रचनात्मकता को रोका नहीं जा सकता

कपिला वात्स्यायन (1928-2020) का विगत सितंबर माह में निधन हो गया। वे वैश्विक स्तर पर प्रख्यात कला-विदुषी थीं। पद्म विभूषण से सम्मानित। वे कला-प्रदर्शनियों में सिद्धहस्त थीं और मानविकी तथा कला के क्षेत्र में बहु-अनुशासनात्मक स्तर पर संवाद करने में कुशल थीं। उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की अकादमिक निदेशक की हैसियत से कार्य करते हुए कई अद्भुत अवधारणात्मक परियोजनाओं का निर्माण किया था। जयदेव के गीत गोविंद का उनके द्वारा हिंदी अनुवाद का प्रकाशन भारतीय भाषा परिषद ने किया था। प्रस्तुत है सुरेश कोहली द्वारा (1997 में) उनसे किए गए साक्षात्कार के अंग्रेजी से अनुदित अंश :

लेखक, भाषाविद और अनुवादक

प्रश्नआपने पिछले पाँच दशकों में भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य को किस रूप में देखा है?

कपिला वात्स्यायन – एक बहुत ही आसान-सा प्रश्न, किंतु बहुत कठिन। पचास वर्षों के समय को हम क्रमिक रूप से देख सकते हैं, फिर भी उनका मूल्यांकन करना बहुत ही कठिन है, क्योंकि जब हम किसी प्रवाह की बात करते हैं तो भारतीय परंपराओं की दृष्टि से उनकी निरंतरता या विच्छिन्नता की बात पैदा होती है। मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि परंपरा तथा संस्कृति के बीच एक बड़ा फर्क है। दोनों ही शब्द समस्या पैदा करने वाले हैं। लोग इसे एक गतिहीन धारणा के रूप में व्याख्यायित करना चाहते हैं। वे संस्कृति को एक ऐसी चीज मानते हैं जो साहित्यिक और अभिनयात्मक और दृश्य कलाओं में कलात्मक अभिव्यक्ति के समान होती होती है। किंतु दर्शकों के लिए परंपरा का अर्थ यह नहीं है। भारतीय संदर्भ में परंपरा का अर्थ है निरंतर गतिमान रहने वाली चीज, जिसमें एक संप्रेषण होता रहता है। दूसरी ओर, संस्कृति केवल कला का विषय नहीं है, यद्यपि वह कई बार कला की जगह व्यवहृत होती है। संस्कृति का अर्थ है जीवन जीने की पद्धति, जीवन की प्रथाएँ, भौतिक जीवन की स्थिति। संस्कृति मनुष्य के जीवन से गहरा संबंध रखती है, और उससे जीवन मूल्यों का निर्माण होता है।

प्रश्नक्या आप जीवन मूल्यों पर थोड़ा प्रकाश डालेंगी, क्योंकि पारंपरिक दृष्टि से इनमें लगातार गिरावट आई है।

कपिला वात्स्यायन – निश्चित रूप से हमें इसके लिए पिछले पचास वर्षों को ध्यान में रखना पड़ेगा, और देखना होगा कि परंपराओं के साथ क्या हुआ है और जीवनमूल्यों में आने वाले बदलावों के संदर्भ में हमारी क्या भूमिका रही है।

जहाँ तक भारतीय मानस का संबंध है 1947 में थोड़ी देर के लिए एक स्थिरता आ गई थी। क्योंकि उसके एक दशक पहले सांस्कृतिक चेतना अपनी सर्वोच्च स्थिति में थी। बल्कि मैं उसे तीसरे दशक में ही देख रही हूँ। यह वह समय था जब एक संपूर्ण आलोड़न पैदा हुआ था। यह उस नवजागरण की तरह नहीं था, जैसा राजा राममोहन राय के समय हुआ था। 1947 तक आतेआते वैचारिक स्थितियों में स्पष्टता आ गई थी। विभिन्न स्तरों पर प्रश्न उठने लगे थे।

जब हम 1947 से 1997 के बीच की भारतीय या राष्ट्रीय चेतना पर विचार करते हैं तो हमें उन बहुत सारे परिवर्तनों से गुजरना होता है, जो इस बीच घट चुके थे। इसमें एक गर्व का बोध हो सकता है, हालांकि मुझे नहीं लगता कि हमने वैसा कुछ पा लिया था।

प्रश्नजब आप मूल्य-पद्धति पर बात करती हैं और तीसरे और चौथे दशक की स्थितियों तथा पांचवें दशक के उस प्रारंभिक काल तक की चर्चा करती हैं, जब एक प्रकार का सांस्कृतिक संस्थागत स्वभाव निर्मित करने की चर्चा हो रही थी, तब क्या आपको लगता है कि वे सही दिशा में बढ़ रहे थे, भले उद्देश्य महान रहे हों?

