कवि और समीक्षक. विद्यासागर विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर एवं प्रबुद्ध रंगकर्मी.

 

 

हिंदी आलोचना का काम आलोचकीय दृष्टि के भीतर संवेदना को बचाए रखने का है।आम तौर पर आलोचना की चर्चा करते ही गंभीर और बौद्धिक होने का दबाव बनने लगता है।हाल ही में प्रकाशित वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह की पुस्तक ‘जातीय अस्मिता के प्रश्न और जयशंकर प्रसाद’, दिवंगत कवि मंगलेश डबराल का गद्य संग्रह ‘सिर्फ यही थी मेरी उम्मीद’ और नाटककार देवेंद्र राज अंकुर की ‘रंगमंच की कहानी’ नामक आलोचनात्मक पुस्तकों से गुजरते हुए ऐसा लगा कि इनमें संवेदना, ज्ञान और मनुष्यता की त्रिवेणी है।बुनियादी रूप से लेखक की प्रतिबद्धता मनुष्य के लिए और उच्च परंपराओं के लिए है।ऐसे में कोई भी कृति जब मनुष्यता, इसकी परंपराओं और जातीय गौरवबोध के साथ भविष्य -निर्माण के प्रश्न से जुड़ जाता है तब वह अर्थपूर्ण हो जाती है।

 

जातीय अस्मिता के प्रश्नों के बीच कवि गद्यकार प्रसाद कैसे मनुष्यता, परंपराओं से संवाद और राष्ट्रीय जागरण की त्रयी को बचा पाए थे, इस पर लेखक विजय बहादुर सिंह ने विस्तार से लिखा है।यह चार खंडों में है।

हिंदी संसार ने जिस जातीयता का सदा वहन किया है, उस जातीयता के तत्वों को प्रसाद मानवता के रूप में देखते हैं।यही वजह है कि उनका काव्य भारतीय कविता की महान परंपरा का अंग है।वे जातीय चेतना के प्रश्नों को अपने नाटकों में भी पर्याप्त स्थान देते हैं।उनके यहां जातीयता मानवीय सामूहिकता का मामला है।वे भारतीय ज्ञान परंपरा और जीवन-दृष्टि को व्यापकता प्रदान करते हैं।विजय बहादुर सिंह लिखते हैं, ‘प्रसाद उन अतीतवादियों में भी नहीं हैं जो राष्ट्रवाद या उग्र भारतीयतावाद के नाम पर देश के आवाम को अतीत की अंधी गुफाओं की ओर ले जाना चाहते हैं।विपरीत इसके, वे उसी तर्कसंगत, ऊर्जास्पद अतीत की याद दिलाते हैं, जो आधुनिक भारत को शक्ति और तेज से युक्त कर सके।’

ऐसे में यह कहना गलत न होगा कि ऐतिहासिकता के बीच प्रसाद प्रगतिशीलता, मानवीय मूल्यों और जातीय अस्मिता इन तीनों को नया अर्थ प्रदान कर रहे थे।आगे चलकर वे विश्वबोध के साथ इन सबको कनेक्ट करते हुए सार्वभौमिकता की अवधारणा के प्रति भी अपनी आस्था प्रकट करते हैं।इस पुस्तक में इस ओर भी संकेत है, ‘प्रकट का आग्रह है कि हम अपनी ज्ञान-परंपरा और जीवन-धारा को अपनी दृष्टि से देखें।भारत क्या है, इसकी अस्मिता क्या है, विश्व-पटल पर यह साम्राज्यवादी सभ्यताओं से किस मायने में भिन्न है और क्यों इसकी यह विशिष्टता और विश्व-बोध बचाया जाना चाहिए, यह आज भी एक बड़ी लड़ाई है, जिसे छायावाद के प्रवर्तक कवि प्रसाद अपने समय में गांधी और रवींद्रनाथ के साथ और समानांतर लड़ रहे थे।’

इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण अध्याय है ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और प्रसाद’।हमें गहराई से समझना है कि भारत में औपनिवेशिक सत्ता को मजबूत और दीर्घायु बनाने के लिए अंग्रेजों ने जिस तरह भारतीयों का बौद्धिक उपनिवेशन करना प्रारंभ किया, वह कितना घातक एवं सम्मोहक था।औपनिवेशिक काल की तुलना में आज बहुराष्ट्रीय शक्तियां ज्यादा शक्तिशाली एवं घातक हैं।अंग्रेजों के समय उनके सहयोगी जमींदार थे और आज धर्म के ठेकेदार हैं।

