
वरिषठ कथाकार। अंग्रेज़ी में उपन्यास ‘द लूपहोल’ तथा कहानी संग्रह ‘इकोज़ फ्रॉम द स्काई’। हिंदी में हास्य-व्यंग्य उपन्यास ‘जो घर फूंके आपना’, कहानी संग्रह ‘इन्द्रधनुषी जाल में एक जलपरी’, ‘नहीं, मैं तुम्हारी बेटी नहीं हूँ’, ‘तृप्ति और अन्य कहानियां’ आदि। भारतीय वायु सेना में विंग कमांडर पद से सेवानिवृत्त।

ढलती दोपहर की मरणासन्न धूप शहर की इमारतों पर पसरी हुई थी। पंकज ने सबसे ऊंची मंजिल के अपने कॉर्नर केबिन से बाहर झांका। कंपनी के सीईओ के बाद उस भव्य आधुनिक इमारत में दूसरा सबसे शानदार केबिन यही था। उसकी आरामदेह रिवोल्विंग चेयर और उसके सामने की बड़ी-सी मेज कंपनी में हाल में ही तेजी से बढ़ी उसकी प्रतिष्ठा की गवाही दे रही थी। टेबुल पर रखे बड़े से शेनजेन नोंग के ऑर्किड फूलों के गुच्छे पर नजर पड़ी तो उसे महसूस हुआ कि उन फूलों में खूबसूरती बहुत थी लेकिन सुगंध नहीं थी। मां ने इतने महंगे फूल देखे भी न होंगे। लेकिन क्या मां के मन में कुछ ऐसे ही फूलों की छवि थी जिनसे उसने एआई की तुलना की थी?
उसका मन एक अदृश्य उड़ान भरकर उस छोटे से शहर में पहुंच गया जहां एक औसत मध्यम वर्ग के छोटे से घर में मेज पर रखे कंप्यूटर में वह दिन-रात डूबा रहता था। कितना त्रस्त रहती थी मां उसे हर समय कम्प्यूटर में उलझे देख-देख कर! मां के उलाहने उसके कानों में फिर से बजने लगे। कितनी शिकायतें थीं उसे अपने बेटे की उस कंपनी से, उस नौकरी से, जिसके मिलने पर वह फूली नहीं समाई थी। पहले उसे विश्वास ही नहीं हुआ था कि इतनी अच्छी नौकरी घर बैठे की जा सकती है। हुई तो वह खुशी से झूम उठी थी कि उसकी आंखों के तारे को घर से हजारों मील दूर नहीं जाना पड़ेगा। मां अनपढ़ नहीं थी। उस छोटे से शहर में मध्य वर्ग की कोई गृहिणी जितनी शिक्षित हो सकती थी, मां उससे एक कदम आगे थी। लेकिन दफ्तर का काम ऑनलाइन करने का नया तरीका उसे एक अजूबा लगा था। पंकज ने जब उसके सामने इंटरनेट के रहस्य की परतें खोली थीं तो वह विस्मित हुई थी और खुश भी। उसने सोचा था अब पंकज हर समय उसकी आंखों के सामने रहेगा और वह जब चाहेगी उससे जी भर कर बतिया सकेगी। लेकिन जब पंकज घंटों अपने कंप्यूटर में खोया रहने लगा तो वह बिफर पड़ी थी। बहुत खीझ के साथ उसने कहा था- ‘तुझसे तो अच्छी हालत तेरे दोस्त गोपाल की है जो अमेरिका चला गया इसी कंप्यूटर की नौकरी के लिए। कम से कम उसके मां-बाप को सामने बैठे बेटे से बात करने के लिए बाट तो नहीं जोहनी पड़ती है।
पंकज ने मुस्करा दिया था। उसने मां को समझाने की कोशिश की थी- ‘घबरा मत मां, मेरी इतनी मेहनत जिस दिन सफल होगी मेरा सारा काम यही कंप्यूटर कर दिया करेगा। जो बेचारा तुझे अभी इतना नामुराद लगता है, उसके भी दिन बदल जाएंगे।’
‘क्यों, कहीं से कोई फरिश्ते आ जाएंगे जो उसके अंदर घुसकर तेरे हिस्से का सारा काम कर दिया करेंगे? और फिर तू क्या करेगा?’