कपिला वात्स्यायन – बहुत जटिल प्रश्न है। मैं समझती हूँ कि उनका आशय अच्छा था। क्योंकि यह महसूस किया जा रहा था कि स्वतंत्रता का समय, वह समय भी था जब राज्य का हस्तक्षेप एक तरह से नहीं हो रहा था। आपके समक्ष बड़े-बड़े नेता थे। वे सभी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हुए भी थे। लेकिन जहाँ तक

मैं समझती हूँ, संस्थागत ढांचे के निर्माण के लिए की जाने वाली पहल में एक असंगति थी। दूसरे शब्दों में, आदर्शों तथा साधनों के बीच मेल नहीं था, जो उन आदर्शों एवं लक्ष्यों को पाने के लिए जरूरी था।

रचनात्मकता को रोका नहीं जा सकता। संस्थागत ढांचे की दृष्टि से रोका जाना भी नहीं चाहिए। संस्थाओं को एक बिलकुल दूसरे प्रयोजन से निर्मित किया गया था। गहराई से देखें तो इसने सांस्कृतिक या रचनात्मक संवाद का काफी प्रसार किया, किंतु वे अपनी प्रकृति के अनुरूप नहीं थीं।

प्रश्न क्या आप यह कहना चाहती हैं कि इन संस्थानों का निर्माण सुचिंतित सांस्कृतिक नीति को ध्यान में रखे बिना ही किया गया?

कपिला वात्स्यायन – मैं समझती हूँ कि संस्थाओं का निर्माण राष्ट्रीय पहचान और गर्वबोध के परिणामस्वरूप किया गया। संस्थापकों ने यह महसूस किया कि ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ काम करना जरूरी है। उनके रचनात्मक प्रयासों को महत्व दिया जाना चाहिए, किंतु प्राप्त करने की पद्धति क्या होगी, इस संबंध में उनकी दृष्टि बहुत साफ नहीं थी। जहाँ तक राष्ट्रीय नीति का प्रश्न है, वह राष्ट्र द्वारा ही बनाई जा सकती है और ऐसी स्थिति में यह सवाल उठता है कि क्या राष्ट्र की वास्तव में कोई सांस्कृतिक नीति होनी चाहिए।

प्रश्न आपकी दृष्टि में 15 अगस्त 1947 का क्या महत्व है?

कपिला वात्स्यायन – वह राजनीतिक स्वातंत्र्य-चेतना का एक महान क्षण था। मुझे याद है कि मैं उस दिन आधी रात में कनॉट प्लेस से दौड़ती हुई सेंट्रल हॉल पहुँची थी ताकि उस समय दिए जाने वाले महत्वपूर्ण भाषण पर तालियाँ बजा सकूँ। इस तथ्य के बावजूद मैं यह भी बता दूँ राजनीतिक स्वतंत्रता का क्षण विभाजन का क्षण भी था। मैं दोनों के बीच कोई भेद नहीं कर पा रही थी, क्योंकि जहाँ देश में खुशियाँ मनाई जा रही थीं, वहीं विभाजन का दर्द भी झेला जा रहा था, जो हमारी आँखों के सामने घटित हुआ था। हम अपने कंधों पर धर्मनिरपेक्षता का बोझ उठाए बिना धर्मनिरपेक्ष थे। बहुत घटनाएँ घटी थीं, जिन्हें यहाँ बताने का अवकाश नहीं है। किंतु हमें जिन चीजों का ध्यान रखना है वह यह कि

भारत एक जीवंत देश है, जिसकी समृद्ध संस्कृति है, किंतु उसे पहले बिलकुल तिरस्कृत कर दिया गया था, और अब उसे फिर से अपनाया जा रहा है। इसका अर्थ है कि हमने उसे उजागर कर दिया है। किंतु क्या हमने अंतर्संबंधों को ध्यान में रख कर ऐसा किया है?

