शंभुनाथ

स्वाधीनता के 75 वें वर्ष पर दो पुराने कथन याद आ रहे हैं।एक कथन है, ‘मनुष्य स्वाधीन पैदा होता है, लेकिन उसे हमेशा बंधनों में जीना पड़ता है।’ दूसरा है, ‘मनुष्य एक करुणासंपन्न प्राणी है, लेकिन हमेशा ऐसे समाज में जीता है जो निष्करुण और अन्यायपूर्ण है।’ जब दुनिया 21वीं सदी के प्रवेशद्वार पर थी, इसे उच्च संभावनाओं, पारदर्शिता, सभी की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विकास की सदी के रूप में देखा जा रहा था।नई सदी में चलते-चलते दो दशक से ज्यादा बीत गए, हर तरफ ऐसी उन्मत्त भीड़ नजर आती है, जिसमें संवेदना की क्षमता नहीं है।संवेदना, अर्थात दूसरे के दुख-कष्ट को अपना दुख-कष्ट समझना, समान वेदना का अनुभव करना!

महाभारत में देखा जा सकता है कि हिंसा में अफवाह की क्या भूमिका है।द्रोणाचार्य की संहारक वीरता से घबराकर पांडव पक्ष अफवाह फैलाता है कि अश्वत्थामा मारा गया।युधिष्ठिर से कहा गया कि वे द्रोणाचार्य के समक्ष इसकी पुष्टि कर दें।युधिष्ठिर महाभारत के एकमात्र ऐसे चरित्र हैं जो सच बोलना छोड़ नहीं सकते थे और ‘अश्वत्थामा मारा गया’ के संदर्भ में दुविधा से अत्यधिक पीड़ित थे।इस महाकाव्य का दूसरा कोई चरित्र इतने संशय और दुविधा में नहीं रहा है।बहुतों को लगता है कि महाकाव्य के नायक भीम हैं, जिन्होंने दुःशासन को मारने के बाद उसका रक्तपान किया, युधिष्ठिर नहीं।आखिर क्या ठीक है- नृशंसता या इसे लेकर मन में पैदा होने वाली दुविधा? महाभारतकार ने स्वर्ग में भीम को नहीं, युधिष्ठिर को भेजा था।उसका मकसद हिंसा की बीभत्सता दिखाना था, ताकि लोगों में हिंसा को लेकर बार-बार संशय पैदा हो।प्लेटो ने भी कहा था, ‘युद्ध के बाद हर तरफ होते हैं सिर्फ अश्रु और रक्त!’

यदि स्वतंत्रता के 75वें साल के मौके पर हम आत्मनिरीक्षण करना चाहते हैं तो सामने यह प्रश्न है – क्या आज किसी भी हिंसा, पक्षपात में शामिल होते समय या इसका समर्थन करते समय हमारे मन में दुविधा होती है, संशय होता है?

एक उदाहरण इतिहास से लें।अशोक ने कलिंग विजय के बाद जब धौलगिरि पर्वत से नदी के जल को रक्त से लाल होता हुआ देखा, वह चंडाशोक से देवनांप्रिय अशोक बन गया।उसे ‘दूसरे’ की हिंसा विचलित कर गई।आज की हिंसा कितनों को विचलित करती है? प्रसाद की कहानी ‘ममता’ में ममता शेरशाह से अपने प्राण बचाकर आश्रय के लिए आए मुगल हुमायूँ से कहती है, ‘तुम भी वैसे ही क्रूर हो’।लेकिन वह ब्राह्मण होकर भी अपने बर्तन से उसे जल पिलाती है और आश्रय देती है।

इस दौर में स्पष्ट है, ‘दूसरे’ के दुख-कष्ट या मारे जाने को चुपचाप देखना नृशंसता है।जिस तरह का विद्वेष हर तरफ फैलाया जा रहा है, उसको लेकर संशय न होना बौद्धिक पक्षाघात है।सबसे खतरनाक है जिज्ञासा की मृत्यु!

