![]() |
![]() |
| ओसामु दाजाई(1909- 1948) जापान के प्रख्यात लेखक। यह शूजी त्सुशिमा का पेन नेम है। अनेक उपन्यास व लघु कथाएं। 1947 में प्रकाशित ‘मेरी क्रिसमस’ द्वितीय विश्वयुद्धोपरांत तोक्यो को पृष्ठभूमी में रख लिखा गया है। 39 वर्ष की उम्र में इन्होंने आत्महत्या कर ली। | अनुश्रीजवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में जापानी भाषा का अध्यापन। जापानी साहित्य और अनुवाद में विशेष रुचि। |

तोक्यो के उत्साह में कुछ उदासी-सी लगी। मैंने तोक्यो से लौटते वक्त सोचा था कि वापस जाने के बाद पहली रचना का पहला वाक्य यही होगा। किंतु मैंने पाया कि ‘तोक्यो की जीवनशैली’ में कोई बदलाव नहीं आया था।
बीते एक साल तीन महीने मैंने अपने गांव त्सुगारु में बिताए और इस साल नवंबर के मध्य में बीवी-बच्चे को लेकर तोक्यो लौटा। परंतु लौटने के बाद ऐसा लगा जैसे मैं केवल 2-3 सप्ताह की लघु यात्रा पर ही गया था।
मैंने गांव में किसी को पत्र में लिखा,
‘इतने समय के बाद तोक्यो आना, अच्छा भी नहीं है, बुरा भी नहीं है। इस शहर के स्वभाव में कुछ बदलाव नहीं आया है। भौतिक रूप में तो जरूर कुछ बदलाव आए हैं, किंतु आध्यात्मिक स्वभाव से यह शहर वैसे का वैसा ही है। कहते हैं न, पागलपन तो मर के ही ठीक होता है। यह शहर कुछ तो बदल ही सकता है। बल्कि नहीं, ऐसा लगता है कि थोड़ा तो बदलना ही चाहिए।’
लेकिन बदला तो मैं भी कुछ नहीं था। मैं कुरुमे कासुरी प्रिंट के किमोनो के ऊपर कोट पहनकर तोक्यो शहर में यूं ही घूम रहा था।
दिसंबर की शुरुआत में मैं तोक्यो उपनगर के एक सिनेमाघर (शायद छोटा-सा पुराना तमाशाघर कहना अधिक मुनासिब होगा) में गया और वहां एक अमरीकी फिल्म देखी। लगभग शाम के 6 बजे जब मैं वहां से निकला तो तोक्यो शहर कोहरे के सफेद धुएं में लिपटा हुआ था। उस कोहरे के अंदर गहरे रंग के कपड़े पहने लोग जल्दी-जल्दी आ-जा रहे थे, बस बिलकुल वर्षांत का माहौल-सा था। तोक्यो की जीवनशैली में कतई कोई बदलाव नहीं आया था।
मैं किताबों की दुकान में घुसा और एक मशहूर यहूदी नाटककार की किताब खरीदी। किताब जेब में डाल मैंने जब एकाएक प्रवेश द्वार की ओर देखा तो वहां एक युवती खड़ी मेरी ओर देख रही थी। वह पैरों पर यूं खड़ी थी मानो कोई पक्षी बस उड़ान भरने वाला हो। मुंह थोड़ा खुला था किंतु अभी उसने कुछ बोला नहीं था।
यह शुभ है या अशुभ?
पहले मैं उनके पीछे पड़ा रहता था किंतु अब मेरी तनिक भी रुचि नहीं है। ऐसी युवती से मिलना सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। और मेरी जिंदगी में ऐसी युवतियां बहुत हैं। नहीं शायद कह सकते हैं कि सभी औरतें ऐसी ही थीं।
अरे! वह शिंजुकु वाली…। अरे फंस गया। पर कहीं वही तो नहीं?
