युवा कवि। कई कविता संकलन तथा प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। संप्रति उत्तर 24 परगना में अध्यापन।

 

नई सदी की हिंदी कविता में अपने समय की अनुगूंज और ध्वनियां विविधता के साथ सुनी जा सकती हैं। इन वर्षों में समाज और राजनीति में तेजी के साथ बदलाव हुए हैं। वैश्विक घटनाओं ने भी आम जीवन पर प्रभाव डाला है। इन सबके साथ कविता के तेवर में भी लगातार बदलाव देखने को मिले हैं। हमारी संवेदना को इसने प्रभावित किया है। समय के अंधेरों के खिलाफ कविता कभी मशाल तो कभी टिमटिमाती रोशनी बनकर साहस देती रही है। इस जटिल समय में प्रेम, प्रकृति और मनुष्यता के ऊपर आए संकट के प्रति वर्तमान कविता बेहद सजग है, सद्यः प्रकाशित कुछ संग्रहों से गुजरते हुए हम आसानी से यह बात लक्षित कर सकते हैं।

 

हिंदी कविता में परिधि की आवाजें हैं। स्त्री, दलित और आदिवासी कविताएं आखिर परिधि की ही तो आवाजें हैं। आज ये आवाजें केंद्र में आ गई हैं।

निशांत का नया कविता संग्रह ‘जब चीजें देर से आती हैं जीवन में’ की कविताएं देश के युवा वर्ग की यंत्रणा, घुटन और त्रासदी का दस्तावेज हैं। विशेषकर उच्च शिक्षा पाए युवाओं के जीवन और संवेदना को इस संग्रह की कविताओं में दर्ज किया गया है। उन सबको सफलता के इंद्रधनुषी सपनों के साथ एक अंधी दौड़ में ढकेल दिया गया है। शिक्षा व्यवस्था की विसंगतियों से गुजरता युवा बेरोजगारी और भेदभाव को झेलता हुआ कई बार आत्महत्या की राह पकड़ लेता है। कवि एक जगह कहता है- ‘बच्चों को बेहतर बनाने का लक्ष्य/इस पूंजीवादी व्यवस्था में/खो गया है कालनेमि की गुफा में/जो मशीन नहीं बन सकता/वो मरने के लिए तैयार रहे या/किसी मानसिक बीमारी के घर में रहने के लिए।’

आखिर एक पढ़ा-लिखा युवा इस व्यवस्था से क्या चाहता है? ‘डिप्रेशन’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां देखिए- ‘मेरी मेहनत का उचित मूल्य मिलना चाहिए/भीड़ में थोड़ी सी जगह/जीने के लिए जरूरी ऑक्सीजन/थोड़े ढंग के कपड़े/थोड़ी ढंग की जिंदगी/थोड़ी सी राजी-खुशी/और थोड़ा सा प्रेम/मैं सिर्फ इतना ही चाहता हूँं’ पर डिग्रियां प्राप्त करने के बाद अंततः सबकुछ छलावा सिद्ध होता है।

‘नौकरी कितनी जरूरी है’ शीर्षक कविता की निम्न पंक्तियां दरअसल पूरी शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलती हैं- ‘वे तय कर रहे थे-/व्यवस्था को जंगल में बदल दो इन्हें आदिवासियों में।’/ विकास का झुनझुना पकड़ा दो इनके हाथों में और/फिर करते रहो इनका शिकार/और कहते रहो – ‘आत्महत्या कोई विकल्प नहीं है।’ दरअसल व्यवस्था यहां शिकारी हैं और हर नागरिक उसके लिए शिकार।

निशांत की कविताओं में युवाओं के मनोविज्ञान की कई परतें खुलती जाती हैं। नौकरी के लिए संघर्ष के साथ प्रेम, विवाह, परिवार इत्यादि का संघर्ष भी साथ चलता रहता है। इस संग्रह से ‘चौंतीस की उम्र में नौकरी’, ‘शादी की उम्र में नौकरी की चिंता’, ‘एडहॉक’, ‘इकतालीस की उम्र में’, ‘तलाक’ इत्यादि शीर्षक कविताएं युवा जीवन की त्रासदी के दस्तावेज हैं।

उनकी कविता में बाजार के चंगुल में फंसे आम आदमी की पीड़ा के कई दृश्य एक साथ मौजूद हैं। लुभावने विज्ञापनों से गुजरता आम आदमी दयनीय दिखता है। उसमें लगातार हीनताबोध भरा जाता है। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखिए – ‘ये बाजार न होता तो हम मनुष्य हैं/इस पर हमें विश्वास न होता/हमारी आत्मा शर्म में डूबकर मर जाती…।’ आज बाजार हमारी संवेदना और मानवीय मूल्यों को नियंत्रित कर रहा है। निशांत की कविताएं बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव पर गंभीर चिंता व्यक्त करती हैं।

निशांत की कविताओं में हमारे समय, समाज और राजनीति की हलचलों को गहन बोध के साथ दर्ज किया गया है। विशेषकर ऐसे समय में जब सत्ता अपने खिलाफ उठी हर आवाज को दबाना चाहती है, एक सजग और प्रतिबद्ध कवि समय के अंधेरों के खिलाफ लिखने से कभी नहीं चूकता- ‘यह समय ही डरते और डर-डरकर रहने का है/वाचालों का है/है आंकड़ों की जुगाली का/छप्पन इंच के सीने के/‘पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?’/पूछने से डरने का समय है यह- /यह ‘अंधेरे में’ का समय है।’ आखिर मुक्तिबोध के समय के ‘अंधेरे’ अब भी कम होने की जगह बढ़ते क्यों जा रहे हैं?

निशांत ने अपनी कविताओं के लिए एक मौलिक काव्य भाषा और शैली का ईजाद किया है। इस कारण इनकी कविताओं ने अपनी गंभीर छाप छोड़ी है। कवि अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सरोकारों के साथ अपनी कविताओं में हमेशा खड़ा रहा है। यह कविता संग्रह इस धारणा को मजबूत करती है।

जिज्ञासा : इन वर्षों में कविता में क्या बदलाव आए हैं?

