अद्यतन कविता संग्रह ‘एक अनागरिक का दुख’। संप्रति एक शिक्षण संस्थान में कार्यरत।
आबरू नागरिक की
ओ नागरिको!
अब जाओ, सो जाओ
कल आना
सड़क पर
आने की जरूरत क्यों-
धान के खेत में बच्ची गई है
किसान का खाना लेकर
फैक्टरी में कामगार का भोजन
कैटवाक करती कोई बच्ची ही तो है
घास काटती
सुई में धागा लगाती
स्कूल पढ़ने जाती
सड़क पार करती
छत पर खिलखिलाती
नागरिक पर बच्ची को यकीन नहीं
यकीन का विश्वविद्यालय कहां है बहन?
जहां से यात्रा शुरू ही हुई थी
वहीं नागरिक खत्म करने को तत्पर है
हम नागरिक का विरोध करते हैं
उस बच्ची के कपड़े कौन सिलेगा
जो रोज फाड़ रहा है
चर्र…. चर्र…. चर्र…..?
अपने अंदर की आवाज सुनो
कोई नहीं है
पृथ्वी पर
कोई नहीं है देश
मिट्टी कितनी मुलायम और कितनी कठोर है
उन्हें पता नहीं कि मिट्टी में भी आग होती है
और धरती के नीचे तो जखीरा है
एक बेटी का बाप नहीं हूँ
हजारों बेटियां हैं
हजारों मांएं हैं
हजारों बहनें हैं
और हजारों समाचार वाचिकाएं हैं
सब हमारे साथ हैं
लो मशाल और उठा लो इसे
हजारों आंखें देख रही हैं
तुम्हें बारंबार
नागरिक नंगा है
और पक रहा ईंट का भट्ठा है
यहां-वहां पत्थर ही पत्थर है
छू लो
और चला दो वहां
जहां तुम्हें इच्छा हो…।
खिड़की
एक खिड़की घर की
सुबह-सुबह खुली
उसमें धूप घुस रही थी
धूप लड़की को छू रही थी
लड़की जहां-जहां जाती
धूप वहीं चली जा रही थी
धूप को क्या पता था
कि लड़की भी रोशनी देती है
मनुष्य को
बिलकुल पास बिलकुल पास से…!
आग के बदले पानी
आग के बदले पानी
यही है हमारी कहानी-
इन्हीं खेतों में आग लगा दी जाएगी
किसानों के पास बैल नहीं है
राख उड़कर जाएगी
इन्हीं के घरों में पहले
इन्हीं का इलाज करने वाला कोई नहीं होगा
बाल बच्चों को होगी
परेशानी
खांसते हुए मर सकते हैं
फेफड़ों के कारण
इन्हीं से देश देखा है मैंने
इन्हीं की तरह हैं बाबू जी
लाठी से लेकर चौकी सजी रहती है
दरवाजे पर
कुत्ता पड़ा हुआ है
अन्न के लिए
वह भात नहीं खाता
रोटी पसंद है
सिर्फ रोटी
जब खेत खलिहान के तमाम लोग नहीं रहेंगे
एक दिन
फिर किसके लिए चुनाव होगा
कैसे कोई प्रधानमंत्री बनेगा
मुझे तो चिंता हो रही है
इन खेतों को देखकर
दिल्ली भी चिंतित होगी
आज अखबार में प्रकाशित समाचार पढ़ रहा हूँ
प्रदूषण और पर्यावरण को लेकर
सिर्फ नहीं पढ़ने को मिला
किसी के खेत में खाद्य कैसे जाएगा
कोई चिड़िया चोंच में कैसे भरकर लाएगी दाना
गिलहरियां कैसे पेड़ों पर चढ़ेंगी
चूहा गणेश की सवारी कैसे करेगा
अपने बच्चों को कैसे दिखाऊंगा
काले-काले खेत
अब लग रहा है
आग के बदले पानी आएगा…!
खाना बनाते वक्त
खाना बनाते वक्त हाथ जल जाता है
कभी-कभी पेट
पेट के जले में खाना बनाना पड़ता है
स्त्री लाखों बार जलती होगी
बनाते हुए खाना
लानत है तुम्हें आग!
एक- दो बार जलने से याद आईं
बहू-बेटियां
हम सिगरेट से नहीं
गैस से नहीं
बम की आग से नहीं
यूक्रेन के हालात से जल रहे हैं हर पहर
मां रोज पूछती है
बेटा, हाथ खाना बनाते समय जला तो नहीं!
देखो न
आज मैं भी कई जगह जली
इन सबों के जलने से
खाना भी जला
मौत भी जली
एक बच्ची केवल बची!
भटकते हुए राह मिलती है
जैसे जल पृथ्वी के अंदर है
और पहाड़ों से आते हुए भी
आकाश और धरती के बीच
हवा से जल आ रहा है चेहरे पर
चेहरे से भी नमकीन जल निकल आया है
पसीना कहते हुए
जल चारों जगहों से
आया इस तरह
खनिज नहीं होता तो जल भी आग की तरह जलने की जल्दी करता
जल में बल है
बल में जल है
कल जल है कि नहीं
पता नहीं
आज जल जलजला है
मनुष्य ने जल के लिए जल बहा दिया
न जाने कितना
पत्थरों में जल बचा है
मनुष्यों के अंदर जल कम है
कलकल नदियों में जल है
पर कम है
इस तरह हमारी आंखों में भी
आंखें नम हैं
हे जल
तू चल पल-पल!
संपर्क : मणि भवन, संकट मोचन नगर, आरा, भोजपुर–८०२३०१ मो.९४३१६८५५८९