कहानीकार
पद्मश्री (2007) और साहित्य अकादमी (2013) के पुरस्कार से सम्मानित नगालैंड की कवि और कथाकार।नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी में लंबे समय तक अंग्रेजी की प्रोफेसर रहीं।यह कहानी कुछ दशकों पहले के संघर्ष काल की नगा मानसिकता को प्रतिबिंबित करती है।

अनुवाद
आकाशवाणी में उद्घोषणा और कार्यक्रम संचालन। बांग्ला तथा अंगरेजी से अनुवाद।एक कविता संग्रह हजार हाथ

छोटी बच्ची का जन्म गाने के लिए ही हुआ, ऐसा लगता था।उसकी मां अकसर बताती कि वह जब बहुत छोटी थी, त्योहार के समय वह अपना पिगीबैक सामुदायिक गान के कार्यक्रम में लेकर जाती थी।जब गायक धुन शुरू करते और धीरे-धीरे जब सबके सुर मिलकर एक साथ तेज होने लगते, उसकी बेटी उसी समय आवाज में लरज लाते हुए तान भरती, कभी एक तरह से, कभी दूसरी तरह से।वह गीत को अपनी शैली में गाना शुरू कर देती, पर अधिकांशतः वह चीख-चिल्लाहट से भरी होती।शुरू में यह मनोरंजक लगता, लेकिन बाद में उसकी बेटी के स्वर दर्शकों-श्रोताओं और गायकों को परेशान करते थे।वह प्रायः घबराकर अपना गान अधूरा छोड़ देती।मां इसे एक वर्ष से भी कम उम्र के बच्चे का अजीबोगरीब व्यवहार मानती थी।दरअसल यह इस बात का संकेत था कि उन्होंने प्रतिभाशाली गायक को जन्म दिया है।

जब नन्ही बच्ची अपेन्यो कुछ-कुछ  बोलने और चलने लगी तो उसकी मां उसे हर रविवार गिरजाघर ले जाने लगी, योंकि उसे घर पर अकेले नहीं छोड़ा जा सकता था।अन्य दिनों में जब उसकी मां खेतों में काम करने जाती, तब उसे उसकी दादी की देखरेख में रखा जाता।रविवार को उसकी देखभाल के लिए घर पर कोई नहीं होता था, योंकि इस दिन सभी लोग चर्च चले जाते थे।जब सब लोग एकसाथ प्रार्थना गाते थे तो अपेन्यो भी उनके साथ गाने लगती थी।सामूहिक गान के बीच उसकी चिल्लाहट सुनाई नहीं देती थी।लेकिन जब कोई विशेष प्रार्थना की जाती, तब मुश्किल हो जाती।अपेन्यो सबके साथ गाने की कोशिश करती, जिससे मां की दिकतें बढ़ जातीं।इस प्रकार के संतापग्रस्त दो-तीन रविवार गुजरने के बाद मां ने चर्च जाना तब तक के लिए बंद कर दिया, जब तक अपेन्यो थोड़ी बड़ी नहीं हो गई।

घर पर भी अपेन्यो कभी शांत नहीं रहती।वह गुनगुनाती रहती या फिर खुद ही उल्टेसीधे गीत बनाबनाकर गाती रहती।इससे कभीकभी उसकी मां परेशान हो जाती।लेकिन वह ज्यादातर उदास हो जाती।अब वह मानने लगी थी कि उसकी बेटी को गाने के प्रति लगाव उसके पिता से विरासत में मिला है।

उनकी मृत्यु अप्रत्याशित ढंग से घर से काफी दूर हुई थी।उसके पिता जैंबेन पारंपरिक लोकगीतों और चर्च के ईसाई भजनों के एक प्रतिभाशाली गायक थे।नगाओं के सामूहिक पारंपरिक गीतों में संगति होती है।शायद लोकगीतों के अपने अनुभव और अपनी सिद्धहस्तता के कारण जैंबेन भजनों की नई-नई धुनें बड़ी सरलता से चुनता था।जल्दी ही वह चर्च के गायक दल का मुख्य गायक बन गया था।वह गांव में एक विद्यालय में अध्यापक था।