‘हां मां, सचमुच ऐसा ही होगा।’ पंकज ने हँस कर कहा था ‘अखबार पढ़ती है तू, टीवी पर खबरें भी देखती है। तूने तो एलेन मस्क का नाम सुन रखा होगा।’
‘हां, पढ़ा था कहीं उसके बारे में। दुनिया का सबसे अमीर आदमी है शायद। टीवी पर बताया गया था कि वह दुनिया को बदल डालने वाली योजनाओं पर काम कर रहा है।’
‘अरे वाह मां, ठीक पकड़ा तूने! पता है, क्या कहता है वह? उसकी मानें तो कुछ वर्षों में ही हर इंसान इतना अमीर हो जाएगा कि किसी को कोई काम नहीं करना पड़ेगा।’
‘फिर सारे काम अपने से हो जाएंगे? और तू जो ये दिन-रात अपने कंप्यूटर में घुसा रहता है उससे भी फुर्सत मिल जाएगी? लेकिन तेरे जितना ढेर सारा काम करेगा कौन?’
पंकज हँस पड़ा था। ‘हां मां। मैं जितना दिमाग इसमें खपाता हूँ वह सब गैर जरूरी हो जाएगा। मेरा ही नहीं, मेरी इतनी बड़ी कंपनी का काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संभाल लेगा। और जो काम मैं दिन भर करता रहता हूँ उसे वह पलक झपकाते पूरा कर दिया करेगा। फिर जितना समय तू मांगेगी तुझे दे पाऊंगा।’
मां की प्रतिक्रिया इतनी अप्रत्याशित निकली कि उसकी याद करके ही पंकज सिहर उठा। मां शायद उससे ज्यादा दूरदर्शी थी। उसने कहा था, ‘बेटा, मुझे तो बचपन से ही बस एक बात पता है, ‘खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से’। मैं हूँ तो इसलिए कि मुझे कुछ करना होता है। जिस दिन कोई और मेरा हर काम करने लगेगा मेरे होने का मकसद ही खतम हो जाएगा।’ फिर एक क्षण रुककर उसने कहा था ‘अक्सर नकली हीरे असली से भी ज्यादा चमकदार होते हैं। पर इस धोखे में मत रहना बेटा कि हर जगह असली आभा की जगह नकली चमक ले लेगी तो यह दुनिया बहुत चमकदार और खूबसूरत हो जाएगी।’
मां के साथ हुई वह बात आई गई हो गई थी। इस बीच पंकज की प्रतिभा और मेधा को पहचान करके कंपनी ने उसे अपने हेड ऑफिस में मुंबई बुला लिया था। यहां आने के बाद कुछ महीने ही बीते थे जब वह लंबे-लंबे डग भरता हुआ कंपनी के प्रबंधन में दूसरी पायदान पर आ पहुंचा था। लेकिन आज मां की याद करके वह तय नहीं कर पा रहा था कि उसे अपनी प्रतिभा के इस अद्भुत मूल्यांकन के बारे में बताए भी या नहीं। और यदि बताए तो किस तरह कि मां उसकी बात समझ सके।
कुछ ही दिन पहले कंपनी ने उसे ‘वर्ष का रणनीतिक द्रष्टा’ घोषित किया था- एक भारी पुरस्कार, एक बड़ा-सा सुनहरा क्रिस्टल का कप और साथ में तालियों की गड़गड़ाहट! उसने पुरस्कार को उंगलियों में उठाकर देखा। कांच के भीतर छिपा एक अजीब-सा धुंधलापन था। उसे लगा यह धुंधलापन उस क्रिस्टल कप का नहीं उसके भीतर का था। पुरस्कार देने से पहले कंपनी के सीईओ ने घोषणा की थी- ‘एआई की मदद से हमारी उत्पादकता 300% बढ़ी है। हमारे वरिष्ठ अधिकारी पंकज वर्मा ने जिस साहस से टीमों का पुनर्गठन किया है वह अनुकरणीय है। एक स्लिम और ट्रिम ऑर्गनाइजेशन ही हमारे भविष्य को सुनहरा बना सकता है।’
लेकिन पंकज को उसी क्षण मां के शब्द याद आ गए थे। उसने महसूस किया ‘स्लिम एंड ट्रिम ऑर्गनाइजेशन’ शब्द में न रक्त था न हाड़-मांस का जीवन। शायद यह एक ठंडी छुरी जैसा शब्द था जो सबसे पहले इंसान से उसकी गरिमा छीनता है और फिर उसे सांख्यिकी में बदल देता है।
उस रात जब वह अपने होटल के कमरे में पहुंचा तो एक छोटे बच्चे की तरह मां की याद उसे रह-रह कर सताती रही। अभी उसका घर एक पंचसितारा होटल का सूना कमरा भर था। जिसमें कंपनी ने उसकी नई हैसियत के अनुरूप फ्लैट देने तक के अंतराल में टिका दिया था। मां अभिभूत थी इस सूचना से कि अब वह शादी के लिए राजी था लेकिन किससे? यह सोचने का समय अभी तक वह नहीं निकाल पाया था। उसके कमरे में आरामदेह सोफ़ा था, बहुत मुलायम बेड था पर कोई इंसान नहीं। उस रात वह घंटों करवटें बदलता रहा। बीच-बीच में छोटी-सी झपकी भी आती तो उसके कानों में उसकी अपनी आवाज गूंजने लगती- ‘क्या मैं बेरहम हूँ? या सिर्फ एक छोटा-सा पुर्जा जो कंपनी की मशीनरी में फँसकर बेबस घूमता रहता है!’