निशांत : मेरे इस संग्रह में युवा समस्याओं पर फोकस है। यह एक ऐसा दौर है जब कोई युवा कवि फेसबुक पर मुक्तिबोध का मोबाइल नंबर मांग रहा है तो कोई कविता के नाम पर कुछ भी लिख दे रहा है। निखालिस गद्य तक को कविता कहने का शौक खुद कवि ही पाल रहे हैं। गंभीर और अच्छी कविताओं की तादाद में कमी दिख रही है। फिर भी माहौल काफी आशावादी है।

हिंदी कविता में परिधि की आवाजें हैं। स्त्री, दलित और आदिवासी कविताएं आखिर परिधि की ही तो आवाजें हैं। आज ये आवाजें केंद्र में आ गई हैं।

जिज्ञासा : इस संग्रह की कविताओं में शिक्षित युवाओं के संघर्ष के विभिन्न आयाम उभरे हैं। अपने इस संघर्ष को आप कैसे देखते हैं?

निशांत : संघर्ष हर कवि के यहां होता है। कुछ लोगों का संघर्ष रोटी के लिए है तो कुछ का केक के लिए। यहां युवाओं का मुख्य संघर्ष रोटी, रोजगार और उनको ठीक से न समझे जाने को लेकर है। युवाओं के डिप्रेशन को लेकर इस संग्रह में दो कविताएं तो सीधे-सीधे हैं। आत्महत्या को केंद्र करके दो-तीन कविताएं हैं। यह एक बड़ी समस्या है और लोग इसे कई बार सिर्फ नौकरी से जोड़ देते हैं। युवा मानसिकता को पूर्ववर्ती पीढ़ी जब तक ठीक से नहीं समझेगी, इस तरह की घटनाएं बड़ी संख्या में घटती रहेंगी। लोग अब काफी जागरूक हो रहे हैं।

 

एक कविता, एक कहानी दिल और दिमाग को झकझोर सकती है। वह सवाल उठा सकती है, सोच को बदल सकती हैं।

कविता के वर्तमान परिदृश्य में एक साथ कई महत्वपूर्ण स्त्री कवियों ने अपने अनुभव और संवेदना को शब्द देकर स्त्री विमर्श को नया आयाम दिया है। उनकी कविता एक ओर पुराने पड़ चुके प्रतिमानों को तोड़ती हुई कथ्य, संवेदना, विषय-वस्तु, भाषा, शिल्प आदि के स्तर तक ताजगी का बोध कराती है, दूसरी ओर स्त्रियों के जीवन में आनेवाली चुनौतियों और संघर्षों के साथ खड़ी रहती है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों की अस्मिता का जो संकट वर्षों से तैयार किया गया है, उसके बरक्स स्त्री कवियों की कविता प्रतिरोध का स्वर बनकर उभरती है।

स्मिता सिन्हा के दूसरे कविता संग्रह ‘रुंधे कंठ की अभ्यर्थना’ में कवयित्री स्त्री की स्वतंत्रता और उसके अधिकारों के प्रति बेहद सजग है। प्रेम और स्त्री विमर्श इस संग्रह के केंद्र में है पर कवयित्री इन दोनों विषयों के सामाजिक पक्ष की भी छानबीन करती हैं। इन कविताओं की एक विशिष्टता यह है कि प्रेम का विमर्श स्त्री विमर्श की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए भी कब एक-दूसरे के साथ जुड़ जाता है पता ही नहीं चलता। कविताएं उस व्यवस्था पर चोट करती हैं जो स्त्रियों के आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को कुचल कर अपने सांचे में ढालते हुए अनुगामी बनाकर रखना चाहती है।

स्त्रियों को अपने जीवन में एक साथ कई मोर्चों पर संघर्षों से गुजरना पड़ता है। यह संघर्ष जितना देहरी के बाहर चलता है उससे कहीं ज्यादा देहरी के अंदर।

स्मिता सिन्हा लिखती हैं, ‘देर तक करती रहेंगी बहस/अपने ही पक्ष और प्रतिपक्ष में/ओस के फाहे देते रहेंगे थपकी इनकी थकी आंखों को/और लगती रहेगी गर्म पानी की सेंक/इनकी पीठों पर आज फिर देर तक/आज ये फिर से छोड़ देंगी अपनी किसी कविता को/अधूरी हमेशा के लिए…।’ इस अधूरेपन में ही पूर्णता की तलाश की जीवंत कथा बनकर जी रही हैं असंख्य स्त्रियां।

एक जगह वह लिखती हैं- ‘उसे नहीं पता कि/उससे पहले प्रेम छूटा/ या ईश्वर/हां वो बेगरज/खड़ी रह सकती है/ दोनों के सामने/आंखों में आंखें डाले…।’ ये पंक्तियां प्रतिरोध का एक सशक्त उदाहरण है। प्रेम और ईश्वर दोनों के प्रति स्त्रियों के मन में सामान्यतः कोमल भावनाएं होती हैं। पर यह एक बड़ा सच है कि प्रेम और ईश्वर के नाम पर ही वह सबसे ज्यादा छली गई हैं।

पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के प्रति बढ़ती हिंसा और भेदभाव का प्रतिकार इस संग्रह की कई कविताओं में मौजूद है। यह सुखद है कि इस कविता संग्रह में मौजूद स्त्रियां परंपरा के बने बनाए ढांचों को तोड़ती हुई स्वयं अपने लिए नए प्रतिमान गढ़ती हैं। वे अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं- ‘तुम तो बस संभालना/उस वक्त/जब लुढ़केंगी/अपेक्षित सी हमारी असहमतियां/ तुम्हारी सहमतियों की ढलान पर।’

कवयित्री की काव्ययात्रा कई जगहों पर निजता से सार्वभौमिकता की तरफ उन्मुख होती है- ‘यहां हैं खून में सनी औरतें/ जबरन गर्भवती होती औरतें/जिबह होती औरतें/जो घसीटी जा रही हैं टॉयलेट में/तहखानों और छावनियों में/जो धकेली जा रही सरहदों के पार/ बेची-खरीदी जा रही हैं जानवरों की तरह/औरतें जो वहशियों से खुद को/बचाने के लिए नदी में डूब रही हैं/जमीन में कब्र बनाकर छिप रही हैं/ औरतें जो हर युद्ध में/किसी बंदूक की/ गोली की तरह चल रही हैं/तो कभी इस्तेमाल हो रही हैं/ किसी बम में बारूद की तरह…।’ युद्ध की विभीषिका और त्रासदी पर लिखी गई हिंदी की महत्वपूर्ण कविताओं में इसकी गिनती की जा सकती है।

स्मिता सिन्हा के पास एक सुदृढ़ काव्य भाषा है। जिसके कारण उनकी कविताओं में गजब की संप्रेषणीयता है। इन कविताओं को पढ़ना एक ऐसे संसार में प्रवेश करना है जहां संवेदनाएं अब भी जीवित हैं और कविता अब भी किसी असंभव-से लगते विश्वास को संभव बनाने की कोशिश करती है। यह एक विचारोत्तेजक और हृदयस्पर्शी काव्य संग्रह है।

जिज्ञासा : वर्तमान के सामाजिक और आर्थिक असंतुलन जैसी जटिल चुनौतियों के दौर में क्या केवल कविता या कहानी लिख देना पर्याप्त है?