विजय बहादुर सिंह ने प्रसाद को लेकर प्रचलित वैचारिक पूर्वग्रह एवं दुराग्रह को ध्वस्त किया है।वे लिखते हैं, ‘औपनिवेशिकता से प्रसाद की लड़ाई अधिक बुनियादी और गहरी है।वे पश्चिम के सांस्कृतिक हमलों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए लंबी-लंबी भूमिकाएं लिखते हैं… उनकी पहली मोर्चाबंदी साम्राज्यवादी इतिहास लेखन की इस धारणा के विरुद्ध है कि आर्य बाहर से आए थे।’ सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का पहला काम यह था कि वह हमारी पहचान और इतिहास को विकृत करता है ताकि हम थोपी गई पहचान को अपना लें।प्रसाद का यह कहना था, ‘यवन को दिया दया का ज्ञान/ चीन को मिली धर्म की दृष्टि/ किसी का हमने छीना नहीं/प्रकृति का रहा पालना यही।’ भेदभाव पैदा करने वाले साम्राज्यवादी सांस्कृतिक हमले के विरुद्ध प्रसाद सांस्कृतिक यथार्थ के साथ खड़े होते हैं।

विजय बहादुर सिंह छायावाद को सिर्फ दो दशकों का काल नहीं मानते, बल्कि उसे आधुनिक जीवन के विविध रूपों का आख्यान बताते हैं।उनकी दृष्टि में छायावाद भारतीयता की विशिष्टताओं से निर्मित जन्म कुंडली है।वे लिखते हैं, ‘जब हम छायावाद और उसकी कविता को लेकर सोचते हैं तो यह हमारी परम स्वाधीनता, आत्मबोध, सामूहिक जातीयता और सांस्कृतिक गौरवबोध का एक ऐसा कालांतरगामी देशज गान था, जिसकी चेतना का निर्माण राजा राममोहन राय, दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, उनके शिष्य विवेकानंद, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी के सामाजिक और सांस्कृतिक उद्यमों के संयुक्त सहयोग से संभव हुआ था।यानी पुनरुत्थानवाद, नवजागरण, पराधीनता विरोध और सांस्कृतिक नवजागरण की ताकतें ही इसे काव्य-परंपरा में प्रतिष्ठाजनक पहचान देती है।

लेखक यह मानता है कि प्रसाद की प्रकृति-चेतना विश्वबोध पर टिकी है।आज के पर्यावरण-संकट के समय प्रसाद की प्रकृति-चेतना हमें खुदगर्ज बनाने के बजाय प्रकृति-साहचर्य के लिए प्रेरित करती है।प्रसाद प्रकृति को जीवन, सभ्यता और वैश्विक सृष्टि के सौंदर्य से जोड़कर देखते हैं।विजय बहादुर सिंह लिखते हैं, ‘प्रसाद नामक कवि के काव्य-स्वप्नों में प्रकृति की यह सतत उपस्थिति केवल आलंकारिक जरूरत मात्र नहीं है।प्रसाद की प्रकृति-चेतना उनके इसी विश्व-बोध पर टिकी है।

आज जब दुनिया की आधी आबादी को समाज में पर्याप्त अधिकार, सम्मान और सामाजिक स्वीकार्यता मिलना बाकी है, हम प्रसाद की कृतियों में उपस्थित भारतीय स्त्री से बहुत कुछ ले सकते हैं।स्त्रियों की प्राचीन छवि पर भोग्या, अनुगामिनी, मूक नारी, माया-महाठगिनी, रूपसी आदि की परतें जम गई थीं।उनको साफ करना आसान नहीं था।ऐसे समय में प्रसाद श्रद्धा, इड़ा, मधूलिका, चंपा, देवसेना, अलका, मालविका, कमला आदि चरित्र गढ़ते हैं।उनमें आंसू भले हों पर वे आंसू में बिला नहीं जाती हैं, बल्कि चुनौतियों से टकराते हुए आत्म सत्ता बचाए रखती हैं।