बृहदारण्यकोपनिषद में कहा गया है, ‘दाम्यत दत्त दयध्वमिति।’ कहने का आशय है-आत्मनियंत्रण, त्याग और करुणा (सम-अनुभूति) की तत्काल फिर जरूरत है।

दुख देगी यह संकुचित दृष्टि

प्रसाद ने ‘कामायनी’ (1936) में बनते हुए राष्ट्र के लिए समरसता का स्वप्न देखा तो अपनी आशंकाएं भी व्यक्त कर दीं।उन्होंने इड़ा सर्ग में लोकतंत्र की भावी विसंगतियों का जो त्रासद चित्र खींचा है, आज वह यथार्थ बनकर उपस्थित है :
यह अभिनव मानव प्रजा-सृष्टि
द्वयता में लगी निरंतर ही
वर्णों की करती रहे वृष्टि
अनजान समस्याएं गढ़ती
रचती हो अपनी ही विनष्टि
कोलाहल कलह अनंत चले
एकता नष्ट हो, बढ़े भेद
अभिलषित वस्तु तो दूर रहे
हाँ मिले अनिच्छित दुखद खेद…
सबकुछ भी हो यदि पास भरा
पर दूर रहेगी सदा तुष्टि
दुख देगी यह संकुचित दृष्टि।

आजादी पाए 75 साल बीत गए, भारत को भिन्नता पर आधारित ‘संकुचित दृष्टि’ के कारागार से मुक्ति कैसे मिलेगी? यह सबसे बड़ा प्रश्न है।इस समय कोई व्यक्ति सुख-शांति से नहीं है, लेकिन सामान्यतः अब अशांति विचलित नहीं करती।हर भिन्नता अपना तर्क गढ़ चुकी है।हर जगह हिंसा का अंत करने के लिए हिंसा जरूरी बताई जा रही है।हर नृशंसता एक मजेदार घटना है, काफी लोगों को मजा आता है।गरीब परिवारों से आकर गली-मुहल्लों में छोटे-छोटे आततायी पनप गए हैं।हरेक के लिए दूसरा झूठा और गलत है।निश्चय ही दिख रहा है कि देश में सड़कों, ट्रेनों, हवाई अड्डों, फ्लाइ-ओवरों, शानदार भवनों, मॉल-मल्टीप्लेक्स का जाल बिछ गया है।हर तरफ हँसते हुए सुखी चेहरों की छवियां हैं।इन सबके बीच ऐसा बहुत कुछ है जो नहीं दिख रहा है और अनजाने बहुत कुछ खो जा रहा है।

वैश्वीकरण से निराशा हिंसा का गर्भगृह है

आक्सफेम की 23 मई 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार इन दिनों विश्व में हर 30 घंटे पर एक नया अरबपति बन रहा है, जबकि इसी अवधि में कई लाख लोग चरम गरीबी की तरफ फेंके जा रहे हैं।उसका निष्कर्ष है, कोरोना महामारी के दौर में भोजन, दवाइयों, ऊर्जा और तकनीकी क्षेत्रों में बड़ी कंपनियों के मुनाफे में अपार बढ़ोतरी हुई है, जबकि मूल्य-वृद्धि की वजह से आमलोगों का जीना पहले से ज्यादा कठिन हुआ है।उन्हें भोजन के लाले पड़ गए हैं।दिखावा के साथ रहने वाले मध्यवर्गीय लोग भी बहुत परेशान हैं।वे कर्ज और अवसाद में हैं।इस दौर में जिनके काम-धंधे कमजोर हो गए हैं, उनकी ‘कहां जाई का करी’ की दशा है।पर ऐसे लाखों मध्यवर्गीय बाबू और सर शर्म से कुछ कह नहीं पा रहे हैं।

कोरोना महामारी के बाद बढ़ी आर्थिक मंदी और मुद्रास्फीति के बीच देश अधिक जटिल स्थितियों से गुजर रहा है।साधारण मध्यवर्ग की हालत बिगड़ चुकी है, खासकर जो सरकारी वेतन नहीं पाते।इनके छोटे-मोटे रोजगार, व्यवसाय या कारखाने संकट में हैं।इनकी हालत लखनऊ के उजड़े रईसों-सी है।लेकिन ये न रोजगार गारंटी योजना में शामिल हो सकते हैं, न राशन योजना और न नकद हस्तांतरण योजनाओं में।नकद पाने वाले गरीब लोग छोटे-छोटे स्वप्न देख लेते हैं, कुछ नहीं तो एक लाटरी खरीद लेते हैं।आम मध्यवर्गीय लोगों के तो सारे स्वप्न हवा हो गए हैं।

