युवा लेखक तथा टिप्पणीकार। सेठ आनंद राम जयपुरिया कॉलेज कोलकाता में शिक्षण।

 

साहित्य के माध्यम से वंचितों के पक्ष में एक माहौल तैयार किया जा सकता है। उनके जीवन को सामने लाकर आम पाठक को संवदेनशील बनाया जा सकता है। कहानी लिखते समय मेरी यही कोशिश रहती है कि वंचितों के प्रति न्याय हो सके और उनके प्रति पाठक सजग और संवेदनशील हो सके। 

हरियश राय की कहानियों के संग्रह ‘पच्चीस कहानियां’ को हम अपने समय का ज्वलंत दस्तावेज कह सकते हैं। उनकी कहानियों में पूरा शासकीय तंत्र नंगा हो जाता है, साथ ही नव-उदारवादी समय से आज के समय के बीच के अंतर को भी देखा जा सकता है। हरियश ने युवाओं की जिन समस्याओं को उठाया है और जिस भाषा में रखा है वह आश्चर्य में डाल देता है क्योंकि विषय के तौर पर जिन समस्याओं को हरियश उठाते हैं वह पूर्णतः आज की, उत्तर-आधुनिक समय की समस्याएं हैं।

उनकी कहानियों में नव-मध्यवर्ग की विवशता और उसका आत्महंता रूप प्रकट हुआ है। ये कई परतों में चलती हैं। आज का नव-मध्यवर्ग नई महाजनी सभ्यता में फंस चुका है जहां वह अपने अतीत को पूरी तरह पोंछकर वर्तमान में रहना चाहता है, लेकिन पुरातन और अतीत उसकी स्मतियों में गहरे पैठे हैं और वह इनसे निकल नहीं पाता और छटपटाता रहता है। इसके अलावा हरियश राय ने सत्ता के यातनादायक और क्रूर रूप को बार-बार नग्न किया। वे देश और समय की किसी बड़ी समस्या पर कमेंट्री करते हुए भी कहानी में लौट आते हैं। यह उनकी कहानी कला की एक बड़ी विशेषता है। हालांकि इस तरह उठाई गई कोई भी समस्या अलग या थोपी हुई नहीं लगती। ऐसा लगता है कि वह मानो कहानी की ही कड़ी हो और कहानी के साथ ही वह भी अपने स्पेस में घट रही है। ‘वजूद के लिए’ कहानी में दिल्ली के किसान आंदोलन का जिक्र ऐसा ही एक मामला है।

वंदना सबरवाल अपने जीवन को अर्थ देने और अपने वजूद के लिए जिस मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती हैं, बाद में वही कंपनी उसके वजूद का संकट भी पैदा करती है। वह घरेलू स्त्रियों के जीवन को नहीं चुन सकती। वह आज की स्त्री है जो पुरुष के अधीन नहीं रहना चाहती। उसका एक अपना निजी आकाश है लेकिन उस निजी आकाश के लिए वह जिस राह को चुनती है वह उसकी सारी स्वतंत्रता ही नष्ट कर देती है। हालांकि उसके सामने यही मार्ग है।

कॉर्पोरेट जगत बड़ी सैलेरी देता है लेकिन उसे खर्च करने के लिए स्पेस और समय नहीं देता। वंदना का एक साल की नौकरी में ही दम घुटने लगता है। वह किसानों द्वारा अपने अधिकार के लिए सड़क पर उतरने को एक प्रेरणा की तरह लेती है। फिर भी वह चाहकर भी विरोध नहीं कर पाती, उसके प्रतिरोध की सारी संभावनाओं पर उसकी कंपनी और मोटी तनख्वाह ने कब्जा कर रखा है।

इसी की अगली कड़ी लगती है ‘ढिंकचिका ढिंकचिका’ कहानी। अनिमेष की आशीष और मनीषा की नए फ्लैट की यात्रा असल में नब्बे के दशक के मूल्यों से आज के युग में प्रवेश की एक यात्रा बन जाती है। अतीत को मिटाकर वर्तमान को बनाने की यह दौड़ आदमी को भीतर से कंगाल कर रही है। वह गांव के घर, बाग-बगीचे को बेचकर पांच करोड़ में फ्लैट खरीदता है और जिस संस्कृति से जुड़ता है वह खोखलेपन से भरी है। अनिमेष द्वारा अम्मा के बारे में पूछने पर आशीष और मनीषा दोनों चुप रहते हैं। यह चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है।