स्मिता सिन्हा : हम जिस समय में जी रहे हैं वह असामान्य है। लेखकों को निश्चय ही अपनी लेखनी से आगे बढ़कर सामाजिक संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। यह भी देखना होगा कि साहित्य की ताकत अपार है। एक कविता, एक कहानी दिल और दिमाग को झकझोर सकती है। वह सवाल उठा सकती है, सोच को बदल सकती हैं। प्रेमचंद हों या निराला, मंटो हों या महाश्वेता देवी… हमेशा से लेखकों ने अपने समय की सचाइयों को अपनी रचनाओं में दर्ज किया है। आज की परिस्थितियां कुछ अलग जरूर हैं। आज जब सत्ता और पूंजी का गठजोड़ जन-आवाजों को कुचल रहा है, तब केवल लेखन पर्याप्त नहीं रह गया।  हालांकि लेखन आज जरूरी है, बल्कि पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है।

जिज्ञासा : आपकी कविताएं वर्ग, जाति, धर्म, क्षेत्र या लिंग की सीमाओं का अतिक्रमण करती हैं। इसकी क्या वजह है?

स्मिता सिन्हा : मैं इस सवाल को गहराई से महसूस करती हूँ कि मेरी कविताओं में आपने सीमाओं के पार जाने वाले पहलू को समझा। हर रचनाकार अपने अनुभवों की जमीन से लिखता है… वह जमीन जाति, वर्ग, लिंग, भाषा या क्षेत्र की होती है। लेकिन जब अनुभव सघन और व्यापक हो जाता है, तो वह निजी सीमाओं को पार करके साझा और सार्वभौमिक हो जाता है। मेरी कोशिश होती है कि मेरी कविताओं में सिर्फ मेरा ‘मैं’ न रहे, बल्कि कई ‘मैं’ समा जाएं।

मेरे समय ने मुझे सिखाया है कि पीड़ा, अन्याय या उम्मीद किसी जाति, धर्म या भाषा की सरहद नहीं मानती। मेरी कविता तब किसी आवाज में ढलती है, तो वह सिर्फ मेरी आवाज नहीं रह जाती, बल्कि उस गरीब बच्चे की भी होती है जिसे शिक्षा से वंचित रखा गया है, उस किसान की भी जो ऋण के बोझ तले दबा है, उस स्त्री की भी जो डर के साए में जीती है, उस युवा की भी जो रोजगार की तलाश में भटक रहा है।

 

स्त्रियां पारंपरिक रूप से सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन पितृसत्तात्मक समाजिक संरचना की वजह से उनकी भूमिका अदृश्य और अव्यक्त रह जाती है।

युवा कवयित्री सपना भट्ट उत्तराखंड के सुदूरवर्ती पहाड़ी गांव की हैं। पहाड़ी जीवन का अपना एक अलग संघर्ष है। पर्यटन के लिए दो-चार दिन पहाड़ों पर घूमकर हम वहां के सामान्य जीवन की कठिनाइयों और चुनौतियों को नहीं समझ सकते। सपना भट्ट के दूसरे कविता संग्रह ‘भाषा में नहीं’ की कविताओं से गुजरना पहाड़ी जीवन की यंत्रणा और संघर्ष की एक लंबी यात्रा पर जाने की तरह है। इस यात्रा से गुजरते हुए आप कई बार सिर्फ स्तब्ध होकर एक गहरी काव्य संवेदना को भीतर तक महसूस करने लगते हैं। इसका ऐसा विलक्षण प्रभाव आपकी चेतना पर पड़ता है, जिससे बाहर निकलना असंभव-सा हो जाता है।

‘मेरे स्त्रीत्व का रंग है/लाल चटख पलाश सा दहकता’ इस पंक्ति में स्त्री मुक्ति का उद्घोष है। भारतीय परिवारों में मासिक स्राव के वक्त स्त्रियों के ऊपर तमाम बंधन थोप दिए जाते हैं। सपना भट्ट इस लाल रंग को पितृसत्ता की साजिशों के खिलाफ अपने गुस्से और प्रतिरोध का रंग मानती हैं। वे लिखती हैं, ‘हमारी मुक्ति की चाबी/दूर खड़ी उस पौरुषयुक्त शक्ति के पास थी/जिसने हमारी परछाईं को अपने खोखले पुंसत्व और/गैरबराबरी के दोमुंहे खंडित संस्कारों से बांध रखा था।’ इस संग्रह की कविताओं में पितृसत्ता की कई-कई परतें एक-एक कर खुलती जाती हैं और उसका घिनौना स्वरूप दिखता है।

कामकाजी महिलाएं पितृसत्ता के सामने एक बड़ी चुनौती मानी जाती हैं। उसे तने हुए कंधे और सीधी रीढ़ वाली औरतें पसंद नहीं हैं। उसके संघर्ष को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता जबकि कर्मस्थल से लेकर सड़क और घर-परिवार के बीच उसे कई मोर्चों पर हर रोज संघर्ष करना पड़ता है। उसकी इच्छाएं जमींदोज कर दी जाती हैं- ‘इतनी भर उपस्थिति दिखे कि/रसोईघर में रखी मां की दी परात में उसका नाम लिखा हो/पर घर के बाहर नेम-प्लेट पर नहीं/कि घर की किश्तों की साझेदारी पर उसका नाम हो/पर घर-गाड़ी के अधिकार-पत्रों पर कहीं नहीं।/कुछ इतना सधा और व्यवस्थित है स्त्री-मन/ कि कोई माथे पर छाप गया है :/ तिरिया चरित्रम्…/जिसे देवता भी नहीं समझ पाते/मनुष्य की क्या बिसात…/और इस तरह स्त्री को/‘मनुष्य’ की संज्ञा और श्रेणी से बेदखल कर दिया गया है’…।

सपना भट्ट लिखती हैं, ‘हाड़-मांस से बनी यह काया/ किसी इस्पाती धातु में ढालकर हम एक दिन/ असमानता और अन्याय के विरुद्ध एकसाथ उठ खड़ी होंगी/ क्या यह मांग बहुत बड़ी है कि/ हमारी देह और जीवन पर/हमारी इच्छाओं के हस्ताक्षर हों?/देखना!/हम सब औरतें एक दिन/देवालयों में देवियों की उपाधि को ठुकराकर/युगों से पथराई प्रतिमाओं से बाहर निकल आएंगी/हम देवत्व की नहीं मनुष्य की संज्ञा के लिए लड़ेंगी।’ सपना भट्ट अपनी कविताओं में उन सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ती हुई नजर आती हैं जिन्हें पिछली पीढ़ियां ढोती आईं हैं।

