वरिष्ठ कवि, लेखक। संप्रति महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में अध्यापन।

करुणा

1.
युद्ध की शिला पर बैठ
रक्त के फव्वारे कौन देख रहा है
शव यात्राओं में यह उल्लास कैसा है
जहां लालसाओं के मृदंग बजाए जाते हैं
धूर्तताओं ने कैसे चमकीले वस्त्र पहन रखे हैं
जिनकी जेब में युद्ध का प्रस्ताव है
कच्चे और मैले विचारों का
यह शोर कैसा है
जहां वंचनाएं मुस्कराती हैं
अहंकार की जमीन पर
यह शापित भवन किसका है
जहां बारिश रोती है
क्षणभंगुर आनंद के लिए
विनाश के खेल किसने रचे
जहां विधवाएं विलाप करती हैं
और बच्चे चीखते हैं?

2.
उल्कापिंड की बिखरती चिंगारियों में
यह किसका चेहरा टूट रहा है
प्रेतात्माओं के बोझिल छंद में
यह कौन सुर साध रहा है
ग्रहों ने अपने रास्ते क्यों बदल लिए हैं
जहां अपराधी पलते हैं
वह सराय किसका है
सवालों को कारावासों में
क्यों बंद कर दिया गया है?

3.
सवालों के सीमांत पर
देर तक खड़ा लकड़हारे के पास जाता हूँ
चुनता हूँ साथ में लकड़ियाँ
चूल्हे की आग में पाता हूँ करुणा
करुणा ही बचाएगी धरती।

संपर्क: एसोसिएट प्रोफेसर, पोस्ट – हिंदी विश्वविद्यालय,  गांधी हिल्स, वर्धा-442001 महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा मो.9422905755