वरिष्ठ गजलकार। दस  ग़ज़लसंग्रह, ग़ज़ल केंद्रित आलोचना की पुस्तकें। संप्रतिस्वतंत्र लेखन।

एक

फरिश्ता इक ठिकाना चाहता है
हमारे बीच आना चाहता है

रिहाई तुमसे पाना चाहता है
परिंदा फड़फड़ाना चाहता है

धुंधलके पर हवा की थपकियां दो
उजाला मुस्कराना चाहता है

हवन की आग में घर को जलाकर
कोई भगवान पाना चाहता है

जमी है धूल दहशत की जुबां पर
नज़र से ही बताना चाहता है।

दो

तुझसे है फ़ासला रहे तो रहे
ज़िंदगी है खफ़ा रहे तो रहे

पत्थरों से मैं क्या दुआ मांगू
वो जो है देवता रहे तो रहे

बंट गए हम हज़ार टुकड़ों में
है कोई आईना रहे तो रहे

रहजनों से भी सच कहा हमने
मेरा साया खफ़ा रहे तो रहे

दीप रखेंगे हम मुंडेरों पर
अब मुखालिफ़ हवा रहे तो रहे।

तीन

हो अगर ये आपके कुछ काम का रख लीजिए
ढूंढ लेंगे घर हमारा यह पता रख लीजिए

आपके पुरखे हमेशा याद आएंगे हुज़ूर
धूप को जोगन बनाने की कला रख लीजिए

सच अगर साधु की बस्ती का समझना हो तो फिर
चोर दरवाज़े-सा कोई रास्ता रख लीजिए

चाय पीना और पिलाना तो बहाना है महज़
आने-जाने का कोई तो सिलसिला रख लीजिए

सब अंधेरे दूर हो जाएंगे काली रात के
हाथ पर अपने जलाकर एक दीया रख लीजिए।