
वरिष्ठ कथाकार।संप्रति केंद्रीय विद्यालय संगठन में ललित कला शिक्षिका के पद पर कार्यरत।

सामने के खुले मैदान में अनगिनत पलाश वृक्ष के पत्तों की फागुनी पर धूप चमक रही थी। गुलमोहर की कलियां भी अपना शैशव तज, तरुणाई की अंगड़ाई ले, चटकने को तैयार थीं। दूर कहीं बांसुरी की तान, ढोल और मांदल की थाप मन में मचलाहट भर रही थी। भदरू अपनी धूल धूसरित तहमद घुटने तक लपेटा, मिट्टी के टीले पर बैठा, एक शाखा से विलग हुई टहनी से जमीन कुरेद रहा था। मन में शायद कोई छवि थी जिसे उस धूल के चित्रपट पर उतार देना चाहता हो। लेकिन भोला भाला-सा भदरू न सिद्धहस्त चित्रकार था और न ही कोई मूर्तिकार कि मन में लहरों-सी डूबती-उतराती उस छवि को गढ़ कर साकार कर लेता। मन में ढेरों रस पगे भाव थे, शब्द थे जिन्हें भदरू किसी कवि-सा अभिव्यक्त भी नहीं कर सकता था। मन गुनिया के विचारों में ऐसा उलझा था, जिस तरफ देखता, उसे सांवली सलोनी गुनिया ही दिखाई देती। भदरू कुछ अनमना-सा ऊबकर जंगल के रास्ते जाती पगडंडी पर पैदल चल निकला। हाथ में वही नरम टहनी थी जिससे धूल पर भदरू अपनी प्रिया का चित्र बना रहा था। उसकी बाईं हथेली में फंसी टहनी उसके साथ घिसटती चली जा रही थी। उस फंसी टहनी के साथ मानो उसके विचार भी साथ ही घिसट रहे हों।
गुनिया से भदरू का बंधन तरुणाई का हो, ऐसा नहीं था। एक ही आदिवासी संस्कृति में दोनों संग-संग पले-बढ़े थे। दोनों ने साथ-साथ शैशव, बालपन, वयःसंधि व यौवन में प्रवेश किया था। जानवरों को हकारना, जंगल से सूखी लकड़ियां बीनना, बालियों से अन्न झटकारना, कंटीली झाड़ियों से खट्टे-मीठे बेर तोड़ना, झील में तैरना सीखना, सबकुछ एकसाथ किया था दोनों ने।
गुनिया से भदरू बचपन से ही स्नेह बंधन से बंधा हुआ था पर जैसे-जैसे गुनिया हरियाती गई, यौवनाई में बढ़ती गई भदरू का गुनिया से नेह बंधन पक्का होकर प्रेम बंधन में बदल गया।
सुचिक्कन सांवली भरी-भरी युवा देह वाली गुनिया आदिवासी सौंदर्य से परिपूर्ण भदरू के मन में गहरी पैठती गई। दोनों जीविकोपार्जन के बहाने वनयात्रा पर चल निकलते। चलते-चलते सघन वृक्षों की ओट से जब धरती पर धूप पड़नी रुक जाती, तब भी भदरू गुनिया के नैनों की धूप के सहारे सारा जंगल छान आता। गुनिया की सांवली, मछली-सी चमकती त्वचा से बने अंग-अंग पर गुदना की कशीदाकारी थी। उसकी पिंडली में सजा ज्यामितीय आकार का गुदना तो भदरू के स्वप्न में भी आता था। गुनिया की ठोढ़ी पर लगी गुदना की तीन बिंदिया और उसके कान के ऊपरी भाग में पहने लच्छे के पास के गुदने का आलेखन तो भदरू को पूरा सितारों से सजा आकाश लगता। वह कई बार निर्निमेष उन गुदना के बिंदुओं को देखता रहता। गुनिया इस तरह देखे जाने का कारण पूछती तो भदरू कुछ झेंप-सा जाता। उसके अंग-प्रतिअंग में गुदने में भरा सौंदर्य निहारते-निहारते भदरू की नजर एक जगह पर कुछ ठहर सी जाती और उसकी सारी स्निग्धता, समर्पण, प्रेम, स्नेह जैसे वहीं जड़वत हो जाते।