लेखक ने पुस्तक में लिखा है, ‘स्त्री रूप की इतनी विपुल छवियां गढ़कर प्रसाद ने हमें अपनी स्त्री-संबंधी परंपराबद्ध रूढ़ दृष्टि पर पुनर्विचार करने का एक ऐतिहासिक अवसर-सा दे दिया है।प्रसाद की स्त्री उसी सामाजिक क्रांति वाली दृष्टि की उपज है।यह स्त्री यदि क्रांतिकारी जीवन की अनुगूंजों से भरी हुई है, तो आधुनिक जीवन की ऐतिहासिक प्रभावों से भी।युग जीवन की निर्मात्री तो वह है ही, भटकावग्रस्त भारतीय समाज को श्रेय-पथ पर ला खड़ा करनेवाली पथ-प्रदर्शिका भी है।पुरुष की सत्ता का विरोध वह नहीं करती, किंतु स्वयं अपनी सत्ता का उद्घोष करना अपना मूल अधिकार मानती है।और कर्तव्य भी।’

विजय बहादुर जी ने ‘शेर सिंह का शस्त्र समर्पण’ और पुनर्मूल्यांकन के जरिए नवजागरण के बृहत्तर अर्थ, प्रसाद की सांस्कृतिक एवं दार्शनिक समझ के विविध बिंदुओं, सिक्खों के इतिहास और ‘प्रलय की छाया’ कमला के जरिए प्रसाद के इतिहास-बोध और जीवन-बोध का विश्लेषण किया है।विजय बहादुर ने स्पष्टता से यह बताने का प्रयास किया है कि किस तरह प्रसाद का लेखन औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति की जमीन तैयार करता है।उनके मन में दयानंद, राममोहन राय, विवेकानंद, तिलक, गांधी आदि बैठे थे।उस पुस्तक में जातीय अस्मिता के संदर्भ में प्रसाद के लेखन एवं चिंतन पर महत्वपूर्ण सामग्री है।

जिज्ञासा: क्या राजनीति में गांधी और आधुनिक कविता में छायावाद भारतीय संस्कृति के लिए दुर्लभ उपहार हैं?

विजय बहादुर सिंह: गांधी 1915 में भारत लौटते हैं।छायावाद इसी के आसपास एक काव्यांदोलन के रूप में उदित होता है।मैथिलीशरण  गुप्त, ‘भारत भारती’ में हम कौन थे, का विधिवत जवाब देते हुए ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधारों को खोजने की पहल करते हैं।गांधी के ‘हिंद स्वराज’ के बाद ही प्रसाद और निराला की कविताएं, प्रसाद की कहानियां और नाटक छपते हैं।प्रसाद अपने नाटकों तथा काव्य और कला के निबंधों में जिस जातीय अस्मिता का उल्लेख करते और याद दिलाते हैं, आधुनिक भारत से उसकी कितनी बौद्धिक समीपता है, यह जानने की जरूरत है।असल सवाल औपनिवेशिक मानस से वैचारिक मुक्ति का है, जिसे गांधी और छायावादी कवि एक चुनौती के रूप में लेते हैं।मैंने इस संदर्भ में चिंतक धर्मपाल, किशन पटनायक, मुक्तिबोध आदि का उल्लेख किया है।

कुल मिलाकर पश्चिमी ज्ञानधारा और विश्वबोध के जवाब में भारतीय ज्ञान धारा और विश्वबोध को रखते हुए गांधी और छायावाद ने भारत के लोगों की विस्मृत अस्मिता को नई स्मृति और चेतना में बदल डाला।इस बारे में कवि निराला, ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लेखक दिनकर को भी देखा जा सकता है।

जिज्ञासा: आज प्रसाद का साहित्य हमारे युग के प्रश्नों, संकटों और विचलनों के बीच कहां खड़ा है?

विजय बहादुर सिंह: आज भी आधुनिक भारत(?) का बड़ा बौद्धिक वर्ग औपनिवेशिकता से मुक्त नहीं है।

जिज्ञासा: भारत पर सांस्कृतिक एकरूपता थोपने की कोशिश है।ऐसे में प्रसाद की साम्राज्यवाद-विरोधी दृष्टि से हम क्या प्रेरणा ले सकते हैं?

