
कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तक- ‘हिंदी कथा साहित्य और झारखंड’ संप्रति झारखंड के रामगढ़ कॉलेज के हिंदी विभाग में अध्यक्ष।

हाउस लोन का अंतिम इंस्टॉलमेंट जमा कर बैंक से नो ड्यूज लेकर निधि प्रकाश गाड़ी की तरफ बढ़ी। वह बहुत हल्का महसूस कर रही थी। गाड़ी में बैठकर उसने सबसे पहले बेटे अभिकल्प को कॉल लगाया और बताने लगी कि कैसे बैंक अधिकारी मकान बीमा के पंद्रह हजार अलग से मांग रहा था। उसने बैंक अधिकारी से कहा कि पहले वह बीमा के पेपर दिखाएं। वह दिखा नहीं पाया। बस कहता रहा- ‘लोन के साथ बीमा तो जरूर हुआ होगा। ए निधि प्रकाश ने साफ कह दिया था ‘बीमा का पेपर मुझे दीजिए, तभी पेमेंट करूंगी’।
बेटे ने कहा- ‘सही किया, मुझे नहीं लगता मां कि आज से बीस साल पहले मकान का बीमा होता भी होगा।’
बात करते हुए अचानक उसे आशंका हुई कि सड़क पार करता हुआ आदमी कहीं उसकी गाड़ी से टकरा न जाए। तेजी से उसके मुंह से चीख निकल गई थी ‘अरे.. अरे… अरे…’ तभी वह आदमी गाड़ी से टकरा के गिर गया था। तेज आवाज हुई थी। हिचकोले खाती हुई गाड़ी रुकने की बजाय आगे बढ़ने लगी। लगा, उस आदमी के शरीर पर चढ़कर उतरी। जैसे गाड़ी शरीर नहीं स्पीड ब्रेकर पर चढ़ी हो। वह आदमी तो बचा नहीं होगा, वह डाइवर से बोली ‘रुको… रुक जाओ…।’ पर वह रुका नहीं। शायद उसने भागने का मन बना लिया था। बाजार में करीब तीस-चालीस मीटर आगे भीड़ खड़ी हो गई, तो मजबूरन उसे गाड़ी रोकनी पड़ी। भीड़ ने ड्राइवर को घेर लिया था। उसकी पिटाई हो गई। भीड़ से आवाज आ रही थी ‘चलो अस्पताल ले चलो…’
निधि को राहत मिली ‘बच गया है बेचारा! पता नहीं किस हाल में होगा।’
भीड़ के किसी व्यक्ति ने गाड़ी की चाबी निकाल ली और एक युवा लड़के को देते हुए कहा- ‘छोड़िहें मत इ सब कर, चाभी रख तोयँ’।
एक आदमी निधि प्रकाश के पास आकर बोला, ‘मैडम इसकी बीवी आ रही है। आपको इलाज तो कराना होगा इसका!’
एक रोती बिलखती औरत नजदीक आई ‘इ क्या हो गया मैडम, अभी तो मेरा आदमी नाश्ता करके घर से बाहर निकला था। एक ही है ऑटो चलाकर कमाने वाला।’
उस औरत की बगल में खड़ा एक सोलह सत्रह साल का दुबला-पतला लड़का कह रहा था ‘गाड़ी की चाबी तो हम नहीं देंगे। पहले इलाज कराइए बाबा का।’
इस बीच ड्राइवर सबकी मदद से घायल को गाड़ी में चढ़ा रहा था। खून से लथपथ घायल आदमी के दर्द से कराहने की आवाज सुनाई पड़ी। सामने खड़े लोगों को ड्राइवर सफाई देने लगा था। कहा- ‘ई भाई साहब फोन से बात करते हुए सड़क पर चल रहे थे।’
इसपर उस लड़के से जोरदार डांट पड़ी ड्राइवर को ‘कोई लापरवाही से चल रहा है तो धक्का मार दोगे उसको।’ किसी ने ड्राइवर को धक्का मारकर गाड़ी में बैठा दिया। घायल के कई लोग गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी अस्पताल के रास्ते पर बढ़ गई थी।