वह बार-बार स्वयं को सफाई देता रहा- ‘एआई ने कब मुझे बेरहम बनाया था? एआई ने सिर्फ वह उजागर किया था जो मेरे मन पर मेरी कंपनी की मुहर के साथ छप गया था -जीतने की इच्छा, लाभ की भूख, और यह भ्रम कि मैं और मेरी कंपनी दूसरों की कुर्बानी पर खड़े होकर भी सुरक्षित रह सकते हैं।’ वह बिस्तर पर देर तक पड़ा रहा लेकिन नींद एक ऐसा इंसान बन गई जो उसके घर के दरवाजे पर आता तो था पर भीतर आने से पहले ही लौट जाता था।
सुबह दफ्तर ले जाने के लिए कंपनी की कार आई तो उसकी नजरों से कार की विंडशील्ड पर जमी हल्की-सी धूल छिपी नहीं रह सकी। ड्राइवर ने कार साफ तो की थी लेकिन उसके मन की तरह कार की विंडशील्ड के नीचे भी अनचाही नमी और धुआं एक साथ छुप कर बैठ गए थे। एक ट्रैफिक सिगनल पर कार रुकी तो उसकी नजर एक दुकान के सामने फुटपाथ पर बैठे दो लड़कों पर पड़ी। उनके लैपटॉप खुले हुए थे, शायद मुफ्त वाई-फाई पकड़ने की कोशिश में।
एक लड़का जो मुश्किल से 21-22 साल का था अपनी स्क्रीन पर शायद वही संदेश देख रहा था जो उसने सामने रखे एक प्लेकार्ड पर लिख रखा था- ‘क्या आपको कोडिंग जॉब के लिए मेरी जरूरत है? मैंने अभी कोडिंग सीखी है। केवल70 रुपए प्रति घंटा पर उपलब्ध हूँ।’
पंकज ने अनायास ही उसे पहचान लिया। वही लड़का जिसे उसने अपनी टीम से दो महीने पहले हटाया था। नाम याद नहीं आया पर चेहरा वही था जिस पर कभी खिलने वाला उत्साह अब धूप में झुलस गए पौधे की तरह मुरझा गया था। पंकज के अंदर एक तीखी चुभन उठी। चुभन का स्वभाव भी अजीब होता है। वह कभी किसी को अंदर से हिला देती है तो किसी और को धीरे-धीरे सुन्न कर देती है। ट्रैफिक सिगनल हरा हुआ और उसकी कार आगे बढ़ गई लेकिन उस लड़के का झुका हुआ चेहरा उसके मन में एक काली लकीर-सी खींच गया। कार चलती रही लेकिन उसकी सोच सुन्न हो गई।
ऑफिस पहुंचकर कुर्सी पर बैठते ही उसने कंप्यूटर स्क्रीन पर देखा- टीम चैट में फिर से नई खबरें थीं- ‘एआई कोड जनरेटर अपडेट हो गया है। मैन्युअल टेस्टिंग टीम को अब पांच की जगह सिर्फ दो बंदों की जरूरत है। क्लाउड कॉस्ट कम करने के लिए पुरानी सेवाएं बंद करनी होंगी। पंकज कृपया अनुमोदन दें।’
अनुमोदन? बस इतनी-सी क्लिक? क्लिक से ही नौकरी आती है क्लिक से ही खत्म हो जाती है? उसने माउस ऊपर रखा पर क्लिक नहीं कर सका। उसकी उंगलियों से जान जाती रही, जैसे उन्हें किसी जीवित चीज को मारने का आदेश लिखना हो। उसे लगा जैसे उसके भीतर ही भीतर क्षरण हो रहा है। क्षरण उसकी आत्मा का। मिट जाना उसकी इंसानियत का। उसे लगा वह स्वयं कृत्रिम इंसान बनता जा रहा है।