विजय बहादुर सिंह: प्रसाद अकेले साम्राज्य-विरोधी लेखक थोड़े ही हैं।भारतेंदु हैं, बालमुकुंद गुप्त हैं, गांधी हैं।हमें ग्लोबल होने से परहेज नहीं है, पर अपनी स्थानीयता गंवा कर कभी नहीं।हमारी देशीयता भी उसी वैश्विकता में हैं।बंगाल में कलकत्ता विश्वविद्यालय के बावजूद गुरुदेव रवींद्रनाथ ने विश्वभारती की कल्पना की थी और उसे साकार किया था।

जिज्ञासा: छायावाद को कल्पनाश्रित काव्य के रूप में देखा जाता रहा है।इस बारे में कुछ बतलाइए।

विजय बहादुर सिंह: कल्पना का अर्थ होता है यथार्थ की द्विगुणित विश्वसनीयता।हवा हवाई होना नहीं।इसके बगैर काव्य संभव ही नहीं है।काव्य यानी साहित्य मात्र, यानी -मनोरचना, मन:स्वप्न, यानी फंतासी।

छायावाद की कल्पना भारतीय समाज के अंत:सत्य का काव्यात्मक साक्षात्कार है।धर्म, दर्शन, इतिहास, लोकजीवन और भूली बिसरी क्रांतिकारी परंपराओं की पुनर्स्मृति और पुनर्रचना।

 

मंगलेश डबराल (1948-2020) के निधन के बाद छपी उनकी आलोचनात्मक पुस्तक ‘स़िर्फ यही थी मेरी उम्मीद’ हिंदी के पाठकों के लिए कविता को जानने-समझने की एक खिड़की है।वे कवि होने के साथ पत्रकार भी थे।उनकी यह आलोचनात्मक कृति काव्यात्मक संवेदना से जुड़ी है तो दूसरी ओर गद्य की शुष्कता से पाठकों को मुक्त करती है।इस पुस्तक में निबंध, व्याख्यान, अनुवाद, टिप्पणियां, डायरी आदि शामिल हैं।

‘सिर्फ यही थी मेरी उम्मीद’ को पढ़ना अपने समय की नाउम्मीदी के बरक्स उम्मीद को बचाने की गहरी बेचैनी से गुजरने जैसा है।कवि अपनी काव्य-संवेदना के साथ आदमीयत के पक्ष में खड़ा है, जिसका जिक्र इस पुस्तक की भूमिका में कवि अशोक वाजपेयी ने किया है, ‘लगातार नाउम्मीदी जगाने-परोसने वाले हमारे अभागे समय में उनकी चिंता एक तरफ मानवीयता बचाए रखने की थी तो दूसरी तरफ हमारे साधारण सामान्य जीवन में हर तरह से उम्मीद के हाशिए खोजने की।कोई भी सच्चा कवि स्वयं कविता से बहुत अधिक अपेक्षा नहीं करता, पर उसके शब्द बढ़ते अंधेरे की काली तख्ती और उम्मीद की वर्णमाला जरूर उकेरते हैं।मंगलेश का गद्य उनकी कविता में अंतर्भूत उम्मीद का ही विस्तार है।’

मंगलेश डबराल की इस पुस्तक में निराला, मुक्तिबोध, शमशेर, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, आलोक धन्वा, चंद्रकांत देवताले, विनोद कुमार शुक्ल, सुदीप बनर्जी, वीरेन डंगवाल से लेकर बांग्ला कवि नवारुण भट्टाचार्य, पहाड़ी कवि राजेंद्र शाह, काश्मीरी कवि रहमान राही, मराठी कवि चंद्रकांत पाटिल, उर्दू कवि फैज़ पर चर्चा विवेकपरकता, सहृदयता और विश्लेषणात्मक ढंग से है।इसमें हिंदी-उर्दू की सामासिकता, कविता में गांधी की उपस्थिति, कोरियाई कविता, संस्कृति-अपसंस्कृति, विकृति, फासीवाद, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आदि विषयों पर लेख हैं।

मुक्तिबोध और शमशेर के बारे में मंगलेश लिखते हैं कि उनमें शायद ऊपरी समानताएं बहुत कम हैं, लेकिन दोनों विवेक और मूल्यदृष्टि के बिंदुओं पर मिलते हैं।एक यातना का कवि है और दूसरा प्रेम का।