‘झंडियां’ कहानी में भी सामाजिक आंदोलन ही विषय है। सिंधु बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसानों के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ मुश्किल से कर पानेवाले सब्जी विक्रेता की सामाजिक सक्रियता को प्रकट करती है। यह सिविल सोसाइटी के सभ्य कहे जानेवाले लोगों पर व्यंग्य की ऐसी रेखा खींचती है जिससे उबर पाना मुश्किल है। दूसरी तरफ संग्रह में ‘अंतिम पड़ाव’ जैसी कहानियां भी हैं जिनमें बुजुर्ग माता-पिता को छोड़कर अपनी गृहस्थी बनाता नव-मध्यवर्ग है। उसे अपने माता-पिता की कोई परवाह नहीं। यह कैसा यातनादायक समय है जब अपने स्वार्थ में एक पूरी पीढ़ी इतनी अमानवीय हो गई है कि अपने फायदे के अतिरिक्त उसे कुछ नहीं दिखता।

‘देखना’ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और ‘बायनरी बनाती’ हमारे समय की एक महत्वपूर्ण कहानी है। यह कहानी तंत्र द्वारा पोषित मीडिया के मुसलमानों के प्रति घृणित मिशन का पर्दाफाश करती है। इस कहानी को महत्वपूर्ण बनाती है पत्रकार ज्ञानप्रकाश दुबे को एक मुस्लिम बुजुर्ग द्वारा बताई गई याकूबपुर की नई कहानी। मुस्लिम मुहल्लों और मुस्लिमों के संबंध में जो स्टिरियोटाइप नैरेटिव बनाया गया है उसे यह कहानी तोड़ती है और एक नई दृष्टि दती है।

हरियश राय का यह कहानी संग्रह आत्यंतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। यकीनन इसमें हमारे युग के जरूरी सवालों और समस्याओं को बखूबी उठाया गया है।

जिज्ञासा: हिंदी में वंचित वर्गों को लेकर तमाम बहसें होती हैं लेकिन वस्तुतः परिवर्तन कहीं नहीं आता है। आप इसे कैसे देखते हैं?

हरियश राय: साहित्य का स्वभाव उत्पीड़ितों और वंचितों की बात करना है। हिंदी कथा साहित्य में उत्पीड़ित और वंचित वर्ग मौजूद है। इस वर्ग के लोगों के जीवन में साहित्य के माध्यम से परिवर्तन नहीं हो सकता। वह तो राजनीति के माध्यम से हो सकता है। हां, साहित्य के माध्यम से वंचितों के पक्ष में एक माहौल तैयार किया जा सकता है। उनके जीवन को सामने लाकर आम पाठक को संवदेनशील बनाया जा सकता है और यह काम साहित्य बखूबी कर रहा है। कहानी लिखते समय मेरी यही कोशिश रहती है कि वंचितों के प्रति न्याय हो सके और उनके प्रति पाठक सजग और संवेदनशील हो सके।

जिज्ञासा: आर्थिक उदारीकरण ने शुरू में जिस मध्यवर्ग को बनाया था उससे आज का मध्यवर्ग बिलकुल भिन्न है। आपकी कहानियों में वह अंतर समझ में आता है। इसके बारे में कुछ बताएं।

हरियश राय:1990 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण ने न केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारतीय बाजार को खोल दिया, बल्कि मध्यवर्ग के लिए उच्च वेतन वाली नई नौकरियों के रास्ते भी खोल दिए। इससे मध्यवर्ग का व्यावसायिक ढांचा ही बदल गया। वित्तीय संसाधन और सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार ने मध्यवर्ग को आर्थिक रूप से खूब समृद्ध किया। मध्यवर्ग के विस्तार को किसी देश के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से शक्ति संपन्न होने का संकेत माना जाता है।

इसका दूसरा पक्ष मुझे निराश करता है। हमारे देश में इधर एक ऐसा मध्यवर्ग विकसित हुआ है जो सामाजिकता से विमुख है। वह अंधविश्वासी है, जो रूढ़ियों में यकीन करने वाला है। वह आत्म केंद्रित है और जो परंपरा के नाम पर अंध-आस्था का प्रहरी है। वह तार्किकता और वैज्ञानिक सोच से कोसो दूर है। यह मध्यवर्ग समाज के निचले वर्ग के प्रति संवेदनहीन है और अपने लाभ को लेकर बेहद सावधान है। हमारे देश ने विकास का जो ढांचा खड़ा किया है, उसमें मध्यवर्ग की आर्थिक ताकत तो बढ़ती जा रही है लेकिन गरीब और शोषित मनुष्य बिलकुल हाशिए पर जा रहा है।