सपना भट्ट की कविताओं में प्रकृति और पर्यावरण की गहरी चिंता है। पिछले कुछ वर्षों में पहाड़ी अंचलों में विकास के नाम पर जिस कदर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया गया है, पहाड़ हांफने लगे हैं। वे समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। कवयित्री ने बहुत संजीदगी के साथ पहाड़ के दुख को व्यक्त किया है- ‘हमें इस कराहती/ पृथ्वी की आह लग गई है।/और इस आसन्न अपघात का अट्टहास/ प्रलय की किंवदंतियों के पौराणिक दस्तावेजों में दर्ज है/जीवन हाथों से छूट रहा है/मिट्टी, वन और पानी के वैभव छीज रहे हैं/देवता प्रतिमाओं से कूच करने को हैं/पर्यटको!/अब तुम क्या देखने आओगे पहाड़! श्रद्धालुओ!’

प्रेम ने उसे जितना सुख दिया है उससे कहीं ज्यादा दुख। हिंदी कविता में मीराबाई ने प्रेम के दुःखों को जिस गहराई से अभिव्यक्त किया था, उसी परंपरा को सपना भट्ट अपनी कविताओं में आगे बढ़ा रही हैं- ‘दुख का पानी मेरी देह को ऐसे लग गया है/ कि अब सुख मुझे बेतरह दुखते हैं।’ ऐसी पंक्तियां एक सहृदय स्त्री ही लिख सकती है।

सपना भट्ट की काव्य भाषा शीतलता भी प्रदान करती है और उद्वेलित भी। छोटी-छोटी घटनाओं, अनुभवों और संवेदनाओं को कविता में ढालने की अद्भुत कला इनके पास है।

जिज्ञासा : पहाड़ ने आपकी कविताओं में कुछ नया, कुछ भिन्न क्या जोड़ा है?

सपना भट्ट : पहाड़ का जीवन दूर से जितना मोहक लगता है, जीने की दृष्टि से उतना कठिन है। सैर-सपाटे की दृष्टि से गिनी-चुनी महत्वपूर्ण जगहों को छोड़ दें तो दूरस्थ इलाकों में बुनियादी सुविधाएं अभी भी नहीं पहुंच पाई हैं। पहाड़ पर बारिश, बाढ़, भूस्खलन और बर्फबारी आदि के रूप में प्रकृति का कहर अलग है!

यहां स्त्रियां पारंपरिक रूप से सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बल्कि, कई बार श्रम की दृष्टि से उनकी भागीदारी पुरुषों से कहीं अधिक है, लेकिन समाजिक संरचना के पितृसत्तात्मक होने की वजह से उनकी यह भूमिका सामान्यतः अदृश्य और अव्यक्त रह जाती है, जबकि उनकी मुश्किलें और चुनौतियां ज्यादा बड़ी हैं। पहाड़ों के पारंपरिक समाज में स्त्रियों को आत्मनिर्णय का सीमित अधिकार प्राप्त रहा है। उनकी शिक्षा, विवाह, आजीविका और समाज में उनकी उपस्थिति और सहभागिता के फैसले आमतौर पर परिवार या पुरुष सदस्य ही लेते हैं। जेंडर डिस्क्रिमिनेशन आज एक वैश्चिक मुद्दा है, भारत में और विशेष रूप से सुदूर पहाड़ी इलाकों में यह अधिक स्पष्ट है। मेरी कविताएं ऐसी समस्याओं से जुड़ी हैं।

जिज्ञासा : पहाड़ी क्षेत्र से आप स्त्री-विमर्श और प्रेम को किस दृष्टि से देखती हैं?

सपना भट्ट : एक विचार के रूप में स्त्री-विमर्श एक मौलिक विषय है, कविताओं में हम उसे विस्तार देते हैं। कवि होने से पहले मैं मनुष्य और स्त्री हूँ, तो लाजिम है कि मैं कविताओं में उन प्रश्नों और चिंताओं के साथ उपस्थित होने की कोशिश करती रहूं, जिनसे मैं और दूसरी स्त्रियां रोज टकराती हैं। इसी कारण प्रेम पर लिखने के अतिरिक्त मैंने अपने जीवनानुभवों के आधार पर दूसरी स्त्री-विषयक कविताएं भी ठीक ठाक तादाद में लिखी हैं।

वैसे भी, प्रेम को अगर आधुनिक स्त्री की अस्मिता की दृष्टि से देखें तो इसे मानसिक स्वतंत्रता, सामाजिक समानता, आत्म-सम्मान और आत्म-निर्णय के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करने की जरूरत है। कई वरिष्ठ स्त्री-कवियों ने प्रेम को एक जेंडर स्ट्रगल के रूप में पेश किया है और समानता और सम्मान जैसे मनुष्य-सुलभ अधिकारों का टूल माना है। मेरे लेखन में भी स्त्री-विमर्श प्रेम की उत्कंठा से लेकर स्त्री-अधिकार और उनकी मौलिक स्वतंत्रता जैसे विषयों तक देखा जा सकता है।

 

 

छोटी कविताएं पढ़ने का आनंद अलग है। छोटी कविता अपने बिंबों के साथ ही आती है, ज्यादा सोच विचार नहीं करना पड़ता। 

सुपरिचित कवयित्री निर्मला तोदी का संग्रह है ‘प्रेम, प्रकृति, दुनिया, दर्शन’। लंबे समय से अपनी कविताओं के माध्यम से उन्होंने हिंदी कविता जगत में एक पहचान बनाई हुई हैं। इस संग्रह में आकार में छोटी-छोटी 87 कविताएं हैं। इनमें जीवन में जो कुछ सुंदर है उसे बचाए रखने की अदम्य चाह है- ‘जीवन को जी लो/जीवन सुंदर है/ साथी एक बात कहनी है/यह कविता नहीं है/ उनपर कविता क्या लिखूं/जो कविता से ऊपर हैं!’