किसी तरह निधि भीड़ के दबाव से बाहर आई। घर वापसी के लिए एक टैक्सी मिल गई। कुछ देर बाद एक रिंगटोन से ध्यान बंटा। मोबाइल से अनुभूति की आवाज आ रही थी- ‘बधाई मां, अब तो बीस साल पुराने लोन से फ्री हो गई न।’
अभी क्या कहती वह।
निधि ने जवाब दिया- ‘दस मिनट में घर पहुंचकर बात करती हूँ।’
घर पहुंचने पर निधि का मोबाइल फिर बजने लगा। इस बार किसी महिला की अस्पष्ट-सी आवाज थी- ‘मैडम, जिसका आपकी गाड़ी से एक्सीडेंट हुआ है न, उसी सावना लकड़ा की पत्नी बोल रहे हैं एक्स-रे हो गया है। अभी अस्पताल सिक्योरिटी के लिए बीस हजार मांग रहा है।’
वह अनुभूति के कमरे में चली गई। अनुभूति ने मामला समझा तो तुरंत भाई अभिकल्प को कॉल कर बुलाया ‘घर आओ जल्दी।’
वह दस पंद्रह मिनट के अंदर घर पहुंच गया। एक्सीडेंट की बात जानकर बोला- ‘मम्मी, आपको तुरंत मुझे कॉल करना चाहिए था। हादसे के बाद ड्राइवर पर सब नहीं छोड़ना था।’
ड्राइवर को फोन लगाकर अभिकल्प ने पूछा ‘अभी कहां हो विशाल?’
‘सिटी हॉस्पिटल में हैं सर।’
अभिकल्प बोला ‘अरे इस महंगे हॉस्पिटल में?’
‘क्या करते सर… ये लोग पकड़ कर मुझे यहीं ले आए।’
‘इनको किसी तरह समझा बुझाकर सदर अस्पताल ले आओ।’
थोड़ी देर बाद फिर कॉल आने से निधि परेशान हो गई। वही महिला बोल रही थी ‘मैडम आप लोग यहां आकर घायल का हाल तो देखिए। तुरंत कुछ कीजिए मैडम।’
उसकी बात से निधि को लग रहा था कि तुरंत घायल से मिलकर इलाज के लिए कुछ पैसे थमाने चाहिए। मन की यह बात कहने वह अभिकल्प के कमरे में गई तो वह कुछ परेशान दिखा। कॉल रखकर निधि से कहने लगा- ‘हमारी गाड़ी थाने में है मां। वहां से गाड़ी छुड़वाना आसान नहीं है।’
निधि को याद आया कि कई बार उसने थाने के बाहर सड़ती हुई गाड़ियों को बरसों बरस देखा है। अस्थि-पंजर ढीले, गाड़ी की बॉडी में पौधे लत्तर सब चढ़े हुए…। अभी बेटे से बात हो रही थी कि छोटे भाई का फोन आया ‘अभी जीजा जी को लेकर गाड़ी छुड़वाने थाने जा रहा हूँ। लौटकर बताता हूँ।’
देर रात छोटा भाई आया। कहने लगा ‘गाड़ी तो छूट ही जाएगी। सारे पेपरवर्क हो गए हैं। ये थाने वाले कह रहे हैं कि अभी कुछ दिन यहां से गाड़ी निकालना मुश्किल होगा। बस्ती का दबाव है कि गाड़ी किसी भी हाल में नहीं छोड़ना है। उन लोगों को लग रहा है कि गाड़ी थाने में रहेगी तो उन्हें हमसे इलाज के लिए पैसे मिल जाएंगे। तुम फिक्र मत करो। थाने से मामला क्लियर है। बस थोड़ा मामला शांत हो तो गाड़ी ले आएंगे।’
निधि ने उदास आवाज में कहा था ‘मैं उस घायल के लिए फिक्रमंद हूँ। उस घायल के लिए हमें कुछ करना चाहिए।’