जिज्ञासा:1990 के दशक के यथार्थ और आज के यथार्थ के बारे में अपनी तुलनात्मक समझ के बारे में कुछ बताएं।

हरियश राय: नब्बे के यथार्थ और आज के यथार्थ में जो खास अंतर मुझे दिखाई देता है वह यह है कि आज अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति नफरत बहुत गहरी हो गई है, नस्ली भेदभाव बहुत बढ़ गया है, जातिगत विद्वेष बहुत मुखर रूप से सामने है, बुलडोजर संस्कृति विकसित हो रही है, बंदिशें और नाकाबंदी बहुत होने लगी है, स्त्रियों और बच्चों के साथ निर्मम व्यवहार और अपराध बहुत बढ़ गए हैं। लोग धार्मिक होने की जगह सांप्रदायिक हो गए हैं। हम एक ऐसा भारत बना रहे हैं जिसमें सहनशीलता, परदुखकातरता, उदारता और मानवीयता की जगहें लगातार कम होती जा रही हैं। लोग जाने-अनजाने हिंसक हो रहे हैं। हममें एक तरह की वैचारिक शून्यता समा गई है। हमने तर्क और तार्किकता की बातें करनी बंद कर दी हैं। हम आस्था और व्यक्ति पूजा की अंधी गली में धंसते जा रहे हैं। आज पाखंड और अंधविश्वास से भरे नब्बे के दशक की अपेक्षा बहुत गहरे हो गए हैं। हमने वैज्ञानिक सोच का साथ छोड़ दिया है। हमारा समाज संवेदना, सहानुभूति, करुणा की अनुपस्थिति से घिर गया है। कॉरपोरेट कल्चर हमारे जीवन मूल्य को बदल रही है। हम ऐसा ही नया भारत बना रहे हैं। आज का समय इसी रूप में मेरे सरोकारो के केंद्र में है।

ज्यादातर लेखक इसी लगभग जातिविहीन पर्यावरण में रहते हैं और वे सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजने के लिए नहीं लिखते। वैसे भी जाति के बदलते डायनामिक्स को साहित्य में लाने के लिए ‘आइडेंटिटी पालिटिक्स’ से आगे देखना पड़ेगा।

‘अन्य कहानियां और अप्रेम’ अनिल यादव का कहानी संग्रह है। इसमें कुल ग्यारह कहानियां हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रांजल भाषा है ही, लेकिन जातिवाद और सांप्रदायिकता को प्रच्छन्न रूप से प्रायः हर कहानी में पिरोए रखना ध्यान ज्यादा आकृष्ट करता है।

‘इमामदस्ता’ कहानी हमारे समाज के क्रूर होते जाने की ज्वलंत कथा है। यह डराती है। कोई आश्चर्य नहीं है कि सांप्रदायिकता अब एक ऐसा रूढ़ शब्द बन चुका है कि इसके प्रयोग से भीतर कोई हलचल नहीं होती। यह बस एक रूटीन शब्द-सा हो गया है और हमारे मानस को बिना स्पर्श किए गुजर जाता है। अनिल यादव की खूबी है कि वे इतनी बड़ी समस्या को रूढ़ बन जाने से निकालकर मानस पटल को झकझोरने के लिए जिस युक्ति का सहारा लेते हैं वह भीतर तक झकझोर देनेवाला है। उन्होंने बच्चों का रूपक गढ़कर सांप्रदायिकता के जिन्न को सामने रखा है। सत्ता विजुअल माध्यम, सोशल मीडिया आदि के द्वारा लोगों के भीतर जिस तरह सांप्रदायिकता का जहर भर रहा है वह इतना स्वाभाविक लगने लगा है कि वह ‘न्यू नॉर्मल’ हो गया है। इस स्थिति को तोड़ने के लिए अनिल यादव ने मीसम की बर्बर हत्या का जो रूपक गढ़ा है वह शर्मसार करनेवाला है। सबसे बड़ी बात है कि गाय के खिलौने को लंच ब़ॉक्स में लानेवाले मीसम को बीफ इटर कहकर जेमेट्री बॉक्स से कंपास से बर्बरतापूर्वक मारा जाता है और दूसरे नहीं उसी की उम्र के बच्चे ऐसा करते हैं।