पंकज ने अपने भीतर एक अदृश्य दरार तभी महसूस की थी जब उसने अपने सीईओ को इंसानों की जगह एआई का उपयोग करके मानव संसाधन पर हो रहे खर्च में भारी कटौती करने की सलाह दी थी। वह एक अदृश्य दीवार थी- बहुत सूक्ष्म, बहुत महीन, जैसे कांच पर नाखून से खींची गई रेखा। लेकिन जब उसके सुझावों पर अमल करने के बाद कंपनी को अभूतपूर्व लाभ हुआ और स्वयं उसे पूरी कंपनी के सामने सम्मानित किया गया तो तालियों की गड़गड़ाहट और सुनहरे क्रिस्टल की जगमगाहट ने उस रेखा को ढंक लिया। चमकीले चेहरे, उठते हुए गिलास, मुस्कराहटों से भरे कॉरपोरेट चेहरे- सबने उसे आच्छादित कर लिया था। पर वह दरार पूरी तरह कहां भर पाई थी? किसी अंधेरी दीवार पर टंगी तस्वीर के पीछे की सीलन से रिसता पानी धीरे-धीरे अपना रास्ता खोज ही लेता है।
पंकज को अब स्वयं अपने साथ समय बिताने में डर लगने लगा था। उसकी आत्मा कभी उसे धिक्कारते हुए चीखने लगती तो उस अप्रिय अनुभव से बच निकलने के लिए वह काम में डूब जाना चाहता था ताकि दिनचर्या में सोचने के लिए जगह ही न बचे। पर स्थिति जल बिच मीन पियासी जैसी हो गई थी। एआई आधारित नया ऑटोमेशन सिस्टम, जिसे उसने ही लागू करवाया था, अब उसके अधिकांश काम खुद ही करने लगा था। पहले दिन उसे यह उपलब्धि लगी थी, दूसरे दिन राहत, तीसरे दिन एक खालीपन। मां की मेधा क्या कृत्रिम बुद्धि से भी अधिक प्रखर थी? क्या उसने उस भविष्य के अंदर तक झांक लिया था जिसकी तरफ उसने कदम तो बढ़ा लिए थे लेकिन जिसके मुखौटे के पीछे वह झांक नहीं पाया था?
शून्यया खालीपन प्रकृति में संभव हो, न हो, पर मन का दरवाजा तोड़कर अंदर पैठ जाना उसे खूब आता है। पंकज के मन के अंदर की दरार में बैठकर खालीपन ने अब उसी दरार को कुरेदना शुरू कर दिया। एआई की मदद मिलने के बाद से कोडिंग के रुटीन काम के लिए इंसानों की जरूरत बहुत कम हो गई थी। ऑटोमेशन सिस्टम लागू होने के बाद कंपनी ने एक के बाद एक ईमेल भेजकर कई सौ इंजीनियरों को पिंक स्लिप अर्थात नौकरी से हटाए जाने की सूचना पकड़ा दी थी। हर नाम के पीछे बहुत बड़ी आकांक्षा भले न हो पर हर ई मेल आई डी के पीछे बहुतेरी जरूरतें थीं। कहीं रोटी, कहीं कपड़े और कहीं मकान की। इन बुनियादी जरूरतों के अतिरिक्त जो छोटे-छोटे मासूम सपने हो सकते थे वे एक छोटे-से शहर के मिडिल क्लास परिवार में जन्मे पंकज की सोच से परे नहीं थे।
‘डेटा वैलिडेशन’ पूरा हुआ या नहीं, चेक करने के लिए उस रात पंकज ने अपना लैपटॉप खोला तो उसके भीतर से कोई चीख-चीख कर कहने लगा ‘इन्हें न पढ़ो तो सुखी रहोगे।’ लेकिन फिर भी वह अपने लैपटॉप पर क्लिक कर गया। शायद उसने शकील बदायूनी की गजल की वे पंक्तियां नहीं पढ़ी थीं ‘नजरों से न करते पुरसिश-ए- ग़म, खामोश ही रहना बेहतर था, दीवानों को तुमने छेड़ दिया वल्लाह कयामत कर बैठे।’ लैपटॉप पर नाम चमका- रामचंद्रन पी। आयु 32 वर्ष। उसकी याद में कहीं दबा हुआ अंकुर फूट पड़ा। एक बार लंच ब्रेक में रामचंद्रन ने बताया था, ‘पिता जी को कैंसर है सर। भगवान की कृपा हुई, मुझे बहुत समय से यह नौकरी मिल गई। अब उन्हें बचाने की कोशिश तो कर पाऊंगा।’