संग्रह में मनुष्य के प्रति प्रेम से लेकर जीव-जंतु और प्रकृति तक इस प्रेम का विस्तार है- ‘मेरे पास तुम हो/आभास होता है मुझे/मेरे निजी पलों में/तैरता है कुछ पास मेरे/मेरी उथली लहरों में/डूब जाता है मन/यादों में/एक आस एक चाहत/दूर होती नहीं/बसी है तुझ में।’ दरअसल प्रेम कांटों पर खिलते गुलाब की तरह है। वह अपने साथ कांटों की चुभन भी साथ लाता है और उसकी व्यथा भी। स्मृतियां फिर भी पीछा नहीं छोड़तीं। गाहे-बगाहे चुपके से आकर हमारे साथ आ बैठती हैं- ‘यादें/बर्फ सी जमी हैं/बर्फ से धुआं निकल रहा है/भीतर आग जल रही है।’

सामान्य पेय जल के अभाव में बोतलबंद पानी का एक बड़ा बाजार तैयार है। आम आदमी को आज पानी रुला रहा है। निर्मला तोदी लिखती हैं- ‘कुएं मिलेंगे संग्रहालयों में/पानी मिल रहा है न भाई/प्लास्टिक की बोतलों में/आंखों में।’

प्रकृति के सुंदर बिंबों का इस्तेमाल उन्होंने अपनी कविताओं में जगह-जगह किया है। इनकी कविताएं कम शब्दों में ही बड़ी बातें कह जाती हैं- ‘पीले-पीले सूरजमुखी/उगता लाल सूरज/ एक-दूसरे पर मोहित हैं/सूरजमुखी खिलते जा रहे हैं/सूरज फूल होता जा रहा है।’

‘पृथ्वी सजी है फूलों से/नीला आसमान हरा हो रहा है/अमलतास सूरजमुखी हो रहे हैं/चढ़ रहा है प्रेम का रंग/वे खिल रहे हैं इधर/झर रहे हैं उधर।’

निर्मला तोदी की कविताएं प्रेम और प्रकृति के अलावा जीवन और संसार के अच्छे-बुरे अनुभवों से सजी हैं। इन अनुभवों ने दुनिया को नए सिरे से समझने और उसपर विचार करने की दृष्टि कवयित्री को दी है- ‘कुछ लोग/ मन को इतना संभाल कर रखते हैं/कि वो मर जाता है/फिर वश में नहीं करना पड़ता।’

‘मां सिर्फ मां होती है/ज्यादा कैसे हो/उससे ज्यादा हो ही नहीं सकती/कम भी नहीं हो सकती/ मां का हिलना/ब्रह्मांड का हिलना है।’

निर्मला तोदी की कविताएं जीवन की सचाइयों को तर्कसंगत ढंग से देखने और समझने की कोशिश करती हैं। यह चीज उनके भीतर की करुणा, दया, प्रेम आदि का विस्तार कर उसे ज्ञान से संपृक्त करती है।

‘जमो तो बर्फ की तरह/बहना हो तो नदी/ टिकना हो तो पुल बनो/झुकना हो तो पेड़/ गिरना हो तो फल/तुम/करुणा धन का पान करो।’

निर्मला तोदी की कविताएं स्त्री मन के भीतर की संवेदना, अंतर्द्वंद्व और विचारों को सरल शब्दों में अभिव्यक्त करती हैं। यही कारण है कि ये पाठकों से आसानी से ‘कनेक्ट’ हो जाती हैं।

जिज्ञासा : आपने अपने नए संग्रह का शीर्षक ‘प्रेम प्रकृति दुनिया दर्शन’ क्यों चुना?

निर्मला तोदी : इसका हर शब्द एक कविता है। हर विषय पर कविता लिखी जा सकती है, एक छोटी-सी घास से पहाड़ तक, सूखी मिट्टी की दरार से दो देशों की विभाजन रेखा पर। मुझे लगता है संग्रह का शीर्षक चिट्ठी का लिफाफा है, संग्रह के प्रति आकर्षण और एक चित्र तैयार करता है। मेरे जो मनोभाव थे, बस वे ही शीर्षक बन गए।

जिज्ञासा : इस संग्रह की सभी कविताएं आकार में बहुत छोटी-छोटी हैं पर इसके बिंब प्रभावी हैं। आखिर इसके क्या कारण हैं?

निर्मला तोदी : यह छोटी कविताओं का संग्रह है। जब कविता एक कसक एक ठसक के साथ आए तो कुछ शब्दों में ही बात पूरी बन जाती है, ऐसा मैं समझती हूँ। मैंने कुछ कविताओं को विस्तार दिया, लेकिन जब फिर लेकर बैठी तो लगा कि कम शब्दों में भाव पूरे सामने आ रहे हैं तो निरर्थक बड़ा क्यों किया जाए। छोटी कविताएं पढ़ने का आनंद अलग है। छोटी कविता अपने बिंबों के साथ ही आती है, ज्यादा सोच विचार नहीं करना पड़ता।

 

 

दुनिया को बचाना है तो बहुत से बदलाव चाहिए लेकिन शुरुआत अगर प्रेम से हो सके तो दूसरे काम ज्यादा आसान और सफल होंगे।

संजीव कौशल का नया कविता संग्रह ‘फूल तारों के डाकिए हैं’ की कविताओं से गुजरना समय के कोलाहल के बीच उपेक्षित आवाजों को सुनना है। एसी आवाजों को जो वक्त के स्याह अंधेरों के बीच कहीं गुम हैं। यह अंधेरा हमारे आस-पास अपना विस्तार करता जा रहा है। संजीव कौशल इस नाउम्मीदी के बीच उम्मीद की लौ जलाने वाले कवि हैं। इनकी कविताओं में संवेदना का एक भरा-पूरा संसार है, जो बिलकुल अपना-सा लगता है। बकौल कवि- ‘कुछ/ बस, थोड़ा सा/बचाने की कोशिश है कविता/थोड़ा हौसला थोड़ी मायूसी/थोड़ा दर्द थोड़ी हँसी/कोई मलाल कोई सुबकी/कुछ शर्म कुछ हमदर्दी।’

संजीव कौशल की पंक्तियां देखिए- ‘मैंने कहा हां/उसने कहा ना/मैंने जोर से कहा हां/उसकी ना सहम गई/मैंने और जोर से कहा हां/उसकी ना बिखर गई/इस तरह/पुरुष की हां स्त्री की ना को निगल गई।’ पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों की असहमतियां ठीक इसी तरह कुचली जाती रही हैं। व्यवस्था के विरुद्ध जाने के कारण देश में हर रोज परिवार के मान-मर्यादा के नाम पर अपने ही पिता, भाई और रिश्तेदारों द्वारा असंख्य युवतियां ‘ऑनर किलिंग’ का शिकार हो रही हैं। संजीव कौशल की ये पंक्तियां इस अमानवीयता को मार्मिक शब्दों में उद्घाटित करती हैं- प्यार में लड़कियों को जीवन तो दूर/इज्जत की मौत भी नहीं मिलती/कूड़े की तरह/वे किसी भी घूरे पर फेंक दी जाती हैं/उनके मुकदमे/अदालतों में नहीं जाते/कोई बहस नहीं होती/सीधे फैसले होते हैं।’