ड्राइंग रूम में बैठे पति के वकील मित्र ने सुना तो कहने लगे ‘पहले तो थाने से गाड़ी का मामला क्लियर होने के लिए अपने जीजा को धन्यवाद दीजिए। आपका काम हो गया कि विधायक जीजा खुद पैरवी के लिए थाने पहुंच गया।’
छोटे भाई ने सबको बताते हुए कहा ‘एक बात और… कल जीजा जी को थानेदार ने कहा है कि सर आप बेफिक्र रहें, देर सबेर साम दाम से उनके सदर अस्पताल में शिफ्ट करने की स्थिति बना दी जाएगी।’
निधि ने उन सबको घायल की पत्नी के कॉल वाली बात भी बताई। वकील साहब कहने लगे-‘देखिए, आपकी गाड़ी तो इंश्योरेंस क्लेम में है। थर्ड पार्टी इंश्योरेंस है तो दुर्घटनाग्रस्त आदमी को पैसा तो मिल जाएगा। देर सबेर सीधे उसके अकाउंट में पैसा जाना है। अगर अभी आप पैसे की मदद करते हैं, तो बाद में मांगने थोड़ी न जाइएगा।’
पति ने भी कहा- ‘दोबारा अगर उस घायल के परिजन पैसे की मांग करें तो एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देना।’
छोटे भाई ने जोड़ा- ‘बिलकुल। सुन लो, पैसा-वैसा मत देना अभी। थानेदार ने यही कहा है कि इंश्योरेंस वाला पैसा तो उसे मिलेगा ही। आप लोग क्यों देंगे।’
निधि चिंतित होकर बोली ‘पर इंश्योरेंस क्लेम जल्दी मिल जाए, इसके लिए कोशिश करनी चाहिए न।’
पति ने सहमति जताई- ‘बिलकुल। हम सब लगकर कर रहे हैं। हमारी भी मुसीबतें कम कहां हैं अभी। गाड़ी बनवाने और पूरी कानूनी प्रक्रिया में समझो पचास-साठ हजार से ऊपर का चक्कर है।’
‘अभी आपको पैसा देकर बेलर भी ढूंढ़ना है’ ये वकील साहब थे।
सारे डिस्कशन सुनते हुए निधि को समझ आया कि थाने में एफ. आई. आर. दर्ज हो चुकी है तो फिर बेल लेने की प्रक्रिया से भी गुजरना होगा। तीन-चार डेट भी पड़ सकती है। अब तक लॉक अप और बेल तो उसने फिल्मों में ही देखे थे।
सुबह से निधि के दिमाग में चल रहा था कि कम से कम घायल को अस्पताल जाकर देखा जाए। बेटे से उसने अपनी इच्छा जताई तो उसने समझाया ‘कोई फायदा नहीं है मां। जितना ज्यादा इंवॉल्व होवोगी, उतनी ही मुश्किल में पड़ोगी।’
किसी भी अनजान नंबर के कॉल से अब निधि को भय-सा हो रहा था। घायल आदमी के बेटे का फोन लगातार आने लगा तो घबराकर नंबर ब्लॉक कर दिया था।
इस साल निधि को अपनी कार बेचनी थी। पिछले साल सबके सुझाव पर बस थर्ड पार्टी इंश्योरेंस करा लिया था। ऐसे में अब अपनी गाड़ी की मरम्मत के लिए कोई क्लेम नहीं कर सकती। परेशान निधि ने ड्राइवर को सुनाकर अपना मन शांत करने की कोशिश की ‘सारी लापरवाही आपकी है। सब ठीक रहता तो अभी गाड़ी सेल करके कुछ पैसे मिलते। कहां अब गाड़ी की रिपेयरिंग और घायल के इलाज के चक्कर में पड़े हैं।’
अनुभूति भी कह रही थी ‘अब रजिस्ट्रेशन फेल होने से पहले तो तुम्हारी एक्सीडेंट वाली गाड़ी बिकने से रही! और बाद में…. रजिस्ट्रेशन फेल गाड़ी कौन लेगा?’
