अगर कोई लेखक सत्ता द्वारा निर्मित बहसों में रुचि लेता है तो यह उसका अपना निर्णय है, कोई इसके लिए क्या करे? सांप्रदायिक अशांति, किसान-मजदूरों की बदहाली, निचले तबकों की आर्थिक विपन्नता- इसे कोई सजग, संवेदनशील लेखक कैसे नजरअंदाज करे? लेखक इनपर नहीं लिखेगा तो फिर क्या लिखेगा!
जिज्ञासा: लंबी कहानियों की जगह छोटी कहानियां लिखने की क्या वज़ह है ?
शंकर: शुरुआती दिनों में मैंने प्रेमचंद के साथ-साथ चेखव को भी पढ़ा था। चेखव चार पृष्ठ लिखने के बाद उस लिखे का संपादन करते थे, फिर आगे लिखते थे। इस प्रक्रिया में कहानियां लंबी नहीं, कसी हुई होती थीं। चेखव मुझे अच्छे लगते रहे। मैं लंबी नहीं, चुस्त कहानियां लिखना पसंद करता हूँ। बाद में ‘हंस’ ने लंबी कहानियों का चलन शुरू किया। मैंने अपने लेखन पर पुनर्विचार किया। लेकिन इस चलन के पीछे नहीं दौड़ा।
जिज्ञासा: क्या आप मानते हैं कि कहानीकार के पास अब प्रेमचंद युगीन लेखकों की तरह आदर्श नहीं हैं?
शंकर: मैं मानता हूँ, लेखक के पास हमेशा कुछ आदर्श, कुछ लक्ष्य, कुछ उद्देश्य होने चाहिए, नहीं तो लेखन में उतरने या सक्रिय होने की जरूरत क्यों होगी। लेखन की प्रकृति, अंतर्वस्तु, विषय, सब लेखक जिस समय और समाज में जी रहा होता है, उससे तय हो जाता है।
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मैं स्त्रीवाद से निःसृत होती ज्ञानात्मकता का पक्षघर होते हुए भी इस बात की अनदेखी नहीं कर सकता कि प्रतिकार, आत्मबोध और न्यायबोध स्त्री में न्यस्त होते हैं जिन्हें उद्बुद्ध करने की जरूरत होती है। |
देवीप्रसाद मिश्र का कहानी संग्रह ‘कोई है जो’ कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यह सात कहानियों का संग्रह है जिसे अंतर्वस्तु और शिल्प दोनों के लिहाज से हम हिंदी की अनुपम निधि कह सकते हैं। यकीनन इन कहानियों की भाषा शानदार है। देवीप्रसाद मिश्र की कहानियां व्यक्ति के संकट को प्रकट करती हैं। वे सामाजिक ढांचे को नियंत्रित करनेवालों से तीखा संवाद करते हैं। उनकी कहानियों में छटपटाता आदमी असल में परिस्थितियों के आगे विवश है। इसका अर्थ निष्क्रियता या यथास्थिति को बनाए रखनेवाला व्यक्ति नहीं है। बल्कि संकट यह है कि उसकी पीड़ा उसके द्वारा निर्मित नहीं है। यह समाज एक बड़े तंत्र द्वारा निर्मित है, जिसमें पात्र घुट रहे हैं। देवीप्रसाद की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके पात्र उस असंभव परिवेश में बिना किसी बड़ी उम्मीद या सहारे के लड़ते-जूझते हुए वर्तमान परिस्थितियों को मानने से इंकार करते हैं। प्रतिरोध का ऐसा जीवंत नैरेटिव हिंदी में बहुत दिनों बाद देखने को मिला है। ‘मैंने पता नहीं कितनी तेज या धीरे से दरवाजा खटखटाया’ कहानी पढ़ने पर इस छटपटाहट को तीव्रता से अनुभव किया जा सकता है।
आखिर गृहस्थी चला रहे लोग अचानक आत्महत्याओं की ओर क्यों बढ़ रहे हैं? सत्ता ने कौन-सी परिस्तिथितियां बनाई हैं, जिनके तहत परिवार का मुखिया खुद को खत्म कर लेता है। उस मुखिया के खत्म होने के बाद परिवार का खत्म हो जाना स्वाभाविक है। आदमी के परिवार को मारने तक की कीमत पर किन लोगों और व्यवस्थाओं को बचाने की क्रूर वंचना हो रही है। यह एक ऐसा सवाल है या कहें ऐसी स्थिति है जिसमें इस तंत्र के बाहर रहता हर आम आदमी अभिशप्त है। अपने पिता की आत्महत्या की अपुष्ट खबर में उलझा बेटा उनको खोज रहा है! इस क्रम में कहानीकार इतिहास और परिस्थितियों को सामने रख देता है। उस आदमी का जीवन शहर में आत्महत्या करने की कोशिश करनेेवाले लोगों को बचाने में जुट जाता है। उसकी पहचान आत्महत्या से लोगों को रोकने वाले व्यक्ति के तौर पर होती है। किसी शहर (या समय) में बड़ी संख्या में लोग आत्महत्या करते हैं, यह अपने में डरानेवाला यथार्थ है।