 

‘तब मैं किसका कुत्ता था’ ग्रामीण जीवन में रची-बसी जाति-व्यवस्था की संड़ाध को व्यक्त करती कहानी है। शहर का सरकारी बाबू गांव जाकर एक बेवकूफ-दीन देहाती में बदल जाता है। शहर में बस चुके दलित, पिछड़े और मुसलमान गांव नहीं लौटते। अनिल की यह कहानी शहर और गांव के बीच की खाई को प्रकट करती है। गांव के रिश्तों के प्रति रोमांटिक होकर भी गांव जाने के नाम से लोगों की आत्मा कांप जाती है।

‘अप्रेम’ युवा जीवन की एक ऐसी अव्यक्त पीड़ा की कहानी है जिसे शब्दों में प्रकट नहीं किया जा सकता। प्रेम व्यक्ति को ऊर्जा से भर देता है लेकिन नायक डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। वह जिस लड़की से प्रेम करता है वह संबंधों की ऐसी खाई में गिर जाती है जहां रिश्ते और उस अनुभव का कोई नाम नहीं है। वह उसे अप्रेम की संज्ञा से विभूषित करता है। ‘नागरिक’ एक ऐसी कहानी है जो दिनोंदिन आदमियत से रहित होते समाज में आदमी बने रहने की उत्कट आकांक्षा को प्रकट करती है। यह कहानी पुलिस, अदालत एवं तंत्र की मिलीभगत और प्रताड़ना को भी उजागर करती है।

आज अपने आप में कैद व्यक्ति मोबाइल में बंद हो गया है। अब न्यूक्लियर फैमिली की भी एक छोटी इकाई न्यूक्लियर पर्सन है। ऐसा आदमी स्वार्थ में अपने समाज से विरक्त होकर नागरिक कर्तव्यों को भूल चुका है। माखिजा जैसे पात्र नव-उदारीकरण से पहले के पात्रों की याद दिलाते हैं जो रास्ते में लोगों को पकड़-पकड़ कर बातें करते थे, सुख-दुख में शामिल होते थे और हँसी-ठट्ठा करते सचमुच नागरिक थे। आज माखिजा जैसे लोगों को संदेह से देखा जाता है।

मिलनसारिता और अन्य की मदद की प्रवृत्ति उस व्यक्ति को जेल तक पहुंचा देती है, लेकिन इसी आदमियत के कारण ही वह बच भी जाता है। वह नागरिक बने रहना चुनता है। उसकी जिजीविषा उसे आज के समय में एक यूटोपिया की तरह प्रस्तुत करती है। माखिजा जैसे चरित्र की परिकल्पना आज के न्यू-नॉर्मल का प्रतिपक्ष है।

वीरेन डंगवाल की कविता ‘कटरी की रुकुमिनी’ का कथा रूपांतरण खालिस यथार्थवादी और बेलौस बन पड़ा है। अनिल  यादव ने कविता को विस्तार दिया ही है, उसे अधिक सजीव भी कर दिया है। गांवों में क्राइम कैसे पैर पसारता है और आपराधिक चरित्र को पूरे समाज का आत्मिक सत्य बना देता है, यह इस कहानी की विशेषता है।

इनकी कहानियां समकालीन यथार्थ को एक नए स्वर एवं भाषा में प्रकट करती हैं। इन कहानियों को वर्तमान का दस्तावेज कहना अतिशयोक्ति न होगी।

जिज्ञासा: आज का कहानीकार जातिवाद को समस्या नहीं मानता क्योंकि जातिवाद पर कहानियां न्यूनतम हो गई हैं। इसपर आपके क्या विचार हैं ?