दूसरा नाम- अनन्या रस्तोगी। आयु 29 वर्ष। याद आया, चार महीने पहले ही उसकी शादी हुई थी। मुबारकबाद देते हुए पंकज ने हँस कर कहा था, ‘बहुत खुश होंगे तुम्हारे हबी इतनी सुंदर पत्नी पाकर’ तो उत्तर मिला था ‘आजकल लुक्स से ज्यादा पत्नी की नौकरी और वेतन मैटर करने लगे हैं सर! मुझसे कहीं ज्यादा सुंदर मेरी बड़ी बहन है। लेकिन वह बेरोजगार है अतः अनमैरेड भी है। मेरी शादी के लिए तो कंपनी को ही पूरा श्रेय जाता है।’
पंकज गंभीर होकर स्क्रॉल करता गया। हर नाम के साथ कोई छोटी-सी बात याद आ जाती- किसी का चुटकुला, किसी का डायरी के पीछे लिखा हुआ सपना, किसी का ऑफिस पिकनिक में लड़खड़ाना। मानव संसाधन डेटा-शीट धीरे-धीरे मानव-शोकगीत में बदलने लगी। उसने बत्ती बुझा दी। फिर लैपटॉप बंद किया तो स्क्रीन की रौशनी भी मन के भीतर छाए अंधेरे में घुल मिल गई।
अगले दिन एकबार फिर सीईओ ने ऑफिस में बुलाकर कॉफी ऑफर की और कहा ‘कमाल कर दिया तुमने, एआई इंटीग्रेशन के बाद आया रेवेन्यू जंप अविश्वसनीय है। बहुत जल्दी हम वर्ल्ड टॉप 10 में आ जाएंगे।’
वह मुस्कराकर इस तारीफ के लिए धन्यवाद देना चाहता था लेकिन सीने में कई और आवाजें उभरतीं-
‘सर, कुछ महीने और मिल जाते तो मेरी बहन की शादी का इंतजाम हो जाता।’
‘सर, प्लीज! छह महीनों में मेरा पर्सनल लोन चुक जाएगा। तब तक की मोहलत नहीं मिल सकती?’
‘मेरे पिताजी के कैंसर के इलाज का क्या होगा सर, कुछ समझ में नहीं आ रहा।’
पंकज का अपराध-बोध स्मृति बनकर उसे दिन रात चाबुक लगाने लगा।
शाम को ऑफिस से लौटकर उससे होटल के अपने शानदार कमरे में नहीं जाते बना। कॉफी शॉप में बैठकर वह सोचता रहा और सामने रखी कॉफी ठंढी होती रही। ‘मैंने गलत क्या किया कंपनी के हित में निर्णय लेकर? तकनीक जब भी आगे बढ़ती है, कुछ लोग पीछे छूटते ही हैं! इतिहास गवाही देगा- मैं जल्लाद नहीं हूँ, सिर्फ प्रगति के फुटप्रिंट्स के नीचे की धूल का एक कण हूँ।’ पर भीतर से कोई बोला- ‘झूठ मत बोलो, क्या तुम सिर्फ अपनी सुविधाओं के गुलाम नहीं हो।’
वह चौंक गया। यह आवाज किसी और की नहीं, उसकी ही थी। उसने विचारों को तर्क के माध्यम से सहेजने की कोशिश की-
‘मैं न होता तो कोई और यही करता। मैं तो विकास की मशीन का एक अदना-सा पुर्जा भर हूँ।’ उसने महसूस किया कि उसका मन धीरे-धीरे दो हिस्सों में बंट रहा है- एक तरफ से आवाज आती- ‘डेटा सही है,निर्णय लॉजिकल।’ तभी दूसरी आवाज कहती ‘उनकी जगह तुम भी तो हो सकते थे!’
