(1911-2000) नई कविता की प्रगतिशील धारा के प्रमुख कवि।इनकी कविताएं प्रकृति, किसान की संवेदना और परिवर्तन की आवाजों से भरीपूरी हैं।पहला काव्य संग्रह युग की गंगा’ (1947)।प्रमुख काव्य कृतियां :‘गुल मेंहदी’, ‘हे मेरी तुम’, ‘जो शिलाएं तोड़ते हैं’, ‘अपूर्वा’, ‘कहे केदार खरीखरी’, ‘फूल नहीं रंग बोलते हैं’, ‘आग का आईनाआदि।केदारनाथ अग्रवाल ने जन संवेदना को पूरी कलात्मकता के साथ नई कविता के  शिल्प में व्यक्त किया था और रिद्मको महत्व दिया था।यहां प्रस्तुत हैं केदार न्यास के सौजन्य से मिलीं कुछ अप्रकाशित कविताएं।

1.
आज निकल आईं कोपलें
जिस्म में साठिया पीपल के
जेठ के जुल्म में
जमीन पर जो नहीं गिर पड़ा।
2.
बाहरी चेहरा लगाए हैं
बनावटी आदमी का
आदमी दिखने के लिए
हमको हमारा चेहरा
व्यक्त नहीं करता।
3.
सफेद गादी* की सफेद छोटी अंगुलियां
दूध की गादियां और दूध की अंगुलियां
ये ही हैं चांदनी के सफेद छोटे फूल
सांवली-सी झाड़ी के खिले फैले फूल।
4.
दिन का सामना करने के लिए वह उठा
अपनी चरमराती डगमगाती खाट के
गुदड़ियाए बिछावन से भोर होते ही
गठियाई देह से दोनों पांव निकाले
निकले जमीन को छूने और पाने को
अस्तित्व की इकाई सामाजिक बनाने को।

राम राम है सौ-सौ बार

आंख मूंद जो राज चलावै
अंधरसट्ट जो ब्याज चलावै
कहे सुने पर बाज न आवै
हमको चूसै लाज न आवै
ऐसे अंधरा को धिक्कार
राम राम है बारंबार
कानों में जो रुई लगावै
बानी से जो बान चलावै
नाक फुलावै, गाल बजावै
घर के भीतर खून बहावै
ऐसे सूरा को धिक्कार
राम राम है सौ-सौ बार
कातै सूत, मलाई खावै
पंखा खोले देह जुड़ावै
भौंहै ताने हमें कलपावै
सुरसा ऐसा मुंह फैलावै
ऐसे दुश्मन को धिक्कार
राम राम है लाखों बार
बेकारी दिन-रात बढ़ावै
बेटों पर जो गाज गिरावै
खेतों पर जो टैक्स लगावै
गांवों में जो गीध बसावै
ऐसे हितुवा को धिक्कार
राम राम है बारंबार
हाथ जोड़ जो हाथ कटावै
पांव पूजि जो पांव कटावै
पेट पाल जो लाश उठावै
देहरी मरघट एक बनावै
ऐसे नेता को धिक्कार
राम राम है सौ-सौ बार।
1.11.1959

* गादी – हथेली