आज जब गांधी पर छद्म राष्ट्रवादियों का हमला बढ़ा है, मंगलेश डबराल ‘कविता में गांधी’ लेख के जरिए गांधी की प्रासंगिकता को सर्वकालिकता प्रदान करते हैं।गांधी पर आधारित कविताओं का मूल स्वर हिंसा, सांप्रदायिकता और मानवीय मूल्यों के ह्रास के बीच अहिंसा, सौहार्द और इनसानियत से जुड़ा है।मंगलेश डबराल एक गहरी उम्मीद को अपनी आलोचना की धीमी आंच पर देश-विदेश के कवियों और लेखकों का मूल्यांकन करते हुए बचाते हैं।

मंगलेश डबराल: मैं कविता लिखने का कोई तर्क या तार्किकता खोजता रहता हूँ, लेकिन मुझे कविता लिखने का पागलपन खोजना चाहिए।एक बुखार, एक तकलीफ, एक उन्माद।या फिर तार्किकता और पागलपन के बीच की कोई जगह।लेकिन शायद उसे खोजने में सारी उम्र बीत जाती है।कभी लगता है, हमारी तमाम कविता बहुत से तर्क, सावधान और वकीलाना बहसों से भर गई है और अपने प्रत्यक्ष शब्दों में सब कुछ प्रकट किए दे रही है।उसके भीतर ऐसा कुछ नहीं बचा है जो बाद में फिर कभी, कई वर्ष बाद व्यक्त होने के लिए बचा हो।उसके सारे रहस्य उसकी त्वचा पर, खुले में ला दिए गए हैं।उसे पढ़ते वक्त दिमाग पर बहुत जोर नहीं देना पड़ता, बल्कि उसे आराम ही मिलता है।वह हद दर्जे की एकरैखिक है।मुझे समेत।

 

रंगमंच एक लोकतांत्रिक कला है।इसके बारे में लंबे समय से बहुत कुछ कहा, पढ़ा और लिखा गया है।हाल में प्रसिद्ध नाटककार देवेंद्रराज अंकुर की ‘रंगमंच की कहानी’ पुस्तक प्रकाशित हुई है।इसमें रंगमंच के वैश्विक सफर का लेखा-जोखा प्रस्तुत है।यह कुल चार खंडों में है।लेखक ने आदिम रंगमंच के इतिहास और समय-समय के वैशिष्ट्यों को मानव जाति की उत्पत्ति के साथ जोड़ते हुए बताया है।

लेखक का मानना है, ‘बेशक रंगमंच की शुरुआत एक आदमी से हुई, लेकिन उसे एक सामूहिक कला बनने में देर न लगी।किसी एक दिन जब एक आदमी घेरे में घूम-घूमकर शिकारी के अनुभवों को साझा कर रहा था तो उसी क्षण एक दूसरा आदमी शिकार अथवा जानवर के रूप में उस अनुभव में कूद पड़ा।जाहिर है कि पहली बार किसी के अनुभव-क्षेत्र में कूदने की शुरुआत उसी अंतःप्रेरणा से संभव हुई होगी।’

आदिम रंगमंच की कहानी में वे शिकार के साथ युद्ध को भी जोड़ते हैं।इस संदर्भ में वे लिखते हैं,  ‘हम स्वयं तनिक निस्संग और तटस्थ होकर सोचें तो पाएंगे कि इसमें वह सबकुछ है जो आज हम नाटक में तलाश करते रहते हैं- एक सशक्त और जीवंत कहानी, उस कहानी को आगे लेकर चलने वाले श्रेष्ठ अभिनेता, एक प्रदर्शन-स्थल जो पहले एक घेरे के रूप में आया फिर घेरा टूटकर दो भागों में बंट गया, जैसा कि हम बाद में ग्रीक, रोमन, यहां तक की शेक्सपियर के रंगमंच में भी देखते हैं।प्रस्तुति के तकनीकी पक्ष से जुड़े तमाम तत्व-घेरे के बीचों-बीच जलती आग और ऊपर आसमान में चांद-रोशनी के नाम पर उससे ज्यादा नाटकीय और क्या हो सकता है।वेशभूषा के नाम पर चूना, मिट्टी से रंगे चेहरे और शायद जानवरों के सर मुखौटों के रूप में- और इन सबको देखने के लिए दिन भर के शिकार की थकान मिटाने और अपना मनोरंजन करने आया एक दर्शक वर्ग।’ लेखक ने आदिम युग में जिस रंगमंच की, रंग-परंपरा आदि की कल्पना की है, निश्चित तौर पर वे ही आगे चलकर रंगमंच की संभावना बनते हैं।

