फ्रांसिस्को मुनोज सोलर
(1957) स्पेनी कवि। कुल 31 कविता-संग्रह प्रकाशित। इनकी कृतियों के अनुवाद विश्व के कई भाषाओं में हुए हैं।

 

अनीता पंडित
(1982) अनुवादक और संपादक। साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका ‘संवदिया’ का दस वर्षों का संपादन। ए. जे. थॉमस की अंग्रेजी कविताओं के हिंदी अनुवाद संग्रह ‘आगामी पल का निर्माण’ की सह-अनुवादिका।

 

 

फूल के लिए संभव नहीं

कैसे संभव है यह
एक फूल के लिए
कि अपने सुगंधित सौंदर्य की
चरमावस्था में
सांत्वना देने के लिए
एक निरर्थक दर्द को
अपनी पंखुड़ियों के मुरझाने की इच्छा करे

इसका कारण निरर्थकता में है
वह करता है इंतजार
उस क्षय के रुकने का
जो बस सीमित है
एक संख्या की ठंडक में
क्या मूल्य है उसके जीवन का?

दिसंबर

दिसंबर, वह आखिरी पत्ता
जो चिपका है
एक पुराने कैलेंडर पर
विदा लेता है दुखी होकर
जाड़े के आगमन के साथ
आशीर्वाद की कामना की जाती है
लाखों उपहारों का आदान-प्रदान होता है
लेकिन ठंड दूर नहीं होती
न ही मजबूर लोगों का अकेलापन
न ही उन अपमानित युवाओं के घर की यादें
जो विस्मित हैं उन कारणों को जानकर
कि अपने को इंसान मानने के
उनके अधिकारों का अपहरण हो गया है।

मेरी स्मृति की सघन दैहिकता

मेरी स्मृति की सघन दैहिकता
उबलती है खूबसूरत कड़ाही में
जहां मेरी वास्तविकताओं और सपनों की
खुशबूएं पकती हैं
इतना सारा भावनात्मक बोझ
और सत्य एवं स्वप्न के बीच
की महीन रेखा
सबकुछ मानों अदृश्य हो गया है
सब घुलमिल गए हैं
एक ऐसा मैग्मा बनाने के लिए
जो इतना सच्चा और स्पष्ट है
कि उसके मूल स्वाद और संरचना
अब वापस नहीं लाए जा सकते।

आमीन

प्रबुद्ध लोग
जो अपने को चुना हुआ मानते हैं
उन्हें यह विश्वास दिलाना कि उनका
अद्वितीय, सैद्धांतिक और गंभीर ईश्वर
जीवनयात्रा में मूल्यवान है-
एक कठिन कार्य है

मुक्ति का दिव्य संदेश पानेवालों को
निरंतर संघर्ष करना चाहिए
उन विरोधियों के खिलाफ
जो उनके नियमों को मानना आवश्यक नहीं समझते
या बचाए जाने की इच्छा नहीं रखते

उनके ईश्वर में आस्था थोपने का
यह निरंतर प्रयास
एक क्रूर हथियार है
अनास्थावादियों के देवदूत के विरुद्ध
दिव्य आघातों से
उनके विचारों और जीवन को बदलो
ताकि वे भयभीत हों और
आज्ञाकारी बनने
अपने स्वर्ग में सुरक्षित रहने की कामना करें

वे मानते हैं कि कोई एक साथ
ईश्वर और संसार-
दोनों की सेवा नहीं कर सकता।

क्यों होती हैं सारी क्रांतियां?

क्यों सारी क्रांतियां
‘जरूरी न्याय’ के बहाने
उदार लोगों की स्वतंत्रता के
नकार में समाप्त होती हैं?

क्यों मूर्खता ढक लेती है
अतिरेकपूर्ण वैभव में फूले हुए
विजयी नायकों के
अंतःकरण की आवाजों और आत्माओं को?

क्यों खिली हुई खुशियां
अधीनों और अत्याचारियों के स्वर्ग में
स्वदेशों, झंडों और लालच की दुर्गंध को
खत्म कर देती हैं?

पुनर्स्थापना

अपने क्षणों के ऊंचे पठार पर
मैं अपने जीवन-कार्य से असंबद्ध
दिनों को भूल जाना चाहता हूँ
पहचानना चाहता हूँ खुद को
अपने बढ़ाए गए कदमों में
अपनी आत्मा की अनुभूति में
अपने संक्षिप्त स्थान को प्रकाशित करते हुए

मेरी गहनता की परछाइयों को पार कर
नए निर्णय खड़ी करती हैं दीवारें
अपने ही सुबह तथा
प्रेम, हानि और अनुभव के गारे से
बोते हैं वह बीज
जो मेरे जीवन की रोशनी को निर्देशित करता है

बिना किसी ग्रहण के
मेरी कोमलता के सद्भाव को जीते हुए
संदेहों और विश्वासों की अनिश्चितता में
एक जटिल क्षितिज में खुद को विस्तृत करते हुए
परिवर्तन की हवाओं के लिए तैयार रहें
वर्तमान में होकर, निराशा को परास्त करें।

फ्रांसिस्को मुनोज सोलर: मो. +34 678 74 10 58  / ईमेल : franciscomunozs2003@gmail.com

अनीता पंडित: फ्लैट नं. ए 1106, ऑफिसर सिटी-1, राजनगर एक्सटेंशन, गाजियाबाद 201017 (उ.प्र.) मो. 9868566420, / ईमेल :anitapandit5090@gmail.com