वरिष्ठ कवयित्री और लेखिका। ‘समय के शहर में’, ‘बीजाक्षर’, ‘अनुष्टुप’, ‘कविता में औरत’, ‘खुरदरी हथेलियाँ’, ‘दूब-धान’ आदि कविता-संग्रह। ‘पर कौन सुनेगा’, ‘मन कृष्ण मन अर्जुन’, ‘अवांतर कथा’, ‘दस द्वारे का पिंजरा’ और ‘तिनका तिनके के पास’ उपन्यास। अद्यतन पुस्तक – ‘आईना साज’। स्त्री-विमर्श में महत्वपूर्ण योगदान।

नीला कॉर्नफ्लावर : यह नाम चेतना में अचानक खिला जैसे बांछें खिलती हैं। ‘एमेज़ॉन’ वेबसाइट पर कोई और ही किताब ढूंढ़ रही थी कि ‘एमेज़ॉन’ के जंगलों से उड़ता हुआ यह पौधा आया और उसने उंगली पकड़ ली। उंगली पकड़ने की यह घटना एक बार पहले भी मेरे साथ घट चुकी है। सरोजिनी नगर के दीवाली मेले में एक साल विस्फोट हुआ था। विस्फोट के ठीक बाद की भगदड़ में कोई बच्चा अपनी मां से बिछड़ गया होगा। अकबकाहट में उसने मेरा आंचल पकड़कर झटका। बच्चा इतना छोटा था कि ठीक से बोल नहीं पा रहा था। उस आपातकाल में और कुछ सूझा नहीं तो मैं उसे गोदी उठा कर दौड़ गई – जिस दिशा में दौड़ सकती थी, दौड़ी, रुक-रुककर और गिरती-पड़ती। हाथ में मेरे पटाखे-फुलझड़िया थीं- जो मैंने अपने बच्चों के लिए ली थीं- सब कहीं रास्ते में छूट गईं। बदहवास दौड़ना क्या होता है, उसी रोज जाना। उन दिनों मोबाइल भी चलन में नहीं आया था, कम-से-कम मेरे पास नहीं था। पुलिस बूथ पर बहुत भीड़-भाड़ थी – घर थोड़ा दूर था। दोनों के बीच कहीं एक किऑस्क था, वहां बरगद की छांव थी। दम धरने को हम वहीं रुके। वहीं से घर फोन किया। घरवाले तब तक मेरी तरफ निकल चुके थे, गनीमत थी।

जितनी देर वह बच्चा हमारे पास रहा, हमने उसकी तोतली जबान के सूत्र पकड़ने की कोशिश की कि कुछ तो पता-ठिकाना मिले….. हार – थककर वहीं पुलिस स्टेशन छोड़ आए उसे। अपने घरवालों से अगले दिन मिला वह, वह भी सिर्फ पिता से। मां वहीं जो घायल हुई तो बम से ज्यादा बच्चे से बिछड़ना उसकी जान ले गया।

वह उस समय का अनुभव और यह इस समय ‘नीला कॉर्नफ्लावर’ के अचानक कौंध जाने का : एक जैसे ही हैं मेरे लिए। उंगली पकड़कर, आंचल झटककर मुझे यह ‘नीला कॉर्नफ्लावर’ कहां से कहां ले गया। ले गया मुझे एक अनंत सफर पर, ऐमेज़ॉन के जंगलों तक, एल पर्वतों से घिरे मार्टिन के गांव तक जहां कुल बयालीस परिवार रहते थे-

‘गांव के चारों ओर कंघी की तीलियों की तरह सीधे खड़े पौधों की कतारें थीं, जिनसे हवा इस तरह अंदर प्रवेश करती थी, जैसे बालों में कोई उंगलियां फेर रहा हो। कतार में सीधे खड़े इन पेड़ों की ओर से जब भी हवा गांव में आती थी, एक खास प्रकार का संगीत बजता था’।