इधर भारतीय मध्यवर्ग के एक खास हिस्से का स्वाधीनता आंदोलन के दौर से भिन्न चरित्र सामने आया है।वे निराश हैं और जितने अधिक निराश हैं उतने ज्यादा गुस्से में हैं।वर्तमान विषमता से नहीं; दूसरे धर्म, दूसरी जाति या दूसरी प्रांतीयता वालों के प्रति।वे जितने अधिक उग्र हैं, उनके सोचने की शक्ति उतनी कम होती जा रही है, समवेदना भी घटती जा रही है।

इस दौर की निराशा मनुष्य को तरह-तरह से आक्रामक बना रही है।निराशा का आक्रमण सकारात्मक स्मृतियों पर है, ऊँचे मूल्यों की थाती पर है।उसके निशाने पर स्वाधीनता संग्राम काल के महान व्यक्तित्व और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के स्वप्न हैं।आक्रमण भविष्य कल्पना पर है।हर तरफ आक्रामकता के बिंबों की ही आराधना है।२१वीं सदी में मनुष्य को आत्मविहीन करने के औजार – खुद सोचने, कल्पना करने और रचने से रोकने वाले औजार धर्म, राजनीति, उपभोक्ता संस्कृति और मीडिया में बड़े पैमाने पर मौजूद हैं।

इतिहास के अंतकी राख

आज की एक विडंबना यह है कि इतिहास को लेकर एक तरफ सिर्फ गर्व है, दूसरी तरफ सिर्फ ग्लानि।इतिहास को कंगूरा और कबाड़खाना बनाने वालों की किसी जमाने में कमी नहीं रही है।अब कहीं पौराणिक घटनाओं को इतिहास बताया जा रहा है, कहीं इतिहास के संवेदनशील मामलों को राजनीतिक चाट बनाकर परोसा जा रहा है।जिस जमाने में ‘भौतिक समृद्धि-बौद्धिक खोखलापन’ चरम पर हो, उसमें इतिहास की दशा शरणार्थी की होती है।

फूकोयामा ने घोषणा की थी, ‘इतिहास का अंत’ हो गया।पश्चिम में इसके अंत की कल्पना अमेरिकी लोकतंत्र की सार्वभौमिकता के रूप में की गई और एशिया में धार्मिक आवेग की वापसी के रूप में।वस्तुतः इतिहास का अंत आत्मतुष्टि का चरम रूप है।जहां सपनों का अंत हो जाता है, सिर्फ वहीं इतिहास का अंत होता है।

21वीं सदी में इतिहास को राजनीति और बाजार का खिलौना बना दिया गया।ऐतिहासिक प्रसंगों पर उपन्यास आए, फिल्में भी बनीं।कई हैं जो कथा का मिश्रण करके इतिहास को बेच-खा रहे हैं।इतिहास को द्रौपदी बना दिया गया है।अपने को इतिहासकार कहने वाले ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं है, जो इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं के वास्तविक अर्थ को बदल डालने का काम करते हैं।जैसे एक क्षमतावान अर्थशास्त्री और इतिहासकार संजीव सान्याल यह धारणा देते हैं कि नवजागरण 19वीं सदी की घटना नहीं है।वह तो अब पिछले कुछ सालों से आया है।

इतिहास खिलौना नहीं है, यह आम लोगों की जीवनी-शक्ति है।पर इधर इतिहास से क्रीड़ा करने वालों की संख्या बढ़ी है।फिर भी, यदि इतिहास में इतिहास को मारने वाली ताकतें रही हैं, उसमें मनुष्यता के लिए चले संघर्षों को बचाने वाली ताकतें भी रही हैं।वे कभी-कभी स्पष्ट दिखने की जगह पहाड़ों और मिट्टी के नीचे छिपे  उस पानी की तरह रहती हैं, जो चारों तरफ से इकट्ठा होकर कभी भी प्रचंड सहस्रधार की तरह झर सकता है।