‘अन्य कहानियां और हेलमेट’ व्यवस्था में प्रच्छन्न हिंसा और ताकत के खेल में पिसते आम आदमी की कहानी है। जब लोकतंत्र आया था, इसने कल्याणकारी राज्य के साथ आखिरी आदमी के अधिकारों को सुनिश्चिति करने के दावे किए थे। लोकतंत्र घिसते-घिसते आज यहां पहुंच चुका है कि एक आदमी की शिकायत तक सुननेवाला कोई नहीं है। हेलमेट असल में आदमी की अपनी सुरक्षा के लिए बनाया गया था, लेकिन व्यवस्था ने उसे उसी की हत्या का औजार बना दिया। हेलमेट का रूपक बेहद प्रतीकात्मक बन पड़ा है। अपनी सुरक्षा के लिए लड़ता आदमी बिना किसी जवाबदेही के मारा जाता है। उसकी हत्या एक अनुत्तरित सवाल बनकर उभरती है। एक आदमी का हेलमेट के लिए छटपटाना असल में अपने को बचाने की कोशिश है। वह हत्यारों से भरे समाज में हत्यारों से ही सुरक्षा चाहता है। अंततः जीवन की मांग ही उसकी हत्या का कारण बनती है। व्यवस्था के मनुष्य-विरोधी चरित्र की अभिव्यक्ति इससे ज्यादा सटीक और वस्तुनिष्ठ ढंग से नहीं हो सकती है।
इस समय जहां हर कोई सामान्य हो चुका है, कोई है जो असंतुष्ट है। उसके पास विरोध की भाषा है, पीड़ित के साथ खड़े रहने का साहस है तथा लड़ने का नैतिक बल है। ‘कोई है जो’ कहानी में इसी के दृश्य हैं। वह आदमी एक साथ पांच उपन्यास लिखनेवाला व्यक्ति है। वह हर असंतोष वाली जगह पर मौजूद है। वह हर बदबूदार, शोषणवाली जगह पर किसी पीड़ित के साथ बातें करता दिखता है। वह फुटबॉल मैदान को भू-माफिया से छीनकर गरीब लोगों के लिए देना चाहता है। वह पुलिस द्वारा प्रताड़ित सिविल सर्विसेज की तैयारी करते युवा का नैतिक बल बनता है। उसे अस्पताल पहुंचाता है, उपचार कराता है। वह लेखक का ही अंतर्मन है जो एक साथ पांच उपन्यास लिखनेवाले रूपक के साथ अवतरित होता है। देवीप्रसाद मिश्र ने कविता क्या है, उपन्यास की भूमिका क्या हो – जैसे प्रश्नों का रचनात्मक उत्तर दिया है। यकीनन यह कविता और कथा की परिभाषा गढ़ रही शास्त्रीय आलोचना के समानांतर रखकर देखी जानी वाली कहानियां हैं, क्योंकि एक लेखक होने की संवेदनशीलता और तमीज का ऐसा सुंदर विवरणात्मक प्रोजेक्शन दुर्लभ है।
‘भस्म’ कहानी पोएटिक है। गद्य को ऐसी भाषाई तमीज निर्मल वर्मा के बाद किसी कहानीकार की किसी कहानी में देखनी हो तो आप ‘भस्म’ को पढ़ सकते हैं। एक कवि की आंतरिक बुनावट उसके तमाम जीवन में उथलपुथल ला देती है। वह ‘जागा अरु रोया’ की श्रेणी में आ जाता है। उसकी कविता ही उसकी हत्या का कारण बनती है, क्योंकि आज का समाज विरोध के किसी स्वर को बरदाश्त नहीं कर पा रहा है। उसके लिए कवि सबसे बड़ा थ्रेट है। देवीप्रसाद मिश्र ने अपनी कहानी में बड़ी पूंजी और सत्ता के खेल के बरअक्स कवि और लेखक को इतना महत्वपूर्ण बना दिया है कि उसका समूचा तंत्र एक कागज और पेन लिए घूमनेवाले आदमी को मारने के लिए दौड़ पड़ता है।