गुनिया की बाईं कलाई के पास कोहनी की तरफ एक नाम गुदा था ‘रेवाराम’। यह नाम भदरू को झिझोड़ डालता, उसके अंदर जैसे कुछ बुझ जाता। यह नाम भदरू के कोमल मन पर अप्रत्यक्ष प्रहार करता रहता। भदरू कभी भी, जब यूं ही उस गुदने को देखता, सहम कर उस स्थान से अपनी नजरें फेर लेता मानो वह उस जगह, उस नाम को देखना ही नहीं चाहता था। यह नाम ही तो वह दुर्भाग्य था जो कई बरस पहले गुनिया को भदरू से विभक्त करा ले गया था। बालपन में गुनिया का विवाह रेवाराम से हुआ था हंसली, तोरण, लच्छे, कौड़िया हार, मोर पंख का फीता, गिलट का बाजूबंद, काली डोर में गुथे सिक्कों की माला पहने नववधू गुनिया जंगल के एक छोर से दिखाई न पड़ने वाले उस छोर की तरफ चली गई थी, मानो वह भदरू की सपनीली, रंग भरी दुनिया भी अपने साथ विदा करा के ले गई थी।
कई साल गुनिया के बिना भदरू बिखरा हुआ, लक्ष्यहीन-सा जंगल में भटकता रहा। सूखी लकड़ियां बीनने के बहाने या ढोर चराने के बहाने, जंगल में मानो वह गुनिया की छाया को ही ढूंढ़ता रहता। और यूं ही बेसबब, निरुद्देश्य मेघ-सा भटककर खाली हाथ लौट आता।
कुछ साल भदरू, भदरू न रहकर कुछ और ही हो गया। फिर एक सुबह देखा, उजड़ी-उजड़ी-सी गुनिया उसके घास-फूस और बांस की बनी झोपड़ी के बाहर खड़ी थी। पूछने पर पता चला रात में सोते समय शायद कोई आदमखोर जंगली जानवर रेवाराम को ले गया था। जंगल में बहुत ढूंढ़ने पर उसकी धोती और फटा-चिड़ा अंगरखा ही बरामद हुआ। गुनिया विखंडित दांपत्य के दुख में विशृंखलित-सी अव्यवस्थित मालूम पड़ी। गुनिया पहले भी निष्काम, निर्लिप्त भदरू की छावं में ही स्थिरता व विश्राम पाती थी। भदरू, गुनिया की इस मनःस्थिति से बहुत दुखी था लेकिन पता नहीं क्यों अंदर से कहीं प्रसन्न भी था, क्योंकि घटनाक्रम कुछ भी रहा हो उसकी गुनिया पुन: उसके पास थी।
इस बात को भी कई बरस बीत गए थे। बालपन का विवाह गुनिया के अंतःस्थल से शनैः-शनैः विस्मृत होता गया। लेकिन गुनिया के हाथ पर गुदा वह नाम अब भी दोनों के जीवन और नेह रेखा को विभक्त कर दो भागों में बांट देता था। फिर भी दोनों के बीच का बचपन का आकर्षण, सारी बाधाओं से दूर जंगल के विशाल वृक्ष के तने से लिपटी किसी लजीली बेल-सा परवान चढ़ता रहता। उनके इस वर्धित प्रेम में जंगल की महती भूमिका थी। गुनिया और भदरू, विकट अरण्य में बहुत गहरे अंदर तक चलते चले जाते, अनेक पक्षियों की विभिन्न प्रकार की मंजुल आवाज सुनते। द्रुत गतिज पवन से झूमते वृक्षों की डालों की चरचराहट, फूलते टेसू, लाल रंग से गसमसाए गुलमोहर से उनका तीव्र आकर्षण रहता। डूबती सांझ में जब आकाश के बादल, गुलाबी केसरिया रंग में रंग जाते तब गुनिया और भदरू भी एक-दूसरे के रंग में रंगे-पगे बस्ती की तरफ लौट आते। रास्ते में दोनों तरफ नीम, आम, जामुन, पीपल के वृक्षों की कतारों के मध्य से गुजरते दोनों कई बार नि:शब्द हो जाते पर दोनों के नयन का प्रेमिल स्नेही वार्तालाप निरंतर चलता रहता। ऐसे में कई बार भदरू की आंखों में गुनिया की कोहनी के पास का गुदना कौंध जाता और फिर भदरू उसी चिरपरिचित ठहराव या जड़ता से उलझ जाता। लेकिन जल्द ही गुनिया की बोलती आंखें उसे उसकी स्नेह धारा से पुनः जोड़ देतीं।