‘भेड़ के बालों से बुनी गई लंबी पोशाकों में वहां के पुरुष, जिनका कद अच्छा-खासा ऊंचा था और जो लोमड़ी के फर से बनाई गई टोपी पहनते थे, जब भी बोलते तो हमेशा उनके मुंह से किसी वोदका की सुगंध और भाप निकलती थी।’

‘गांव की महिलाओं की सुंदरता अद्वितीय थीं। लंबा कद, गुलाबी त्वचा पर सिर पर बंधे स्टॉल से लटें कनपटी से होती हुई गर्दन पर बिखरी रहतीं मानो आर्किट के फूल पर बोलोरिया तितली बैठी हो।’

‘गांव का नाम वहां की दंतकथा के नायक के बोलोव के नाम पर रखा गया था- बोलोव।… बोलोव शिकारी का बेटा था, लेकिन शिकार में बहुत निम्न दर्जे का।… जीवों के प्रति उसके स्नेह से उसके पिता सदैव चिंतित रहते कि उसका जीवों से इसी प्रकार लगाव बना रहेगा तो वह कुशल शिकारी कैसे बन पाएगा।’

दंतकथा में गहरी डुबकियां लगवाने के बाद मुझे वह ‘नीला कॉर्नफ्लावर’ ले गया मार्टिन के बचपन तक, मार्टिन जो हमारा कथानायक है :

‘मार्टिन की नानी भिथारु ग्लेशियर से मॉस लाकर, उसका तेल निकाल, स्नेह से मार्टिन के बालों में लगाती हुई बताती थीं कि वाइकिन्स  ने जब उनके देवता को ग्लेशियर पर जाने को विवश कर दिया था, तब जहां-जहां देवता के आंसू गिरे थे, वहां की मॉस ने आंसुओं को सोख लिया था। तेल उनके देवता की पीड़ा और आशीर्वाद है, जो सोमेत्र को उसके अतीत से जोड़े हुए था।’

मार्टिन के पिता फूलों का व्यापार करते थे। गांव के किसानों से फूल खरीद उन्हें सोमेत्र की राजधानी एइस्ट्रॉन भेजते थे जहां से बाकी की दुनिया में उनका निर्यात होता था। पूरब-पश्चिम दोनों से आए लुटेरों से परेशान उनकी पत्नी ने एक रोज कहा, कॉर्नफ्लावर की नीली कलियों का गुच्छा बनाते हुए कहा- ‘क्यों न हम सबकुछ बेचकर किसी दूसरे देश में बस जाएं?’

मार्टिन के पिता ने मोटे चमड़े के दस्ताने से दाहिना हाथ निकालकर, ओक के गिलास में देसी वोदका उड़ेलते हुए अपनी पत्नी से पूछा – ‘कहां जाओगी?…जिसके नसीब में अपने देश में सुकून नहीं, उसे पूरी दुनिया में कहीं ठिकाना नहीं!’

उसके बाद ‘नीला कॉर्नफ्लावर’ मेरी उंगली पकड़कर मुझे ले गया नीदरलैंड जहां मार्टिन के पिता के परिचित एक बड़े ग्राहक ने मार्टिन की फेलोशिप का इंतजाम कर उसका दाखिला ग्रेनिंग विश्वविद्यालय में करवा दिया था। शुरू में उसे डच भाषा नहीं जानने से बहुत परेशानी हुई, फिर उसे मिली लक्ष्मी- भारतीय मूल की सांवली युवती जो विश्वविद्यालय में उसके साथ थी पर खाली समय में फुटपाथ पर फूलों की एक दुकान भी चलाती थी। उसी दुकान पर उसे गुच्छों में सच्चे नीले कॉर्नफ्लावर दुबारा मिले। वे फूल उसे लक्ष्मी के भीतर के गहनतम आकाश से जोड़ने का सहज माध्यम बन गए-

‘वे फूल दुनिया की सबसे खूबसूरत आंखों से भी अधिक नीले थे। …उनमें उसकी मां की उंगलियों की छाप एवं पिता का पसीना था। उनमें बोलोवो का आसमान, पहाड़ और ओस थी। उन फूलों में उसके गांव के घरों से शाम को निकलने वाले धुएं की महक थी।’

