
वरिष्ठ कवि।अद्यतन कविता संग्रह ‘बैंड का आखिरी वादक’।
बच्चे की मुस्कान
बच्चे की मुस्कान सुबह की पहली किरण है
जो बिना पूछे खिड़कियों पर उतर आती है
वह किसी दर्शन की किताब नहीं पढ़ती
फिर भी जानती है-
कि दुनिया को बचाने के लिए
एक खिलखिलाहट काफी है
उसके होठों पर
भविष्य की छोटी-सी नाव तैरती है
जिसमें न युद्ध है, न सीमाएं, न शक के कांटे
बच्चे की मुस्कान मां की थकी हुई आंखों में
आराम का तकिया रख देती है
पिता की चिंताओं पर
हल्की-सी धूप बिछा देती है
वह मुस्कान
रोटी के टुकड़े को भी उत्सव बना देती है
टूटी हुई गेंद को पूरा ब्रह्मांड
जब वह हँसता है तो लगता है-
ईश्वर ने अपनी सबसे सच्ची प्रार्थना
धरती पर उतार दी है
और हम अपने सारे तर्कों, सारी शिकायतों
सारे हिसाब-किताब के बीच
अचानक भूल जाते हैं-
कि जीवन का असली अर्थ
शायद उसी छोटे-से दांतों भरे उजाले में छिपा है।
जंगल का फूल
वह
किसी बाग की योजना में शामिल नहीं था
न किसी माली की उंगलियों ने
उसे मिट्टी में सपने की तरह दबाया था
वह उगा-
जैसे चुप्पी उगती है शोर के किनारे
जैसे उम्मीद उगती है सबसे बंजर खबरों के बीच
कांटों, कंकड़ों, सूखी पगडंडियों की धूल में
उसने अपना छोटा सा सूरज खोला
पीली पंखुड़ियों में एक निजी सुबह बांध ली
उसे कोई नाम नहीं देता
कोई उसे तोड़ कर
देवी के चरणों में नहीं रखता
न प्रेमी उसे क़िताबों में सुखाते हैं
वह प्रेमपत्रों से बाहर का फूल है
फिर भी सबसे पहले
उसी पर रुकती है भटकी हुई तितली
उसी से बात करती है हवा बिना शर्तों के
जंगली फूल जानता है-
सुंदरता को देखे जाने की जरूरत नहीं
बस खिलना आना चाहिए अपनी ही वजह से
और शायद ईश्वर भी
उसी को ज्यादा देर तक देखता होगा
जो किसी बाग के भीतर नहीं
खुले जोखिम में खिलता है।
सिक्के
जेब में खनखनाते हैं कुछ छोटे-छोटे सूरज-
धातु के गोल टुकड़े
जिन पर उभरे हैं चेहरे
और पीछे उभरी है एक अद़ृश्य भूख
सिक्के चलते हैं हथेली से हथेली
पसीने से भीगते, बाजार की धूल चाटते
तराजू की नजर से तौले जाते-
जैसे मनुष्य की नीयत
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं-
एक पर सत्ता की मुहर
दूसरे पर वक्त की खरोंच
फेंको तो उछलता है भाग्य
गिरता है तो निर्णय बन जाता है
कुछ सिक्के मंदिर की थाली में चमकते हैं
कुछ चौराहे पर फैले हाथ में खामोश हो जाते हैं
बच्चा उन्हें गुल्लक में बंद कर
भविष्य का सपना बुनता है
बूढ़ा उन्हें गिन-गिनकर
अतीत का हिसाब चुकाता है
सिक्के सिर्फ मुद्रा नहीं
वे समय के छोटे-छोटे चक्र हैं-
घूमते रहते हैं इतिहास की उंगलियों पर
और हम उनकी खनक में
अपनी कीमत तलाशते रहते हैं
पर एक दिन सिक्के भी थक जाते हैं-
घिसकर सपाट हो जाते हैं उनके चेहरे
मिट जाती है पहचान
रह जाती है बस धातु की ठंडी गोलाई
तब समझ में आता है-
कीमत धातु में नहीं, न मुहर में, न खनक में
कीमत उस हाथ में है जो कमाता है
और उस दिल में
जो खर्च करते समय
मानवता बचाए रखता है
सिक्के घूमते रहेंगे
बदलते रहेंगे राज और बाजार-
पर मनुष्य यदि अपनी आत्मा को खोटा न होने दे
तो वही सबसे अनमोल सिक्का है।
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