दिल्ली के सरकारी विद्यालय में शिक्षक।एक कविता संग्रह मेरे पास तुम हो

भाषा का दुख

एक दिन किसी ने कहा
कि होली मुबारक नहीं कहते

कल किसी ने फिर कहा
कि ईद की शुभकामनाएं नहीं दी जातीं
ईद मुबारक कहते हैं

उसने बस इतना ही कहा था
किंतु उसके अनकहे में
सिसक रही थी दो भाषाएं

और मैं अपनी सीखी हुई तमाम भाषाओं को
भूल जाना चाहता था।

मेरी मदद करो

होने और न होने की बहस के बीच
मैं ईश्वर की तलाश में हूँ

मैं किसी मलबे के नीचे हूँ
जिसमें घुले हुए कांच
चुभने लगे हैं मेरी पीठ पर

मेरी पीठ पर आईं खरोंचों से
उभरने लगे हैं पुरानी सभ्यताओं के नक्शे
मेरी पीठ अब मेरी पीठ नहीं है
धर्मयुद्धों से लहूलुहान सभ्यताओं का समुच्चय है.
मेरी देह में अवशेष ढूँढने वालों के हाथों में

वे मोटी-मोटी किताबें हैं
जिनकी लिपि तक वे नहीं जानते
वे उन किताबों की व्याख्यायें
किसी नुकीले पत्थर से खुरचकर
मेरी पीठ पर लिखना चाहते हैं
और मैं चुप हूँ

मैं चीखना चाहता हूँ
किंतु मैं नहीं जानता कि किस भाषा में चीखूँ
दुनिया के भाषाविदो मेरी मदद करो।

निर्वासन

चिड़िया गुनगुना रही है अखरोट पर
कौआ देवदार पर बोल रहा है
दूर बज रही हैं घंटियां किसी कोने में

कुछ लोग हाथ में माला फेरते हुए
मंत्र बुदबुदा रहे हैं
कुछ औरतें तैयार कर रही हैं
मोमोस के लिए मीट

कुछ बच्चे बस्ता लेकर
अपने नन्हे कदमों से गिन रहे हैं सीढ़ियां
उनके मुंह से
जून महीने में भी निकल रही है भाप

यह डलहौजी का वह कोना है
जहाँ सड़क के दोनों ओर
रंग-बिरंगे झंडे हैं
उनपर बहुत बारीक अक्षरों में कुछ लिखा हुआ है

मैं लिखा हुआ पढ़ना चाहता हूँ
किंतु लिपि नहीं जानता
मैं बारीक अक्षरों का मिलान
उन चेहरों से करता हूँ
जिनकी अकथ्य उदासी को

मैं बरसों से पढ़ने की कोशिश में हूँ
मैं इस उदासी का कारण जानना चाहता हूँ
मैं गौर से देखता हूँ
जीन-जैकेट पहने
जल्दी-जल्दी काम पर निकलते हुए
तिब्बती युवक-युवतियों को

वे सब आते-जाते मुझे देखते हैं
अदब में सिर हिलाते हैं
और धीमे से मुस्कुरा देते हैं

मैं उनकी मुस्कुराहट में
झंडों पर लिखी हुई इबारत को पढ़ता हूँ
मानो लिखा हो-
कि अनुदान से बनी इमारत और
दया में मिली शरण से
बरसों के निर्वासन का दर्द नहीं जाता।

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