उनके जीवन से छुट्टी शब्द धीरे-धीरे मिट जाता है। छुट्टी भी वह दूसरों के लिए लेती हैं- ‘मुझे बीमार होने का हक नहीं/थकने का हक नहीं/ थककर कहने का हक नहीं/मेरे पास मेरे लिए कोई छुट्टी नहीं/मेरी छुट्टियां घर छीन लेता है।’

संजीव कौशल प्रेम और मनुष्यता के पक्षधर कवि के रूप में हमारे बीच मौजूद हैं। हिंसा और उन्माद के इस दौर में प्रेम के विभिन्न राग-रंगों से सजी इनकी वे कविताएं गहन आश्वस्ति की तरह हैं, जो हमारे भीतर की करुणा, सौंदर्यबोध और संवेदना को गहरे अर्थ और ऊंचाई प्रदान करती हैं।

सुंदर दृश्य और श्रव्य बिंबों ने इनकी कविताओं को अत्यधिक संप्रेषणीय और प्रभावी बनाया है- ‘पेड़ की फुनगियों को गुलेल बना/अभी-अभी जो उछाला है/ क्या तुम तक पहुंच गया/वह चांद/देखना उसकी आंखों में/आसमां के रंगों से/तुम्हारा नाम लिखा है।’

संजीव कौशल की कविताओं में प्रकृति के प्रति गहरा अनुराग देखने का मिलता है। साथ ही मौजूदा दौर में प्रकृति पर आए संकट को लेकर गहरी चिंता भी है।

नदियों के साथ हमारी संस्कृति और पहचान भी जुड़ी है। इसलिए नदियां बचेंगी तभी जीवन बचेगा, हमारी पहचान बचेगी। संजीव कौशल की पंक्तियां इस बात को पुख्ता करती है- ‘नदियों में पानी ही नहीं/ देश भी बहता है/बोलियां बहती हैं/गीत बहते हैं/खुशियां बहती हैं/ संगीत बहते हैं/नदियां पृथ्वी की बांसुरियां हैं।’

संजीव कौशल जनपक्षधर और मानवीय सरोकारों से जुड़े कवि हैं। इसलिए इनकी कविताएं कठिन दौर में जीवन यापन करने वाले हर उस आदमी की कथा कहती हैं जिनकी आवाजें इस क्रूर व्यवस्था में लगातार अनसुनी रह जाती हैं। वे कहते हैं- ‘जो सब्जियां उगाते हैं/वे सब्जियों की तरह ताजा नहीं दिखते/अपनी ताजगी/वे प्रकृति को सौंप देते हैं और जुते हुए खेतों की तरह/अगली फसल की तैयारी में जुट जाते हैं/जमीन पौधों को सींच लेती है/अपने बेटों को नहीं सींच पाती।’ किसान के लिए अपनी मिट्टी और खेत ईश्वर के समान है, वह संघर्ष स्वीकारता है पर अपनी जमीन का सौदा नहीं करना चाहता।

‘एडहॉक’ सीरीज की पांच कविताएं शिक्षा व्यवस्था के भीतर मौजूद अमानवीयता, शोषण और क्रूरता की बदरंग तस्वीरें हमारे सामने लाती हैं- ‘वह हँसना टालता रहता है/बोलना टालता रहता है/जीना टालता रहता है/मरना टालता रहता है/मां बाप से ऐसे मिलता है जैसे कोई अपराधी/लोगों ने खुरच खुरच कर/उसकी पसलियों पर लिख दिया है:/एडहॉक/ ताकि वह सांस ले तो गिनती हो सके। इन कविताओं को पढ़ते हुए हम कई बार स्तब्ध हो जाते हैं।

इस पूरे कविता संग्रह से गुजरते हुए हमारा परिचय एक बेहद संवेदनशील कवि के साथ होता है, जिसके पास गंभीर काव्य भाषा और अद्वितीय शैली है। काव्य में एक गजब का प्रवाह और लयबद्धता है। बिंबों और प्रतीकों के प्रयोग के मामले में भी कवि काफी सजग है। ये कविताएं हमारी संवेदना को भले चुपके से छूती हैं, पर इसका असर लंबे समय तक हम पर बना रहता है।

जिज्ञासा : वर्तमान समय में प्रेम और प्रकृति का जीवन और कविता में बचा रहना क्यों जरूरी है?

संजीव कौशल : आज हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहां हिंसा के नए-नए रूप सामने आ रहे हैं। सुबह का अखबार खोलें या टीवी या सोशल मीडिया देखें हर जगह हिंसा की प्रमुखता है। कई बार सोचता हूँ कि हम किस तरफ बढ़ रहे हैं। हमारी फिल्में हिंसा का चित्रण और गुणगान करती क्यों दिखाई देती हैं? जरूरत इस बात की है कि दूसरे के सम्मान का भाव समाज में जब तक गहरे रूप में स्थापित नहीं होगा तब तक तस्वीर ऐसी ही रहेगी।

प्रकृति से हम निश्चित रूप से दूर जा रहे हैं, प्रकृति को एक साधन की तरह देखने लगे हैं जबकि वह हमारे अस्तित्व की पहली शर्त है। अगर हम प्रकृति के करीब रहे तो इस बात की पूरी संभावना है की जो टूटन समाज में दिखाई दे रही है वह जोड़ी जा सकती है। दुनिया को बचाना है तो प्रेम को गहराई से समझना और समझाना होगा। बहुत से बदलाव चाहिए लेकिन शुरुआत अगर प्रेम से हो सके तो दूसरे काम ज्यादा आसान और सफल होंगे।

जिज्ञासा : आज के समय की चुनौतियों से भिड़ने में कविता कितनी सफल है?