मृत्यु के समय जैंबेन असम के एक कस्बे में शिक्षकों के लिए आयोजित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में था।वह अचानक बीमार पड़ गया।जब तक खबर गांव में पहुंची, वह मर चुका था।जब उसके रिश्तेदार उसे देखने जाने की तैयारी कर रहे थे, प्रशिक्षण विद्यालय के उसके मित्र उसका शव लेकर घर आ गए।अपेन्यो उस समय केवल नौ महीने की थी।तब से अब तक उसकी मां का एकमात्र संघर्ष यह था कि वह खेती और इस छोटी बच्ची का पालन-पोषण अपने बल-बूते करे।बीच-बीच में अपने ससुराल वालों और अपने खुद के रिश्तेदारों की मदद से विधवा लिबेनी धीरे-धीरे अपनी बेटी और अपना भविष्य गढ़ रही थी।बहुत से रिश्तेदारों ने उससे कहा कि वह फिर से शादी कर ले, ताकि एक पुरुष हो जो उसका और उसकी नन्ही अपेन्यो का खयाल रख सके, उनकी देखभाल कर सके।लेकिन लिबेनी उनकी बात नहीं सुनती।वह उनसे कहती, वे फिर कभी यह बात अपनी जबान पर न लाएं।मां और बेटी अकेले रहतीं और खेत में जो कुछ होता, मुख्यतः उसी से अपनी आजीविका चलातीं।

ओपेन्यो कुछ बड़ी हुई।गांव के विद्यालय में वह अच्छा कर रही थी।वह सबकी प्रिय छात्रा बन गई थी।जब इतनी बड़ी हो गई कि करघे पर सूत फैलाने में मां की मदद कर सके, वह पास बैठकर बहुत ध्यान से अपनी मां को रंगबिरंगे शाल बुनते देखा करती।इसे बेचकर घर के लिए कुछ अतिरिक्त आय हो जाती थी।लिबेनी को गांव में सबसे अच्छे बुनकरों में एक माना जाता था।उसके शालों की मांग बहुत ज्यादा थी।

धीरे-धीरे अपेन्यो ने भी अपनी मां से यह कला सीख ली और उसी की तरह एक श्रेष्ठ बुनकर बन गई।इसके साथ गाने के लिए भी उसका प्रेम बढ़ता जा रहा था।लोगों को समझ में आ गया कि उसे गायन से सिर्फ प्रेम नहीं है, बल्कि उसकी आवाज़ गायन के लिए एकदम उपयुक्त है।उसे चर्च के गायक कलाकारों के दल में शामिल कर लिया गया।जल्दी ही वह मुख्य गायक की भूमिका में आ गई।जितनी बार भजन गायकों का दल अपनी प्रस्तुति देता, उसकी आवाज़ के असर से साधारण से साधारण गीत में अलौकिक भाव पैदा हो जाता।

अपेन्यो जब अठारह की हो रही थी, उसकी आवाज के जादुई प्रभाव के साथसाथ उसका सौंदर्य भी निखार पर था।उसका नैसर्गिक सौंदर्य उसकी मोहक आवाज से बढ़ जाता था।इसकी वजह से गांव में प्यार से उसे गाता हुआ सौंदर्य’ (स्वर सुंदरी) कहा जाने लगा।लिबेनी की खुशी का ठिकाना नहीं था।वह खुश थी कि अकेलेपन और कठिनाइयों के बदले पुरस्कार के रूप में ईश्वर ने उसे सुंदर और प्रतिभाशाली पुत्री दे दी है।

इस वर्ष ग्रामवासी काफी उत्साह में थे, योंकि लगभग छह महीने के बाद गांव के पुराने चर्च की जगह नए चर्च भवन के शुभारंभ के अवसर पर एक विराट कार्यक्रम का आयोजन होने वाला था।चर्च के हर सदस्य ने इस भवन निर्माण निधि में नकद और अन्य रूपों में दान देकर अपना योगदान दिया था।बांस और फूस की पुरानी छत के बदले टीन की छत और लकड़ी का फ्रेम बनाने में करीब तीन साल का समय लग गया था।हर घर में स्त्रियां परिवार के लिए नए वस्त्रों की योजनाएं बना रही थीं, पुरुषों के लिए एकदम नए शाल, स्त्रियों के लिए नई स्कर्ट या लुंगियां।इस अवसर के लिए पूरा गांव ही सजाया-संवारा जा रहा था, योंकि आसपास के गावों से कुछ खास धर्मगुरुओं, पुरोहितों को इस उद्घाटन कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था।भोज आयोजित करने के लिए चुने गए सुअरों को मोटा बनाने के लिए विशेष भोजन दिया जा रहा था।