अनिल यादव: जातिवाद की प्रकृति बहुत बदल चुकी है। शूद्र जातियां हर स्तर पर सत्ता में हिस्सेदारी के लिए सवर्णों के साथ सौदेबाजी और गठबंधन करके कथित रूप से सफल हो रही हैं। शूद्रों ने पिछले तीस सालों में अपने मिट्टी-पत्थर के लोक देवताओं को छोड़कर उन्हीं सर्वणों के मूर्तिमान देवताओं, जीवन मूल्यों और संस्कृति को अपनाया है जो सैकड़ों सालों से उनपर अत्याचार कर रहे थे। ऐसा लगता है जैसे शूद्र जातियां अपने उत्पीड़कों जैसा ही होने के लिए सदियों से तड़प रही थीं और उनकी इस गुप्त आकांक्षा का किसी को पता नहीं था। अब एक ऐसा इलाका है जिसमें जातिवाद को सहनीय बनाया जा चुका है। अगर जातिवाद नहीं रहा तो शूद्र सौदेबाजी और सवर्ण श्रेष्ठताबोध दोनों का क्या होगा?

छोटे शहरी दायरे में कुछ अंतरजातीय विवाह हो रहे हैं, परिवारिक संबंधों से कहीं दीर्घकालिक और उपयोगी संबंध बन रहे हैं, जातिवाद खत्म हो रहा है। ज्यादातर लेखक इसी लगभग जातिविहीन पर्यावरण में रहते हैं और वे सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजने के लिए नहीं लिखते। वैसे भी जाति के बदलते डायनामिक्स को साहित्य में लाने के लिए ‘आइडेंटिटी पालिटिक्स’ से आगे देखना पड़ेगा।

जिज्ञासा : शहरी जीवन ने ग्रामीण जीवन के यथार्थ को कहानियों से अपदस्थ कर दिया है। इसपर आपके क्या विचार हैं?

अनिल यादव: लगता है कि शहरों की ओर ऐसा पलायन हुआ है कि अब गांवों में कोई लिखने वाला बचा ही नहीं है। नए लेखक कलम उठाने से पहले किसी और काम के लायक न रहने देने वाली शारीरिक या मानसिक मजदूरी करने लगते हैं।

मुझे लगता है कि भूमंडलीकरण के बाद गांव बहुत कम समय में अभूतपूर्व तेजी से इतने स्तरों पर बदले और अब भी बदल रहे हैं कि वहां के जीवन के बारे में कुछ ऐसा नहीं कहा जा सकता जो अगले कुछ सालों तक टिक सके। यह भी कह सकते हैं कि वहां सामुदायिक जीवन के खात्मे के साथ बाजार, तकनीक, पूंजी और भ्रष्टाचार की साधना करने वाली राजनीति ने जो खिचड़ी विप्लव पैदा किया, उसे समझने में बहुत कम बौद्धिक ऊर्जा लगी जिसके नतीजे में सन्नाटा दिखाई देता है।

जिज्ञासा:‘इमामदस्ता’ कहानी अपने अंत तक अत्यंत मार्मिक हो जाती है। आपकी यह रचना पढ़कर समकालीन कहानियों की ओर ध्यान गया तो लगा सांप्रदायिकता आज की कहानियों में प्रमुखता से नहीं आ रही है। इसकी क्या वजह हो सकती है?

अनिल यादव: पिछले दस साल से देश में सांप्रदायिकता के वास्तुकारों, इंजीनियरों और पुरातत्वविदों की सरकार है। वे कुपित होंगे, इसलिए नहीं लिखा जाता। खुद हिंदी में सांप्रदायिक दिमाग वाले लेखकों की कमी नहीं है। उनसे ज्यादा वे हैं जो अपने डर को छिपाने के लिए राजनीति से ऊपर होने का स्वांग करते हैं। कुछ लेखकों ने लिखा है, लेकिन उन्हें पढ़ने और समझने वाले इतने कम हैं कि उनकी उपेक्षा करना ही उचित समझा जाता है। हिंदीभाषी समाज अभी विक्षिप्तता की स्थिति में है। वह जब समान्य होगा तो ज्यादा लोग साहित्य पढ़ेंगे और ऐसे लेखकों के लिखे पर ध्यान जाएगा।

नैतिकता या अनैतिकता, आदर्श या अपकर्ष रचनाओं में नहीं, समाज और जीवन में होते हैं। कोई भी वाद-आदर्शवाद या नैतिकतावाद कथाकार के लिए न्यूनतम महत्व का होता है। हां, कथाकार की अपनी वैचारिकता जरूर होती है, जो उसकी रचनाओं में प्रक्षेपित होती है।