नदी के मुहाने पर मैदान के उस तरफ, अमराई के साथ बांसों के जंगल थे। चारों तरफ खिली श्वेत दुग्ध धवल कांस, दिन के अंतिम प्रहर की धूप में अपनी लकदक से चमक रही थी। कुछ दूर जाने पर सांझ गहरा कर झुटपुटी-सी हो जाती। बांस के झुरमुट के ऊपर, उजली पंचमी का तिहाई चांद उग चला था। रात रानी की झाड़ियां, हरसिंगार के फूलों के लदेफदे पेड़, कदंब की सरसराती शाखें भदरू और गुनिया का आत्मिक प्रेम जगा जातीं और दोनों एक-दूसरे के लिए जमीन पर पड़े हरसिंगार के सुवासित फूल चुनने लगते। इससे भी मन नहीं भरता तो गुनिया भदरू को सहारा देकर कुछ ऊंचा उठा देती और भदरू उन फूलों की छोटी-छोटी डालों को हिला देता और फिर दोनों शाखों से झरे फूल एकत्रित कर एक-दूसरे पर उलट देते। फूल एकत्रित करने और उछालने का क्रम तब तक चलता जब तक कि दोनों के अंतस, फूलों की सुवास से गमक न उठते। दोनों एक-दूसरे की चुहल करते-करते छेड़छाड़ पर उतर आते। ऐसे में भदरू से गुनिया का कोहनी के समीप गुदा, गुदने वाला हाथ टकरा जाता और भदरू किसी चोरी के अपराधबोध से गाफिल, शांत हो अनमना-सा पड़ जाता।
गुनिया इस अचानक आए ठहराव का संकेत समझ नहीं पाती और दोनों हरसिंगार के फूलों से रिक्त अपनी डलिया लेकर लौट आते। किंतु जल्द ही शरद ऋतु की चांदनी का नील निर्मेघ आकाश दोनों के मन के अंतराल को काट देता और फिर दोनों निकल पड़ते अपनी पूर्व परिचित प्रेम यात्रा पर।
इस तरह कई दिन, वर्षों में बदलकर बीत जाते। कई बार गुनिया भदरू के लिए भात भाजी की बियारी अपने आंचल में या फिर टोकरी में छुपा ले आती जिसे भदरू छक कर, आत्मा तृप्त होने तक खाता। भदरू के उदर की तृप्ति गुनिया के नेत्रों में आत्म संतुष्टि की प्रसन्नता बन कर निखर जाती।
वैवाहिक संबंधों में अपेक्षाकृत उदार मनोवृत्ति रखनेवाले आदिवासियों ने कभी भी भदरू और गुनिया के इस मेलजोल पर कोई आपत्ति नहीं जताई। जंगल के नियम से बंधे स्वतंत्र जीव–जंतुओं की तरह मानव संबंधों में भी स्वतंत्रता का समावेश इस आदि ग्रामीण जीवन की अपनी विशेषता थी, शायद यही कारण था कि भदरू और गुनिया के रिश्ते की प्रगाढ़ता, देह से परे प्रेम कभी भी किसी की आपत्ति का विषय नहीं बने।
जंगल में ऋतु कोई भी हो सबका प्रभाव अपनी विशेषता के साथ पूरे जंगल पर पसरा रहता। जंगल में पछुआ हवाएं जब प्रवेश करने लगतीं, तब प्रकृति अपना शीतला बाना उतार, फूलों के रंग में रंगी बसंती हो उठती। सर्वत्र पल्लवित रंगीन फूलों की कतारें रुक्ष से रुक्ष मन को भी रंगों से पाग देती। पलाश के वृक्षों पर झूमती फूलों की टहनियां मानो अनहद नाद बजा कर सर्वत्र रंग और प्रेम का आमंत्रण देती जान पड़तीं। दूर से आती आदिवासी स्त्रियों के समवेत स्वरों की बरम देव, बूढ़ा देव, दूल्हा देव की स्तुतियां मन में भक्ति के साथ एक रसीली मचलाहट भी भर जातीं। समग्र वातावरण मानो किसी अनदेखे अतिथि का स्वागत करता जान पड़ता, और यह अतिथि कोई और नहीं फागुन का महीना होता। चहुंओर फैले रंगों और पुष्पों की सुवास से मन की तरुणाई मानो अंगड़ाई ले जागृत हो जाती। इस बार के पलाश के वृक्ष की सिंदूरी फूल की बौड़िया गुनिया और भदरू के हृदय में प्रेम स्वीकृति की मृदु भावना बनके प्रस्फुटित होने लगी।
भगोरिया भी समीप था। दोनों ही युवा अब अपने इस प्रगाढ़ संबंध पर अपने समाज और परिवार की स्वीकृति चाहते थे।
उस दिन सरोवर के नजदीक वाले टीले पर वार्तालाप करते गुनिया और भदरू अब अपने अप्रत्यक्ष प्रेम को सार्वजनिक करके दंपत्ति के रूप में बरम देव व दूल्हा देव की आशीषें चाहते थे। बहुत देर तक की चुप्पी को गुनिया ने तोड़ा, ‘क्यों रे भदरू! होंठ रचाने वाला बीड़ा बनाएगा मेरे लिए?’