‘डच हमें माना नहीं गया, कैरेबियन हम हो नहीं पाए और भारतीय हम रहे नहीं’ – कहती है लक्ष्मी… और उसकी बाहों का सांवला रंग उसके जिस्म से उतरकर रात में परिवर्तित हो जाता है।

दोनों ही अपने मूल से विच्छिन्न हैं, लेकिन जहां वह अपने मूल से दूर भाग रहा है, वहीं लक्ष्मी अपने मूल में लौटना चाहती है।

लक्ष्मी से जीवन के कुछ सूत्र पाकर मार्टिन मुड़ता है प्रोफेसर टिम से-

‘हल्की धूप थी और वातावरण में शांति। उनके टेबल के बगल वाले टेबल पर एक युगल दिन भर का अपना क्रियाकलाप एक-दूसरे से साझा कर रहा था। वहीं से कुछ दूरी पर कुछ युवक खड़े-खड़े ही कॉफी पी रहे थे और फुटबॉल के टूर्नामेंट पर चर्चा कर रहे थे। कुछ देर की खामोशी के बाद प्रोफेसर टिम ने मार्टिन से कहा-

‘यह जो जगह है, जहां इस समय तुम बैठे हो! यहां जो लोग हैं, उनके क्रियाकलाप, उनकी  छोटी-से-छोटी बातें या उनका चुप रहना, ये सभी क्रियाएं शब्दों के समान हैं, और इनके द्वारा तुम इस समय, इस स्थान के, इस समाज को पढ़ सकते हो। तुम्हारी नानी को इस कला में विशेषज्ञता प्राप्त है, तुम्हें भी हो।’

इस तरह और भी कई स्थानों पर आदिवासी समाज को वैकल्पिक ज्ञान-संज्ञान के आकर-स्रोत की तरह रेखांकित किया जाता है। यहां  यह मूल दर्शन पग-पग पर उजागर होता है कि हर व्यक्ति, हर समुदाय के पास सीखने और सिखाने को कुछ है ही तो फिर कोई किसी से कमतर कैसे हुआ?

उपन्यास के बाद के हिस्से में भी इसी धरातल के कई जीवंत वर्णन हैं :

लैटिन अमेरिकन एस्पीडिशन दल का सदस्य बनकर मार्टिन एमेज़ॉन वर्षावन में बसे ‘हीहो’ आदिवासी समूह का अध्ययन करता है, तब के कई वर्णन बहुत जीवंत हैं। वहां से लौटकर जब वह घर जाता है और वहां की तबाहियां देखता है, तब के वर्णन ‘लार्जन दैन लाइफ’ और  एपिफेनिक इन विराट अनुभवों के बाद वह ‘तुआ’ आदिवासियों के निरपेक्ष अध्ययन के लिए निकल पड़ता है, जहां उसे कुछ और अतींद्रिय अनुभव होते हैं जिन्हें जादुई यथार्थवाद के उत्तल दर्पण में पढ़ा जाना चाहिए।

ये तीन यात्राएं उसकी अंतर्यात्रा का महाप्रयोजन सिद्ध होती हैं, पर चरम वहां है जहां नायाब शोध के नतीजे वह एक बड़ी अतींद्रिय अनुभूति, एक विराट एपिफनी से रू-ब-रू होकर जला ही डालता है। नहीं चाहिए उसे यश-कीर्ति। नहीं चाहिए पैसा। नहीं चाहिए ऐसा ज्ञान जो विकास के नाम पर विनाश के बीज बोने वाली पूंजीवादी ताकतों के हाथ मजबूत करें, इन जनजातियों और इनके विलक्षण जंगलों के अंतरंग सूत्र उसकी ही फील्ड-रपट से पाकर उनके आर्थिक दोहन का नया मानचित्र तैयार करें।