संजीव कौशल : जो चुनौतियां समाज के समक्ष हैं, वे ही कविता के समक्ष भी हैं। कोई कवि अपने समाज की चुनौतियों से दूर नहीं भाग सकता और न ही वह यह तय कर सकता है कि वह कुछ खास समस्याओं पर ही बात करेगा, बाकी पर नहीं। कवि को इसकी कोई छूट नहीं होती और न हो सकती है। इसलिए कवि का दायित्व और चुनौती दोनों बहुत बढ़ जाते हैं।

दलितों और आदिवासियों जिनकी आवाज हजारों साल से अनसुनी ही रहीं, हिंदी कविता के माध्यम से सशक्त रूप से दुनिया के सामने आई हैं। आज उनके मुद्दे और संघर्ष आमजन के बीच हैं। हिंदी कविता ने जिस तरह का स्पेस दलित और आदिवासी मुद्दों को दिया, उससे ये मुद्दे मुख्य धारा में शामिल हुए हैं और आमजन की संवेदना इन मुद्दों से विस्तृत हुई है। स्त्रियों के संघर्ष भी हिंदी कविता में बखूबी आए हैं। आज सैकड़ों की तादात में कवयित्रियां हमारे बीच में मौजूद हैं जो बिना किसी डर और झिझक के स्त्रियों से जुड़े मुद्दों को समाज के बीच लेकर आ रही हैं। गरीबी-अमीरी की खाई को हिंदी कविता ने एक लंबे समय से केंद्र में लाने की कोशिश की है, लेकिन जिस तरह राजनीतिक माहौल देश में बदला है उससे लगता है कि गरीब को बहुत पीछे धकेल दिया गया है और उसकी आवाज अब सत्ता के केंद्रों तक नहीं पहुंच रही। फिर भी हिंदी का लगभग हर कवि उनकी आवाज में अपनी आवाज मिलाने की कोशिश कर रहा है और यह एक बड़ी बात है।

धार्मिक उन्माद एक और बड़ी समस्या है जिस पर गंभीरता से बात करने की जरूरत है लेकिन यह विषय कुछ कवियों को छोड़कर बाकी कवियों से जैसे दूरी बनाए हुए है। शायद इसका कारण समाज में बढ़ता हुआ धार्मिक ध्रुवीकरण है। किसानों की समस्याएं हों या राजनीतिक भ्रष्टाचार या क्षेत्रीय और भाषाई तनाव, आज की हिंदी कविता तमाम उन क्षेत्रों तक पहुंच रही है जहां वह पहले नहीं जा सकी थी और उसमें कहने की आजादी की एक धुन सुनाई देती है जो आस्वस्त करने वाली है।

 

 

स्मृति हमारे अनुभवों, संबंधों, हर्ष-विषाद, छूटी-बिछड़ी चीजों से ही बनती है। हर कवि अपनी कविता में समय की चिंताओं के बीच स्मृतियों से ही प्रकाश ग्रहण करता है।

हमारा वर्तमान विचित्र उथल-पुथल का दौर है, जहां संबंधों के नाम पर आत्मवंचना है और संवाद की जगह सतही प्रतिक्रियाएं हैं। हम खुद से भागते हुए, दूसरों में कुछ तलाशने की अधीरता में जी रहे हैं। ऐसे समय में कुछ कविताएं आती हैं जैसे पुराने घर की दीवारों से उठती सोंधी गंध हों। गौरव पांडेय का कविता संग्रह ‘स्मृतियों के बीच घिरी है पृथ्वी’ ऐसी ही कविताओं का एक अनूठा संसार रचता है। यह संग्रह सिर्फ कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि स्मृतियों की पृथ्वी पर ले जाने वाली एक एसी आत्मीय यात्रा है जहां संबंधों की गंध अब भी ताजा है, अकेलापन भी आत्मीयता से भरपूर है और जहां एक भटकी हुई पीढ़ी की बेचैनी एक गहरे अनुभव में ढल जाती है। ये कविताएँ हमें उन भावनाओं की ओर ले जाती हैं जो अकसर अनुभव में तो आती हैं, पर शब्दों में कही नहीं जातीं।

गौरव पांडेय मूलतः प्रेम और मनुष्यता के पक्षधर कवि के रूप में पहचाने जाते हैं। उनकी कविताओं का सबसे मजबूत पक्ष उनके गहन मानवीय और सामाजिक सरोकार हैं, जो अपनी विविधता में भी एक गहरे भावनात्मक सूत्र में बँधे हुए दिखाई देते हैं।

ये कविताएं बताती हैं कि हमारी जड़ें उन अनुभवों, यादों और व्यक्तियों में निहित हैं जिन्होंने हमें आकार दिया है। मां की स्मृति को नदी और ऋतु के रूप में देखना उसके शाश्वत प्रभाव को दर्शाता है। गौरव पांडेय के शब्दों में- ‘अमरबेल हैं स्मृतियां…/और स्मृतियों की जड़ें बहुत गहरी हैं जैसे दुख की।’

‘न्यूनतम मनुष्य बने रहने के लिए’ कविता मानवीय मूल्यों को बनाए रखने और अपने संघर्षों को न भूलने की सलाह देती है- ‘लेकिन मेरे दोस्त! कभी मत भूलना/ उन खेत की पगडंडियों को जिन पर तुमने चलना और संभलना सीखा/ मत भूलना गांव जाती उस राह को जिस पर चलते हुए/ तुम यहां पहुंचे/अपने कंधों पर गिरे अपनों के आंसुओं को/ और उन हाथों को कभी मत भूलना/जो संघर्ष के दिनों में/साथ थे।’

उनकी ‘उन्माद’ कविता सत्ता, धर्म, युद्ध और विकास के नाम पर होनेवाले अतिरेक और पागलपन की आलोचना करती है- ‘कुछ लोग युद्ध के उन्माद में हैं/तो कुछ विकास के/ कुछ धर्म के/उन्माद में राजा सैनिकों की बलि दे सकता है/उन्माद में राजा चरण धो सकता है/ उन्माद में राजा नंगा हो सकता है/ कहते हुए कि नंगई जरूरी है/राष्ट्रहित में।’ यह कविता हमें विवेक और संतुलन बनाए रखने की सीख देती है।

गौरव पांडेय की विशेषता है कि वह साधारण बोलचाल के शब्दों में गहरा अर्थ और भाव भर देते हैं, जैसा कि ‘झुठ्ठा’ कविता में है- ‘शब्द आत्मा के वस्त्र होते हैं/और आप जितनी बार झूठ बोलते हैं/यह वस्त्र उतनी बार/उतरते हैं/आपने इतने-इतने-इतने झूठ बोले हैं कि/मंच पर फूहड़ अभिनय करते हुए/जनता के बीच आप/नंगे खड़े हैं।’