(आदिवासी संस्कृति के उत्सव में बना हुआ पान अगर कोई युवक युवती को देता है तो इसका अर्थ प्रेम अथवा विवाह प्रस्ताव होता है)
गुनिया के इस खुले-खुले प्रस्ताव से भदरू कुछ झेंप-सा गया।
गुनिया पुनः बोली, ‘अरे, तू तो लजा गया।’
भदरू ने कुछ संभलकर मुंह से किक की आवाज निकाल कर अस्वीकृति दर्शाइ और फिर टेसू के रंग वाले सुर्ख गालों में प्रसन्नता भर कर बोला, ‘तू आएगी मेरा पान खाने?’
गुनिया लरज कर बोली, ‘सज-धज के आऊंगी।’
इस सहज संक्षिप्त वार्तालाप में यह प्रगाढ़ संकेत थे कि दोनों का प्रेम अब दांपत्य को प्राप्त करने वाला था।
भगोरिया हाट वाले दिन गुनिया अपने सारे गहने पहन, सुनहरी किनारे वाली लाल धोती में किसी वनदेवी-सी सुंदर लग रही थी। उंगलियों से लेकर कलाई तक बंधे हाथ फूल का गहना कांप कर कभी गुनिया की बेचैनी तो कभी उसकी स्त्रीसुलभ स्वाभाविक लाज दर्शा देता। सफेद बुशर्ट और लाल रंग के गमछे में लक-दक भदरू भी गुनिया की तरह ही अपनी प्रणय प्राप्ति के लिए तैयार था। दोनों ही अपने सगे संबंधियों के साथ बहकते-संभलते हाट की तरफ चल निकले। झूलों की चर्र-चर्र, मनिहारिनों की आवाजें, मेले-ठेले की हलचल, बांसुरी की तान पर मांदल की थाप, सब जैसे भदरू और गुनिया को दांपत्य की शुभकामना देने आए हों। उत्सव, मेले की रेलमपेल के बीच फागुन की उड़ती गुलाल सारे माहौल को हुरियारा बनाए दे रही थी। ऐसे में लजाती गुनिया ने भौंह के इशारे से पूछा, ‘पान लाए हो या नहीं?’
भदरू प्रसन्नता की लहर में बहता मानो वापस लौटा। अपने कलावा बंधे हाथों से उसने गुनिया की तरफ बीड़ा बढ़ाया। गुनिया ने उसी कोहनी के पास गुदे, गुदना वाले हाथ को आगे बढ़ाया। गहरा स्याह गुदना ‘रेवाराम’ भदरू के मानस पटल पर काली छाया बन के छा गया। हाथ से पान जमीन पर गिर के धूल में मिल गया। हतप्रभ, अवाक गुनिया के हाथों की चूड़ियां ठिठक गईं। अन्यमनस्क भदरू जब कुछ न कर सका तो उठकर जंगल की तरफ पलायन कर गया। सारे नाते रिश्तेदार में चर्चाओं के स्वर स्पष्ट होने लगे। गुनिया भी जैसे किसी दुःस्वप्न से जागी और किसी के भी सवाल का जवाब दिए बिना भदरू की दिशा में जंगल की तरफ चली गई। कुछ दूर जाकर देखा, नदी के कच्चे घाट पर भदरू, किसी गुजरे हादसे से घायल, हतबुद्धि-सा बैठा था। पारंपरिक गहनों में सजी-धजी गुनिया भदरू की पीठ के पीछे बैठ गई। गुनिया को अपने पीछे महसूस कर भदरू पास ही पड़े पत्थर नदी में निरुद्देश्य फेंकने लगा।
गुनिया ने प्रश्न किया, ‘क्या हुआ रे?’