यह कार्यक्रम दिसंबर के प्रथम सप्ताह में आयोजित होने वाला था।जाहिर था कि उस समय तक फसलों की कटाई पूरी हो चुकी होगी।यह भी तय था कि विशेष समारोह चर्च के सामान्य क्रिसमस समारोहों में बाधा नहीं बनेगा।ग्रामवासियों ने बहुत उत्साह से तैयारियां शुरू कीं।आपस में वे हँसी मजाक करते कि इस बार तो डबल क्रिस्मस होगा।

फिर भी यह समय नगाओं के लिए एक कठिन समय था।स्वाधीनता आंदोलन दिन पर दिन गति पकड़ता जा रहा था।दूरदराज के गांव भी जुड़ते जा रहे थे।अगर भूमिगत फौज के सदस्य के रूप में नहीं तो निश्चित रूप से उनकी भूमिगत ‘सरकार’ को करों का भुगतान करनेवाले के रूप में।यह गांव भिन्न नहीं था।हर वर्ष उन्हें बाध्य किया जाता था बकाया भुगतान करने के लिए।राशि का हिसाब गांव के घरों में बसे परिवारों के आधार पर तय किया जाता था।वसूली क्रिसमस की छुट्टियों के ठीक पहले की जाती थी।शायद इसलिए कि ठंड के समय जंगलों से उगाही आसान थी या वे भी क्रिसमस मनाना चाहते थे।जो भी हो, गांव वाले अपने जंगल के साथियों के वार्षिक आगमन के लिए तैयार रहते थे और लेनदेन बिना किसी हिचकिचाहट के किया जाता था।

लेकिन पिछले वर्षों की भांति इस वर्ष यह इतना आसान नहीं था।छिपने के भूमिगत ठिकानों पर किए गए छापों की रिपोर्टों से इस इलाके में ऐसी उगाहियों के रिकार्डों का पता चला था।सरकारी बलों ने उन गांवों को विद्रोहियों को इस प्रकार करों का भुगतान करने, ऐसे सहयोग देने का परिणाम भुगतने और सबक सिखाने का निश्चय कर लिया था।ग्रामवासियों की जानकारी के बिना इन बलों द्वारा एक खतरनाक योजना सारे नगा लोगों के खिलाफ बनाई जा रही थी- यह बताने के लिए कि क्या होता है जब आप अपनी ही सरकार को धोखा देते हैं।यह तय किया गया था कि फौज विशेषकर इस गांव में उस दिन जाएगी जिस दिन वे नए चर्च भवन का उद्घाटन कर रहे होंगे, और उनके सभी नेताओं को भूमिगत बलों को करों का भुगतान करने के ‘अपराध’ के लिए गिरफ्तार कर लेगी।

इस बीच निर्धारित दिन, एक रविवार के पहले वाले दिन ग्रामवासी अपने घरगृहस्थी की साफसफाई के कामों में लगे हुए थे, खासतौर से जहाँ अतिथियों को ठहराया जाना था।उद्घाटन वाले रविवार की सुबह ठंडी और शानदार थी।आखिरकार यह दिसंबर का महीना था।सभी ग्रामवासी अपनी सबसे सुंदर पोशाकों में सजेसंवरे नए चर्च के सामने इकट्ठे हो गए।यह जगह पुराने चर्च वाली जगह पर ही थी।

ग्रामवासियों की उलझन यह थी कि पुराने चर्च का क्या करें जो नए चर्च की बगल में ही मौजूद था।लेकिन उन्होंने इसको तब तक के लिए टाल दिया था, जब तक कि उद्घाटन कार्यक्रम न समाप्त हो जाए।उस सुबह धार्मिक सभा के औपचारिक कार्यक्रम के पूर्व भजन का एक दल गीत द्वारा शुभारंभ के लिए नए चर्च के बरामदे में एक साथ खड़ा हुआ था।मुख्य गायक अपेन्यो प्रथम पंक्ति के मध्य खड़ी थी- अपने नए घाघरा और शाल में एक दिव्य आभा बिखेरती हुई।वह दल के समूह गीत के बाद एकल प्रस्तुति देने वाली थी।जैसे ही धर्मगुरुओं की अगुवाई में आह्वान प्रार्थना प्रारंभ हुई, भीड़ में उत्कंठाभरी निस्तब्धता छा गई।प्रार्थना के बाद भजन गायकों का दल अपनी पहली प्रस्तुति देगा।