कभी-कभी टूटन चिल्लाकर नहीं आती- वह बेहद मुलायम कदमों से चलकर आती है। गिरीश की टूटन या कहें क्षरण, ऐसे ही धीमे-धीमे आरंभ हुआ। कभी वह आधी रात में अचानक जाग जाता तो पाता कि माथे पर पसीने की बूंदें थीं। कोई स्पष्ट सपना याद नहीं रहता, पर घबराहट बनी रहती, जैसे कोई अपराध की परत भीतर ही भीतर पिघलकर नसों में बह गई हो। एक रात उसने आधी नींद में एक अजीब दृश्य देखा-
लाखों लाइनों का कोड अचानक इंसानों की आवाजों में बदल गया- कोड ब्लॉक चिल्ला रहे थे, हमारी नौकरी लौटाओ…
फंक्शंस कह रहे थे- ‘हमारा अस्तित्व अल्गोरिद्म के पहले से था।’
डेटा-लॉग्स रो रहे थे- हम अभी जिंदा हैं। हमें अभी न दफनाओ।’
वह घबराकर उठ बैठता। पर उसके भीतर कहीं एक दिलासा देने वाला भी था जो कहता ःतुमने क्या गलत किया। तुम तो उपकरण भर थे इस उथल-पुथल के पीछे।’ पर जाने क्यों दिलासा देने वाली आवाज बहुत क्षीण-सी होती, कहीं दूर सिसक रहे एक शिशु जैसी।
एक शाम उसकी उदासी आंसुओं में बदल गई। क्या हर घनीभूत पीड़ा आंसुओं में बदल जाती है? दुर्दिन किसी और के हों तब भी? क्या उसके अपने दुर्दिन भी किसी दिन यूं ही अचानक आ जाएंगे? या जिस अंतर्वेदना से वह गुजर रहा था वह उसके दुर्दिन का पूर्वावलोकन भर था। काफी देर बाद उसने खुद से कहा- ‘मैं इतना टूट क्यों रहा हूँ? ये लोग मेरे लिए कौन थे?’
पर उत्तर तुरंत मिला- ‘थे तो वे भी तुम्हारे ही जैसे, बस सिस्टम ने उन्हें तुमसे पहले चुन लिया।’ ‘नैतिक दुविधा’ और ‘व्यावसायिक सफलता’ के दो पाटों के बीच पंकज लगातार पिसता जा रहा था। उसका विघटन हो रहा था। धीरे-धीरे।
पंकज के जीवन को एआई दिशा देती आई थी। दिशा गति देती थी और गति उपलब्धि। उपलब्धि, जिसे वह कभी अपनी आत्मा का ईंधन समझता था अब कर्पूर की तरह व्योम में विलीन हो रही थी। कंपनी उसे हर दिन और ऊंचा उठा रही थी। इंटरव्यू, फोटो सेशन, लिंक्डन पर हजारों लाइक्स, इनबॉक्स में बधाइयों की बारिश। लेकिन जितना उसका बाहरी कद बढ़ रहा था, उतना ही उसके भीतर की जमीन धंस रही थी।
पंकज ने अपने केबिन की खिड़की से बाहर देखते हुए पहली बार महसूस किया कि वह अपनी उपलब्धियों का शिकार हो गया था। जब कोई युवा इंजीनियर उसकी प्रशंसा करता-‘सर, आपने तो भविष्य बदल दिया’, तो उसकी रीढ़ में एक अजीब ठंडक उतर आती।
उसने अपने मनोचिकित्सक मित्र अभिक से मिलने का विचार किया। अभिक ने उसकी बात पूरी सुनने के बाद कुछ देर उसे स्थिर निगाहों से देखा, फिर बोला ‘तुम्हें पता है पंकज, बहुत से लोगों को सफलता संभाल लेती है। लेकिन दूसरों की कीमत पर मिली सफलता आदमी की आत्मा को खा जाती है। यह तुम्हारा अपराध-बोध नहीं, तुम्हारी पहचान का संकट है। तुम खुद से पूछ रहे हो- ‘मैं कौन हूँ?’ और तुम्हें खुद का जवाब पसंद नहीं आ रहा।’
पंकज ने आंखें नीची कर लीं। वह किसी जादू की उम्मीद लेकर आया था, जो उसका बोझ छीन ले। अभिक बोलता रहा ‘तुमने ऐसे फैसले किए जिनमें तुम खुद को मनुष्य नहीं, एक संस्था का प्रतिनिधि मान रहे थे। अब जो टूटन है, वह तुम्हारी अपनी है, संस्था की नहीं।’
पंकज ने धीमी आवाज में कह, ‘पर कोई विकल्प तो मेरे पास था भी नहीं।’
अभिक मुस्कराया, ‘विकल्प हमेशा होता है। तुमने उसे चुना नहीं क्योंकि उसके साथ संघर्ष, धीमे रास्ते और असफलता की संभावना जुड़ी थी।
