लेखक की पहली पुण्यतिथि पर (10 अक्टूबर 1938 – 6 जुलाई 2021) केंद्रीय जल आयोग में सहायक निदेशक तथा सलाहकार के रूप में देशविदेश में कई उच्च पदों पर कार्य।रामविलास शर्मा के पत्रों तथा कई बिखरे कार्यों को संपादित करके पुस्तकाकार प्रकाशन।कृष्णदत्त शर्मा के साथ रामविलास शर्मा की आलोचना सामग्री का 18 खंडों में हाल में प्रकाशन।इस लेख में रामविलास शर्मा के कवि रूप का परिचय कराने के साथ उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं पर प्रकाश!

रामविलास जी की अनेक छवियों में से जो उनके प्रशंसकों, चाहने वालों, आलोचकों और ‘दुश्मनों’ ने बना रखी हैं, एक छवि उनके कुश्ती लड़ने वाले पहलवान छाप आलोचक की है जो अकेले दम पर अपने तमाम विरोधियों पर भारी पड़ता है।इसकी कुछ मिसालें भी दी जाती हैं।कैसे उन्होंने कुछ बदमाश लड़कों और अभद्र लेखकों की ठुकाई कर दी थी।कुछ लोग यह भी कहते सुने गए हैं कि ‘कभी कभी तो वह अखाड़े की मिट्टी लगाए हुए ही विश्वविद्यालय में क्लास लेने चले आते थे’, जबकि असलियत यह है कि जिन दिनों वह अखाड़े जाते थे उन दिनों वह लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे।वहां क्लास लेने के लिए कोट पैंट पहन कर और टाई लगाकर ही जाना होता था।

इसमें कोई शक नहीं है कि उन्हें शारीरिक व्यायाम करने और अखाड़े में जोर अजमाने का शौक था।वह अखाड़े भी व्यायाम के लिए ही जाते थे, कुश्ती लड़ने के लिए नहीं।लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं है कि उनके बलिष्ठ शरीर में एक अत्यंत संवेदनशील और भावुक कवि-ह्रदय रहता था।उनका कहना था कि एक स्वस्थ तन में ही एक स्वस्थ मन बस सकता है।भारत में यह बात बहुत पहले से मानी जाती रही है।पश्चिम की आधुनिक सोच के अनुसार भी तन और मन एक दूसरे को लगातार प्रभावित करते रहते हैं और सही माने में, तन और मन आपस में इतने दूर नहीं हैं जितना लोग समझते हैं।पहलवान के नाम से एक ऐसे कुंद-बुद्धि मोटी गर्दन वाले व्यक्ति का बिंब उभरता है जिसे तमाम समस्याओं का हल केवल पिटाई से निकलता दिखाई देता है।ऐसा ‘पहलवान’ पढ़ने-लिखने का काम तो करेगा नहीं।

जो लोग रामविलास जी को ठीक से नहीं भी जान पाए और सुनी सुनाई बातों पर अधिक निर्भर रहे हैं, वे भी मानेंगे कि सचाई इससे कोसों दूर थी।रामविलास जी इस पहलवानी-बिंब के विपरीत निहायत ज़हीन और प्रखर मेधा के धनी थे।उसपर उन्होंने कड़े अनुसाशन से अपने आपको बांध रखा था, जिसकी वजह से वह उतने ही समय में दूसरों के मुलाबले कहीं अधिक काम कर लेते थे।

रामविलास जी ने अपना साहित्यिक जीवन कविताएं लिखने से शुरू किया था।दरअसल वह जब स्कूल में पढ़ते थे, तभी से कविताएं लिखने लगे थे।एक हस्तलिखित पत्रिका ‘रण-दुंदुभि’ का संपादन भी करते थे।लखनऊ आकर और निराला जी का सान्निध्य पाकर यह कविता-लेखन और भी परवान चढ़ा।जब अज्ञेय जी और उनके मित्रों ने ‘तार सप्तक’ निकालने की योजना बनाई तो स्वाभाविक ही था कि रामविलास जी को भी उसके लिए कविताएं भेजने के लिए कहा गया।जिन लोगों ने ‘तार सप्तक’ में छपी उनकी कविताएं देखी हैं, वह मानते हैं कि उन सात कवियों में से जिन कवियों ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और जिनकी चर्चा भी हुई, उनमें रामविलास जी भी थे।कुछ लोगों ने यह भी कहा कि इन कवियों में सबसे अधिक ‘पोटेंशियल’ रामविलास जी और मुक्तिबोध थे।