‘कासाई सान’, युवती ने जैसे बड़बड़ाते हुए मेरा नाम पुकारा। सीधे खड़े हो हल्का-सा सिर झुकाकर उसने अभिवादन किया।
उसने हरे रंग की टोपी पहनी हुई थी जिसकी डोरी ठोढ़ी पर बंधी थी व गहरे लाल रंग का रेनकोट पहन रखा था। जैसे मैं ध्यान से उसे देख रहा था वह युवती 12-13 वर्ष की तरुणी हो गई और मेरी यादों में जो एक छवि अंकित थी उससे मेल खा गई।
‘शिज़ुएको चान’
यह तो शुभ ही है।
‘चलो, चलो कहीं चलते हैं। या फिर कुछ मैगजीन-वैगजीन लेनी थी?’
‘नहीं, एरिएल नामक किताब खरीदने आई थी। लेकिन कोई बात नहीं।’
हम वर्षांत की भीड़भाड़ वाली तोक्यो की गलियों में निकल पड़े।
‘तुम तो बड़ी हो गई हो। मैं तो पहचान ही नहीं पाया।’
आखिर यह तोक्यो ही है। यहां यह भी हो सकता है।
मैंने ठेले वाले से दस-दस येन के दो मूंगफलियों के पैकेट खरीदे व बटुआ जेब में रखा। कुछ सोचा, फिर से बटुआ निकाला और एक और पैकेट खरीदा। पहले मैं इस बच्ची के लिए हमेशा कुछ न कुछ लेकर ही इसकी मां से मिलने जाता था।
इसकी मां मेरी उम्र की थीं। वह युवती मेरी यादों की युवतियों में से ऐसी अनोखी, नहीं-नहीं, बल्कि कहा जा सकता है कि ऐसी अद्वितीय स्त्री है जिसके एकाएक सामने आ जाने से भी मैं डरूंगा या घबराऊंगा नहीं। इसकी क्या वजह हो सकती है? मैं इसके चार प्रत्युत्तर यहां प्रस्तुत करना चाहता हूँ। अगर मैं यह कहूं कि वह एक कुलीन घराने में पैदा हुई, शारीरिक रूप से अस्वस्थ किंतु सुंदर है, तो ये बातें बनावटी लगेंगी व उसे ‘अद्वितीय’ बनाने के लिए खरी नहीं उतरेंगी। दौलतमंद पति से तलाक हो गया और फिर हालात खराब हो गए। बची-खुची संपत्ति और अपनी बेटी के साथ अपार्टमेंट में रहती है। अगर मैं ऐसे व्याख्या करूं तो मुझे ही अमूमन महिलाओं के बीते दिनों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। और असल में इस युवती के दौलतमंद पति से तलाक की वजह क्या थी, बची-खुची संपत्ति कितनी संपत्ति है, मुझे कुछ नहीं पता। अगर मुझे बताया भी गया तो मैं भूल जाऊंगा। यह शायद इसलिए है कि महिलाएं मुझे पागल बनाती आई हैं, वे चाहे मुझे कितनी भी आपबीती बताएं, मुझे लगता है वे सब झूठ बोल रही हैं। अब तो यह हाल है कि एक बूंद आंसू मेरी आंखों से नहीं टपकता। यानी ऐसा भी नहीं है कि अच्छे घर में पैदा होना, सुंदर होना, फिर हालात खराब हो दयनीय स्थिति हो जाना आदि रूमानी बातों के कारण मैंने इस युवती को ‘अद्वितीय’ होने के काबिल समझा। वजह ये चार हैं। पहली वजह है उसका सफाई पसंद होना। कहीं बाहर से घर लौटते ही वह दहलीज पर ही हाथ-पैर धोती। भले ही उसके हाल खराब थे पर दो कमरे के अपार्टमेंट का कोना-कोना साफ-सुथरा होता। विशेषकर रसोई के बर्तन तो एकदम चमचमाते थे। दूसरा कारण यह कि वह बिलकुल भी मेरी ओर आकर्षित नहीं थी। और मैं भी उसके प्रति बिलकुल आकर्षित नहीं था। अगर कामेच्छा के बारे में कहूं तो, वह बेचैनी भरा, गंदा, पेचीदा, कभी हमदर्दी तो कभी गुरूर, कभी अपनी ओर आकर्षित करना, तो कभी अकेले ही लड़ना, वही चिर-परिचित घिसे-पिटे मर्द और औरत के संघर्ष में पड़ने की जरूरत नहीं थी। मुझे जहां तक लगता है वह अभी भी अपने तलाकशुदा पति को चाहती थी। और दिल