‘सुलेमान कहां है’ अँधेरे में अपने लिए प्रकाश खोजने की छटपटाहट की कहानी है। यह कहानी, आदमी किस असुरक्षा और भय में जीने के लिए छोड़ दिया गया है, उसकी पड़ताल करती है। देश के आखिरी आदमी को व्यवस्था से कोई उम्मीद नहीं है। उसे अंधा-बहरा-काना बना दिया गया है। वह अपने लिए राहत की तलाश में आंखें मूंदे किसी सुरक्षित घेरे से दूर भटक रहा है। उसके पास ऐसी स्थितियां हैं कि वह जिस राहत की तलाश करता है या जिस स्वप्न के साथ आगे बढ़ता है वह झूठ, भ्रम और गलत सूचनाओं से भरा हुआ है। पता नहीं कुछ भी ठीक होगा या नहीं -इस स्थिति के साथ सुलेमान की खोज की जा रही है जो है भी या नहीं, किसी को नहीं पता। क्योंकि जिन लोगों ने रोशनी छीनकर आदमी को अंधा बनाया है, उन्होंने रोशनी पाने की संभावनाओं को ही नष्ट कर दिया है। वे बहुत ताकतवर हैं। इसी अर्थ में यह यात्रा, यह खोज एक अनिश्चित खोज बन जाती है। ऐसी अनिश्चितता किसी भी समाज के लिए एक आत्महंता स्थिति है।
नई व्यवस्था ने लोगों को एक विकल्पहीन मृत्युलोक में फंसा दिया है, जहां उसके पास मृत्यु के वरण के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। हालांकि देवीप्रसाद मिश्र ने ऐसी आत्महंता स्थिति में भी सुलेमान की तलाश का जो रूपक गढ़ा है, वह बताता है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों जीवन की तलाश की छटपटाहट में कोई कमी नहीं है। अंधा हो चुका आदमी अपनी आंखों के उपचार के लिए अकेले निकल पड़ा है। यह रूपक आदमी की अदम्य जिजीविषा की तीव्रता को व्यक्त करता है। रोशनी की तलाश में अशक्त व्यक्ति का भटकना उस व्यवस्था का आखिरी आदमी द्वारा एक सशक्त प्रतिरोध है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि आदमी की जीवटता को चित्रित करना क्या बताता है। उसकी आंख और प्रकाश की भूख उसे जिस यात्रा पर ले जाती है, वह असल में सत्ताप्रदत्त व्यवस्था की तीव्र आलोचना है।
‘पिता के मामा के यहां’ कहानी पुंसवादी सामाजिक तानेबाने के साथ जिस छोर पर संवाद करती है, वह आत्यंतिक रूप से महत्वपूर्ण है। रामदेई और मोहिनी उस संवाद की महत्वपूर्ण वैकल्पिक कड़ी हैं। देवीप्रसाद मिश्र ने इन चरित्रों को गढ़ने में सामंतवाद और पुंसवाद की चूलें हिला दी हैं। परिश्रम और मेहनत मामा के घर भी है। साथ में जमीन और संपत्ति का भरोसा भी, लेकिन रामदेई और मोहिनी को संपत्ति और जमीन की भूख नहीं है। वे चीथड़ों और अभाव में रह लेंगी लेकिन उन्हें मामी की गुलामी बर्दाश्त नहीं है। आखिर स्वाभिमान की ललक ही है जो इन दो पात्रों को इतनी बड़ी व्यवस्था से लड़ने का साहस देती है। सामंतवाद को खत्म करने के लिए क्या सिर्फ कानून काफी है? संसाधनों का बंटवारा क्या कानूनी स्थिति भर है? जो वर्ग सदियों से एक बड़े वर्ग को दास बनाकर जमीन का मालिक बना हुआ है, वह क्या संपत्ति के साथ केवल मशीनी तौर पर जुड़ा है? ‘पिता के मामा के यहां’ कहानी इन प्रश्नों से जूझती है। सामंतवादी परजीवीपन एक सोच है। इसमें परिवर्तन सिर्फ कानून की किताबों का मामला नहीं है। रामदेई और मोहिनी की पात्र योजना सामंतवादी परिस्थितियों का विलोम खोजती हैं।

जिज्ञासा: आपकी कहानियों में ‘डर’ और ‘असुरक्षा’ प्रच्छन्न रूप से दिखती है। कहानी लिखते समय आप सुखांत की भूमिका को कैसे देखते हैं?