संवेदनशील कवि की छवि को बिगाड़ने में कुछ हाथ उनका अपना था, कुछ काम ‘तार सप्तक’ में छपे वक्तव्यों ने किया। ‘तार सप्तक’ में रामविलास जी के नाम से एक वक्तव्य छपा था, जिसके अंतिम पैराग्राफ में कहा गया था, एक और बात का विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि वात्स्यायन जी ने कविताओं के लिए परेशान कर डाला।नहीं तो कविता लिखने में बड़ी मेहनत पड़ती है और उसकी नकल करने में और भी ज्यादा! आशा है, यह प्रकाशन बस अंतिम होगा।

यह वक्तव्य रामविलास जी के नाम से छपा जरूर है, लेकिन यह उनका लिखा हुआ वक्तव्य नहीं है।दरअसल हुआ यह था कि ‘तार सप्तक’ में हर कवि का परिचय और वक्तव्य छपना था।यह वक्तव्य और परिचय कवियों को स्वयं ही लिख कर भेजना था।रामविलास जी ने जो सामग्री भेजी थी वह या तो खो गई या देर से पहुंची। ‘तार सप्तक’ की भूमिका में अज्ञेय जी ने स्वीकार किया है, आधी पांडुलिपि रेलगाड़ी में खो गई, और संकोचवश इसकी सूचना किसी को नहीं दी जा सकी।नेमिचंद जी ने अपने 2 फरवरी 1944 के पत्र में रामविलास जी को लिखा, आपका वक्तव्य बहुत देर से मिला।तब तक कविताओं वाला फर्मा छप चुका था, इसलिए वह दिया नहीं जा सका।मुझे इस बात का व्यक्तिगत भाव से और भी अधिक खेद है, आपके परिचय को ही वक्तव्य के रूप में इसी से प्रकाशित करना पड़ा और इसी से उधर परिचय भी अधिक सुंदर न हो सका।

जिन लोगों पर ‘तार सप्तक’ के संपादन का दायित्व था उन्होंने रामविलास जी द्वारा भेजे हुए ‘परिचय’ में एक अंतिम पैराग्राफ अपनी तरफ से जोड़ कर ‘वक्तव्य’ बना दिया और इसे रामविलास जी के नाम से छाप दिया।जो परिचय उन्होंने (संपादक महोदय ने) लिखा, उसमें कहा, ’रामविलास जी पहले आलोचक हैं फिर कवि।कविता उन्होंने कम लिखी है।इसका कारण वे यह बताते हैं कि उसमें मेहनत पड़ती है, पर असल में कारण यही है कि उन्हें आलोचना का चस्का है, और उसका अवसर पाकर वे लेखनी या मसि की प्रतीक्षा अनिवार्य नहीं समझते।मौखिक आलोचना और कटाक्षपूर्ण पदावली उनकी विशेषता है।हिंदी को छोड़कर जब वे ठेठ मातृभाषा (बैसवाड़ी) को अपनाते हैं तब उनका यह अस्त्र और भी पैना हो जाता है।इसीलिए हिंदी के पहलवान कवि-शिरोमणि निराला जी उन्हें बहुत मानते हैं।स्वस्थ देह के साथ स्वस्थ मन वाला ग्रीक आदर्श वे पूरा करते हैं या नहीं यह तो मनस्तत्ववेत्ता बताएं, किंतु उनका कंठ और उनकी वाणी खूब स्वस्थ और समर्थ हैं।’