इतिहास युद्धास्त्र नहीं है।वह शांति, मनुष्यता और स्वतंत्रता की खोज है।वह विज्ञान न हो और ‘अस्थिर’ हो, पर मिथ्या चेतना नहीं है।

1960 के दौर में आधुनिकतावादी लेखक अपने को इतिहासहंता के रूप में देखते थे, पर इतिहासहंता तो अब आए हैं।यह जरूर कहा जा सकता है कि इतिहास के अंत का यदि कोई अर्थ है तो वह है इतिहास की एकरेखीयता का अंत।

भारत का इतिहास कभी एकरेखीय नहीं रहा है, क्योंकि इसमें कई समाजों, कई भाषाओं, कई जातियों, कई धर्मों और कई संस्कृतियों का इतिहास शामिल है।इस इतिहास में विशिष्टता और अखंडता के बीच अंतर्विरोध नहीं है और विविधता सर्वोच्च मूल्य है।इस इतिहास ने हमें साथ रहना सिखाया है।स्पष्ट है कि हम भारत के भविष्य की जिस रूप में कल्पना करते हैं, भारत का अतीत वैसा ही दिखेगा।

हमें इतिहास से दृष्टि मिलती है, मूल्य मिलते हैं और परंपराओं का ज्ञान होता है, और कोई इतिहास भविष्यहीन नहीं होता।हर इतिहास में भविष्य-कल्पना छिपी होती है।एक बात और, इतिहास से दृष्टि मिलती है, पर कई बार यह दृष्टि अंधता का काम करने लगती है।कुछ व्यक्ति इतिहासांध होते हैं।

आजादी के 75वें वर्ष में एक बड़ी चुनौती है, हम अपने विध्वस्त हो रहे इतिहास का समावेशी आलोचनात्मक पुनर्निर्माण कैसे करें।हम इसे इतिहास के खिलाड़ियों, इतिहासांधों और इतिहासहंताओं से कैसे बचाएं।

हम अपने इतिहास को ब्राह्मण परंपरा या श्रमण परंपरा में विभाजित करके नहीं देख सकते।इसी प्रकार हम अपने इतिहास को कबीर या तुलसी के रूप में नहीं देख सकते।हम अपने इतिहास को गांधी या वल्लभभाई पटेल या भगत सिंह या सुभाषचंद्र बोस के रूप में नहीं देख सकते।उत्तर या दक्षिण के रूप में नहीं देख सकते।प्रेमचंद या प्रसाद के रूप में नहीं देख सकते।ब्राह्मण या दलित, पुरुष या स्त्री, समवेदना या स्वानुभव के रूप में नहीं देख सकते।अब भी आंखें खुल जानी चाहिए।हमें ‘या’ की जगह ‘और’ को चुनना होगा, मिथ्या बनामवाद को खत्म करके।

निश्चय ही इतिहास में ऐसा बहुत कुछ है जो हमपर बोझ है।उसमें ऐसा भी बहुत कुछ है जिसे खोकर हम अपनी भारतीय पहचान और इसकी मानवीय जड़ों से विच्छिन्न हो जा सकते हैं।समझने की जरूरत है कि इतिहास से स्वार्थवश रणनीतिक गठबंधन और समावेशी आलोचनात्मक रिश्ता दो भिन्न चीजें हैं।

प्रदत्त अस्मिता और अर्जित अस्मिता

निराला ने अपने एक लेख ‘साहित्य की समतल भूमि’ में एक मार्के की बात कही है, ‘सीमा के अंदर घिरकर रहना जिस तरह मनुष्य की प्रकृति है, उसी तरह सीमा के संकीर्ण बंधनों को पार कर जाना भी मनुष्य की प्रकृति है।’ कोई व्यक्ति अपनी अस्मिता को, चाहे वह धार्मिक हो, जातीय हो या जातिपरक (कास्ट) हो, मान दे ही सकता है।एक हिंदू क्यों नहीं कहे कि वह हिंदू है।एक मुसलमान क्यों नहीं कहे कि वह मुसलमान है।एक तमिल क्यों नहीं कहे कि वह तमिल है।एक गुजराती क्यों नहीं कहे कि वह गुजराती है।लेकिन एक बिंदु के बाद मनुष्य को अपनी अस्मिता के संकीर्ण बंधनों और सीमाओं को पार करना पड़ता है।दरअसल एक ‘प्रदत्त अस्मिता’ होती है, जिसमें हम जन्म लेते हैं, यह हमारा चुनाव नहीं होता और एक ‘अर्जित अस्मिता’ होती है जो हमारे कार्यों, सरोकारों और विचारों से बनती है।