जिस गीत को सुनने के लिए भीड़ व्यग्र थी, वह जैसे ही शुरू हुआ, दूर कहीं बंदूक की गोलियां चलाए जाने की आवाज सुनाई दी।यह अनिष्टसूचक ध्वनि थी।इसका अर्थ था कि फौज समारोह होने नहीं देगी।लेकिन भजन मंडली अविचलित भाव से गाती रही।हालांकि भीड़ के अंदर से बेचैनी भरी अस्तव्यस्तता का पता चल रहा था।धर्मगुरु भी चिंतित दिखाई देने लगे थे।वे मुड़कर उपयाजक (डीकन) से कुछ विचार-विमर्श कर रहे थे।जैसे ही गीत धीमा पड़ा, एक आवाज पूरे गांव में एक छोर से दूसरे छोर तक गूंजने लगी।भयभीत दोबाशी कांपती आवाज में लोगों से कह रहा था कि जो जहां है, वहीं रहे।भागने की कोशिश न करे।एक दहला देने वाली खामोशी थी वहां और कांग्रीगेशन अपने स्थान पर जैसे जम गया।किसी को यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उद्घाटन का यह रविवार हेकड़ीबाज भारतीय फौज द्वारा रौंद दिया जाएगा।

शीघ्र ही नजदीक आते सैनिकों ने भीड़ को चारों ओर से घेर लिया।धर्मगुरु को आगे आने का आदेश दिया गया और कहा गया कि अपने को गांव के बूढ़ों से पहचनवाए।

लेकिन इसके पहले कि वे कुछ कर पाते, अपेन्यो ने अपना एकल गीत प्रारंभ कर दिया।इस कमउम्र लड़की की बहादुरी और मूर्खता के चलते श्रेष्ठ होने के लिए नहीं, उसे इस तरह पहचान लिए जाने के डर से पूरा दल गाने लगा।सैनिकों को समझ में आ गया कि यह खुला विद्रोह है।इसका बदला लिया ही जाना चाहिए।उन्होंने धर्मगुरु और गांव के बूढों को धका दिया।इन्हें धकेलते हुए आगे बढ़ने लगे।बंदूक के कुंदे से उनको कोंचते हुए वे चर्च की सीढ़ियों के नीचे इंतजार कर रही जीपों की तरफ ले गए।कुछ ग्रामीणों ने उन्हें समझाना चाहा, लेकिन उन्हें भी धका देकर बेइज्जत किया गया।साथ आए दोबाशी ने हल्की-सी कोशिश की कि आदेश के पालन का कुछ असर बना रहे।लेकिन  उसकी कोई सुन नहीं रहा था।भीड़ तब तक भय और क्रोध से भरकर अलग-अलग दिशाओं में बिखरने लगी थी।

गायक दल के कुछ सदस्य गाना छोड़कर सुरक्षा की खोज में भाग जाने की कोशिश कर रहे थे।केवल अपेन्यो अपनी जगह पर खड़ी थी।वह परिस्थिति से बेपरवाह गाए जा रही थी, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उससे ऐसा करवा रही हो।उसकी मां धर्मसभा के साथ खड़ी हुई अपेन्यो को गाते हुए देख रही थी, जैसे बंदूकों की ताकत का मुकाबला करने के लिए स्वर्ग में बैठे ईश्वर तक अपनी आवाज पहुंचाते हुए वह कलेजा निकाल कर रख दे रही हो।उसने उसे पुकार कर चुप होने के लिए कहा, पर लगा नहीं कि वह कुछ सुन या देख रही है।

घबराहट में लिबेनी ने दौड़कर अपनी बेटी को खींच लेना चाहा, लेकिन फौज का प्रमुख उससे तेज निकला।उसने अपेन्यो को बालों से पकड़कर खींचा और भीड़ से दूर पुराने चर्चभवन की ओर लेकर गया।इस दौरान यह लड़की लगातार अपने गीत को डूबकर गाती रही।