ज़ाहिर है, यह किसी चोट खाए संपादक के दिल की आवाज़ है! वक्तव्य का अंतिम पैराग्राफ, ‘एक बात का और विश्वास दिलाना चाहता हूँ;… आशा है, यह प्रकाशन बस अंतिम होगा।’ वैसे भी यह रामविलास जी का लिखा हुआ नहीं लगता, क्योंकि रामविलास जी कभी ‘मेहनत पड़ती है’ न लिखते।रामविलास जी को यही बात लिखनी होती तो वह लिखते, ‘मेहनत करनी पड़ती है’।उदाहरण के लिए, अपनी आत्मकथा में उनका लिखा यह वाक्य, उन (सीढ़ियों) पर चढ़ने में काफी मेहनत करनी पड़ती थी।जिसने परिचय लिखा उसी ने वक्तव्य का अंतिम पैराग्राफ लिखा है।दोनों में काफी ‘मेहनत पड़ी’ होगी!

रामविलास जी ने लिखा है, ‘तार सप्तक’ के लिए मेरा वक्तव्य उसमें नहीं छपा।जहां तक याद है, वह लौट कर मुझ तक नहीं पहुंचा।

इसी तरह उनकी भेजी एक कविता, जिसका शीर्षक था- ‘रेतः दधाति औषधीशु गर्भस’ और जिसकी प्रथम पंक्ति थी ‘संस्कृति के स्वर्ण रथ’, खो गई।अज्ञेय जी ने एक पत्र में इसकी प्राप्ति स्वीकार की थी, किन्तु बाद में वह छपी नहीं और लौट कर रामविलास जी के पास पहुंची भी नहीं। (रूप तरंग और प्रगतिशील कविता की पृष्ठभूमि)

इस बात की थोड़े विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता इसलिए हुई कि जहां ‘तार सप्तक’ ने रामविलास जी को प्रतिष्ठित कवियों की श्रेणी में शामिल किया, वहीं उनके बारे में इस धारणा को बल दिया कि रामविलास जी को आलोचना का चस्का है और उन्हें कविता लिखने में मेहनत ‘पड़ती’ है, उसकी नकल करने में और भी ज्यादा।इसलिए उन्होंने जो लिखा, मजबूरी में लिखा।वास्तविक स्थिति इसके बिलकुल विपरीत थी।रामविलास जी ह्रदय से कवि थे।उन्होंने स्वयं कहा है ‘निराला को लेकर हिंदी में कितना संघर्ष हो चुका है, तब मुझे पता न था।सन ’३४ में यह संघर्ष ही मुझे आलोचना के क्षेत्र में घसीट लाया और मेरा पहला आलोचनात्मक निबंध निराला की काव्य प्रतिभा के समर्थन में प्रकाशित हुआ।संभव है, यह संघर्ष न होता और मेरे प्रिय कवि पर द्वेषपूर्ण आरोपों की वर्षा न की गई होती तो मैं आलोचना के क्षेत्र में आता ही नहीं।’

अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत तो उन्होंने कविताओं से की थी।बाद में भी उन्हें समय-समय पर हुड़क उठती थी कि कविता लिखी जाए।

केदारनाथ अग्रवाल जी को लिखे पत्रों में वह बार-बार कहते हैं, ‘ठहरो, मैं भी कुछ कविताएं  लिख लूं, फिर बांदा आऊंगा और तुम्हें सुनाऊंगा।’ (पत्र, 15.12.53)

‘मैं कई साल से कविताएं लिखने की सोच रहा हूँ, लेकिन मन में बहुत-सी कविताएं रच डालने के बाद भी, भाषा और छंद में उन्हें बांधने की नौबत नहीं आई।’ (पत्र 9.1.56)

अपने बड़े भाई साहब को उन्होंने एक पत्र में लिखा, कविता लिखने में …(जितनी) शारीरिक यातना होती है, मानसिक आनंद उतना ही अधिक (आता है)।किंतु अब कुछ ऐसा हो गया है कि मैं बिना कविता लिखे रह नहीं सकता।’ (13.09.1935)

इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा बनाई गई एक फिल्म में पहले वह निराला जी पर लिखी अपनी प्रसिद्ध कविता सुनाते हैं, ‘वह सहज विलंबित मंथर गति…’, फिर कहते हैं कि निराला की साहित्य साधना के तीन खंडों में इस कविता का ही भाष्य है।इसी प्रकार वह ‘रूप तरंग’ में संकलित अपनी कविता ‘धरती का पुत्र’ पढ़ते हैं और कहते हैं कि मार्क्सवाद पर उन्होंने जो कुछ भी लिखा है वह इसी कविता का भाष्य है।

कविता में सूत्र रूप से बात कहने के बारे में वह यहां तक कहते हैं कि उन्होंने जितना भी गद्य लिखा है, वह उनकी कविताओं के ही भाष्य हैं।वह यह भी मानते हैं कि उन्हें आलोचना के मुकाबले कविताएं पढ़ना अधिक रुचिकर लगता है और वह अभी भी कविताएं अधिक पढ़ते हैं, लिखते आलोचना हैं यह बात अलग है।

सच बात तो यह है कि वह अन्य तमाम लेखन संबंधी कामों को ज्यादा ज़रूरी समझते थे, और चाहते थे कि वह अपने पाठकों को, और अपनी जनता को आने वाले खतरों (विश्व में बढ़ते साम्राज्यवाद और संप्रदायवाद के खतरों) से सावधान कर दें।इसलिए न चाहते हुए भी कविता-लेखन को ‘बैक-सीट’ लेनी पड़ी।

कविताओं के अनुवाद

अपनी कविताएं लिखने के अलावा रामविलास जी ने कई दूसरे कवियों की कविताओं के अनुवाद भी किए।इनमें से कुछ कवियों के नाम हैं, नजरुल इस्लाम, उमर खैयाम, बल्गेरिया के कवि वाप्त्सारोव, फ्रांसीसी कवि विक्टर ह्यूगो, रूसी कवि शेवचेन्को।

फ्रांसीसी कविताओं को मूल रूप में पढ़ पाने के लिए उन्होंने फ्रेंच भाषा सीखी।विश्वविद्यालय से डिप्लोमा लिया जो उन्हें लगा, कविताओं को समझने के लिए काफी न था।इसलिए वह अध्यापक अय्यर साहब के घर जाकर फ्रेंच भाषा संबंधी अपनी शंकाओं का निराकरण करते थे।

गीतमाला 

रामविलास जी ने संत कवियों की गेय कविताओं का एक संग्रह तैयार किया था, जो जून 1947 में बंबई से प्रकाशित हुआ था।प्रकाशक थे भानुकुमार जैन, मैंनेजिंग डाइरेक्टर, हिंदी ज्ञान मंदिर लिमिटेड, चर्चगेट स्ट्रीट, फोर्ट, बंबई।इसकी भूमिका स्वरूप ‘दो शब्द’ में उन्होंने लिखा था-

‘हिंदी की प्राचीन परंपरा में गीतात्मकता का अभाव नहीं है।पश्चिमी साहित्य के संपर्क में हमारे यहां लिरिक या गीति काव्य का विशेष विस्तार हुआ।ब्रजभाषा—सहित्य में कवियों का आत्म-निवेदन, भक्ति-विह्वल पद, श्रृंगार की कल्पनाएं और इनके साथ उपमाओं का अनूठापन और भक्ति-चातुरी देखने योग्य हैं।लोगों की पसंद अलग-अलग होती है।इस संग्रह में बहुत से छंद प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं, कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें अधिकांश संग्रहों में स्थान नहीं मिला।आशा है, पाठकों को अपनी काव्य परंपरा से परिचित होने में सहायता मिलेगी और साथ में उनका मनोरंजन भी होगा।’

गीतमाला में 30 कवियों के कुल 178 गीत संकलित हैं।पहला पद तुलसीदास का है :