देवी प्रसाद मिश्र: स्वातंत्र्योत्तर भारत में राज्य, सत्ता और समाज इस तरह का रहा है कि जो असुरक्षा और आतंक औपनिवेशिक समय में हुआ करते थे, वे अंग्रेजों के जाने के बाद नए रूपों और प्रविधियों में बने रहे। यह सदी भी आश्वस्त करने के बजाय नया आतंक ही मैनुफैक्चर कर रही है। इसमें विषमता का डर सबसे बड़ा है। किसी के पास बहुत अधिक है तो कई दूसरों के पास कुछ भी नहीं है। संसाधनों के समान वितरण के लिए जिम्मेदार राज्य विषमता की सैद्धांतिकी को पुलिस और बल के माध्यम से कार्यान्वित करने की सबसे बड़ी एजेंसी है। जाति और स्त्री की जो तरह-तरह से घेरेबंदी करते हैं वे स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के सबसे बड़े अपहर्ता हैं। इन स्थितियों में लिखी जाने वाली कहानियां निर्भयता और नागरिक के आत्मविश्वास की कथा कैसे हो सकती हैं। तो इन कहानियों में डर और असुरक्षा की जो अवस्थिति है, वह भारत के डरे हुए नागरिक की कंपकपाहट है।
यह कहने की जरूरत नहीं कि जो कहानी मैं एक पात्र के माध्यम से कह रहा हूँ, वह भारतीय मनुष्यता की वंचना की कथा बनती जाती है। यह उसके अकेला पड़ने का बियाबान हो जाया करता है। इन परिस्थितियों में कथा में सुखांत का आग्रह छद्म आशावाद का निर्माण ही करेगा। लेकिन दुखांत को मैं केवल इसलिए अर्जित नहीं करता कि मुझे पाठक को अतिरिक्त शॉक देना है। न, यह मकसद तो होता ही नहीं। ‘भस्म’ कहानी अपनी त्रासदी और संहार से डर पैदा करती है, लेकिन वहां यह बात साफ है कि सत्य और कविता को स्टोर करने वाले सिर और मस्तिष्क को सत्ताएं अपना निशाना बनाएंगी। इस तरह ‘भस्म’ उत्तर सत्य के इस काल खंड को डिकोड करने में हमारी मदद करती है। मैंने अपनी एक कविता में कहा है कि मेरा काम एक बड़े असमंजस का निर्माण करना है। कहानियों में यह काम अधिक विस्तृत और विमर्शमूलक तरीके से करने की संभावना मुझे दिखती है।
जिज्ञासा: कहानी लिखते समय यथार्थ को प्रकट करने के लिए आप तुलनात्मक रूप से ऐसा क्षेत्र चुनते हैं जो विकसित भारत में उपेक्षित है। अवध क्षेत्र की कथा पूरे समय की कथा बन जाती है। ‘पिता के मामा के यहां’ में परजीवी शोषक वर्ग के बरअक्स रामदेई और मोहिनी का चरित्र शानदार है। तो क्या यह सामंतवादी समाज की आलोचना का मानक बन सकता है?
देवी प्रसाद मिश्र: रामदेई और मोहिनी अवध में कदम-कदम पर व्याप्त पितृसत्ता से भिड़ रही हैं। यह मर्दवाद घर के पिता और भाई में तो मौजूद है ही, इसका सामाजिक विस्तार अछोर है। दृष्टिकोण ही फंसा हुआ है, जहां स्त्री सामान की तरह बरती जाती है। लेकिन रामदेई और मोहिनी में इस तरह के मर्दवादी व्यवहार को लेकर गहरा प्रतिकार है। वे अगर सहती हैं तो मधुमक्खी और बर्रे की तरह काटने को भी दौड़ती हैं। वे अपने अवसर की प्रतीक्षा करती हैं। प्रतिरोध की जो छवियाँ दैनंदिन जीवन में दिखती हैं, उनका एक विराट रूप कथा के अंत में प्रकट हो जाता है। वे एक ऐतिहासिक और निर्धारक निर्णय लेती हैं।
कहना यह है कि प्रतिकार के उनके उपकरण ठीक-ठीक स्त्रीवादी आंदोलन के परिणाम नहीं हैं। लेकिन धुर देहात की स्त्री अपनी हीन अवस्थित को न पहचानती हो, ऐसा कतई नहीं है। अधीनता और स्वतंत्रता के बीच का फर्क करना उसे आता है। दासता और आत्मगरिमा के बीच की रेखा को वह जानती है। स्त्री का यह आत्मबोध खांटी देशज, सहज, नैसर्गिक और प्राकृतिक है।
हर स्त्री में आत्मगौरव का प्रबोध होता है। हर स्त्री के पास उसका अपना नैसर्गिक स्त्रीवाद होता है। यह कहानी स्त्री की उसी अंतःप्रेरणा को विवृत करती है। मैं स्त्रीवाद से निःसृत होती ज्ञानात्मकता का पक्षघर होते हुए भी इस बात की अनदेखी नहीं कर सकता कि प्रतिकार, आत्मबोध और न्यायबोध स्त्री में न्यस्त होते हैं जिन्हें उद्बुद्ध करने की जरूरत होती है। यह कहानी प्रतिरोध के उसी वैभव और उसी प्रतिकारात्मक उन्नयन को सामने लाती है संस्तर-दर-संस्तर।