वहां हर तरफ कोहराम मचा था।जो ग्रामीण वहां से भाग जाना चाह रहे थे, उन्हें पीटा जाता था या धका देकर हर जगह फैले सिपाहियों द्वारा एक साथ झुंड में धकेल दिया जाता था।धर्मगुरु और गांव के बूढ़ों को फौज के मुख्यालय या उनकी किस्मत में जहां भी जाना लिखा हो वहां ले जाने के लिए अच्छी तरह बांध दिया गया था।ज्यादातर लोग घबराहट में दूर भाग रहे थे।कुछ लोग पुराने चर्च में सुरक्षा के लिए शरण ले रहे थे।कुछ नए चर्च में प्रवेश कर गए, इस आशा में कि कम से कम ईश्वर का घर उन्हें सैनिकों से बचाएगा।

लिबेनी अब व्यग्र हो रही थी।वह अपनी बेटी का नाम जोर-जोर से पुकार कर उसे उस दिशा में खोजने लगी, जहां वह अंतिम बार प्रमुख फौजी द्वारा खींची-घसीटी ले जाई जा रही थी।अंत में जब वह उस स्थान पर पहुंची तो वहां के दृश्य ने उसे पागल बना दिया।युवा कप्तान अपेन्यो का बलात्कार कर रहा था, जबकि दूसरे कुछ सैनिक खड़े देख रहे थे, शायद अपनी बारी का इंतजार करते हुए।

यह दृश्य देखकर मां पागल हो गई और जानवरों की तरह गुर्राते हुए उसकी ओर ऐसे दौड़ी जैसे बेटी के शरीर पर हावी उस मर्द को रोककर दूर हटा देगी।लेकिन एक सैनिक ने उसी को दबोच लिया और जमीन पर पटक दिया।वह भी पैंट खोलने लगा।जब लिबेनी को यह अहसास हुआ कि आगे क्या होने वाला है तो उसने उस सैनिक के मुंह पर थूक दिया और शरीर को इधर-उधर से मरोड़कर वह उसकी पकड़ से छूटने की कोशिश करने लगी।लेकिन इससे वह और भड़क गया।उसने उसका सिर जमीन पर कई बार पटक दिया जिससे वह बेहोश हो गई।उसने उसके बेजान शरीर से ही अपनी हवस पूरी की और उसकी नई लुंगी जो उसने दूर उछाल दी थी, उससे अपना शरीर पोंछकर साफ किया।इसके बाद सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी ने बारी-बारी यह दुष्कर्म किया।हालांकि चौथे के चढ़ने के पहले ही वह निष्प्राण हो चुकी थी।

अपेन्यो अपने साथ घट रही घटनाओं के कारण गंभीर रूप से घायल थी और सुन्न पड़ गई थी, पर अभी तक जीवित थी, यद्यपि नाम भर को।पुराने चर्च में शरण लेने वाले कुछ लोगों ने देखा कि मां और बेटी पर क्या गुजरी थी।और जब सैनिकों को वहां से गांव के चौक की तरफ जाते हुए देखा, तब वे उसकी मदद के लिए निकलकर आगे बढ़े।जब वे उनके बेजान शरीर उठाने की कोशिश कर रहे थे, तभी कप्तान ने पलटकर देखा और यह देखने पर कि ये उनकी काली करतूतों के गवाह हैं, उसने मुड़कर सैनिकों को उन दोनों स्त्रियों के शरीर उठाने वाले लोगों पर गोली चलाने का आदेश दिया।चीखों-चिल्लाहटों के बीच उनके हाथ से शरीर छूट गए, क्योंकि  ग्रामीण एक बार फिर चर्च के अंदर शरण लेने की कोशिश में थे।

अपनी पिछली कार्रवाइयों वाली जगह पर जब कप्तान दुबारा लौटा तो उसने उन दोनों स्त्रियों के विकृत शरीर देखे।दोनों ही मृत थीं।उसने चीखकर अपने आदमियों को उन्हें चर्च की ड्योढ़ी में डालने का आदेश दिया।उसके बाद उनसे चर्च के चारों तरफ पोजीशन लेने का आदेश दिया।उसके संकेत पर उन्होंने अपनी बंदूकें चर्च के अंदर चलाईं और खाली कर दी।अंदर से घायलों और मरनेवालों की चीखों ने साबित कर दिया कि ईश्वर का घर भी उन्हें सुरक्षा नहीं दे सका, न ही सनकी सैनिकों की गोलियों से बचा सका।

दूर वाली जगहों पर भी इसी तरह की नृशंस घटनाएं घट रही थीं, लेकिन बर्बरता का अंत अभी नहीं हुआ था।चर्च के अंदर के सारे गवाहों को इस तरह मारा जाएगा तो समय और गोलियों की बरबादी होगी, यह सोच कर कप्तान ने चर्च को आग लगाने का आदेश दे दिया।