का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए सांच।
काम जु आवै कामरी, का लै करै कुमाच (रेशमी वस्त्र)।

एक अन्य उल्लेखनीय पद कबीर का है,

साधो ई मुर्दन कै गांव।
पीर मरे पैगम्बर मरिगे, मरिगे ज़िंदा जोगी।
राजा मरिगे परजा मरिगे मरिगे वैद्य औ रोगी।
चांदौं मरिहैं सुर्जों मरिहैं मरिहैं धरनि अकासा।
चौदह भुवन चौधरी मरिहैं इनहूँ कै का आसा।
नौहू मरिगे दस हू मरिगे मरिगे सहस अठासी
तेंतिस कोटि देवता मरिगे पड़िगे काल की फांसी
नाम अनाम रहै जो सधी दूजा तत्त न होई।
कहै कबीर सुनो भाई साधो भटक मरे मत कोई।

रामविलास जी ने यह पुस्तक अपने बड़े भाई साहब को समर्पित की थी, बड़े भाई साहब को  जब इस बात का पता चला तो उन्होंने लिखा ‘बेहतर होगा कि यह पुस्तक तुम दौआ (रामविलास जी के पिता जी, जिन्हें वह दौआ कहते थे) को समर्पित करो।’ लेकिन रामविलास जी अपने निश्चय पर डटे रहे।

रामविलास शर्मा के कविता संग्रह

रामविलास जी के तीन कविता संग्रह और प्रकाशित हुए हैंः

पहला कविता संग्रह ‘रूप तरंग’ जो 1956 में विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा से प्रकाशित हुआ था।यह नरेंद्र शर्मा जी को समर्पित था।इसके बाद उन्होंने बल्गेरियाई कवि वाप्त्सारोव की कविताओं का अनुवाद किया था जो ‘कविताएं’ नाम से भारतीय शांति परिषद से छपा था।इसके बाद रामविलास जी ने एक लंबा लेख लिखा जिसका शीर्षक था, ‘प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि’।उन्होंने इन तीनों को मिलाकर एक पुस्तक बना दी और उसे नाम दे दिया- ‘रूप तरंग’ और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि, जो 1990 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई।

रामविलास जी ने राजनीतिक कविताएं भी बहुत लिखी थीं।उनका संग्रह ‘सदियों के सोये जाग उठे’ नाम से 1988 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ।

इसके बाद 1997 में उनकी  प्रारंभिक कविताओं का एक संग्रह आया जिसका नाम था- ‘बुद्ध वैराग्य तथा प्रारंभिक कविताएं’। अभी भी उनकी बहुत सारी कविताएं और कविताओं के अनुवाद किसी संग्रह में संकलित नहीं हैं। हिंदी के अलावा उन्हें अंग्रेजी और फ्रेंच कविताएं पढ़ने का बहुत शौक था।उनकी थीसिस अंग्रेजी भाषा के मशहूर कवि ‘कीट्स और प्री-रेफेलायिट्स’ विषय पर थी।

कविता के संस्कार   

रामविलास जी को कविता के संस्कार अपने परिवार और गांव के सांस्कृतिक वातावरण से मिले।जन्म के बाद का पहला स्पर्श जो रामविलास जी को याद रहा वह मां का नहीं, अपने बाबा का था।सौर से निकलते ही वह रामविलास जी को अपने पास सुलाने लगे थे।डरते थे कि अम्मा उन्हें कहीं खाट से गिरा न दें, कहीं कचर न डालें।रोने पर उठकर उन्हें दूध पिलाने ले जाते थे।

थोड़ा बड़ा हो जाने पर, बाबा जहां भी जाते थे, रामविलास जी को साथ ले जाते थे।कभी पीठ पर, कभी घोड़इयां, कभी कमर पर कनिया, कभी ऊंचे कंधे पर बिठाकर।वह खेतों के बीच से चले जा रहे हैं और रामविलास जी ऊंचाई से चारों ओर खेतों की हरियाली देख रहे हैं!