‘पिता के मामा के यहां’ कहानी में दोनों मां-बेटियां सामंती ढांचे की ईंट से ईंट बजा देती हैं लेकिन बिना किसी स्त्रीवादी नारेबाजी के। उनके प्रतिकार की गति विकासात्मक है। अपनी असहमति को वे कभी भुनभुनाकर तो कभी ललकार कर प्रकट करती हैं। समर्पणवाद की लीपापोती वहां नहीं है।
मैं इस ओर इशारा करना चाहूंगा कि ‘पिता के मामा के यहां’ कहानी में मैंने सामंतवाद और पितृसत्ता के स्थापत्य को संरचित करने में खासी मेहनत की है। सच तो यह है कि अवध में सामंती जीवन के इतने तत्त्व मौजूद हैं कि लेखक को उन्हें विवृत करने में बहुत मुश्किल नहीं होती। प्रतिपक्ष यदि आतंककारी हो तो संघर्ष और प्रतिकार का मूल्य बड़ा हो जाता है। रामदेई और मोहिनी डेढ़ हड्डी वाली स्त्रियां हैं, लेकिन नव्य दास न होने का उनका आग्रह एक बड़ा मूल्य है। वे दोनों ही स्त्री की स्वतंत्रता का सत्याग्रह हैं। उनके पास इंकार का जो आयुध है उसे वे अपरिग्रह के बड़े मूल्य में बदलती हैं। उन्हें हांक कर कहीं भी किसी भी खूंटे से बांधा नहीं जा सकता।
जिज्ञासा: आज के समय में जब उम्मीद मर चुकी हो, आप अपने शिल्प में उसे खोजते हैं। सुलेमान की खोज आम आदमी की असहायता है अथवा यथास्थितिवाद? क्या आदमी अब लड़ नहीं सकता?
देवी प्रसाद मिश्र:‘सुलेमान कहां है’ में सुलेमान की खोज यूटोपिया की खोज है। वह एक नाउम्मीद और अंधेरे भारत में रोशनी की तलाश है। यह भी खुला तथ्य है कि यह तलाश कहीं ले नहीं जाएगी। लेकिन इसी कारण इस तलाश को स्थगित नहीं किया जा सकता। मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ को लीजिए। क्या वहां तलाश किसी पूर्णता तक पहुंचती है? लेकिन इसी वजह से प्रक्रियाओं की दौड़धूप, अध्यवसाय, श्रम, प्रयत्न और बेचैनी को कम करके नहीं आंका जा सकता।
‘सुलेमान कहां है’ को लिखते हुए मेरे जेहन में ‘अंधेरे में’ कविता नहीं थी। मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा हूँ। मैंने यह कठिन कविता काफी बाद में पढ़ी। लेकिन देखता हूँ कि ‘सुलेमान कहां है’ और ‘अंधेरे में’ की बेचैनियाँ और विजन समान हैं, जबकि दोनों की संरचनाओं और प्रविधियों और ढांचे में कोई समानता नहीं है। मैंने इस कहानी में फेरबदल की संरचना को अपनाया है, जहां लोककथा की किस्सागोई की विट और विदग्धता दिख सकती है। रोशनी के लिए भटकाव की यह कहानी प्रकाश को न पाने की हताशा में जाती दिखती है जरूर, लेकिन कहानी में वह प्रयत्न अलक्षित नहीं रहा जाता जो आलोक को पाने के निमित्त किया जा रहा है। इस तरह देखिए तो कहानी किसी भी तरह के अनर्गल आशावाद से कन्नी भले ही काट ले, वह किसी भी तरह के यथास्थितिवाद को संपोषित नहीं कर रही है। आप कह सकते हैं कि मैं प्रक्रियाओं की कथाएं लिखता हूँ और किसी भी तरह के परिणतिवाद से परहेज करता हूँ।
‘सुलेमान कहां है’ का सुलेमान जो प्रकाश को फिर से पाने का उत्स है, शायद कभी नहीं मिलेगा। वह नहीं मिलेगा लेकिन मानीखेज बात यह है कि प्रकाश की खोज सतत और आवेगवान है या नहीं। सवाल है कि हम खोए हुए को कितनी शिद्दत, आग्रह और उत्सर्ग के साथ पुकार रहे हैं। लेकिन यह पुकार और गुहार जैसे ही नारेबाजी में बदलती है तो आप कथा को आत्महीन बना देते हैं। उसमें तब अनात्म कंकाल की खड़खड़ और बड़बड़ बच रहती है। अंतर्वस्तु और कहानी कला के बीच के इस संतुलन की चुनौतियां सबसे अधिक प्रतिबद्ध रचनाकारों के सामने आती हैं। अनिश्चयों के इस समकाल में हम किसी भी सुनिश्चितता का नैरेटिव कैसे खड़ा कर सकते हैं?