की गहराइयों में कभी उस पति की पत्नी होने का गर्व उसे अभी भी था। तीसरा कारण यह कि वह मेरी स्थिति एवं जरूरतों के प्रति संवेदनशील थी। जब मेरे लिए इस संसार की बातें व्यर्थ, असहनीय हो जाती थीं, तो किसी का यह कहना कि आजकल तो लगता है बहुत फल-फूल रहे हो, बहुत ही नीरस लगता। जब भी मैं उसके यहां जाता वह हमेशा बिलकुल मेरी मनोस्थिति के अनुरूप बातें करती। उसने एक बार कहा था हमेशा से ऐसा रहा है कि सत्य बोलने पर जान गंवानी पड़ सकती है। संत जॉन, ईसामसीह आदि। यह भी कहा था कि जॉन तो पुनर्जीवित भी नहीं हुए। उसने जापान के जीवित उपन्यासकारों के बारे में कभी कुछ नहीं कहा। चौथी वजह जो कि शायद सबसे महत्वपूर्ण हो, वह यह कि उसके अपार्टमेंट में शराब की कभी कमी नहीं होती थी। हालांकि मैं यह नहीं कह रहा कि मैं कंजूस हूँ, पर उन कष्टमय दिनों में जब बार में मुझ पर कर्जा चढ़ जाता, मेरे पैर अपने आप वहां चल पड़ते जहां मैं मुफ्त पी सकता था। युद्ध लंबा चला इसलिए शराब आसानी से नहीं मिल रही थी, किंतु उसके घर जाने पर जरूर कुछ न कुछ तो मिल ही जाता। मैं उसकी बेटी के लिए छोटा-मोटा कुछ ले जाता और धुत्त होने तक पीता। उपरोक्त चार कारण वह मेरे लिए क्यों ‘अद्वितीय’ है, इस प्रश्न के प्रत्युत्तर हैं। किंतु अगर फिर भी कोई मुझसे पूछे कि क्या यह तुम दोनों के प्रेम का तरीका नहीं है तो मेरे पास भोला-सा चेहरा बना, ‘शायद यही बात हो’, कहने के अलावा कोई चारा नहीं है। अगर मर्द और औरत के बीच किसी भी प्रकार का मेलजोल प्रेम है तो शायद यह भी वही है। किंतु मुझे उसके प्रति कभी प्रेम की व्यथाएं न हुईं और उसे भी मेरी तरह किसी प्रकार का तमाशा नहीं पसंद था।
‘मां ठीक हैं न?’
‘हां!’
‘बीमार-वीमार तो नहीं हैं न’
‘नहीं!’
‘तुम दोनों साथ में रह रहे हो?’
‘हां!’
‘क्या तुम कहीं पास में रहती हो?’
‘लेकिन घर बहुत गंदा है।’
‘कोई बात नहीं। चलो अभी चलते हैं। मां को खींच कर लाते हैं और किसी होटल में अच्छे-से पीने चलते हैं।’
‘अच्छा!’
लड़की का मुंह कुछ पीला पड़ गया। ऐसा लगा जैसे वह हर कदम के साथ बड़ी हो रही है। इस लड़की के जन्म के समय इसकी मां की उम्र अट्ठारह वर्ष थी। और इसकी मां मेरी तरह अड़तीस की है तो इसका मतलब यह हुआ कि…..
मेरा मन गुरूर से भर गया। ऐसा भी हो सकता है कि उसे अपनी मां के प्रति ईर्ष्या हो रही हो। मैंने किसी और विषय पर बात करने की सोची।
‘एरियल?’
‘यह बहुत अजीब बात है।’ जैसा सोचा था, उसमें जैसे कि जोश आ गया हो। ‘पहले जब मेरा दाखिला महिला विद्यालय में हुआ ही था, आप हमारे घर आए थे। गर्मियों का समय था। आपके और मां की बातचीत में अकसर एरियल, एरियल नामक शब्द आता था। मुझे उसका अर्थ नहीं मालूम था, किंतु पता नहीं क्यों मैं इस शब्द को भुला नहीं पाई।’ जैसे कि उसे स्वयं अपनी ही बातें नीरस लगने लगी हों, उसने आवाज धीमी की, फिर चुप हो गई। कुछ देर चलने के बाद उसने कहा, ‘यह पुस्तक का नाम है न।’ और फिर चुप हो गई।
मुझे अपने ऊपर और अधिक गुरूर होने लगा। शायद यही बात है। इसकी मां मेरी ओर आकर्षित नहीं थी, न ही मेरे मन में उसके प्रति कोई कामेच्छा थी। किंतु इस लड़की के प्रति, पता नहीं!