‘फुज्जार’ धनेश दत्त पांडेय का नया कहानी संग्रह है। इसमें कुल तेरह कहानियां हैं। इनको समग्रता में देखने पर समकालीन समय के भिन्न-भिन्न चित्र बनते हैं। उनमें पारिवारिक अनुभूतियां हैं तो राजनीतिक चालबाजियों का पर्दाफाश भी है। कोरोना काल के सत्ता तंत्र के शोषण का चित्र है तो उसके कारण विवश गरीबों की घुटती जिंदगी भी है। सांप्रदायिक विद्वेष का जाल बुनते राजनीतिज्ञ हैं तो उसे विफल करता लोक जीवन और उसकी जिजीविषा भी है।

धनेश दत्त पांडेय अपने समय के जालों को सुलझाने की कोशिश करते हैं। उनका शिल्प जरा अलग है। वे बातचीत की शैली में समस्याओं को रखते हैं। इसलिए उनकी कहानियों में संवाद और कथोपकथन महत्वपूर्ण हैं। ‘मौत के आगोश’ में एक ऐसी कहानी है जिसके सिरे तंत्र की लापरवाही से जुड़ते हैं। अकसर ट्रेनें दुर्घटना का शिकार होती हैं, लोग मरते हैं। इन मौतों के लिए जिम्मेदार कौन है? कहानी पढ़कर लगेगा, यह एक साधारण-सी यात्रा की कथा है लेकिन प्रच्छन्न रूप से यह तंत्र पर, सवालिया निशान करती है। आज के युग में फुज्जार कौन है? वे निर्दोष लोग हैं जो तंत्र की चक्की में आटे की तरह पिस रहे हैं अथवा वे हैं जो अपनी विलासिता में भ्रष्ट से भ्रष्टतम होते जा रहे हैं।

आम आदमी की लड़ाई कितनी कठिन होती गई है वह इस कहानी में उपस्थित एक बड़ी चुनौती है जो इसे विशिष्ट बनाती है।

‘अफीम’ धर्म के नशे को एक अन्य ढंग से प्रस्तुत करती है। हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता की बढ़ाई जा रही आग में पूरा देश जल रहा है, कहानी उसी का विलोम बनाती है। यह विलोम गांव के साथ जीने-मरने वाले सीधे सादे लोगों द्वारा बनाया जाता है। उनका बर्ताव मानवता को सबसे बड़ा धर्म बनाकर पेश करता है। ‘लव जिहाद उर्फ क्रौंचबध’ पौराणिक कथा का आधुनिक संदर्भों में प्रयोग कर लिखी एक विलक्षण कहानी है। यह कहानी आधुनिक सभ्यता को आईना दिखाती है। कहानी प्रेम को प्रेम न रहने देकर उसे धर्म, संप्रदाय और जाति के भेद से मलीन कर देनेवाले तथाकथित सभ्य समाज की पूरी पड़ताल करती है। धनेश दत्त पांडेय तंत्र को यथार्थवादी शैली में सीधे उपस्थित नहीं करते, लेकिन समग्रता में कहानी, तंत्र को खलनायक बना देती है। यह उनकी कहानी कला की एक विशेषता है।

‘मर्दमार’ कहानी में डॉ सुषमा जौहरी की प्रताड़ना असल में पितृसत्तात्मक समाज की ही पुरातन शैली है। कामकाजी महिलाओं को बेइज्जत करना, कार्य स्थल पर उनके लिए असहज वातावरण बनाना इसके लक्षण हैं। ऐसी शोषित और पीड़ित स्त्री सार्वजनिक जीवन से निकलकर फिर घर की चाहरदीवारी में कैद हो जाती है। पुंसवाद यही चाहता है। लेकिन कहानी के अंत में डॉ सुषमा जौहरी ने मंत्री के बेटे के सामने उसी की शैली में जिस तरह चपत लगाई, वह इससे किसी भिगी बिल्ली-सा शर्मसार हो गया। कहानी कहती है कि आक्रमण करनेवालों के आगे समपर्ण कर देना हार है। एक हारा हुआ दिमाग कभी भी स्वस्थ मस्तिष्क नहीं बना सकता।