पंकज चुप हो गया। उसके सामने अनगिनत अनसुने चेहरे कौंध गए जिन्हें उसने कभी ध्यान से नहीं देखा था।
उसी रात उसने अपनी पुरानी डायरी निकाली, जिसे उसने अपने कैरियर के शुरुआती दिनों में लिखा था। पन्ने पीले पड़ चुके थे, पर उनपर लिखी आकांक्षाएं अभी भी ताजा थीं-
‘मैं एक ऐसा टेक्नोलोजिस्ट बनूंगा जो इंसानियत और विकास के बीच कोई खाई नहीं खुदने देगा।’ उसे लगा, वह अपने ही स्वप्नों का हत्यारा बन गया है। कॉरपोरेट संस्कृति ने एक मुखौटा पहन कर क्रूरता को सहजता में बदल दिया था और वह इस अनोखे खेल को देखता एक निस्पृह तमाशाई बन कर रह गया था। वह फुसफुसाया ‘क्या सब कुछ मशीनें ही तय करेंगी? मुझे उनके औचित्य का प्रबंधन करना था, मैं उनके निर्णय का क्रीतदास बनकर क्यों रहूं? मैंने लोगों से उनकी नौकरियां छीनीं और बदले में अपनी पहचान ही खो दी।’
उसने कई रातें बिना सोए काटीं।आधी रात को अचानक उठकर वह बालकनी में खड़ा हो जाता और नीचे शहर का फैलाव देखता। नीचे लाखों टिमटिमाती रोशनियों में वह बेरोजगारी की चिंगारियां देखता। चिंगारियां, जो उसके एक निर्णय से भड़क उठी थीं, और जिनकी आंच वह लगातार अपनी आत्मा पर महसूस कर रहा था।
अगली सुबह अचानक उसने फैसला किया कि वह उन कर्मचारियों से मिलेगा जो निकाले गए थे। कंपनी ने जो ईमेल भेजे थे, उनमें से कुछ के संपर्क नंबर उसने अलग से नोट किए थे। उसने दो-तीन लोगों को फोन किया।
पहले तो वे चौंके कि पंकज सर स्वयं बात कर रहे हैं। फिर कुछ संकोच, कुछ राहत और कुछ दबी हुई शिकायतें तैर कर उसके पास आ गईं। एक ने कहा-
‘सर, मैं अब गांव लौट आया हूँ। शहर में किराया भरना मुश्किल हो गया था।’
दूसरे ने कहा ‘सर, इसमें आपकी कोई गलती नहीं थी। बस मेरा समय खराब था।’
एक महिला इंजीनियर ने धीमी आवाज में कहा- मैंने अपने बेटे को बताया कि मेरी कंपनी बंद हो गई है तो वह खुशी से चिल्लाया कि अब तो आप घर पर रहेंगी। पर शायद अब उसे उस महंगे स्कूल से निकलना पड़ेगा जहां इस नौकरी के मिलने पर मैंने एडमिशन दिलाया था।’
पंकज उन आवाजों को सुनता रहा- उनकी दरारों को, उनकी घुमड़ती नमी को, उनकी टूटन को।
उसके भीतर कुछ और भी टूट रहा था। पर उसने तय कर लिया कि प्रायश्चित वह जरूर करेगा।
अगले ही दिन उसने कंपनी को अपना इस्तीफा भेज दिया। बहुत छोटा पत्र था-
मैं वह नहीं बनना चाहता, जो मैं बन चुका हूँ।’
बोर्ड स्तब्ध था। कई ने रोका। कई ने भविष्य के बड़े प्रोजेक्ट्स की पेशकश रखी। कई ने इसे मानसिक थकान कहा। लेकिन वह अड़ा रहा। उसकी आत्मा, जो महीनों से घायल थी, पहली बार खुद में लौट रही थी- जैसे लंबे समय से सूखे हुए कुएं में थोड़ा-सा पानी फिर से दिखाई दे।
आई टी क्षेत्र की सफलता के शिखर से उतरकर जब वह वापस अपने शहर पहुंचा तो मां तय नहीं कर पा रही थी कि खुश हो या दुखी। मां को उसने आश्वस्त किया। कंपनी के जो शेयर उसे अपने काम के ईनाम के तौर पर मिले थे अब एआई के नए क्षेत्र में एक टॉप की कंपनी के बहुत महंगे शेयर में बदल चुके थे। उनकी कीमत और फंड के पैसे इतने काफी थे कि जीवन यापन की कोई समस्या नहीं थी। विवाह करने के बाद भी।
‘लेकिन तू करेगा क्या?’ माँ ने पूछा ‘अभी तेरी घर पर बैठ जाने की उम्र तो है नहीं। क्या वह दिन सचमुच आ गए जब किसी को काम नहीं करना पड़ेगा?’