यह एक बड़ा निर्णय है जहां एक विराट सत्य मार्टिन के साथ-साथ हम पाठकों के जीवन में भी  ऊर्ध्वबाहु संकल्प की पावनता से प्रवेश करता है। जिन तथ्यों के आलोक में हम इस विराट सत्य का अवगाहन कर सकते हैं- एक झलक उनकी भी लेते चलें तो उपन्यास अधिक प्रासंगिक जान पड़ेगा। जहां तक मैं समझती हूँ, इन तथ्यों के आकर स्रोतों की आहट हमको मिल सकती है इन कुछ शोध-पत्रों में : नैल फरगुसन का ‘द असेंट ऑफ मनी : अ फाइनैनशियल हिस्टरी ऑफ द वर्ल्ड (2009), जेफ टॉलेसन का ब्राजील्स फाइट टु सेव एमेज़ॉन ऐंड क्लाइमेट चेंज डिप्लोमेसी, फॉरेन अफेयर्स, मार्च/अप्रैल, 2013 तथा डेविड ई टुहे का ‘इंडियंस पीपुल्स’, एनवायेरमेंटल ग्रुप्स, नेटवर्कस एंड पॉलिकल इकोनॉमी ऑफ  रेनफॉरेस्ट डिस्ट्रक्शन इन ब्राज़ील’, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ पीस स्टडीज, समर, 2012, वोल्यूम 17, नंबर1)

ब्राजील दुनिया का एकमात्र भूखंड है जिसके आदिवासी समूहों ने दुनिया भर के आदिवासी समूहों से नेटवर्किंग की और एक महामोर्चा बनाया आर्थिक उपनिवेशिकों के खिलाफ। वहीं के पढ़े-लिखे (मार्टिन – जैसे) युवकों ने बाहर-भीतर से उन्हें संगठित करने में इनकी भरपूर मदद की! इस संगठित संघर्ष में जनजातियों के 40% पुरुषों ने जान गंवाई, पर अपने अधिकांश ध्येय प्राप्त किए।

‘थर्ड स्पेस’ कहलाने वाले इस प्रेशर ग्रुप की सबसे बड़ी सफलता यह है कि अंततः इसने विकसित देशों को विवश किया कि वन संरक्षण के लिए एक मोटी रकम वे इन जनजातीय संगठनों को दें : पेड़ काटकर, चारागाह बनाकर, बस्तियां बसाकर, संसाधन दोहन की अन्य क्रूरताओं के द्वारा वे जो भी कार्बन-ऋण अपने सर लेते हैं, वन-संरक्षण और जीव-संरक्षण के लिए ये जनजातियां उनका उपयोग करेंगी। हाइवे, रेडरोड, ट्रांसमिशन लाइन, टिंबर कंपनियों, हाइड्रो-एलिक्ट्रिक प्लांट उसी सीमा तक जंगल में प्रवेश करने दी जाएंगी जिस सीमा तक उन्होंने कार्बन-ऋण चुकता किया और जीवों तथा संसाधनों के बीच की वह आदिम लय वापस कायम करने में इन आदिवासियों की मदद की।

1988 में 1,53,000 वर्ग मील तक एमेज़ॉन के रेनफॉरेस्ट साफ कर दिए गए थे, विश्व का 10 से 15 प्रतिशत प्रदूषण वहीं से होता था। 2015 तक 40% का ‘कार्बन-सिंक’ नोट किया गया तो इन्हीं अभियानों के चलते। इन अभियानों में ‘नीला कॉर्नफ्लावर’ के नायक मार्टिन – जैसे  संवेदनशील युवक बड़ी संख्या में जनजातियों के सहायक हुए थे।

इंद्रधनुष के दरवाजे से गुजरती, पतझड़ की सुनहरी किरणों से बादल को बुहारती ये जनजातियां इतनी भावप्रवण हैं कि आज भी खाने के पहले पूर्वजों को ‘धाक’ या ग्रास गिराती हैं। उपन्यास में इनकी सूक्ष्म भावप्रवणता के और भी मार्मिक वर्णन आपको मिलेंगे, और इनकी वैकल्पिक ज्ञान-पद्धतियों की हजार झलकियां। सबके ऊपर सहज बातचीत में फूटता है उनका गहन मानवीय विवेक :

‘अब आप अंजीर के इस विशाल पेड़ को ही देखिए। इसके नीचे हैं छोटे और मध्यम आकार के अंजीर के पौधे जो कि इन्हीं पेड़ के बीजों से उग आए हैं… जब बड़ा पेड़ समय से बूढ़ा होकर या आंधी के कारण मर जाता है, तब उसका खाली स्थान उस जाति का दूसरा पेड़ लेता है जो सालों तक उसकी छांव में… उसकी गोद में था… जब पेड़ अपनी जाति से इतना प्रेम करते हैं तो कोई मानव समूह नरभक्षी कैसे हो सकता है!