निधि से संपर्क न हो पाया तो घायल की बीबी बेटा थाने गए। थानेदार ने उनको तसल्ली दी- ‘इंश्योरेंस क्लेम के लिए प्रयास हो रहा है, पर उसमें समय लगेगा। बड़े अस्पताल में सिर्फ लूट है इलाज नहीं। पैर में चोट है, पर सिटी स्कैन से लेकर एम आर आई तक सब कर देगा। अगला पार्टी भी अपनी तरफ से कितना पैसा देगा! आखिर में तो इंश्योरेंस क्लेम का पैसा तुम लोगों को मिलना ही है। व्यावहारिक यही है कि चेकअप प्राइवेट में करा लो, फिर सदर में एडमिट कर दो।’ रोज कमाने खाने वाला आदमी समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। मैडम भी फोन नहीं उठा रही हैं। एक-दो दिन अगल-बगल के लोग आए, सलाह मशविरा दिया, फिर धीरे-धीरे सब गायब हो गए। सबकी अपनी व्यवस्था और शायद आशंका भी हो कि कहीं रोते गाते उनसे पैसे की मांग न कर बैठें।
फिर घायल आदमी छोटे-से एक प्राइवेट क्लीनिक के जनरल वार्ड में शिफ्ट हो गया। वहां कई लोग अपने सुख-दुख साझा करते हुए एक बड़े परिवार का हिस्सा बन गए थे। एक-दूसरे को तसल्ली देते हुए, सबको अपने हिस्से का दुख थोड़ा कम लगने लगा था।
घायल का बेटा हादसे की हालत बता रहा था ‘अब क्या करें गरीब लोग! जहां सस्ते में इलाज होगा, वहीं न जाएगा।’
बगल बेड वाले मरीज ने हामी भरी थी- ‘हां भाई यहां डॉक्टर भी अच्छा है, फीस भी कम। जनरल वार्ड में गपशप में मन भी लग जाता है।’
वह आगे बताने लगा- ‘इसके पहले जिस अस्पताल में एडमिट थे, वहां के डॉक्टर ने बताया था कि आपरेशन में साठ हजार लगेगा। मेरे पास तो उतना पैसा था नहीं! अस्पताल को बता दिया कि हेल्थ इंश्योरेंस का क्लेम हड्डी टूटने के चार दिन पहले करवाया है। अस्पताल के ऑफिस ने कहा कि प्रपोजल भेज कर देखते हैं। अगर पैसा तुरंत आ जाएगा तो बहुत अच्छा होगा। बाद में देखा कि नब्बे हजार के खर्च का प्रपोजल बनाकर भेजा है।’
सब उसे चकित होकर सुन रहे थे। बगल बेड के मरीज ने कहा था ‘बिजनेस देखिए इन लोगों का। आपसे लेना था तो साठ हजार खर्च बताया। और क्लेम से लेना है तो नब्बे हजार।’ जनरल वार्ड में हँसी पसर गई थी। फिर से वह आदमी बताने लगा-
‘अब इतना घाटा लगेगा तो इंश्योरेंस कंपनी भी क्या करेगी! कहां से फैसलिटी देगी। किसी न किसी टेक्निकल प्रॉब्लम में मामला उलझा देगी न!’
‘हां भई, इंश्योरेंस कंपनी तो बिजनेस करती है न; कोई सेवा या खैरात तो बांट नहीं रही।’
वह मरीज आगे बताने लगा- ‘प्रपोजल भेजने के नाम पर अस्पताल ने मुझे फंसा कर रख लिया था। मैं दर्द और तकलीफ से छटपटाता हुआ दो दिन इंश्योरेंस कंपनी के जवाब का इंतजार करता रहा। पर इंश्योरेंस कंपनी ने अड़तालीस घंटे बाद बताया कि वे इंश्योरेंस के पैसे दे पाने में असमर्थ है। अरे पहले भी तो बता दे सकते थे भाई!’
सब गौर से सुन रहे थे। वह हँस रहा था ‘अब आगे की कहानी सुनिए, तब अस्पताल का खेला समझेंगे। जिस ऑपरेशन का खर्च साठ हजार बताया था, उसे तीस हजार में करने को अब राजी हो गया था। इतना भी पैसा मेरे पास नहीं था, तब उनका प्रस्ताव मिला कि जूनियर डॉक्टर से करा लो पंद्रह-सोलह हजार में काम हो जाएगा। ई तोल मोल देखकर हम तो वहां से उलटे पांव भागे। यहां एडमिट हुए तो डॉक्टर ने बताया कि मेरे पैर में किसी ऑपरेशन या नट-बोल्ट की जरूरत नहीं है।’ सुनकर सब बहुत आश्चर्य में पड़ गए।
‘पर इस खबर से बड़ी राहत भी मिली होगी भाई!’
