अरुण रंजन मिश्र

मुख्यतः संस्कृत समीक्षक के रूप में प्रतिष्ठित।ओड़िया में लंबे समय से कविकर्म, किंतु अपने इधर के तीन संस्कृत कविता संग्रहों के कारण चर्चित।

बहते पानी जैसे लोगों के मुंह वहां
कोई अघोरी कोटिशः जीवित नरमुंड फेंकता हैं
संपर्कों में वाड़वाग्नि जलता है
टूटी ख्वाहिश की हड्डियां गिर गईं
सब जगह
सब जगह है हलाहल नीले धुएं-सा
चुप्पी साधे शहर के अस्तित्व में
फूंक दिया गया सिनेमाघर
फूलों का एक बगीचा भी उसी तरह
सर्वोपरि महादेव का शिव मंदिर
पानी के नलों से टपकती है
हर पल जहर की एक बूंद आकाश के
सफेद कांच के भाण्ड से बरसता है
करोड़ों लोगों की आंखों का आंसू
अलार्म घंटी के स्पर्श से
घर के भीतर लग जाती है आग
असमर्थ शब्दों की बर्फबारी से
नहीं दिखलाई पड़ती है कमलरूपी-आश्वस्ति
जीवनाग्नि पान करने की आवाज
नहीं सुनाई पड़ती
सबका सब विषय में है प्रतिवाद
शहर की गलियों में आग की रेतियां
झंझाओं की पीठ चढ़कर दौड़ रही हैं
पत्थर की पायल पहन नाच रहा है
फुफकारता हुआ दिन का उजाला।

संपर्क :
अरुण रंजन मिश्र, प्रोफेसर, संस्कृत, पालि और प्राकृत विभाग,विश्वभारती, शांतिनिकेतन-७३१२३५ पश्चिम बंगाल मो.८६१७८६३८९१
शुभ्रजित सेन, सहायक प्राध्यापक, संस्कृत विभागगौड़वङ्ग विश्वविद्यालय, मालदा -७३२१०३, पश्चिम बंगाल, मो.८१००२३२०२१