‘नक्शा पिंजरा है, जिसमें सभी राष्ट्र कैद हैं!’

बेटा, जीवन में दूसरों को दिया गया दुख ही ताउम्र साथ देता है!’

विकास का मयदानव इन भोले-भाले लेकिन संज्ञानसिद्ध लोगों के पीछे ऐसा पड़ा कि सदियों वे ‘एथनोग्राफिक गेज’ का शिकार रहीं ये जनजातियां और अजायबघरों में उनका अस्तित्व सीमित कर देने की हजार साजिशें चलीं। प्रखर आदिवासी कवयित्री, योगिशा गायित के शब्द उधार लेकर कहें तो –

सबकी जान इकट्ठा की,

फिर नहर बन गई!

चेनुआ अचेबे से शब्द उधार लेकर कहें तो कुछ देर तो वे समझ ही नहीं पाए कि ‘वेयर द रेन बिगैन टु बीट देम’ (बारिश उन पर कोड़े कैसे बरसाने लगी) यानी भोजन-वस्त्र-आवास, कामचलाऊ शिक्षा और कामचलाऊ चिकित्सा की सुविधाएं देखते-देखते उपनिवेशन उनके आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक दोहन का साधन कैसे बन गया।

उपन्यासिका इस तथ्य का भी सजग साक्ष्य गहती है कि धीरे-धीरे ही सही, चेतना जगी, तो एक अघोषित युद्ध शुरू हो गया। मार्टिन अपने पिता की चिट्ठी पा जब अपने गांव पहुंचता है, सब कुछ तहस-नहस हो चुका है, उसकी जनजाति के लोग प्रतिपक्षियों से लड़ते-लड़ते शहीद हो चुके हैं। युद्ध का ध्वंसावशेष रह गया है उसका गांव। यहीं उसे कुछ लोकोत्तर अनुभव होते हैं; उस श्रेणी के अनुभव जिन्हें येट्स और ज्वाएस ‘एपिफनी’ कहते हैं –

‘उसने गौर किया कि घर छोड़कर जाने वाले वाकई जल्दी में थे, क्योंकि डाइनिंग टेबल पर अभी भी खाने की प्लेटें पड़ी हुई थीं जिनपर रखा खाना सड़कर जम गया था, उस पर सूखी फफूंद और काई थी। डाइनिंग टेबल के ठीक सामने दीवार पर घड़ी थी और वह अभी चल रही थी!’

इस उपन्यासिका की एक बड़ी विशेषता प्रतीकों का मनहर प्रयोग है। सामान्य वस्तुएं भी अगर गौर से देखी गईं तो प्रतीक बनकर झिलमिला जाती हैं और उनकी अर्थव्याप्ति सघन हो जाती है किंतु सधे गद्यकारों के और कवियों के यहां ही! यहां बमों से ध्वस्त शहर में भी दीवार-घड़ी का चलते चले जाना इस बात का रेखांकन है कि काल की टिक-टिक कायम है और जो अभी औंधे मुंह गिर गए हैं, कल उनके भी दिन आएंगे। युद्धविराम हुआ है, युद्ध खत्म नहीं हुआ, युद्ध खत्म होते भी नहीं जब तक मार्टिन जैसे युवक धरती पर कायम हैं और वीरेंद्र यादव जैसे युवा लेखक :

कमरे में गलन मार्टिन के शरीर के साथ ही उसकी आत्मा को भी ठंडा कर रही थी, किंतु उसकी सांसें मॉस का तेल निकालते वक्त भट्टी से निकलने वाली हवा की तरह गरम थीं। बाथरूम के टब में पड़े सूखे कपड़े सूखी हुई चइली की तरह अकड़ गए थे… युद्ध के दौरान खूब धमाके हुए थे, जिनसे घरों की खिड़कियों के शीशे थर्रा गए थे। मार्टिन ने कंकाल को उसी घर के पीछे दफन किया, पत्थर पर कोयले से खरोंचकर मार्टिन लिखा और प्रार्थना कर आगे बढ़ गया!