‘हां वह तो है भाई। लेकिन मेडिकल लाइन और इंश्योरेंस के कारोबार पर भरोसा खत्म हुआ।’ घायल आदमी का बेटा कहने लगा ‘ऊ मैडम फोन नहीं उठा रही है। कुछ पैसा दे देती तो इलाज आसान हो जाता।’
रिपोर्ट लेकर वह अपनी मां के साथ डॉक्टर का इंतजार कर रहा था। रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने कहा- ‘ऑपरेशन की जरूरत नहीं है लकड़ा। प्लास्टर करवा कर घर चले जाओ। डेढ़ महीने बाद आ जाना।’
घायल की पत्नी ने हाथ जोड़कर कर पूछा ‘ई ठीक तो हो जाएंगा न डॉक्टर साहब?’
‘हां-हां बिलकुल। बाद में कुछ एक्सरसाइज करना होगा, बस।’
घर आकर मां को चिंतित देख बेटा कहने लगा ‘डॉक्टर बोला है तो पहिले जैसे हो जाएगा बाबा।’ घायल आदमी परेशान और चिढ़ा हुआ था, कहने लगा- ‘अब तोयं घर कैसे चलाभिं? पत्नी हँसी- ‘तोय फिक्र मत कइर। दु महिना आराम से रह। हमिन देख लेबई। तोयं बच गैलहि एहे बहुत हऊ । मैडम नई देतई तो का हम मइर जाबड़!’
अस्पताल से घर आने के बाद का दिन कई तरह की मुश्किलों और तनाव के बीच गुजरा। घायल आदमी ने दवा का पैकेट खोलकर देखा तो उसे सिर्फ दो दिन की दवा दिखी। ठीक होकर वह अपनी सामान्य दिनचर्या में किस तरह लौटे, वह समझ नहीं पा रहा था। पत्नी को देर से घर में नहीं देखकर उसे खीज हुई कि बीमार की फिक्र किसी को नहीं! थककर उसे नींद आ गई। कई लोगों की बातचीत की आवाज सुनी तो वह जाग गया। उसने देखा सामने टेबुल पर दवा का एक बड़ा बंडल खुला पड़ा है। सामने थाली में टमाटर झोर और भात रखा हुआ था। जमीन पर पत्नी की बड़ी बहन और जीजा बैठे खाना खा रहे हैं। उसे जगा हुआ देखकर पत्नी कहने लगी- ‘जीजा पैसा देवधऊ फिर से दुकान शुरू करें वास्ते। का कहेथीस तोयं?’
वह चुप रहा तो जीजा बोला- ‘अरे उससे क्या पूछ रही हो। हम गार्जियन हैं। हमसे पैसा लेकर चाय पकौड़ी का दुकान फिर से शुरू करो।’ उन्होंने बगल में बैठे बेटे की तरफ पैसा बढ़ाया था- ‘जा बाबू, समान किन के ले आना।’
घायल आदमी कुछ बोल नहीं पाया। उसकी आंखों के कोनों से आंसू की कई बूंदें हौले से ढलक गईं।
अगली सुबह मां-बेटे बाहर बारामदे में अपनी दुकान फिर से शुरू करने की जुगत में भिड़ गए थे। घायल आदमी चाय-पकौड़ी की लगी अपनी छोटी-सी दुकान और मां-बेटे की हिम्मत देखकर कुछ गर्व से भर गया। उसने सोचा, पैसे के लेनदेन का काम अगर वह धीरे-धीरे संभाल ले, तो इन दोनों मां-बेटा को सुभीता होगा। बीमार की तरह लेटे-लेटे मन भी कहां लगता है।
संपर्क : द्वारा श्री नीरज कुमार, गेट नंबर-1, सरला बिरला यूनिवर्सिटी के पास, महिलौंग, टाटीसिल्वे रांची-835103 झारखंड मो. 9546166234
Image Credit : Montserrat-Gudiol

