वरिष्ठ आलोचक और शिक्षाविद।महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्वउपकुलपति।कोच्चि में निवास।

१.
बलि का बकरा बनना आसान है
सिर्फ खड़े रहना है
तलवार गले पर गिर पड़ेगी
बकरे के मरने के बाद भी जान तड़पती रहेगी।

२.
हमारे जंगलों में बहुत से कृष्णमृग
इधर-उधर भाग रहे हैं
राम-भाव के बावजूद
सभी राम कृष्णमृग से आकर्षित हैं।

३.
आज एक शख्स से मिला मैं
मामूली था वह
हर रोज बिना विज्ञापन के
हजार से ज्यादा लोगों को खाना दे रहा था।

४.
कल रात सपने मैंने कई घुड़सवारों को देखा
भयानक था दृश्य
घोड़ों के टापों की आवाजें
आज दिन में भी भी सुनाई दे रही हैं।

५.
कई-कई माताओं के गर्भ में
भ्रूणावस्था में जो बच्चे जीवित हैं
उनसे मेरा निवेदन है
ऊसर हो रही है इस धरती पर जन्म न लें।

६.
हमारे आसपास भीषण युद्ध
इतने सहज कैसे हो गए हैं?
सैनिकों की मृत्यु को
हम कैसे सहन कर पा रहे हैं?

७.
कई नदियां सूखती जा रही हैं
कई भाषाएं लुप्त हो रही हैं
कई लोग मरणाधर्मा हैं
पर लोग चिंताग्रस्त नहीं हैं।

८.
देश छोड़कर लोग विदेश जा रहे हैं
मैं मातृभूमि का अर्थ
अपने आत्मकोश में ढूँढ़ रहा हूँ।

९.
हे बुद्ध!
एक बार फिर जनम लो इस धरती पर
अपनी तमाम करनणा की नदियों के साथ।

१०.
जब एक पत्ता गिरता है
तो पूरा जंगल विलाप करता है
जब एक आदमी मरता है
तो हमारी आंखें गीली क्यों नहीं होतीं?

संपर्क : सांद्रम, कोलायकोड, पो.पुडुसेरी, पलक्काड६७८६२३ (केरल) मो. ९८९५०१८०८८