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मेरी धारणा है कि हमारी विचार की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। हम सजग रूप से जब देखते, सुनते और समझते हैं, तो हर क्षण अपने विचारों को समृद्ध करते हैं। हमारे विचारों में बदलाव संचित रूप से हमारे भीतर उपलब्ध होता है। |
‘किताबघर प्रकाशन’ की ‘प्रतिनिधि कहानियां’ में राजेंद्र श्रीवास्तव की दस कहानियां हैं। उनकी कहानियां छोटे-छोटे यथार्थ और अनुभव को पकड़ती, जीवन के साथ संवाद करती कहानियां हैं। इनमें मनुष्य के अकेलेपन से बाहर निकलकर कम्युन का हिस्सा बनने और जीवन का वरण करने की छटपटाहट है। ‘खोने का सुख’ और ‘इतना बड़ा दुःख’ कहानियां निम्न-मध्यवर्गीय परिवार के बदलते यथार्थ को व्यक्त करती हैं। आज जब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और न्यूक्लियर फैमिली की अवधारणा से भी आगे बढ़कर अविवाहित रहने का चलन निकल चुका है, मृत पत्नी के साथ बिताए क्षणों को पाथेय की तरह देखना एक दृष्टांत बन जाता है। ‘इतना बड़ा दुःख’ निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों में बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने के बोझ तले मर रहे सपनों को चिह्नित करती कहानी है। इस कहानी को पढ़ते वक्त लगता है आडंबर और दिखावे की संस्कृति में निम्न-मध्यवर्ग इतना आगे जा चुका है कि उसका जीवन संवादहीन हो चुका है।
‘कोई तकलीफ नहीं’ कहानी ट्रेड यूनियन और मालिकों के संबंधों का यथार्थ व्यक्त करती है। इस कहानी को पढ़कर भारतीय मजदूर की नारकीय स्थिति और संपूर्ण क्षय को समझ सकते हैं। यानी अब जो नई स्थिति है उसमें विरोध के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं और संगठनों को मैनेज कर लिया गया है। नए मजदूर नई परिस्थितियों में चुपचाप जीने को अभिशप्त हैं। अब बड़ी पूंजी ने विरोध और असहमति के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं।
‘मकड़जाल’ कहानी एक मानव निर्मित विश्व त्रासदी से पीड़ित करोड़ों लोगों के जीवन पर है। कोरोना के दौर ने झूठ और फरेब का ऐसा मकड़जाल रचा कि दुनिया आज भी उस भंवर में फंसी हुई है। सरकारी आंकड़ों से इतर समाज के सच को पकड़ने के क्रम में ‘मकड़जाल’ की रचना हुई है। कहानी के नैरेटिव में कथाकार ने जिस नायक को चुना है वह अवांगार्द और अराजक है। विजय कुमार अराजक इसलिए है कि उसकी निर्मिति एक अराजक सत्य व्यक्त करने के लिए हुई है। मंदा अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए पांच सौ रुपए में शरीर बेचनेवाली सिर्फ एक मजबूर स्त्री ही नहीं होती, बल्कि भारत की निम्नवर्गीय जिजीविषा का भी प्रतीक होती है। यह इस संग्रह की ही नहीं हमारे समय की भी एक महत्वपूर्ण कहानी है।
‘हिसाब बराबर’ कहानी नए पूंजीवादी दौर के नारों की पोल खोलती है। बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते युवाओं की सामंती-पितृसत्तात्मक मनःस्थिति को प्रकट करती यह कहानी बताती है कि समय बदला है, परिस्थितियां बदली हैं, पारंपरिक ढांचा बदला है, लेकिन आदमी की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। ‘अपराधी कौन’ और ‘पूरी लिखी जा चुकी कविता’ को भी इसी कड़ी में देखा जाना चाहिए। पितृसत्तात्मक समाज स्त्री को कलंकिनी और दूषित कहता है। वह नौकरी कर रही आधुनिका को पति बरदाश्त नहीं कर पाता। वह