निराला ने बल देकर कहा था कि सीमा के संकीर्ण बंधनों को पार करना भी मनुष्य की प्रकृति है।कोई मनुष्य प्रदत्त अस्मिता से बंधकर नहीं रह सकता।वह अपनी प्रकृति से ही स्वतंत्रता-खोजी है, शांति-खोजी है और प्रेम चाहता है।इसलिए वह संस्कृति को चुनता है, कला-साहित्य को चुनता है और एक ‘कॉमन प्लेस’ खोजता है।संस्कृतिहीन व्यक्ति ही कला-साहित्य से विमुख रहता है, कॉमन प्लेस की जगह पशु-पक्षियों की तरह सिर्फ अपने खास झुंड में रहना चाहता है।यह कैसी घड़ी आ गई है, व्यक्ति आज अपनी जाति-बिरादरी या धर्म या प्रांतीय समुदाय में ही सुरक्षा का अनुभव कर रहा है, वह बृहत्तर समाज में अपने को असुरक्षित पाता है!

सत्ता की राजनीति का सदा से एक बड़ा औजार रहा है – अभेद में भेद।इसके लिए एकेडेमिक संसार को भी हथियार बनाया जाता है।इन चीजों का मकसद है- ‘सांस्कृतिक इंटरैक्शन’ में अवरोध पैदा करना तथा ‘सांस्कृतिक रेजिमेंटेशन’ को बढ़ावा देना।इसमें सफलता मिल जाती है, जब मनुष्य की दो बड़ी आंतरिक क्षमताओं -तर्कशक्ति और सृजनात्मक कल्पना को ‘प्रचार’ के नए माध्यमों द्वारा ध्वस्त कर दिया जाता है।लोग तब हर मामले में अंध-पिछलग्गू होने लगते हैं।

यदि अतीतवादी बर्बरता ला रहे हैं तो उपभोक्तावादी भुक्खड़ता ला रहे हैं।पहला सामुदायिक उन्माद  बढ़ाता है, दूसरा विलासोन्माद।दोनों ही तर्क, कल्पना और सृजनात्मकता के समान रूप से शत्रु हैं।मनुष्य के खुद सोचने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने के लिए जब मानसिक स्पेस सिकुड़ गया हो तो वह ‘निर्मित इच्छाओं’ को ढोने के लिए बाध्य होता है।वह हर सूचना या अज्ञान के प्रचार को ज्ञान मान लेता है।

आमतौर पर मनुष्य प्रत्यक्षतः जो देखता है और जिन खास सांस्कृतिक स्थितियों में जीता है, उनके पार जाकर वह बहुत सारी चीजों को देखना, जानना और उनसे रिश्ता बनाना चाहता है।मनुष्य के अर्थपूर्ण अस्तित्व के लिए यह जरूरी है कि वह कूपमंडूक न बने।वह प्रदत्त अस्मिता का अतिक्रमण करे।वस्तुतः वह कई पहचान रखता भी है।वह एकसाथ मराठी, भारतीय, किसी का पिता, व्यापारी, हिंदू, ब्राह्मण, मनुष्य, नागरिक आदि बहुत कुछ होता है।बस सवाल है, वह जोर किस-किसपर देता है।आजकल सबसे कठिन है अपने को भारतीय और मनुष्य समझना- वंदे-भारतम्-वंदे मानवम्!