इसकी मां तो भले ही कितने भी हाल खराब हो, बिना अच्छे खाने के नहीं रह सकती थी। इसलिए इंग्लैंड और अमरीका के साथ युद्ध शुरू होने से पहले ही वे हिरोशिमा के आस-पास रहने चले गए थे जहां खाने की कोई कमी नहीं थी। हिरोशिमा जाने के तुरंत बाद ही इसकी मां ने मुझे सचित्र पोस्टकार्ड भेजा था। उस समय मेरे हाल कुछ ठीक न थे इसलिए जो लोग आराम से जीवन-यापन कर रहे थे, उन्हें उत्तर लिखने का मेरा मन नहीं किया। फिर मेरे हालात में भी कई बदलाव आए, किंतु पांच साल बीत गए मैंने मां बेटी से कोई संबंध नहीं रखा।
और आज पांच साल बाद अचानक मुझसे यूं मिलकर कौन ज्यादा खुश होगा, मां या बेटी? पता नहीं क्यों, मुझे इस लड़की की खुशी मां की खुशी से अधिक निर्मल और गहरी लगी। अगर ऐसा है तो मुझे भी अपना पक्ष स्पष्ट करने की जरूरत है। मां और बेटी से समान रिश्ता तो नहीं रखा जा सकता। आज मैं मां को धोखा दे, बेटी के साथ दोस्ती करता हूँ। अगर मां मुंह बनाती भी है तो कोई बात नहीं। आखिर यह प्रेम था।
‘तुम लोग तोक्यो कब आए?’ मैंने पूछा
‘पिछले साल के अक्टूबर में’
‘अच्छा तो युद्ध समाप्ति के तुरंत बाद आ गए। शिजुएको चान, तुम्हारी मां की तरह के स्वार्थी लोग लंबे समय तक गांव में रह ही नहीं सकते।’
मैंने निर्लज्जता से मां की बुराई की। मैं सिर्फ उसका ध्यान अपनी ओर लाना चाहता था। औरतों में, बल्कि नहीं इंसानों में, मां-बाप और बच्चों में भी एक-दूसरे के प्रति मुकाबले की भावना रहती है।
किंतु वह हँसी नहीं। ऐसा लगा निंदा में भी, प्रशंसा में भी मां के बारे में बात करने पर पाबंदी थी। मुझे यह भीषण ईर्ष्या का मामला ही लगा।
‘आज हमारा अचानक यूं मिलना संयोग ही है।’ मैंने तुरंत फिर से विषय बदला। ‘ऐसे लगा जैसे हम समय तय कर उस दुकान में मिले हों।’
‘सच में।’ इस बार वह मेरी बातों में आ गई।
मैंने भी उत्तेजित हो कहा, ‘मैंने फिल्म देख टाइम पास किया। हमारे मिलने के बस पांच मिनट पहले मैं उस किताब की दुकान में गया और…।’
‘फिल्म?’