मैं अंतर्संबंध शब्द का प्रयोग कर रही हूँ। यह अंतर्संबंध संस्कृति और विकास के बीच है। हमने कला को उसके सांस्कृतिक धागे से विच्छिन्न कर दिया है। हम उसे स्टेज पर ले गए हैं।

संस्कृति का अधिकांश भाग दैनंदिन जीवन का अंग है और जब हम उत्पादों के रूप में इसकी सराहना करते हैं तो क्या हमने यह ध्यान दिया है कि जीवन पद्धतियों में क्या बदलाव आया है? हम वस्तुतः उन्हें यह कहते हैं कि वे हमारे जैसा बनें। हमने न्यूनतम आम मानक पर एक संवेदनशीलता पैदा की है। हाँ, हमारी एक महानगरीय संस्कृति है, एक सर्वदेशीय संस्कृति है, हम अद्भुत हैं, हम संसार से संवाद कर सकते हैं, एक दूसरे के साथ भी कर सकते हैं … पर और क्या?

प्रश्नआपको क्या लगता है कि इस संदर्भ में और अन्य संदर्भों में भी भारत के उत्सवों ने विदेशों में क्या कोई उपलब्धि हासिल की है?

कपिला वात्स्यायन – एक स्तर पर हाँ। इससे कुछ हो सकता है और तात्कालिक प्रभाव से कुछ खास घटित हो सकता है। किंतु मैं थोड़े उलझन में पड़ जाती हूँ जब आप संस्कृति को पैकेज के रूप में प्रस्तुत करते हैं। आपके आकलन के अनुसार आपका सर उस समय गर्वोन्नत हो उठता है जब दूसरे आपको सम्मान देते हैं। यह भाव भी पैदा होता है कि इन उत्सवों के माध्यम से आप एक प्रभाव छोड़ेंगे और ऐसे अनेक लोगों को अपनी कला के साथ विदेश जाने का अवसर प्रदान करेंगे, जो पहले कभी नहीं जा सके हैं और आप भारतीय कलाओं को एक हस्तकला के रूप में स्थापित करेंगे, जिसके मूल्य का निर्धारण आप निर्यात के माध्यम से करते रहे हैं। पर आप स्वाभाविक रूप से उसके मूल्य का निर्धारण नहीं कर रहे हैं। आप विपणन की बात कर रहे हैं। हालांकि इस प्रक्रिया का एक सकारात्मक पहलू भी है। भारतीय कलाओं के ग्राहकों या दर्शकों की संख्या बढ़ी है।

प्रश्नइलेक्ट्रोनिक मीडिया के विकास और उसकी संभावना को देखते हुए आपको क्या लगता है कि इसका उपयोग भारतीय कला और संस्कृति की परंपराओं में कम से कम बुनियादी जागरूकता पैदा करने के लिए किया जा सकता है?

कपिला वात्स्यायन – यह दुधारी तलवार है। मैं समझती हूँ कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया की संभावनाएँ बहुत अधिक हैं। हममें से कुछ लोग जो किराये के लेखक हैं या पुस्तकें लिखते हैं वे कभी-कभी इसके माध्यम से स्वयं को प्रकट करना चाहेंगे, क्योंकि

हमारे अधिकांश सैद्धांतिक विचार, जो पुस्तकों में क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत होते हैं, वे उनमें उतनी अच्छी तरह से नहीं कहे जा सकते, जितनी अच्छी तरह से इलेक्ट्रोनिक मीडिया के फार्मेट में कहे जा सकते हैं, भले वह मल्टीमीडिया हो या फिल्माया गया वीडियो कार्यक्रम हो।

यही वह जगह है जहाँ आपको मूल्यबोध पर खास ध्यान देना होगा। क्योंकि वहाँ विज्ञापन होगा, जिसका सामना इस देश को करना पड़ता है। एक शिक्षाविद होने के नाते मुझे लगता है उस ‘ब्रेक’ का हस्तक्षेप किसी भी संचार के नियम के विरुद्ध है। आप संवेदनशीलता की हत्या कर देते हैं और जन अपील के नाम पर अरुचि पैदा करते हैं। मुझे लगता है कि यह एक ऐसा मामला है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यदि स्वतंत्रता का अर्थ संचार के नियमों की कैद में रहना है तो मुझे ऐसी स्वतंत्रता नहीं चाहिए।

परंतु यह सच है कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया एक ऐसा माध्यम है जिससे लोग बहुत बड़े महत्व की चीजें देख सकते हैं और लोगों ने देखा भी है। इसका उपयोग शिक्षा के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में भी किया जा सकता है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि प्रौद्योगिकी को फेंक दिया जाए, बल्कि उसका उपयोग कैसे किया जाए, यह ध्यान रखना है। आप कार का उपयोग कहीं जाने के लिए कर सकते हैं और उस कार से आप किसी को कुचल भी सकते हैं।

 

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