रात को बाबा कहानियां सुनाते थे।एक-एक कहानी कई-कई बार सुनी जाती थी।ऊंट और सियार की कहानी, जिसमें सियार ऊंट को धोखा देता है और फिर ऊंट सियार से बदला लेता है, उसे नदी में कंडे जैसा बहा देता है।बालक रामविलास कल्पना करते कि वह नदी उनके गांव का नाला था।जिस खेत में खरबूजे लगे थे वह उसी नीम के पास था, जिस पर सवेरे सूरज निकलता था।जिस गली में ऊंट घूमा करता था, वह उनके घर के सामने वाली गली थी।जहां दहलीज में बैल बंधते थे, वहीं ऊंट बांधा गया था और मोटी-मोटी रोटियां सेक कर अम्मा ने झौवे में भरकर वहीं रख दी थीं।

नाले के पास बड़े ऊसर में एक ऊंचा महुए का पेड़ था।सवेरे तड़के उठ कर अम्मा महुआ बीनने चलती थी।रामविलास जी भी साथ हो लेते थे।चांदनी रात, ठंडी हवा, सफेद धरती पर रस भरे महुओं का टपकना सुना जा सकता था।सूरज उगने तक हवा में महुओं की गंध बनी रहती थी।लोधी ताल के किनारे आम के पेड़ थे।हर पेड़ का नाम था, उसकी एक विशिष्ट पहचान थी। ‘पेड़ पर वाला’ आम मीठा तो ‘विसैन्धी’ उसकी गंध के चलते खाया जाता था।खरबूजे की मिठास वाले आम का नाम पड़ा ‘खरबुजहा’ तो दूसरे को ‘कुसिलिहा’ नाम से पुकारा जाता था।होली पर खोया भर कर गुझिया बनाते हैं, जिसे अवध में कुसिली कहा जाता है।गाढ़ी मिठास के कारण नाम पड़ा कुसिलिहा।

बाबा की सुनाई कहानियों में बहुत सारी बातचीत पद्य में होती थी।रामविलास जी को यह पद्य याद हो गए थे और अंत समय तक याद रहे।

बाबा सोने से पहले गिनती सिखाते थे, पहाड़े याद कराते थे।दूसरे पहाड़ों की अपेक्षा पंद्रह का पहाड़ा बहुत जल्दी याद हो गया था, और उसे वह बिना कहे ही सुनाने लगते थे।पंद्रा दुन्ना तीस तिया पैंतालीस, चौको साठ, पछी पचहत्तर, छक्का नब्बे, सतौ पिचोकर, अट्ठे बीसा, नौ पैंतीसा, दहाम डेढ़ सौ! कहने का मतलब यह कि जहां तरन्नुम था, सुर और ताल थे, वहीं रामविलास जी का मन रमता था।

एक कविता डमरू पर थी।सुनने पर लगता था कि खूब उछल कूद हो रही है और डमरू बज रहा है।यह कविता भी रामविलास जी को याद रही।

उन दिनों लोक कवियों में समस्या-पूर्ति करते हुए छंद कहना बहुत लोकप्रिय था। ‘तरवा के तरे लौं’ समस्या कवि ने चार तरह से पूरी की थी और बाबा को यह सब याद था।बैसवाड़े के हर गांव में दो चार कवित्त-सवैये कहने वाले होते थे।बाबा ने संभवतः कभी इनकी संगति की होगी।

बाबा को गिरधर कविराय की बहुत सी कुंडलियां याद थीं।उन्होंने कुछ रामविलास जी को भी याद करा दी थीं।इन्हीं में से एक थी- ‘लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिए संग।’ वे भक्ति भाव से कभी भजन गाते थे- ‘देखोजी इक बाला जोगी द्वारे तेरे आया है।’ कभी वैराग्य भाव से एक सवैया पढ़ते थेः

बचपन में सूप में पौढ़े, जवानी में पलंग पर —
पौढ़त पौढ़त ही सो चिता पर पौढ़न को दिन आयो
छीर समुद्र के पौढ़नहार तिन्हें बिसरे कहां सुख पायो।