‘मुझे कभी-कभार फिल्म देखना पसंद है। यह सर्कस में रस्सी पर करतब दिखाने वाले की फिल्म थी। एक कलाकार को कलाकार की भूमिका निभाते देखना बहुत मजेदार है। कितना भी बेकार अभिनेता क्यों न हो, जब वह कलाकार की भूमिका निभाता है तो वह अच्छी कला का प्रदर्शन करता है, क्योंकि मूल रूप से वह स्वयं भी कलाकार ही है। कलाकार की उदासी चू-चू कर बाहर निकलती है, भले उसे पता चले न चले।’
प्रेमियों की बातें फिल्मों तक ही हैं। बिलकुल ठीक बैठ रही हैं।
‘वह फिल्म तो मैंने भी देखी है।’
‘जैसे ही दोनों मिले, उनके बीच लहरें आ गईं और वे फिर बिछड़ गए। फिल्म का यह भाग अच्छा था। ऐसा असल जिंदगी में भी होता है कि छोटी-सी घटना से लोग हमेशा के लिए बिछड़ जाते हैं।’
ऐसी मीठी बातें भी अगर आराम से नहीं बोल पाया तो मैं युवा लड़की का प्रेमी नहीं बन सकता।
‘अगर मैं उस किताब की दुकान से एक मिनट पहले निकल जाता और अगर तुम उसके बाद उस दुकान में आती तो हम कभी या शायद दस साल तक तो नहीं मिल पाते।’
मैं आज शाम की इस अकस्मात मुलाकात को जितना हो सके रूमानी बनाने की कोशिश में था।
संकरे रास्ते में अंधेरा था, और ऊपर से कहीं- कहीं कीचड़ भी था। इस वजह से हम दोनों साथ-साथ नहीं चल पा रहे थे। लड़की आगे चलने लगी और मैं कोट की जेब में हाथ डाले पीछे-पीछे चल रहा था।
‘अब हम कितनी दूर हैं? आधा चो या फिर एक चो?’ मैंने पूछा।
‘हम्म.. मुझे अंदाजा नहीं है कि एक चो कितना होता है।’
असल में मेरा भी यही हाल है। दूरी मापने के मामले में कमजोर हूँ। किंतु प्रेम में अपनी अज्ञानता नहीं दिखानी चाहिए। मैंने वैज्ञानिक के लहजे में कहा, ‘अब 100 मीटर का रास्ता और होगा क्या?’
‘हूँ!’
‘शायद मीटर से बेहतर समझ आए। 100 मीटर का आधा चो होता है।’ मैंने कह तो दिया किंतु मन में कुछ आशंका हुई। मैंने मन ही मन हिसाब लगाया और देखा कि 100 मीटर लगभग एक चो होता है। लेकिन मैंने गलती को सुधारा नहीं। प्रेम में मूर्खता मना है।
‘बस अब पहुंचने ही वाले हैं।’
बैरक का अपार्टमेंट फटेहाल था। हमने हल्के अंधेरे वाले गलियारे को पार किया। बाईं ओर के पांचवें या छठे दरवाजे पर उनके कुलीन घराने का नाम जिंबा लिखा हुआ था।
‘जिंबा सान’ मैंने जोर से कमरे के अंदर आवाज लगाई।
हां, मुझे लगा जैसे मुझे उत्तर सुनाई दिया। और साथ ही ऐसा लगा दरवाजे के शीशे पर जैसे कोई परछाई हिली हो।
‘हां, वे घर पर हैं’, मैंने कहा।
लड़की स्तब्ध खड़ी थी। उसका चेहरा पीला पड़ गया। निचले होंठ को उसने अजीब ढंग से ऐंठा और एकदम रो पड़ी।
उसने बताया मां की हिरोशिमा की हवाई बमबारी में मृत्यु हो गई। यह भी बताया कि मरने से पहले बेहोशी की हालत में बड़बड़ाते हुए उन्होंने मेरा नाम भी लिया था।
लड़की अकेले तोक्यो लौट आई थी और मां की ओर के रिश्तेदार जो कि प्रगतिवादी पार्टी के सांसद थे, उनके कानूनी दफ्तर में काम कर रही थी।
मां की मृत्यु की बात वह बता नहीं पाई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे और मुझे यहां तक ले आई थी।
अब मुझे समझ आया कि जब भी मैं उसकी मां का जिक्र करता वह क्यों उदास हो जाती। इसका कारण ईर्ष्या या प्रेम नहीं था।
हम कमरे में नहीं घुसे और वैसे के वैसे ही स्टेशन के पास की चहल-पहल वाली जगह पर आ गए।
उसकी मां को ईल मछली बहुत पसंद थी।
हम लोग एक ईल के स्टॉल के अंदर घुसे।
‘आइए। क्या लेंगे आप?’
ग्राहकों में खड़े होकर खाने वाले बस हम दो थे। अंदर की ओर एक महाशय अकेले बैठे पी रहे थे।
‘बड़ी प्लेट लगाऊं या छोटी?’
‘छोटी वाली तीन।’
‘जी अभी लाया’, स्टॉल का मालिक तोक्यो वाला ही लगा। वह तेज-तेज चूल्हे के कोयलों को हवा दे रहा था।
‘तीन अलग-अलग प्लेटें लगाना।’
‘हैं? कोई और भी हैं? बाद में आएंगे?’