मनुष्य की प्रकृति में यह भी है कि उसके मन में प्रश्न पैदा होते हैं।उसमें सभ्यता की शुरुआत से ही जिज्ञासा है, जिसका अंत नहीं किया जा सकता।इसलिए कोई बंधन या बाउंडरी शाश्वत नहीं है – हर बाउंडरी, चौखटा प्रश्नांकित होता है।जिज्ञासा अनंत है।स्वतंत्रता अनंत है, इसकी कोई आखिरी मंजिल नहीं है।इसलिए अस्मिता की भी कोई आखिरी मंजिल नहीं है।

तकनीकी विकास और लोकतंत्र

हम देख सकते हैं कि आज लोग कंप्यूटर, इंटरनेट और अन्य प्रौद्योगिकियों के प्रयोग में आगे हैं, लेकिन मानवीय संबंधों के बोध, मूल्य चेतना और संवेदनशीलता के मामले में पिछड़ते जा रहे हैं।मोबाइल ने नन्हे बच्चों से खिलौने और खुले मैदान छीन लिए हैं।बस पर चढ़िए, हर यात्री अपने मोबाइल में डूबा दिखेगा।वह अलग-अलग द्वीप की तरह होगा।यदि कोई असमर्थ बुजुर्ग किसी नौजवान के सामने क्लांत खड़ा हो, तब भी नौजवान अपनी सीट छोड़कर उसे बैठने के लिए नहीं कहेगा।भले दोनों हिंदू हों! लोकतंत्र में यदि संवेदनशीलता का ह्रास हो जाए, फिर उसमें कुछ बचा नहीं होता।देखा जा सकता है कि तकनीकी छलांग बहुत तेज है, बाजार में अखंडता है, लेकिन समाज अंतर्शत्रुताओं से भरा है।यह न्याय और पारदर्शिता से दूर होता जा रहा है।क्या स्वतंत्रता के 75 साल की यही चरम उपलब्धि है?

दरअसल 1947 में ‘नियति से मुठभेड़’ का जो सुअवसर मिला था, उसे हमने गंवा दिया।एक समय तक मूल्य-संस्कृति में जरूर कुछ आवाज थी।ज्यादातर लोग उदार थे, बड़े स्वप्न मरे नहीं थे।समाज में आधुनिक विकास को लोकतांत्रिक चरित्र देने के लिए आवाजें थीं।लेकिन सत्ता मिलने पर चूहों में भी बिल्ली बनने की आकांक्षा पैदा होने लगती है।अतः नेताओं की रीढ़ गलने लगी।सबको बहुत पैसा चाहिए, बहुत जमीनें चाहिए, बहुत सोना चाहिए।अतृप्ति बढ़ती गई।लोकतंत्र में खुदगर्जी, कुप्रबंध और भ्रष्टाचार की दीमकें लगती गईं। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की बात झूठ निकली, ज्ञान का अर्थ हो गया चालाक!

नायक पूजा की प्रवृत्ति ने भी इस देश का काफी नुकसान किया है।इसने सत्य और तर्क का महत्व गिरा दिया।समाज की विभिन्न तहों तक लोकतंत्र पहुंच नहीं पाया।परिवार और लोगों के बीच रिश्तों में भी लोकतांत्रिकता नहीं आ पाई।देश में भूमंडलीकरण के बाद जब किसी भी तरफ बाजार छोड़कर कुछ नहीं बचा तो आखिरकार संसद दधीचि का तपोवन कैसे होती!

हम पिछले 75 सालों के परिदृश्य पर गौर करें।आधुनिकीकरण के बावजूद जीवनदृष्टि में आधुनिकता नहीं आ पाई, ऊपर टाई – भीतर जनेऊ की जोड़ी बनी।माथे पर तिलक लगा लेना भर धार्मिक होने का प्रमाण पत्र बन गया।आधुनिक जीवनशैली और कूपमंडूकता की जुगलबंदी आम हो गई।विकास और अन्याय सहोदर बन गए।फिर सबकुछ जारी रहा – स्त्री की अवमानना, हर जाति द्वारा अपने से नीचे की जाति से भेदभाव, दहेज प्रथा और बढ़-चढ़कर दिखावा – ‘चिह्न’ के साथ शक्ति प्रदर्शन।जातिवाद और हिंसक बड़बोलापन बढ़ता गया।इन दिनों हर आदमी के दिमाग में छोटे-छोटे फासिज्म का घोंसला है, परिवार से लेकर राजनीति तक।एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर चढ़ बैठना चाहता है।