हर शव दफनाता हुआ मार्टिन खुद को ही दफनाता चलता है, अपने वजूद के उस पक्ष को जिसके जीवन का उद्देश्य अकादमिक जगत का शोध-सितारा बनना था। खुदी को मिटाकर कायनात के बृहत्तर सत्य तक क्वांटम लीप लेता हुआ वह उस महाशून्य तक पहुंचता है जिसके बारे में फॉर्स्टर के ‘अ पैसेज टु इंडिया’ के प्रोफेसर गोडबोले कहते हैं : ‘एब्सेंस इप्लाइज प्रेजेंस’ (अनुपस्थिति ही गहन उपस्थिति है)।

कुछ समय उसकी स्थिति उस सत्यकथा के आदिवासी नायक जैसी होती है जिसे अमेरिका की एक यूरेनियम कंपनी विश्व-भ्रमण पर ले गई। जब वह लौटा तो अपना प्रदेश पहचान नहीं पाया। सारे पेड़-पौधे, पशु-पक्षी हवा हो गए थे।

बचपन में इससे मिलती-जुलती एक कहानी हमने सुनी थी जिसमें रिप नाम का एक सहृदय व्यक्ति पत्नी की डांट से कुंभलाकर किसी पेड़ के नीचे इतनी गहरी नींद में सो गया कि उठा सौ वर्ष बाद जब सारी दुनिया बदल गई थी। वह कहानी उन्नीसवीं सदी की थी, इसलिए दुनिया बदलने में सौ वर्ष लगे। अब की कहानी में दुनिया पलक झपकते ही बदल जाती है। एक नए रिप की कहानी है यह।

इमर्सन ने कहीं लिखा है- हर शब्द कभी कविता था। बेशक, इमर्सन। आगे हम यह जोड़ सकते हैं कि हर शब्द में व्याप्त आदिकाव्य की प्रथम श्रोता आदिवासी जनजातियां ही रही होंगी- पानी की आवाज, मेघनाद, बिजली की तड़प, तूफान का हाहाकार, आकाश का सूनापन, मिट्टी की गंध, पक्षियों के गीत- सब मिलकर जो ध्वनि-तरंग या विचार की सूक्ष्म विद्युत्तरंग रचते हैं- उसी से लिखी गई है आदिवासी जीवन की यह कविता- उपन्यासिका की शकल में। वीरेंद्र कुमार यादव मूलतः तो कवि ही हैं।

कविता तो कविता बनती ही तब है जब उसका एक शब्द भी इधर से उधर न किया जा सके। एक शब्द क्या, एक अक्षर भी अपनी जगह से खिसकाया गया तो हड़कंप मच जाता है, अर्थ-लय टूट जाती है। इसी तरह प्रकृति का छंद भी बिगड़ जाता है यदि मूल बाशिंदों के इस संयुक्त परिवार की जीवन-लय किसी कुठाराघात का शिकार हो।

नए सिरे से यह विराट सत्य रेखांकित करने के लिए ‘नीले कॉर्नफ्लावर’ का धन्यवाद! याद दिलाने का धन्यवाद कि बादल का बारिश से, नदी का समुंदर से, बीज का धरती से जो नाता होता है, वही आदिवासियों का जंगल से। पेड़-पौधे पशु-पक्षी, नदी-पहाड़ सब उनके लिए एक संयुक्त परिवार का ही हिस्सा हैं। धन्यवाद इन युवा लेखकों-चिंतकों-पर्यावरण कार्यकर्ताओं का जिनके आश्रय इनका स्वाभिमान आज परवान चढ़ रहा है और ये खुलकर व्यंजक भाषा में कह पा रहे हैं-