‘हम तीन हैं तो’ मैंने बिना हँसे कहा।
‘हैं?’
‘इस लड़की और मेरे बीच में एक सुंदर-सी कुछ चिंतित-सी दिख रही महिला हैं तो।’ इस बार मैंने थोड़ा हँस कर कहा।
स्टॉल के उस नौजवान मालिक को क्या समझ आया पता नहीं। उसने हँस कर कहा, ‘मेरे तो सिर के ऊपर से जा रहा है।’
और अपने सिर पर बंधी हाचीमाकी की गांठ को छुआ।
‘है क्या?’ मैंने बायां हाथ उठाकर पीने का इशारा करते हुए कहा।
‘एकदम उम्दा किस्म की है। नहीं, वैसे पता नहीं आपको पसंद आएगी या नहीं।’
‘तीन कप दीजिए।’ मैंने कहा
ईल की तीन छोटी प्लेटें हमारे सामने लग गईं। हमने बीच वाली प्लेट वैसे के वैसे ही छोड़ दी और बाकी दो में से खाने लगे। तभी साके से लबालब भरे तीन कप भी आ गए।
मैंने कोने वाले कप को उठाया और एक ही घूंट में गटक लिया।
‘चलो मैं कुछ मदद करता हूँ।’
मैंने धीरे से कहा जिससे केवल शिजुएको चान को ही सुनाई दे और उसकी मां का कप उठाया और गटक गया। फिर जेब में से जो कुछ देर पहले तीन मूंगफली के पैकेट खरीदे थे वे निकाले और धीमी आवाज में कहा, ‘आज मैं थोड़ा पिऊंगा। तुम यह खा सकती हो। मेरे साथ ही रहना।’
शिजुएको चान ने सिर हिलाया और उसके बाद हमने कुछ बात नहीं की।
मैंने चुपचाप चार-पांच कप साके पी कि तभी देखा स्टॉल के अंदर बैठे महाशय ने मालिक को ऊंची आवाज में कुछ बोलना शुरू किया। असल में वह चुटकुले सुना रहा था जो कि बिलकुल बेकार, खराब और बकवास थे। अब महाशय तो खूब मजे लेकर सुना रहे थे, किंतु स्टॉल का मालिक केवल साथ देने के लिए हँस रहा था। ‘कुछ कह दिया, इसीलिए गुम हो गया मैं, सेब सुंदर है, मुझे सब समझ आता है, हा हा हा, वह बहुत तेज है, उसने कह दिया तोक्यो स्टेशन मेरा घर है, अब तो मैं फंस गया, मेरी माशूका मारू बिल्डिंग में रहती है, इस बार तो वह फंस गया।’ उसका मजाक जरा भी मजेदार नहीं था। बिलकुल भी हँसी नहीं आ रही थी। बस वह बड़बड़ाए जा रहा था। मुझे तब जापान के पियक्कड़ों के हास्य भाव की कमी से कोफ्त हुई। भले ही वह महाशय और स्टाल का मालिक खूब हँस रहे थे, मेरे मुंह से तो जरा-सी हँसी भी नहीं फूटी। मैं बस पीता रहा और खोया खोया-सा स्टॉल के पास से गुजर रही वर्षांत की चहल-पहल को देखता रहा।
उस महाशय ने जिस ओर मैं देख रहा था, कुछ देर स्टॉल के बाहर की भीड़-भाड़ को देखा और एकदम चिल्लाकर कहा, ‘हैलो! मेरी क्रिसमस’
वहां एक अमरीकी जवान चल रहा था।
पता नहीं क्यों पर उसकी इस बात पर मैं हँस पड़ा।
उस जवान ने मुंह सिकोड़ते हुए सिर हिलाया और लंबे कदम भरते हुए चला गया।
‘क्या हम इस ईल को भी खा लें?’
मैंने बीच में पड़ी प्लेट की ईल में चॉपस्टिक लगाते हुए कहा।
‘हां’
‘चलो आधा-आधा खाते हैं।’
तोक्यो आखिर बिलकुल नहीं बदला था। एकदम वैसे का वैसा ही था।