अपनी पूरी ताकत लगाकर चिल्लाता हुआ कप्तान पागल हो गया लगता था।अपने पास खड़े एक सैनिक से दियासलाई की डिब्बी छीनकर उसने आग लगानी चाही, पर उसके हाथ कांप रहे थे।उसे लग रहा था कि उस छोटी लड़की के गाने की धुन अब भी उसके कानों में आ रही है, जैसी धुन उसके कौमार्य को भंग करते समय आ रही थी।इस सबके दौरान लड़की की न दिखाई पड़ने वाली आंखें उसे घूर रही थीं।वह जमीन पर गिर पड़ा।सैनिकों को लगा कि अब चलना है, लेकिन फिर क्रोधित होकर कप्तान ने चर्च जला देने का आदेश दिया और पुराना चर्च धू-धू कर लपटों में जल उठा।मर चुके और मर रहे लोग जलकर पहचानी न जा सकने वाली काली राख बन गए।नया चर्च, जो पुराने चर्च से बहुत दूर नहीं था, वह भी जलने लगा और बुरी तरह बरबाद हो गया।गांव में दूसरी जगहों पर सबसे पहले अन्न भंडार लपटों की भेंट चढ़े।इन कोठारों से हवा के जरिए जलते हुए टुकड़े कच्चे घरों पर जा पड़े।वे सब भी जलकर जमीन पर आ गए।

अब लूटपाट करनेवाले सैनिक अपने कैदियों के साथ गांव छोड़ चुके थे।अंधेरा छा गया था।उनके दुख के साथ ही दुखी होकर रात भर वर्षा होती रही।धर्मगुरु और गांव के चार बूढ़ों को छोड़ कर कितने पुरुष और स्त्रियां लापता थे, यह तय कर पाना असंभव था।बाहर से अतिथि के रूप में आए धर्म गुरुओं को गांव के बाहर का जानकर दयावश छोड़ दिया गया था।लेकिन उन्हें तुरंत गांव छोड़कर जाने का आदेश दे दिया गया था।साथ ही चेतावनी दी गई थी कि यहां जो कुछ हुआ है, इसकी जानकारी अगर किसी को भी दी तो उनके गांवों का भी यही हाल होगा।

लापता लोगों की खोज जब अगली सुबह शुरू हुई, पता चला कि खोए हुए लोगों में अपेन्यो और उसकी मां भी थीं।जब मृतकों की सामान्य गणना हो रही थी तो पाया गया कि बहुत से ग्रामीणों के शरीर पर गोली लगने के घाव थे साथ ही बेरहमी से की गई पिटाई से हुए जख्म भी थे।इसके अलावा, गायक दल के छह सदस्यों को भी नहीं गिना गया था।एक वृद्धा ने, जिसका घर चर्च के काफी निकट था, जांच करने वाले दल को बताया कि उसने कुछ लोगों को पुराने चर्च की ओर भागते हुए देखा था।

जब गांव वाले जले हुए पुराने चर्च भवन के निकट पहुंचे, उनकी भयावह आशंका सच निकली।पुराने चर्च की बारिश में भीगी राख के बीच इनसानी हड्डियों का अंबार मिला जो रात की वर्षा में धुलकर साफ हो चुका था।जो कभी पुराने चर्च की ड्योढ़ी हुआ करती थी, उस पर एक अलग ढेर मिला और किस्मत के फेर से नए शाल का एक टुकड़ा सही सलामत जली हुई हड्डियों के ढेर के नीचे अभी तक दबा हुआ था।मां और बेटी उसी एक ढेर में एक साथ पड़ी हुई थीं।

ग्रामीणों ने दल के छह सदस्यों की हड्डियों को इकठ्ठा किया और एक ही काफिन में रख दिया।लेकिन मां और बेटी की हड्डियां अलग रखीं।उदास और गीतविहीन फ्यूनरल सर्विस।सवाल यह उठा कि दफनाएंगे कहां? हालांकि पूरे गांव ने काफी पहले ईसाई धर्म अपना लिया था।फिर भी कुछ पुरानी परंपराएं और अंधविश्वास पूरी तरह छोड़े नहीं गए थे।इन अभागे लोगों की मौतें अप्राकृतिक कारणों से हुई मौतें मानी जा रही थीं।और परंपरा के हिसाब से वे गांव के कब्रिस्तान में नहीं दफनाए जा सकते थे।वे चाहे ईसाई हों या गैर-ईसाई धर्म के हों।