उसकी नौकरी छुड़वाता है, उसे लाचार बना लेने के बाद उसके साथ मारपीट करता है और गर्भवती होने पर कन्या भ्रूण हत्या करना चाहता है। अंकिता इस नारकीय स्थिति से खुद को निकालकर फिर से नौकरी करती है और बेटी को जन्म देती है जिसका नाम वह अपराजिता रखती है। ‘सात क्रांतिकारी’ में सुविधा से स्त्रीवाद का झंडा लेकर चलनेवाली स्त्रियों के बरअक्स पूजा जैसी स्त्रियों को रखा गया है जो बोलती तो कुछ नहीं लेकिन अपने मजबूत इरादों से काम करने में विश्वास रखती है। इसी कड़ी में ‘चुनरी में दाग’ को भी देख सकते हैं। समाज भ्रष्टाचारी व्यक्ति को दोषी की तरह न देखकर एक सफल और बड़े आदमी के रूप में देखता है। ‘फिर वापसी’ उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ का एक अन्य पाठ तैयार करती है। राजेंद्र श्रीवास्तव की चुनी हुई कहानियों का यह संकलन विविधतापूर्ण है।

जिज्ञासा: कहानी में सुखांत और दुखांत की अवधारणा को कैसे देखते हैं? क्या आप कहानी लिखते समय वैचारिक रूप से कुछ सोचते हैं?
राजेंद्र श्रीवास्तव: कहानी में सुखांत और दुखांत की अवधारणा सामान्य-सी बात है। स्पष्ट है कि सुखांत कहानी वह है जिसका अंत सुखद हो। कह सकते हैं कि सुखांत कहानी प्राय: सुख या खुशी प्रदान करने वाली अथवा अपनी समग्रता में सकारात्मक होती है। कहानी सुखांत होगी तो तय है कि यदि कहीं कोई समस्या है तो उसका संतोषप्रद समाधान भी पाठक देख सकेगा। हिंदी की प्रारंभिक कहानियों का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन था, वे बहुधा सुखांत होती थीं। इसके विपरीत यदि कहानी का समग्र प्रभाव दुख की अनुभूति कराता है, तो हम इसे दुखांत रचना के रूप में देखते हैं। कहानी के अंत तक पहुंचते-पहुंचते हम पाते हैं कि कथा की संरचना से जुड़े मूल लक्ष्य अपूर्ण रह गए। यह लक्ष्य प्रेम की प्राप्ति भी हो सकता है, जो अधूरा रह गया। कई बार इसका समग्र प्रभाव नकारात्मक होता है, जो पाठक को बेचैन करता है। विश्व की बहुत सी कालजयी कहानियां दुखांत ही हैं।
कहानी लिखते समय वैचारिक रूप से मैं इस संबंध में कुछ नहीं सोचता। मेरी धारणा है कि हमारी विचारधारा और विचार की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। हम सजग रूप से जब देखते और सुनते और समझते हैं, तो हर क्षण अपने विचारों को समृद्ध करते हैं। हमारे विचारों में बदलाव आता है तो यह सब कुछ संचित रूप से हमारे भीतर उपलब्ध होता है। आशु भाषण प्रतियोगिता में कोई प्रतिभागी तुरंत दिए गए विषय पर दो मिनट में यदि दर्जेदार बात कहता है, तो वह उसका बरसों का संचित ज्ञान है। जब हम कोई कहानी लिखते हैं तो उसका विस्तार और अंत इस बात पर निर्भर करता है कि हमने अब तक क्या अर्जित किया है। हमारी विचारधारा क्या है। यदि यथार्थ की प्रस्तुति से कहानी दुखांत बन रही है, तो अब यह लेखक के सोच पर है कि वह जख्म को ढंककर रखना चाहता है अथवा उघाड़ना। उसका लक्ष्य कोई चमकीला मुलम्मा चढ़ाना है या नहीं। जहां तक मेरा सवाल है, मैं रचना को सुंदर और सुखांत बनाने के लिए यथार्थ से कतई कोई समझौता नहीं करता। इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता कि मेरी कहानी का अंत सुखांत है या दुखांत। सच मेरे लेखन की पहली शर्त है। कहानी अपना आकार स्वयं ग्रहण लेती है।
जिज्ञासा: क्या आप प्रतीकात्मकता को कविता की तरह कहानी में महत्वपूर्ण मानते हैं?