जिस नीम के पेड़ पर सूरज निकलता था, उसी के आगे बराय देवी का मंदिर था।यहां पूजा करने अधिकांश स्त्रियां आती थीं।लोटे में मांज कर उसमें जल भर लेती थीं।ऊपर दो चार कनेर के पीले फूल डाल लेती थीं।एक के पीछे एक खेतों के बीच मेड़ पर पांति बांध कर गाती हुई जाती थीं।नरवा के किनारे देवी का मंदिर ऊंची कुर्सी देकर बनाया गया था।तीन चार सीढ़ी चढ़कर उसके चौड़े आंगन में पहुंचते थे।मंदिर के ऊपर का चूना बरसात और धूप सहते-सहते काला पड़ गया था।मंदिर के भीतर काले पत्थर की कुछ मूर्तियां रखीं थीं।कोई पुजारी नहीं था, स्त्रियां अपने आप देवियों पर जल चढ़ाकर पूजा करती थीं।मंदिर के पीछे गदा उठाए हनुमान जी की मूर्ति थी।सेंदुर लगाने से पूरी मूर्ति लाल बनी रहती थी।ब्याह होने पर दूल्हा-दुल्हिन गांठ जोड़कर देवी दर्शन को जरूर आते थे।

गांव के पश्चिम की तरफ कुछ दूर पर अल्वापन (अलोपा देवी) का मंदिर था।मंदिर के पास बड़ा ताल और बाग था।विशेष अवसरों पर यहां मेला लगता था।बहुत से मिठाई वाले दुकानें लगाते थे।मेले में मर्द काफी होते थे, मंदिर में पूजा करने अधिकतर स्त्रियाँ आती थीं।सूरज डूबते ही वहां से खुटिया, बताशा लेकर लौट पड़ती थीं।बागों से होती हुई अंधेरा होने से पहले घर पहुंच जाती थीं।आगे चलकर रामविलास जी ने गांव पर लिखी कविताओं के विषय इन्हीं मंदिरों, खेतों और देहात की रोजमर्रा की जिंदगी से उठाए।

बाबा बड़े साहित्यप्रेमी थे।उन्होंने अपने साथ साथ रामविलास जी को छह-सात साल की उम्र में सुखसागर और बाल-भागवत पढ़वा दिया था।वह जहां ठीक पढ़ते थे, उन्हें शाबाशी देते थे।जहां गलत पढ़ते थे, वहां टोकते न थे।थोड़े दिनों में रामविलास जी स्वतः समझने लगे थे कि क्या गलत है और क्या ठीक।चौथे-पांचवें दर्जे तक आते-आते रामविलास जी ने चनाजोरगरम से शुरू करके कवित्त-सवैये बनाने शुरू कर दिए थे।बाबा हनुमान जी के बड़े उपासक थे।कुछ भक्ति भाव से और कुछ बाबा के लिए रामविलास जी ने हनुमान जी पर एक-दो सवैये बना दिए थे।बाबा ने उन्हें याद कर लिया था और पूजा करते समय वे उन्हें पढ़ा करते थे।लोगों को सुनाते थे, देखो हमारे नाती ने बनाया है!

बरगदहाई रामविलास जी के बचपन का प्रिय त्योहार था।गर्मियों की छुट्टियों में पड़ने वाला यह बिरला त्योहार था जो वह गांव में मनाते थे।बाकी सब त्योहार झांसी में रहते समय पड़ते थे, लेकिन उन्हें मनाने में होली-दिवाली समेत उतना मजा नहीं आता था, क्योंकि बाबा और अम्मा दोनों गांव में होते थे।झांसी की कैद से छूटने पर, पढ़ने, इम्तिहान देने की चिंता न होने से त्योहार और भी सुख देता था।बाबा का त्योहार से विशेष संबंध न था, लेकिन अम्मा का था।सभी स्त्रिया बक्सों से चमकदार गोटे वाले लंहगे निकाल कर पहनतीं, गहनों से, खास तौर पर नाक में नथ डाल कर सजतीं, फिर गाती हुई गांव की सीमा पर नाले के पास एक बाग के पुराने बरगद के चारों ओर रंगीन धागे का फेटा बांधते हुए परिक्रमा करतीं और लौट आतीं।बच्चे लोग बेसब्री से इंतजार करने के बाद पहले ‘बरगद’ खाते और फिर पूरी कचौरियों पर टूट पड़ते।‘बरगद’ बड़े मीठे लगते और घर के घी में सिकी पूरी-कचौरियों का क्या कहना।उस दिन उन्हें सीताफल का साग भी अच्छा लगता।रामविलास जी ने उस बरगद और त्योहार पर एक कविता लिखी थी जो कलकत्ता की एक पत्रिका में छपी थी, लेकिन उसकी प्रति अब उपलब्ध नहीं है।