दरअसल कहने को हम उत्तरआधुनिक हो गए हैं किंतु असल में सामंती बीज कहीं-न-कहीं भीतर पल रहा है। इसका समूल नाश आत्यंतिक रूप से जरूरी है। आज भूमंडलीकरण और नव-उदारवाद के इतने वर्षों बाद अंततः एक स्वार्थी और चालाक समाज तैयार हुआ है। इस दौर में भोंदू व्यक्ति तंत्र के चालाक आदमी का विलोम बनता है। यह भोंदू व्यक्ति ही आज की सबसे बड़ी मांग बनकर उभरता है। कुल मिलाकर यह संग्रह आदमी की तंत्र में फंसकर घुट रही जिंदगी के चित्रों से भरा है। कहानीकार के इन चित्रों में करुणा भी है और व्यंजना की प्रहारक क्षमता भी।

जिज्ञासा : क्या आज के युग में आप कहानियों में आदर्शवाद को महत्वपूर्ण मानते हैं?

धनेश दत्त पांडेय : कहानी हो या उपन्यास, मेरा मानना है कि इसमें अंकित जीवन बहुत प्रामाणिक तौर पर उतरना चाहिए। आज का युग लोकतांत्रिक है और इस कारण रचनाएं आम मनुष्यों द्वारा तथाकथित आम जनता के लिए ही लिखी जातीं हैं। नैतिकता या अनैतिकता, आदर्श या अपकर्ष रचनाओं में नहीं, समाज और जीवन में होते हैं। मंटों, इस्मत चुगताई पर अश्लीलता यानी आदर्श-भंजन के आरोप लगे, बात कोर्ट-कचहरी तक आ गई मगर अदालत-ए-फाजिल यानी प्रबुद्धता ने उसे नैतिक ही माना। कहने का मतलब यह है कि कोई भी वाद-आदर्शवाद या नैतिकतावाद-कथाकार के लिए उसकी कथा रचना के लिए न्यूनतम महत्व का होता है। हां, कथाकार की अपनी वैचारिकता जरूर होती है जो उसकी रचनाओं में प्रक्षेपित होती है।

जिज्ञासा : सांप्रदायिकता आज समाज का नया सच है। आप सांप्रदायिक वैमनस्य को किस दृष्टि से देखते हैं?

धनेश दत्त पांडेय : कहानी लिखते समय मेरे सामने न कोई धर्म होता है और न ही कोई संप्रदाय। कारण वस्तुतः मूल रूप में अब इनकी कहीं व्याप्ति ही नहीं है। सब जगह इनका छद्म चल रहा है। मेरे सामने सिर्फ और सिर्फ हमारे समय का आदमी, उसकी हताशा और उसकी बेचारगी होती है, चाहे वह जिस किसी भी धर्म या संप्रदाय के भ्रम-जाल में जकड़ा हो।

जिज्ञासा : क्या आप सत्ता तंत्र के शोषण पर लिखना एक महत्वपूर्ण चुनौती मानते हैं?

धनेश दत्त पांडेय : सत्ता तंत्र जनित शोषण पर लिखना पहले भी चुनौतीपूर्ण था। आज भी है और आगे भी रहेगा। ब्रिटिश शासन ने प्रेमचंद को अपने लिए इतना खतरनाक माना कि इन पर ‘सिडीशन’ का आरोप लगाया और ‘सोजेवतन’ की सभी उपलब्ध प्रतियों को आग के हवाले कर दिया। नौकरी तक छोड़नी पड़ी। पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की ‘चिनगारियां’ की जब्ती हुई। अज्ञेय ने अपनी सारी प्रारंभिक कहानियां जेल भुगतते हुए लिखीं। सलमान रुश्दी ने जला-वतन होकर अपनी जान बचाई। साहित्य और पत्रकारिता की प्रकृति ही है कि प्रतिवाद पर बल दिए बिना उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। अब साहित्य रचने वालों के लिए गर यह चुनौती है तो है और अच्छा भी है। किसी भी समाज की खासियत को तो सिर्फ और सिर्फ साहित्य के माध्यम से जाना-समझा जा सकता है।

 

समीक्षित पुस्तकें–
1.पच्चीस कहानियां- हरियश राय, अंतिका प्रकाशन, प्रथम पेपरबैक संस्करण 2025
2.अन्य कहानियां और प्रेम, अनिल यादव, पेंग्विन स्वदेश, प्रथम संस्करण 2025
3.फुज्जार, धनेश दत्त पांडेय, न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण 2025

प्राध्यापक, हिंदी विभाग, सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज, कोलकाता-700005मो. 9831615131