ख़ास चिट्ठी :

अनामिका सिंह, कोन्नगर

सितंबर 2019 के उत्तरार्ध में प्रकाशित वागर्थ की कविताएँ उन अनकहे पहलुओं को उजागर करने की कोशिश करती हैं जहाँ से हम भरसक अनजान बने रहने की कोशिश करते हैं। ज्योति चावला की कविता ‘उनके पैरों की आवाज से कांप रही है पृथ्वी’ उसी बदरंग पहलू को दर्शाती है। संपूर्ण लॉकडाउन के समय सोशल मीडिया पर व्यंजन बनाने और पोस्ट करने की होड़ में सभ्य समाज ने प्रवासी मजदूरों के दर्द को अनदेखा कर अपने आरामदायक आशियाने में बैठकर हम केवल चर्चा करते रहे उनकी स्थिति की। जमीनी स्तर पर उनकी अनदेखी की। वंदना वाजपेयी की कविता ‘हम सब हत्यारे हैं’ में अभिजात वर्ग की अनदेखी का ही चित्रण है जहाँ अपने वैभव के प्रदर्शन में वे उस व्यक्ति के दर्द को भूल जाते हैं जिसका पूरा जीवन परिवार का पेट भरने की जद्दोजहद में गुजर जाता है।

मालिनी गौतम की रचना ‘अकेलापन इतना उपजाऊ पहले न था’ रेगिस्तान में ठंडी बयार के समान लगी। सच में भीड़ में अकेले आदमी के लिए कोरोना काल का अकेलापन वरदान साबित हुआ। व्यस्तता में उलझे रहने वाले जनसमाज को रिश्तों पर पड़ी धूल को झाड़ कर उसे पुनर्जीवित करने का समय मिला। कितने दिन के लिए? यह तो पता नहीं, पर इस अकेलेपन ने हमें रिश्तों की दुनिया वापस जरूर लौटा दी है।

समाज को सचेत करने वाली बहस

बिर्ख खड़का डुवर्सेली, दार्जिलिंग

कोरोना काल में शिक्षा, उद्योग, व्यापार सभी क्षेत्रों में सबको मुसीबतें भोगनी पड़ी। सामान्य स्थिति अभी तक नहीं आई है। सितंबर (16-30) 2020 अंक में बहस स्तंभ में प्रकाशित ‘बच्चों की दुनिया का हाल’ में आरती स्मित, अर्चना सिंह और देवेंद्र मेवाड़ी के विचार समसामयिक समस्याओं को उजागर करके समाज को सचेत करते हैं। रजनी पांडेय का आलेख ‘अस्मिता का बदलता अर्थ’ बहुत रोचक और उल्लेखनीय है, क्योंकि अस्मिता के अर्थ को आज के संदर्भ में पश्चिमी चिंतकों के कथन के साथ विवेचन करके प्रस्तुत किया गया है।