वह हँस पड़ा ‘नहीं मां, अभी तो नहीं आए। लेकिन कभी जरूर आ जाएंगे। समय के रथ को रोकना मेरे बस में तो नहीं। लेकिन लाखों नहीं तो हजारों नौजवानों को मैं इस लायक बना दूंगा कि वे भी समय के रथ के साथ-साथ चल सकें।’
मां हैरान थी। ‘पहेलियां बुझाना बंद कर। कुछ तो बता, तू यह सब करेगा कैसे?’
‘भस्मासुर की कहानी तूने ही तो सुनाई थी मां मुझे। अभी भी याद है न? भस्मासुर जब वर देने वाले को ही भस्म करने पर तुल गया था तो मोहिनी का रूप धरकर भगवान विष्णु ने उसे कैसे अपने साथ नृत्य करने को प्रेरित किया। कैसे नृत्य की एक मुद्रा में मोहिनी ने अपने सिर पर हाथ रख लिया था?’
‘हां खूब जानती हूँ। मोहिनी की नकल करते हुए भस्मासुर ने अपने सिर पर हाथ रखा तो स्वयं ही भस्म हो गया था। पर इसका तेरी कंप्यूटर विद्या से क्या लेना देना? कुछ मेरी समझ में भी तो आए।’
‘कोई मुश्किल नहीं होगी तुझे मेरी योजना को समझने में। देख मां, पहले लाखों युवा कंप्यूटर की भाषा में उसे साधारण निर्देश देने के काम पर रखे जाते थे। इसे कोडिंग कहते थे। ऐसा सामान्य काम अब एआई चुटकी बजाते कर डालती है। उन युवाओं को यदि एआई का समुचित ज्ञान होता तो आगे अधिक मुश्किल काम करने के लिए उनकी जरूरत बनी रहती। मैं अब लाखों युवाओं को बिना कोई फीस लिए एआई का उपयोग करना सिखाऊंगा। एक बार फिर से उनके लिए रोजगार के रास्ते खुल सकेंगे।’
‘यह तो बहुत अच्छा करेगा तू, लेकिन इससे भस्मासुर की कथा का क्या संबंध?’
‘है मां, विष ही विष का उपचार है। मानव मस्तिष्क की क्षमता कंप्यूटर की क्षमता से कम नहीं है। एआई अभी अनंत आकाश जैसा लगती है। लेकिन मानव मस्तिष्क की कोशिकाओं की सीमा ही अब तक कौन माप सका है। मशीन और मानव की रेस में कौन जीतेगा यह तो निश्चित रूप से अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन जिस दिन मानव मोहिनी मुद्रा में एआई के ऊपर वशीकरण मंत्र फूंकेगा वह दिन मानव मात्र की जीत का दिन होगा। मानव अपनी ही कृति का दास बनकर जीने को कभी तैयार नहीं होगा। एआई बहुत कुछ कर सकती है लेकिन वह भावना शून्य होती है। मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। एआई हमारी भावनाओं से कैसे जीत सकती है?
माँ चुप हो गई। पंकज की बातें उसकी समझ में आईं यह कहना तो कठिन है लेकिन उसे सबसे बड़ी सांत्वना इस विचार से मिली कि एआई के साथ लगातार जद्दोजहद उसी के सहयोग से बिना कुछ किए यूं ही जीते जाने से बेहतर विकल्प होगा। उधर पंकज ने उस शाम अपनी डायरी में लिखा- ‘मैं मशीन नहीं हूँ इसलिए सब कुछ कर पाने का दम नहीं भरूंगा। लेकिन इंसान के हक में जो विकल्प हो उसे चुनने का अधिकार रखता हूँ यही मेरी सबसे बड़ी शक्ति है। यही है वह जादुई छड़ी जो मैं घुमा सकता हूँ लेकिन जिसे कृत्रिम मेधा नहीं घुमा सकती।’
और तब उसे लगा कि पिछले कई महीनों से चली आ रही उसके अंदर के विघटन की प्रक्रिया थम गई है। उसकी सोच की दिशा बदल गई है। यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।
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