उनकी अनेक कविताएं संक्षिप्त हैं, लेकिन अपने छोटे कलेवर में भी वे गहरा प्रभाव छोड़ती हैं, यह कवि की भाषा पर पकड़ और भावनाओं को संक्षेप में व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता को दर्शाता है। ‘एक मृत्यु’ शीर्षक कविता की बानगी देखिए- ‘एक बीज की मृत्यु से एक वृक्ष मरता है/ एक बच्चे की मृत्यु से एक/ परिवार/ एक चिड़िया की मृत्यु से/ उजड़ता है एक/ घोंसला/ कविता कहती है एक स्वप्न की मृत्यु से/ नहीं मरता जीवन, न उम्मीद/ न संघर्ष/ लेकिन एक सत्य जिसे कोई नहीं कहता/ कि रिक्त कोटर हो जाती है देह/ जिसमें कोई सुग्गा/नहीं रहता।’

इन सभी कवियों की कविताएं न केवल मानवीय संबंधों की जटिलताओं को उजागर करती हैं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक यथार्थों पर भी मुखर टिप्पणी करती हैं। ये नई सदी के उन महत्वपूर्ण कवियों में हैं, जिनमें असीम संभावनाएं हैं।

जिज्ञासा : अपनी कविताओं में आप बार-बार पुरानी स्मृतियों में लौटते हैं। कविता और स्मृति के अंतर्संबंध पर आप क्या कहना चाहेंगे?

गौरव पांडेय : स्मृतियां विवेक के हाथों की टार्च हैं। जहां तक स्मृतियों में लौटने का सवाल है, उचित-अनुचित का विवेक मुझे स्मृतियों से ही मिला है। संग्रह की तमाम कविताएं स्मृतियों की भूमि पर ही जन्म लेती हैं। उनकी जड़ें मेरे परिवेश में गहरे उतरी हैं। स्मृति हमारे अनुभवों, संबंधों, हर्ष-विषाद, छूटी-बिछड़ी चीजों से ही बनती है। हर कवि अपनी कविता में समय की चिंताओं के बीच स्मृतियों से ही प्रकाश ग्रहण करता है।

उन्हें शब्द देता है। इस संग्रह में स्मृतियां वस्तु के रूप में नहीं हैं टार्च के रूप में हैं जो आवश्यकता पड़ने पर मार्ग को सुगम बनाती हैं; आलोकित करती हैं।

स्मृति बीते हुए को केवल याद करना नहीं है बल्कि अपने समय के अंधेरे के लिए थोड़ा-सा प्रकाश लेना है। अपने को रिचार्ज करना है। एक कवि जब किसी स्मृति को कविता की अंतर्वस्तु बनाता है तो वह उसे पुनः जीता है, उसकी नमी से गीला होता है; उसके ताप से ऊष्मा लेता है। कविता स्मृति का रचनात्मक विस्तार करती है। यह एक ऐसा पुल निर्मित करती है जो गुजरे कल और आज को जोड़ती है। मुझे लगता है दुख और स्मृति किसी भी कवि की अपनी निजी पूंजी होती है जिसे वह लोक के लिए खर्च करता है। अपने समय, समाज और परिवेश की स्मृति से हर कवि ही जुड़कर लिखता है। जो नहीं जुड़ता वह अपनी जड़ों से कटा होता है। स्मृतिविहीन कवि लोक के किसी काम का नहीं होता है।

जिज्ञासा : हिंसक होते समय के बीच प्रेम और मानवीय मूल्यों को बचाने में कविता की क्या भूमिका होनी चाहिए?

गौरव पांडेय : समय हिंसक नहीं होता है; हम होते हैं। जैसे एक दुनिया में कई दुनियाएं होती हैं वैसे ही एक समय में कई समय। यह त्रासद है कि हम एक ऐसे समय में जीने को अभिशप्त हैं जो लगभग मूल्यहीनता की ओर बढ़ रहा है। हम अधिक खुदगर्ज, अधिक अनुदार और अधिक असहिष्णु हुए हैं। मूल्यों का क्षरण जीवन का क्षरण है। मनुष्यता और सभ्यता का क्षरण है। मुझे लगता है हमें समय से नहीं लड़ना है खुद से लड़ना है क्योंकि इसे हमने ही रचा है। हिंसा की जड़ें हमारे ही भीतर से बाहर आई हैं।

ऐसे समय में जब भय, असुरक्षा, अविश्वास और असहिष्णुता का वातावरण है, तब कविता एक सांस्कृतिक प्रतिरोध के रूप में हस्तक्षेप करती है। वह प्रेम, करुणा, संवेदना और न्याय को स्वर देती है। हमें ठहरकर सोचने का अवकाश देती है जहां हम उस मनुष्य को पहचान सकते हैं जिसे हिंसा, राजनीति या स्वार्थ ने मूल्यहीन कर दिया है।

कविता नफरत के बरअक्स संवाद और समझदारी की दुनिया रचने की कोशिश करती है।  ईमान की बात कहते हुए उसे बिगाड़ का डर नहीं होता। साहस रचती है और यह साहस उम्मीद रचता है। कविता इसी तरह हस्तक्षेप करती है। वह हमें याद दिलाती है कि हम केवल उपभोक्ता या नागरिक नहीं हैं, बल्कि संवेदनशील, संबंधों में जीने वाले मनुष्य हैं। वह हमारी जड़ों से हमें जोड़ती है। स्मृतिविहीन होने से बचाती है। कविता यह करती रही है और हम अपने समय से संघर्ष करते हुए एक बेहतर दुनिया का सपना इसी के भरोसे रच रहे हैं।

 

समीक्षित पुस्तकें 

(1) जब चीजें देर से आती हैं जीवन में – निशांत, सेतु प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2025, मूल्य: 175  (2) रुंधे कंठ की अभ्यर्थना – स्मिता सिन्हा, सेतु प्रकाशन, प्रथम संस्करण- 2025, मूल्य: 249 (3) भाषा में नहीं – सपना भट्ट, सेतु प्रकाशन, प्रथम संस्करण- 2024, मूल्य: 275  (4) प्रेम प्रकृति दुनिया दर्शन – निर्मला तोदी, सेतु प्रकाशन, प्रथम संस्करण – 2025, मूल्य: 160 (5) फूल तारों के डाकिए हैं – संजीव कौशल, लोकभारती पेपरबैक्स, प्रथम संस्करण-2025, मूल्य : 250 (6) स्मृतियों के बीच घिरी है पृथ्वी – गौरव पांडेय, सेतु प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2023, मूल्य: 180

गली न. 18, मकान सं. 2/1/1/1, मानिकपीर, पोस्ट-कांकीनारा, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल-743126 मो. 9339487500

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