कुछ युवाओं ने प्रतिरोध किया, ‘आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? वे हमारे चर्च के सदस्य थे और भजन गायकों के दल में गाते थे।’ बुजुर्गों ने प्रतिकार किया, ‘उससे या? हम अब भी नगा हैं, नहीं हैं या? और हमारे लिए कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं।’ थोड़ी देर तक विवाद चलता रहा, जब तक इस समझौते पर वे नहीं पहुंच गए कि उन्हें कब्रिस्तान की चारदीवारी के ठीक बाहर दफनाया जाएगा यह दर्शाने के लिए कि गांव के साथियों ने उनके अवशेषों को रद्द करके दूर जंगल में नहीं भेजा था।लेकिन एक चीज तय की गई कि उनकी कब्र पर कोई परिचय शिरोलेख नहीं खड़ा किया जाएगा।

आज कब्रिस्तान की चारदीवारी से सटी इन कब्रों की जगह घास के दो टीले बन गए हैं।अगर किसी को गांव का इतिहास नहीं पता है, खास तौर से तीस साल पहले के उस भयानक रविवार को क्या हुआ था, इस बारे में जो नहीं जानता वह अनदेखा कर सकता है इन दो उभरे हुए टीलों को, जो भूमि के स्तर से थोड़ा ऊपर ही हैं।

किसी दिन ऐसा भी हो सकता है कि जमीन इन्हें निगल ले या फिर फटकर उनकी जली हुई हड्डियों को सबके सामने कर दे।कोई नहीं जानता कि परिचयात्मक शिरोलेख विहीन इन कब्रों का क्या हश्र होगा या कब्रगाह की पवित्र भूमि के अंदर जिनपर विस्तृत सुसज्जित कंक्रीट की शिलाएं हैं, और नीचे स्वाभाविक मृत्यु पाने वालों की अस्थियों का ढेर रखा हुआ है, उनका क्या होगा।लेकिन बिना हेडस्टोन के घास के टीलों के नीचे वालों की कहानी, खास तौर से गाने वाली उस छोटी लड़की की कहानी गांव के सर्वाधिक अंधकारमय दिन के बाद भी जिंदा बचे लोगों की आत्माओं में बसी रह गई।

ठीकठीक कोई नहीं जानता कि उस कप्तान और उसकी बलात्कारी टुकड़ी का क्या हुआ, जिसने सोचा था कि उन्होंने अपने अपराध के सभी गवाहों को जला कर मार डाला है।लेकिन भूमिगत संजाल ने न केवल ग्रामीणों पर अपवादिक बेरहमी करनेवाले बर्बर आतताइयों के बारे में जानकारी हासिल कर ली, बल्कि उस काले रविवार की छोटीछोटी घटनाओं को जोड़कर कप्तान के बारे में भी पता कर लिया कि एक बड़े शहर के मिलिट्री अस्पताल के मानसिक रोगियों के सर्वाधिक सुरक्षा वाले पागलों के एक कक्ष में उसे रखा गया है।यह भूमिगत संजाल गहरे से गहरे रहस्यों को खोदकर निकाल लेता है।

पुनश्च : यह दिसंबर की एक ठंडी रात है।दूर किसी गांव में जलती भट्ठी के पास जाड़े की छुट्टियों में घर आए कुछ छात्रों के समूह के साथ कहानी सुनाने वाली एक बूढ़ी औरत  बैठी है।वे उसके पास आकर कहानियां सुनना पसंद करते हैं।लेकिन आज बूढ़ी अम्मा अपने सामान्य बातूनी मूड में नहीं थीं।वह काफी बूढ़ी लग रही थीं और किसी बात पर परेशान लग रही थीं।उनसे एक लड़का पूछता है कि क्या उनकी तबीयत ठीक नहीं है? अगर ऐसा है तो वे किसी और रात को आ जाएंगे।लेकिन सवाल का जवाब देने के बजाय बूढ़ी औरत बोलना शुरू कर देती है और उन्हें बताती है कि किन्हीं खास रातों में गांव से होकर एक अजीब हवा चलती है जो कब्रिस्तान से शुरू होती है और एक धुन जैसी लगती है।बूढ़ी औरत उनसे यह भी कहती है कि आज ऐसी ही एक रात है।पहले तो बच्चे डर जाते हैं, फिर कहते हैं कि वे कुछ भी नहीं सुन पा रहे हैं।और यह भी कि ऐसी बातें संभव नहीं है।बूढ़ी औरत उन्हें झिड़क कर कहती है कि वे अपने आसपास घट रही घटनाओं पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।उसने बच्चों से कहा कि आज के बच्चे धरती और हवा की आवाजों को सुनना भूल गए हैं।बच्चे इसे सही मानकर कानों पर जोर डालकर ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगते हैं।उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता, जब उन्हें दूर कहीं से मद्धिम स्वरों में एक धुन सुनाई देती है।बच्चे थोड़ी देर सुनते रहे फिर लगभग जीत के अंदाज में बोले कि वे केवल एक अजीब-सी आवाज सुन रहे हैं।

