(जन्म-1936) कोलकाता महानगर के साठोत्तरी साहित्यिक गतिविधियों के एक महत्वपूर्ण साक्षी। वरिष्ठतम कवियों में एक। संवादहीन नाटक चेहरों का जंगलसे चर्चित। कई कविता पुस्तकें प्रकाशित।

अंतिम युद्ध

अपनी मौत के लिए जिंदा बने रहने से
कहीं बेहतर है जिंदा रहने के लिए मर मिटना
इसलिए साथियो
अपने हाथों में लगी संगीनें फेंक दो
और खंदक के बाहर निकल आओ
क्योंकि अब दुश्मन और हमारे बीच का फासला
खत्म हो चुका है-
दुश्मन हमारे भीतर उतर चुका है
अब हमें बारूद की नहीं
एक पुख्ता वजूद की जरूरत है
इसलिए साथियो
तुम अपने दिमाग की खोल से
अपना सबसे मजबूत हथियार बाहर निकाल लो
और एक निर्णायक वार करो उस दुश्मन पर
जिसने हमारी भावभूमि के नीचे सुरंगें बिछा दी हैं
हमारी संवेदनाओं के भंडार में आग लगा दी है
हमारे आपसी रिश्तों के पुलों को
ध्वस्त कर दिया है
तथा हमारी शिराओं को
उस केंद्रीय कंप्यूटर से जोड़ दिया है
जिसमें हमारे चरित्र का
मनचाहा प्रोग्राम फीड किया जाता है
यही वजह है साथियों
हमारी भूख हमारी चोरी में
हमारी ईमानदारी हमारे फरेब में
और देश के प्रति हमारी बफादारी
हमारी गद्दारी में बदल जाती है!

आग

यहां तो एक आग
हर वक्त लगी रहती है
एक आग बीमा निगम के पैसों से
लोगों की जेबें भर जाती है
तथा दूसरी आग
नगर विकास के नाम पर
बस्ती के लोगों को
घर से बेघर कर जाती है
मुनिया मलवे में
अपनी गुड़िया के लिए तरसती है
बीवी अमवार में अपना चुटीला तलाशती
और खाविंद अपने टूटे बक्स
और फटे छाते के साथ
अपने नियोजित परिवार को लेकर
उस दिशा की ओर चला जाता है
जिस दिशा से वह कभी यहां आया होता है
यह दिशा आदमी को कहां से लाती है
और कहां ले जाती है कोई नहीं जानता।
(‘आजादी का हलफनामा’ लंबी कविता का अंश)

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