
वरिष्ठ कवि। कविता संग्रह, ‘रोज ही होता था यह सब’, ‘धरा का स्वप्न हरा है’। उपन्यास, ‘उत्तर वनवास’

रात-बारात
विचित्र बारात थी वह
घोड़ी, बग्घी या कार नहीं
बुल्डोजर पर सवार था दूल्हा
सड़क छेंककर चल रही थी बारात
सड़क के दोनों तरफ
मकानों की छतों पर खड़े लोग
कर रहे थे पुष्प वर्षा
दूल्हा हवा में भांजकर तलवार
जता रहा था आभार
चरम पर था बारातियों का उत्साह
डीजे ऐसे बज रहा था जैसे युद्ध का डंका
सड़क से लगती पतली गली में
दम साधे खड़ी थी आशंका
घरों के अवचेतन में बज रहा था खतरे का गजर
कि कहीं उनकी तरफ न घूम जाए बुल्डोजर
गली की बगल से सकुशल निकल गई बारात
घरों के अवचेतन से कब विदा लेगा डर?
दु:स्वप्न
रात का दूसरा या तीसरा प्रहर था
निगाह अचानक दीवार घड़ी पर पड़ी
उल्टी दिशा में चल रही थीं सुइयां
कोने के गमले में उग आया था विस्मय
वहां पत्तियों से हरा रंग गायब था
और फूलों से लाल
बच्चे के खिलौनों से भी हुआ था खिलवाड़
हैंड ग्रेनेड जैसी दिख रही थी क्रिकेट की गेंद
तमंचे की नाल में तब्दील हो गई थी बांसुरी
हिम्मत करके बुकशेल्फ की तरफ देखा
किताबें सिर झुकाए
पंक्तिबद्ध जा रही थीं कबाड़खाने की ओर
अचानक किसी शरारती किताब ने धक्का दिया
जमीन पर गिर गई बच्चे की ड्रॉइंग बुक
जिसमें बनाया था उसने
जंगल में भटक गए आदमी का चित्र
ताज्जुब कि उस दृश्य से
अदृश्य हो चुका था आदमी
दृश्यमान था सिर्फ और सिर्फ जंगल
कमरे में बहुत अंधेरा था
पर उस बहुत अंधेरे में भी
बहुत साफ-साफ दिख रहे थे ये सारे उलटफेर
उजाले के लिए बल्ब का स्विच दबाना चाहा
कि लगा 220 वोल्ट का झटका
झटके ने ला पटका मुझे
नींद और स्वप्न से बाहर
घबराहट में टटोलने लगा अपना दिल
वह धड़क रहा था बदस्तूर
सीने में बाईं तरफ
मैंने राहत की सांस ली
कुछ है जो अपनी सही जगह पर है।
संपर्क : 202, ज्ञानखंड-1, फ्लैट-एफ2, इंदिरापुरम, गाजियाबाद-201014 (उप्र) मो. 9873413078