‘नहीं!’ कहानी सुनाने वाली नानी चिल्ला कर बोलीं, ‘नहीं, ध्यान से सुनो।आज उस भयानक रात की वार्षिकी है।’ उस कमरे में मौत का-सा सन्नाटा पसर गया, क्योंकि उन्होंने भी उड़ती-उड़ती खबर सुन रखी थी कि उनके जन्म से काफी पहले एक रविवार को गांव में फौज ने नृशंस अत्याचार किए थे।

कहानी सुनाने वाली बूढ़ी और वहां मौजूद श्रोता कानों पर जोर डाल कर बहुत ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगे।अचानक एक अजीब घटना घटती है।हवा जब घूमती हुई उस घर के पास से गुजरती है तो आवाज तेज हो जाती है, कुछ पलों के लिए वह घर पर मंडराती है।फिर वह इधर- उधर घूमने लगती है, जैसे उसे मानव क्षेत्रों के अलावा कहीं और जाना हो।

बच्चे अचंभित रह जाते हैं, क्योंकि उन्होंने एक नई चीज सुनी।एक अलौकिक झूमकर गाया जाने वाला गीत हवा में गूंज रहा था।बूढ़ी अपनी जगह से कूद पड़ती है और हर एक की ओर देखकर कहती है, ‘तुमने सुना, सुना तुमने? मैंने तुमसे कहा था न? यह अपेन्यो का अंतिम गीत था।’ और वह बूढ़ी औरत वही धुन बड़ी मधुरता से गुनगुनाने लगती है, अपने भीतर।बच्चे इनकार नहीं कर पाते कि उन्होंने धुन नहीं सुनी।लेकिन वे परेशान हैं कि वह कह क्या रही है।धुन गुनगुनाते हुए जैसे ही बूढ़ी औरत खड़ी होती है, बच्चे उसे आश्चर्य से देखते हैं।उसके चेहरे पर अद्भुत चमक है, जैसे पुराने रूप की जगह उसे एक नया रूप मिल गया है।पहले से अधिक जीवंत और सक्रिय।थोड़ी देर बाद एक छोटी बच्ची ने डरते-डरते उससे पूछा, ‘नानी किसके बारे में कह रही हैं आप? किसका अंतिम गीत?’

कहानी कहने वाली बूढ़ी औरत झपट कर पलटी।सारे बच्चों को ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हो।फिर उसने गहरी सांस ली और आवाज में असीम व्यथा के साथ बाहें चौड़ाई में फैलाते हुए फुसफुसाई, ‘तुमने गीत के बारे में नहीं सुना है? तुम अपेन्यो के बारे में नहीं जानते? तो आओ ध्यान से सुनो…’

इस तरह एक दिसंबर की ठंडी रात में दूर किसी गांव में बूढ़ी कहानी कहने वाली वहां के बच्चों को इकट्ठा करके ऊंची-ऊंची लपटों वाली आग के चारों ओर नंगी जमीन पर पालथी मारकर बैठ गई।उस काले रविवार की कहानी उन्हें बताने के लिए, जब एक छोटी और सुंदर गायिका ने अपना अंतिम गीत गाया, तो जैसे एक और नगा गांव अपने बरबाद हुए बच्चों के लिए रोने लगा।

संपर्क : मंजु श्रीवास्तव, सी-11.3, एनबीसीसी विबज्योर टावर्स, न्यू टाउन, कोलकाता-700156 मो.9433076174