‘पूर्व का रंगमंच’ के अंतर्गत भारतीय शास्त्रीय रंगमंच, भारतीय लोक रंगमंच, भारतीय पारसी रंगमंच, भारतीय आधुनिक रंगमंच, चीनी रंगमंच और जापानी रंगमंच के इतिहास पर चर्चा है।नाटक के परंपरागत शिल्प के विविध प्रकारों, मंच-सज्जा सामग्री, प्रस्तुति के ढंग, गीत-संगीत, वाद्य-यंत्र के साथ नाट्यप्रस्तुति के दो प्रमुख अंगों-पूर्वरंग और प्रयोग आदि पर महत्वपूर्ण सूचनाएं शामिल हैं।

देवेंद्र राज अंकुर भारतीय लोक रंगमंच का समय एक हजार से सत्रहवीं शताब्दी तक मानते हैं।लोक रंगमंच मुख्यतः मौखिक साहित्य और श्रुति-परंपरा का अंग है।इस अध्याय में भारत की प्रमुख लोक नाट्य शैलियों- जम्मू व कश्मीर से भांड पाथेर, हिमाचल प्रदेश से करियाला, पंजाब से भांड-मिरासी, हरियाणा से स्वांग, उत्तर प्रदेश से रामलीला और नौटंकी, मध्यप्रदेश से माच, राजस्थान से ख्याल, छत्तीसगढ़ से पंडवानी, महाराष्ट्र से तमाशा, गुजरात से भवई, बंगाल से जात्रा, उड़ीसा से छऊ, तमिलनाडु से तेरुकुत्तू, कर्नाटक से यक्षगान, केरल से कुडियटृम, मणिपुर से लाई हरोबा और असम से अंकिया वाट आदि की चर्चा है।वे भारतीय लोक रंगमंच को पारंपरिक मानते हुए उसे ज्यादा स्वच्छंद, सार्वजनिक और लोकतांत्रिक बताते हैं।

लेखक ने पारसी थियेटर की शैली और नाटकों के विविध पक्षों पर तथ्यपरक विश्लेषणकिया है।पारसी नाट्य मंडलियों के सामने जब स्थायी प्रेक्षागृह नहीं होते थे, तब वे बड़े-बड़े मेलों में पहुंचकर तख्तों और टेंटों से अपना एक मंच बना लिया करती थीं।रंगमंच को पहली बार टिकट से जोड़ने का श्रेय पारसी थियेटर को जाता है।लेखक ने पारसी थियेटर के धर्मनिरपेक्ष रूप की चर्चा की है।

लेखक ने ‘भारतीय आधुनिक रंगमंच’ के अध्याय में शौकिया अ-व्यावसायिक रंगमंच की कलात्मकता, प्रयोगात्मक विकास एवं गुणवत्ता पर विस्तार से बात की है।भारत में इस तरह के रंगमंच की शुरुआत 1795 में कोलकाता में हुई थी।आगे चलकर यह महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश आदि से होता हुआ भारत के लगभग हर प्रदेश, हर नगर और हर कस्बे तक फैल गया।इसकी सबसे अच्छी बात यह थी कि पारसी रंगमंच की तरह यह किसी एक भाषा का न होकर विभिन्न जगहों की स्थानीय भाषाओं में खेला जाता था।भारतीय आधुनिक रंगमंच को भारतीय नवजागरण से जोड़कर देखना इस पुस्तक की उपलब्धि है, ‘यदि हम अपनी चर्चा को मात्र रंगमंच तक भी सीमित रखें तो भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, रवींद्रनाथ टैगोर, शिशिर कुमार भादुड़ी, गिरीश घोष आदि नाटककारों, अभिनेताओं, निर्देशकों एवं रंग-चिंतकों के योगदान को रेखांकित करना पड़ेगा, जिन्होंने हमारे देश में आधुनिक भारतीय रंगमंच की नींव रखी, पारसी थियेटर के समानांतर और उससे बिलकुल अलग एक ऐसे रंगमंच का सूत्रपात किया जो अपनी मूल प्रवृत्ति में प्रश्नवाचक रंगमंच है, सोच-विचार का रंगमंच है और कहीं यथास्थिति के अस्वीकार का भी रंगमंच है।’