भदरू ने संक्षिप्त जवाब दिया, ‘ऊहूं।’
गुनिया के हाथ में साज के पत्ते थे, उसने आगे जाकर भदरू के हाथ में थमा दिए और बोली, ‘एक बात का जवाब दे दे भदरू! फिर मैं चली जाती हूँ।’
हाथ में साज वृक्ष के पत्ते थे जिन्हें हाथ में लेकर असत्य नहीं बोला जा सकता था। पत्ते हाथ में लिए भदरू ने नम आंखों से गुनिया को देखा, गुनिया बोली, ‘तू मेरे साथ उम्र भर के बंधन में बंधना चाहता है?’
भदरू ने हाथ के साज वृक्ष के पत्तों को मजबूती से थाम लिया और बोला, ‘हां!’
गुनिया उत्तर सुनकर किंचित विह्वल हो उठी।
‘तो फिर मेले से भाग क्यों आया?’
वहीं पास के पीपल वृक्ष पर क्रौंच पक्षी ने कीकना शुरू कर दिया मानो वह भी भदरू के इस कृत्य से नाराज था। भदरू ने आगे बढ़कर गुनिया की कलाई थाम ली और गोदना पर उंगली फिरता हुआ बोला।
‘तेरा यह गुदना….!’
गुनिया बोली, ‘तो?’
भदरू सांस भर के बोला, ‘जाने क्यों तेरा यह गुदना मुझे बताता है कि तू मेरी नहीं है, मेरे लिए नहीं बनी है।’
मानव मन की इतनी क्लिष्ट और बारीक बात सुन गुनिया निरुत्तर हो गई। कजरारी आंखें सजल हो उठीं। गुनिया ने पास ही पड़ी बबूल की सूखी डाल उठा ली और उसके कांटे से अपना गुदना कुरेदने लगी। भदरू ने जब गुनिया की रक्तिम कोहनी देखी तो जैसे वह नींद से जागा। वह चिहुंक कर उसे ऐसा करने से रोकने दौड़ा, पर तब तक गुनिया की कलाई बहते रक्तसे सनने लगी थी। भदरू ने जल्दी से गुनिया की रक्त स्रावित बाहु को मजबूती से पकड़ लिया। गुनिया रुंधे गले और बहते आंसू से बंधी हिचकी के स्वर में बोली, ‘भदरू! तू इस छोटे से गुदने से परेशान है! अरे यह तो सिर्फ ऊपरी खाल पर खुदा हुआ है, और तू और तेरा नाम तो मेरे मन के कहीं अंदर, कहीं भीतर तक कभी न मिटने वाले गुदने की तरह है। ऊपरी गुदना तो कभी भी मिट जाएगा भदरू! पर अंदर जो गुदना है वह तू क्या कभी मेट सकता है। खेर महारानी, बरम देव के असीसों से गुदा है तेरे नाम का गुदना, मेरे मन पर। लेकिन तुझे विश्वास नहीं तो जाने दे! मेरा क्या है, पहले भी जी गई थी अब भी जी जाऊंगी।’
यह कहते-कहते उसके हाथ के लच्छे खनक उठे, आंखों की नमी आंचल से पोंछती वह टीले से उठकर जाने लगी। पीछे से भदरू, जैसे सब कुछ समाप्त होने वाला हो यह भांप कर तड़फड़ा कर दौड़ पड़ा और उसने गुनिया का वही कोहनी के नीचे गुदने वाला हाथ थाम लिया।
उनकी इस खुशी में बसंती बयार हुलसकर बह निकली, जंगल में पक्षियों का कलरव प्रसन्नता से गा उठा। दूर से आती बांसुरी की स्वर लहरी व मांदल की थाप के स्वर और तेज हो गए।
संपर्क सूत्र :प्लॉट नं.9, साई सुबह परिसर, फेज-1, संजीवनी नगर गढ़ा रॉयल स्कूल रोड, लक्ष्मी कांत मेमोरियल स्कूल के पास, जबलपुर- 482003 (म प्र) मो.7999300881


जंगल में प्यार की खुशबू बिखेरती हुई सी है आपकी ये कहानी “गुदना”।
शुभ्रा
शिकागो से