हम बीज है जंगली,

करोड़ों साल पहले दब गए थे

हमारे पुरखे जमीन में

तो ही यह जंगल उगे

-जितेंद्र वासवा

अंत में कुछ बातें भाषा शिल्प के सौष्ठव पर। कोई भी उपन्यास सफल तभी माना जाता है जब उसका विजन, उसमें अनुस्यूत जीवन-दर्शन उसकी भाषिक काया के रोम-रोम से कॉर्नफ्लॉवर जैसी आह्लादकारी सुगंध बनकर फूटे, उसके पात्रों के कथोपकथनों, उनके मन:संवादों में इसी लय में प्रवाहित होता चला जाए जिस तरह हमिंगबर्ड की आंखों से कैंडोर चिड़िया बने नायक की आंखों में मानव-समाज के हृदयविदारक, डिसटोपिक दृश्य दु:स्वप्नों की शक्ल में प्रवाहित हुए चले जाते हैं।

यह उपन्यासिका एक सफल इको-फेमिनिस्ट उपन्यासिका है क्योंकि परिवर्तन की एजेंसी यहां स्त्रियों के हाथ है, सोमेट्र के बोलोव गांव में मां और नानी की नर्चरिंग प्रिंसिपल में प्रतीकित, ग्रोनिंगन विश्वविद्यालय के अकादमिक माहौल में लक्ष्मी की प्रश्नविह्वलता से देदीप्यमान, होहो जनजाति की स्त्री-शामन के प्रज्ञा पक्ष में मूर्तिमान, नूआ जनजाति की मिचाऊ के सजग दृष्टा-भाव में और उसकी चमकीली प्रतीक कथाओं में भी।

ये प्रतीक कथाएं उपन्यासिका को एक अलग ही धरातल पर प्रतिष्ठित करती हैं। फिलहाल एक उदाहरण से काम चलाती हूँ : मिचाऊ हँसती हुई बोली, ‘पुरुष केंडोर की तरह होते हैं, दिन भर आसमान की ऊंचाई में उड़ते हुए न जाने क्या सोचते रहते हैं… स्त्रियां हामिंगबर्ड की तरह होती हैं – इन्हें तुम हर जगह पाओगे, हर खुशी, हर गम में या यों ही वे हमेशा सबसे जुड़ी रहती हैं।… हमने इस कीमती स्वर्ण को मिट्टी और रेत मान लिया है। इसलिए यहां शांति है… हम वर्षावन से ही बने हैं और भरने के बाद पुनः वर्षावन ही बन जाएंगे।

जो कोई जीवन की इस पारस्परिकता का पता पा गया, जो भी समझ गया ‘अन्योन्याश्रय’ शब्द का मर्म, उसकी दृष्टि सम्यक तो हो जाएगी। मार्टिन परात्परता का एक वैश्विक मॉडल है, विश्वमानवता का सार, सृष्टि की स्त्री-दृष्टि से परिचालित महावीर जिसके बारे में मेरे पिता-श्यामनंदन किशोर का गीत कहता है- ‘तन से किसान और मन से सम्राट बन/तुलित रख दिमाग-देह/आदमी विराट बन’। विराट, पर अतिपुरुष नहीं, सम्यक दृष्टि-संपन्न संबुद्ध पुरुष जो यह समझता है कि बाजार का बीज-शब्द भले ही ‘स्पर्द्धा’ हो, गिरहकट स्पर्द्धा, पर सार्थक जीवन का बीज शब्द है ‘सहकारिता’, प्रकृति-लय से छंद मिलाकर चलने वाली उच्छल सहकारिता। सर्वहसोथू भोक्ता-भाव का सहज स्थानापन्न एक सम्यक दोस्त-दृष्टि से वही कर पाएगी।

पुस्तक विवरण  :  नीला कॉर्नफ्लावर, लेखक : वीरेंद्र प्रताप यादव, आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 2024

 

 

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