भारतेंदु के साथ इप्टा, नवान्न, पृथ्वी थिएटर्स, केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, तीसरा रंगमंच शताब्दी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भारतेंदु नाट्य अकादमी, नाट्य केंद्र (इलाहाबाद), प्रयाग रंगमंच, बहुरूपी आदि संस्थाओं के योगदान और भूमिका का जिक्र लेखक की व्यापक नाट्य दृष्टि का परिचायक है। ‘चीनी रंगमंच’ और ‘जापानी रंगमंच’ में दोनों देशों में रंगमंच के विकास, प्रचार और नाटक की विविध शैलियों के बारे में लिखा गया है।

‘पश्चिम का रंगमंच’ इस पुस्तक का तीसरा महत्वपूर्ण खंड है।इस खंड के अंतर्गत पश्चिमी देशों के रंगमंच-इतिहास का -विशेष रूप से ग्रीक रंगमंच, रोमन रंगमंच, मध्यकालीन रंगमंच, रिनेसाँकालीन इतालवी रंगमंच, एलिजाबेथकालीन रंगमंच और उसके बाद, स्तानिस्लाव्स्की, ब्रेष्ट और एब्सर्ड (विसंगति) के रंगमंच पर प्रकाश डाला गया है।

पुस्तक का चौथा खंड ‘नेपथ्य का रंगमंच’ शीर्षक से है।इसके अंतर्गत अभिनय, प्रेक्षागृह, मंच-अभिकल्पना एवं दृश्यांकन एवं निर्देशन अध्यायों के जरिए नेपथ्य की गतिविधियों और भूमिकाओं को सामने लाने का प्रयास किया गया है।लेखक का मानना है कि रंगमंच के स्थायी और अस्थायी प्रेक्षागृह होते हैं।

देवेंद्र राज अंकुर की यह पुस्तक रंगमंच का इतिहास बताती है।इसे पढ़ते समय लगता है कि हम मानव-जीवन की कथा पढ़ रहे हैं।

जिज्ञासा: आपके रंगकर्म और लेखन पर विभिन्न पड़ावों का कितना प्रभाव पड़ा है?

देवेंद्र राज अंकुर: किताब में मैंने तीन पड़ावों का जिक्र किया है।2022 में रंगकर्म में मेरे 50 वर्ष पूरे हो गए।पहला पड़ाव परंपरागत कॉलेज शिक्षा से इतर कुछ अलग सीखने और पढ़ने से जुड़ा है।दूसरा पड़ाव उन पुस्तकों के अध्ययन के जरिए खुद को समृद्ध करने से जुड़ा है, जिन्हें मैंने एनएसडी में रहते हुए पढ़ा था।तीसरा पड़ाव राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पढ़ने-पढ़ाने तथा दूसरे संस्थानों में जाकर बोलने-सुनने से हासिल हुआ।तीनों पड़ाव मेरे जीवन में बेहद खास हैं।

जिज्ञासा: लोकतंत्र के पक्ष में रंगमंच की क्या भूमिका है?

देवेंद्र राज अंकुर: लोकतंत्र में रंगमंच का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वह हमें सिखाता है कि हम प्रतिरोध कर सकते हैं।अगर हम रंगमंच के पूरे इतिहास को उठाकर देखें तो रंगमंच का जो बेसिक ढांचा है, वह यह है कि रंगमंच कभी भी यथास्थिति को स्वीकार नहीं करता।प्रतिरोध ही रंगमंच की सबसे बड़ी शक्ति है।अगर एक स्वस्थ लोकतंत्र को आगे बढ़ना है तो उसमें इस बात की गुंजाइश हमेशा बनी रहनी चाहिए कि कोई प्रतिरोध कर सके।

जिज्ञासा: समकालीन रंगमंच में लोक रंगमंच की शैली के प्रयोग के बारे में आप क्या कहना चाहते हैं?

देवेंद्र राज अंकुर: हमारे यहां एक शास्त्रीय नाट्य परंपरा थी।मध्यकाल में लोकनाट्य परंपरा आई।आजादी के बाद 1970 के आसपास हमारे यहां के बड़े-बड़े रंगचिंतकों ने इस बात पर जोर दिया कि क्यों न हम ऐसे आधुनिक नाट्यलेखन की शुरुआत करें जो हमारी अपनी परंपराओं पर आधारित होते हुए भी वर्तमान अर्थवत्ता से जुड़ी हो।आज एक ओर घासीराम कोतवाल, बकरी, हयवदन, रस गंधर्व जैसे नाटकों का मंचन हो रहा है तो दूसरी ओर लोक रंगमंच आज भी अपने-अपने प्रदेश में चल रहा है।हम यक्षगान, नौटंकी, बंगाल में जातरा को देख सकते हैं।

जिज्ञासा: आपने एक जगह जिक्र किया है कि भारत में व्यावसायिक और शौकिया रंगमंच का उदय ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिबंध के कारण हुआ।कैसे?