साहित्य अकादेमी द्वारा डॉ. रामविलास शर्मा को पुरस्कृत किए जाने के समय का चित्र।दाएं से बाएं-नामवर सिंह, विजय मोहन शर्मा (सुपुत्र), मुंशी जी, राम विलास शर्मा, बुद्ध देव शर्मा, रामविलास शर्मा जी की पुत्रियां और रामविलास शर्मा के बड़े भाई के पुत्र एवं पुत्री हैं।

बचपन में अपने गांव में बिताए दिन उन्हें सारी उम्र याद आते रहे।उन्हीं के शब्दों में, ‘मैं अपने गांव पर, अपने बाबा-दादी पर क्या लिखूं, सिर्फ आमों पर लिखूं तो पूरी किताब हो जाए।शायद ही हमारी ज़िंदगी में कोई दिन ऐसा बीता होगा जब हम गांव के आस-पास चक्कर न लगाते हों।हम जानते हैं, इस गांव में मच्छर नई राजामंडी से ज्यादा हैं, कुएं के पानी में कभी-कभी पतले महीन कीड़े दिख जाते हैं।वहां हम बचपन में बहुत बीमार पड़े थे और हमें बेहद कुनैन खिलाई गई थी।हम यह भी जानते हैं कि इस गांव में ऊंच-नीच का भेद इतना ज्यादा था कि छोटी जाति का बूढा बड़ी जाति के बच्चे को भी बाबा कहता था और जमींदार की बेगार करने वाले चर्मकार मुर्दा ढोर खाते थे।फिर भी हमारा मन इस गांव के चक्कर लगाया करता है, क्योंकि हमारा बचपन यहां बीता है।हमने सबसे पहले आंखें खोलकर वहां जो देखा और पहचाना, वह हमें अभी तक याद है।’

कुछ कविताओं में गांव के दृश्यों का वर्णन है।बचपन गांव के खेतों में बीता है।वह संपर्क कभी नहीं टूटा।इस समय भी खिड़की के बाहर खेत दिखाई दे रहे हैं, जिसमें कटी हुई ज्वार के ठूंठ ही रह गए हैं।सुनहली धूप में कबूतर दाने चुग रहे हैं और थोड़ी दूर पर नहर का पुल पार कर किसान सिर पर बाजार के सामान का गट्ठर रखे घर लौट रहे हैं।मैं साधारणतः छह घंटे काम करूं तो खेतों के बीच दस घंटे काम कर सकता हूँ।इन खेतों को प्यार करना किसी ने नहीं सिखाया।ये मेरे गांव के खेत भी नहीं है, गांव सैकड़ों मील दूर है।फिर भी हिंदुस्तान के जिस गांव पर भी सुनहली धूप पड़ती है, वह अपने गांव जैसा ही लगता है।19वीं सदी के रोमांटिक कवियों में मुझे फ्रांस के कवि इसलिए ज्यादा पसंद हैं कि उन्होंने इन खेतों को किसानों की तरह प्यार किया है।हिंदी के नए कवियों में मुझे केदारनाथ अग्रवाल भी इसीलिए ज्यादा पसंद हैं कि उनकी कविताओं में भदेसपन ज्यादा है।