
युवा कवयित्री।डॉ भीमराव अंबेडकर कॉलेज, दिल्ली में सहायक प्रोफेसर।
गार्गी
गार्गी इन दिनों क्या कर रही हो
कितने सवाल और बचे हैं गह्वर में
तुम इतनी चुप क्यों रहने लगी हो
जब बोलती थी तो विद्वानों के कान में
मधुमक्खी का डेरा जम जाया करता था
उनका अधैर्य असीम
क्या अभी भी कुछ सवाल उन्हें
बार बार जन्म लेने को प्रेरित करते हैं
उनकी आंखें सवालों के
रक्तिम दृश्य से लथपथ शव सरीखी अंकित हैं
इनमें देखो! न जाने कितनी गार्गी की
नीली देह तैर जाएगी
गार्गी! तुम्हारे सवालात पर चरमराया आसमान
धरती पर अंगारे फेंकता है
आकाशवाणी होती है
अब सब नष्ट हो जाएगा
तुम्हारा दिमाग विक्षत हो जाएगा गार्गी
इस आवाज से तुम कितना चौंकी थी
‘ब्रह्म क्या है’ पूछते ही
स्त्री को पागल हो जाना था?
तप त्याग वैराग्य धारण करती तुम
दर्शन की गहराई को नापती
अंतिम सवाल पर चुप हो जाना
श्रेष्ठ समझती रही गार्गी!
उस स्त्री के बारे में तुम कितना जानती हो जो
सुरक्षा कवच को सीने में दफनाए
दो आंखें पीठ में गुदवाए
भूखे प्यासे भाग रही है अपनों से?
क्या तुम मानती हो
गलतियों के बदले कोई श्राप होता है
अच्छाई के बदले कोई वरदान?
गार्गी तुम्हारी नाक नहीं कटी
तुम बच गई कई अपमान से
पर क्या सच में प्रश्न पूछने की अनुमति देता समाज
उतना ही सरल सुंदर होता है
जैसे कि पहले प्रश्न की अकुंठ तान लेती स्त्री?
गार्गी वर्चस्व की खिचड़ी को अब तुम
कैसे समझती हो
नगाड़ों के बीच विसर्जित स्त्री को तुम
कितनी बार याद करती हो?
क्या तुम छींक सकती हो इन व्यवस्थाओं पर
या छींटों की चिंता से रुमाल से ढंक लोगी चेहरा?
बोलो गार्गी तुम्हारी वाकपटुता कब माफ होगी?
तमाचा जड़ देने भर से
या बलात्कार कर टुकड़े में बाँट देने से
शायद तेजाब फेंक कर अंतर्मन झुलसा देने से
माफी मिल जाए
या सरेआम नंगा घुमा देने से
किसी रोज़ रोज़गार के दरवाजे से ही
निकासी मिल जाए तुम्हें!
गार्गी तुम सदियों से सवालों से संघर्ष कर रही हो
कितना साहस जुटाती होगी उन क्षणों में
प्रेम पर लात पड़ने से जब
गर्भ गल गलकर बह जाता होगा
उसकी चीख कितनों के कानों में
आंसू छोड़ जाती होगी?
कुल कलंकिनी कही जाती तो कितनी बार खुद से
लिपट पूछती न्याय दर्शन अध्यात्म के बारे में?
गार्गी तुम्हारी ऊर्जा से
उनकी त्वचा क्यों कुंभलाने लगी
संसार सन्निपात बन उजड़ने क्यों लगा?
तुम सुअर को देखती हो तो क्या महसूस करती हो
गर्दभ तान का व्यंग्य तुम्हें
कितना रसीला लगता है?
सौंदर्यबोध की तुच्छ परीक्षा से गुजरती हुई
तुम रोकर आंखें बंद कर लेती हो
या अपने जीवन को याद करती
अड़ जाती हो हर परिभाषा के आगे
गार्गी ये तुम्हारे चुप रहने का समय नहीं है
उठो और पूछो
भक्ति और ज्ञान के बीच रेहड़ पर
जीते जीव के पेट की गुड़गुड़ाहट
पूछो उनसे उनके किरदार के बारे में
कितने और बचेंगे उनकी स्वर्ण नगरी में
ब्रह्म मुहूर्त कब निकलेगा!
कितने और आका जन्म लेंगे उनके दरबार में
पूछो गार्गी
पूछो!
संपर्क : फ्लैट नं. १४९, दूसरा तल, पैराडाइज अपार्टमेंट, रोहिणी, सेक्टर-१८, नई दिल्ली-११००८५


समस्त नारी जाति को उद्वेलित करने की क्षमता से परिपूर्ण।
अत्यंत प्रभावशाली कविता