देवेंद्र राज अंकुर: यह कोई दुविधा वाली बात नहीं है।जब यहां अंग्रेज पूरी तरह से स्थापित हो गए तो उनके मनोरंजन के लिए उनकी अपनी नाटक कंपनियां, डांस कंपनियां, म्यूजिक कंपनियां इंग्लैंड से आती थीं।यहां उसके प्रोड्यूसर होते थे।उस समय उनके नाटक भारतीय नहीं देख सकते थे।उनके प्रतिबंध के विरोध में यहां के लोगों ने अपनी तरह का शौकिया रंगमंच तैयार किया।उसी समय पारसी लोगों ने रंगमंच को मनोरंजन के साथ व्यवसाय से जोड़ना शुरू कर किया।शौकिया रंगमंच से जुड़े लोग दिन में किसी और काम में व्यस्त रहते थे।शाम को वे लोग मिलते थे।उन्होंने अपने किस्म का रंगमंच शुरू किया।बंगाल में इसके लिए ‘ग्रुप थिएटर्स’ शब्द चलता है।जीविका वाला एक अलग रंगमंच है, जैसे पारसी कंपनियां आज भी चलती हैं।आंध्र प्रदेश में सुरभि नाटक कंपनी है, असम में भव्यमान थियेटर है।

जिज्ञासा: क्या ओटीटी प्लेटफार्म रंगमंच के लिए अब एक चुनौती है?

देवेंद्र राज अंकुर: मैं पिछले 2-3 साल में ऑनलाइन क्लासेज की तरफ बहुत कम गया।दरअसल रंगमंच अपने आपमें एक जीवंत माध्यम है।ऐसे में फिल्म, टेलीविजन और ओटीटी उसका मुकाबला नहीं कर सकते।रंगमंच में अभिनेता सामने खड़ा रहता है।उसके सामने जीवंत दर्शक होता है।दोनों के बीच जो आपसी लेनदेन है, उसकी कल्पना हम ओटीटी में या फिल्म में, जो एक सशक्त माध्यम है या टेलीविजन में नहीं कर सकते।ऐसे कई दौर आए, जब लगा कि फिल्म या टीवी के आने से रंगमंच को खतरा है।पर हम देख सकते हैं कि आज भी लोग रंगमंच को पसंद करते हैं।

जिज्ञासा: आज रंगमंच महज थियेटर फेस्टिवल (रंग-महोत्सव) बनता जा रहा है।ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी अनुदान पर आयोजित होने वाले ऐसे महोत्सव  जनसाधारण के प्रश्नों को कहां तक उठा पा रहे हैं।

देवेंद्र राज अंकुर: यह जरूरी सवाल है।जब ये सारे अनुदान नहीं होते थे तब भी महोत्सव होते थे।संस्थाएं अपने संस्थागत प्रयासों से मिलजुलकर ऐसे महोत्सव करती थीं।उस समय  सबकी भागीदारी उसमें होती थी, जो आज बहुत घट गई है।आज आसानी से ग्रांट मिल रहा है।ऐसे में व्यवस्था को लेकर प्रखर तेवर नहीं दिखता है।इसके बावजूद, रंग महोत्सवों में कम ही सही, पर कुछ प्रस्तुतियां जनसाधारण के प्रश्नों को लेकर भी हो रही हैं।

समीक्षित पुस्तकें

(1) जातीय अस्मिता के प्रश्न और जयशंकर प्रसाद: विजय बहादुर सिंह। साहित्य भंडार, इलाहाबाद :2021 (2) सिर्फयही थी मेरी उम्मीद: मंगलेश डबराल, वाणी प्रकाशन, 2021 (3) रंगमंच की कहानी: देवेंद्र राज अंकुर, वाणी प्रकाशन, 2021

1, राम कमल रोड, पोस्ट-गरिफा, पिन-743166, उत्तर 24 परगना (प.बं.) मो.9331075884