राजेंद्र श्रीवास्तव: प्रतीकात्मकता कविता को व्यापक अर्थ प्रदान करती है। मुक्तिबोध की कविता में प्रतीक और बिंब की प्रधानता है। मैं किसी अमूर्त अवधारणा अथवा विचार की अभिव्यक्ति के लिए कविता की तरह कहानी में भी प्रतीकात्मकता को आवश्यक और अनिवार्य मानता हूँ। यद्यपि कविता में कई बार प्रतीक बहुत प्रभावी रूप से उभरकर सामने आते हैं, किंतु कहानी में भी प्रतीकात्मकता जरूरी है। कहानी में सूरज की लालिमा का उल्लेख भर क्रांति का प्रतीक हो सकता है। गहराता अंधेरा कई बार सत्ता की निरंकुशता का बयान करने के लिए पर्याप्त होता है। मैं समझता हूं कि इसे सायास नहीं किया जा सकता, यह स्वतः सृजन प्रक्रिया का हिस्सा होता है।
जिज्ञासा: समसामयिक लोकप्रिय मुद्दे पर कहानी लिखने की चुनौतियों के संबंध में कुछ बताएं।
राजेंद्र श्रीवास्तव: विभिन्न लोकप्रिय मुद्दों के समूह से कोई एक मुद्दा चुनकर उसपर कहानी लिखना भी अब देखने में आ रहा है। सत्ता को प्रसन्न करने के लिए भी लिखा जा रहा है। प्रकाशक तथा अखबार के मालिकों की नीति समझकर, पुरस्कार पाने के लक्ष्य निर्धारित करके लिखना भी आज आम है। बाजार से प्रभावित होकर लिखना तो धड़ल्ले से जारी है। इस प्रकार का लेखन एक नपा-तुला लेखन होगा, जो मेरे लिए संभव नहीं है। मैं इसे उचित भी नहीं मानता।
आज बहुत से नए लेखक फैशन के तहत अथवा प्रयोग के नाम पर ऐसा कर रहे हैं। यह एक बड़ी चुनौती है। हां, कोई मुद्दा यदि मुझे भीतर से आंदोलित करे और चैन से बैठने न दे, तो मैं सहज भाव से उसपर कहानी लिखता हूँ। यह देखने लगूं कि यह मुद्दा लोकप्रिय है या नहीं, फिर वह सहज और स्वाभाविक लेखन नहीं रहेगा। उसमें कृत्रिमता आ जाएगी। उदाहरण के तौर पर यदि नारी मुक्ति पर एक फैशन की तरह लिखना हो, तो यह संभव नहीं। लेकिन कोई प्रसंग, कोई घटना मन को छू जाए तो मैं अवश्य लिखूंगा। मेरी कहानी ‘तिरस्कार’ की मां कहानी के अंत में अपने संवेदनहीन बच्चों का तिरस्कार करके आगे बढ़ जाती है। कहानी ‘मकड़जाल’ की वेश्या पांच सौ का नोट अपने ग्राहक के मुंह पर दे मारती है। जब मैं अपने पात्र के पक्ष में खड़ा हो जाता हूँ, तो यह सब सहज रूप से मेरे लेखन में आ जाता है। हम जो देखते हैं, प्राप्त करते हैं और अनुभव करते हैं, उसे ही हम शब्दबद्ध करते हैं। सारी दुनिया को लेखक बेवकूफ बना लेगा, लेकिन अपने आपको कैसे धोखा देगा? मैं यही कहूंगा कि लेखक का अपने प्रति ईमानदार होना सबसे अधिक जरूरी है।
समीक्षित पुस्तकें
(1) पच्चीस कहानियां– शंकर- अंतिका प्रकाशन प्रा. लिमिटेड, पहला पेपरबैक संस्करण 2025, मूल्य 450 (2) कोई है जो– देवीप्रसाद मिश्र- राजकमल प्रकाशन, पेपरबैक संस्करण 2024, मूल्य 299 (3) प्रतिनिधि कहानियां– राजेंद्र श्रीवास्तव, किताबघर प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2024, मूल्य-350
प्राध्यापक, हिंदी विभाग, सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज, कोलकाता-700005मो. 9831615131



