वरिष्ठ कवि। अद्यतन कविता संग्रह ‘मनुष्य विरोधी समय में’।

बंदियो!
तुम जहाँ पर भी हो
जो कुछ भी हो तुम्हारे पास
आतंक, घुटन, तनाव और पीड़ा
मेरे पास भेज दो
मछुआरो!
जो कुछ भी हो तुम्हारे पास
खाली जाल और समुद्र की पीड़ा
भेज दो सब मेरे पास

हे समस्त खेतिहरो!
जो कुछ हो तुम्हारे पास
भूख, खाली बर्तन, चीथड़े
कटे हुए स्तन, उखड़े हुए नाखून
सब मेरे पास भेज दो

मनुष्य के दुख पर
तैयार कर रहा हूँ मैं एक दस्तावेज
ईश्वर के समक्ष पेश करने के लिए

किंतु हे धरती के सर्वहारा
मुझे आशंका है
कहीं ईश्वर निरक्षर न हो?

अभिव्यक्ति; मेरा बोलना
सदियों से कद
किसी आवाज का मुक्त होना है

और मेरा लिखना
धरती में दबे
सदियों पुराने यथार्थ के
कंकाल को खोदकर
जमीन पर रख देने जैसा है
जो डरावना भी है और घिनौना भी

सच कहना जोखिक भरा है
और अपना सच कहना
स्वयं अपनी सलीब पर चढ़ने जैसा

किंतु मैं समझ गया हूँ
मेरा बोलना और
मेरा लिखना ही मेरे लिए मोक्ष है!

संपर्क: मंगलदीप-2, मानस नगर, जियामऊ, हजरतगंज, लखनऊ-226001 मो.9415568836 मेल-bhagwanswaroopktr7@gmail.com