
लेखिका और अनुवादक।अद्यतन अनुवाद : रॉबर्ट सर्विस की स्तालिन की जीवनी।

रॉबर्ट फ्रॉस्ट (1874-1963)। प्रसिद्ध अमेरिकी कवि। ग्रामीण जीवन के यथार्थ और दार्शनिक चित्रण के लिए चर्चित। पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित।
रॉबर्ट फ्रॉस्ट के कविता संग्रह ‘नॉर्थ ऑफ बोस्टन’ (1914) में ‘मेंडिंग वॉल’ शीर्षक से दर्ज यह कविता जीवन और मानवता के विरोधाभासों की कविता है। यह ऐसी कविता है, जिसे कहानी की तरह सुना और गुना जा सकता है। यह कविता है दीवार और दरख्त की। यह कविता है ग्रामीण इंग्लैंड के उन दो पड़ोसियों की, जो हर साल वसंत आते ही अपने बीच की दीवार को दुरुस्त करने में जुट जाते हैं क्योंकि उन्होंने सीखा है कि पड़ोसियों के बीच दीवार का होना अच्छा है। फ्रॉस्ट ने जब यह कविता लिखी उस समय उद्योगीकरण और तकनीकी दोनों बड़ी तेजी से पांव फैला रहे थे। अलग-अलग विचारधाराओं के लोगों का आपस में साबका पड़ रहा था। इसलिए जाहिर तौर पर संघर्ष पनप रहा था। उस संघर्ष से बचे रहने में बड़ी-बड़ी मानवतावादी सीखें और इंसानियत के सबक नहीं, बल्कि ईंट-कंक्रीट की दीवारें काम आ रही थीं! फ्रॉस्ट की यह कविता मनुष्यता की इसी विडंबना पर टिप्पणी करती है।
दीवार और दरख्त
कुछ तो है ऐसा जिसे दीवार पसंद नहीं
जो कभी बर्फ भेज इसे नीचे से फुला डालता है
तो कभी धूप से
इसके ऊपरी पत्थरों को ढरका देता है
और इतनी बड़ी दरार बना देता है
कि दो लोग एक साथ गुजर जाएं!
शिकारियों का काम अलग बात है
खरगोश को दुबकने से रोकने या
किकियाते कुत्तों को खुश करने के लिए
जहां भी उन्होंने पत्थर से पत्थर हटाया
वहां उनके पीछे-पीछे जा
मैंने खुद दीवार की मरम्मत की है
वैसे उन्हें किसी ने भी बनाते हुए नहीं देखा-सुना
मेरा मतलब दरारों से है!
वसंत में वे वहां दिखने लगती हैं
मैंने पहाड़ी के उस पार
अपने पड़ोसी को खबर कर दी
फिर एक रोज लीक पर चलने के लिए हम मिले
और अपने बीच की दीवार फिर से उठा दी
हम अपने बीच हमेशा
इस दीवार को लिए जीते रहे हैं
फिर दोनों ने अपनी-अपनी ओर गिरे पत्थर सहेजे
उनमें कुछ रोटी सरीखे थे
और कुछ एकदम गेंद की मानिंद
इसलिए उनका संतुलन बनाने के लिए
मंतर भी फूंकना पड़ा
‘(ऐ पत्थरो) हमारी पीठें मुड़ने तक
तुम जहां के तहां टिके रहो!’
उन्हें संभालते-संभालते
हम अपनी उंगलियां खुरदुरी कर बैठे
ओह! पर यह भी तो एक तरह का खेल था
जिसमें दोनों ओर बस एक ही खिलाड़ी था
पर यह खेल, खेल से थोड़ा ज्यादा निकला!
हमें इस दीवार की कोई जरूरत नहीं थी
(क्योंकि) वह सरापा सनोबर था
और मैं सेब का बगीचा!
मैंने उससे कहा, ‘मेरे सेब के दरख्त
तुम्हारे सनोबरों पर लगे
इन नोंकदार फलों को खाने के लिए
कभी यह दीवार नहीं फांदेंगे।’
उसने केवल इतना कहा, ‘अच्छी दीवारें
माने अच्छे पड़ोसी!’
(माने अच्छे पड़ोसियों के बीच दीवारें होना अच्छी बात है!)
उफ! ये वसंत भी न…
क्या-क्या घपला कर डालता है मेरे भीतर
पर अगर मैं उसके दिमाग में
अपनी बात डाल पाया तो मुझे हैरत होगी
‘वे भला क्यों अच्छे पड़ोसी बनाने लगीं?
वे वहां हो सकती हैं जहां गाय हों
पर यहां गाएं हैं कहाँ?
यहां तो एक भी गाय नहीं
दीवार बनाने से पहले
मैं यह पूछना और जानना चाहूंगा कि
मैं भला किसे दीवार के बाहर रखना चाहता हूँ
और किसे दीवार के भीतर
और मैं किसे दोष देना चाहता हूँ
कुछ तो ऐसा है जिसे दीवार पसंद नहीं!
जो इसे ढहा देना चाहता है
मैं उससे कहना चाहता हूँ कि
यह कल्पित बौनों की कारस्तानी है
लेकिन दरअसल
यह कल्पित बौनों का काम नहीं
मैं चाहता हूँ कि मेरा पड़ोसी
खुद इसका जवाब खोजे
मैं तो उसे
पाषाण युग के किसी आदिम मानुष की तरह
दोनों हाथों में
पत्थर को कसकर उठाकर लाते हुए देख रहा हूँ
मुझे लगता है जैसे वह अंधेरे में चल रहा हो
नहीं, यह केवल जंगल और दरख्तों की
छायाओं का अंधेरा नहीं है
वह कभी अपने पिता की कहन से नहीं मुकरेगा
बल्कि उसके लिए तो वही सबसे अच्छी बात है
(इसीलिए) उसने फिर कहा,
‘अच्छी दीवारें माने अच्छे पड़ोसी!!’