यह एक लज्जाजनक हकीकत है कि भारतीय संस्कारों में लोकतंत्र शामिल नहीं किया जा सका।तकनीकी बुद्धि का खूब विकास हुआ, पर तर्क का विस्थापन हुआ।प्रायः हर व्यक्ति आजकल याज्ञवल्क्य के मिजाज में रहता है कि इससे आगे बोला तो तुम्हारे सिर के टुकड़े हो जाएंगे (गार्गी से कही गई उक्ति)! तर्क पर बाहुबल, पद का बल, मिथ्या प्रचार और संख्या का बल हावी हो जाए तो लोकतंत्र की आत्मा का बचना मुश्किल है।

सोशल मीडिया में कैसा लोकतांत्रिक परिवेश है? यह वर्तमान युग में झूठ के प्रचार का सबसे बड़ा मंच है।यदि कोई पीछे पड़ गया, जिसे ट्रोल करना कहते हैं, तो किसी भी व्यक्ति के अपमान, उपहास और उसके प्रति घृणा की ज्वालामुखी फट पड़ेगी।तू नहीं तो तेरी मां ने नहर का पानी गंदा किया होगा! किसके भीतर से कब एक बाघ निकल आएगा ठीक नहीं।नई सभ्यता शालीनता के ही पूरी तरह खात्मे पर नहीं तुली है, इसने भाषा को अपशब्दों का कोश बना दिया है।

क्या मध्यवर्ग के लोगों में कोई संभावना बची है

19वीं सदी और 20वीं सदी के पूर्वार्ध में मध्यवर्ग ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी।इसने बहुत त्याग किया था, बंधुत्व, स्वतंत्रता और समानता के लिए कुर्बानियां दी थीं।उस युग का वह सच्चा नायक है।21वीं सदी के वर्तमान दौर में वह फिर मुखर, उत्साही और हुंकार से भरा हुआ है।इस बार भी वही नायक है, पर इस दौर में उसे बंधुत्व, स्वतंत्रता और समानता के मूल्य पसंद नहीं हैं।

माना जाता है कि आम मध्यवर्गीय मनुष्य उदार होता है, पर आज के मध्यवर्ग का चित्त कठोर है।कहा जा सकता है कि वह क्रूरता के साथ लालच के नंगे रूप में है।आदमी जब अपने लिए कोई कष्ट उठाना नहीं चाहता तो वह दूसरों का कष्ट क्या समझेगा!

ऐसे माहौल में संवेदनशील लोगों का अजनबीपन बढ़ा है, क्योंकि समाज में उन आधुनिक और मानवीय मूल्यों को बचा पाना काफी मुश्किल हो गया है जो साम्राज्यवादी-सामंती व्यवस्था से लड़कर हासिल हुए थे।पहले बहस की एक आत्मीय दुनिया थी।अपरिचित के, ‘भिन्न’ के भी दुख को देखकर पीड़ा होती थी।लोगों के बीच प्रेमपूर्ण सह-अस्तित्व का भाव पनप रहा था।उस दुनिया को आज के नए संसार ने काफी बदल दिया है।आज मानो मनुष्य से उसका आकाश छीन लिया गया है, वह अपनी ही धरती पर विस्थापित है।अब मूल्यों की जगह कब्र से निकले प्रेत नाच रहे हैं।फिर भी बहुत-सी जगहों पर यह विश्वास बना हुआ है कि यदि वह दुनिया बदल गई है तो यह दुनिया भी बदलेगी।

इस पर सोचने की जरूरत है कि जब अतीत की भेदभाव पैदा करने वाली रूढ़ियों को ही संस्कृति बनाकर उपस्थित किया जा रहा है या बाजार की मजेदार चीजों के पीछे लोग दौड़ रहे हैं तो व्यक्ति की स्वतंत्रता सचमुच कितनी सुरक्षित रह सकती है।जब एक-एक शब्द में मिलावट करने में शक्तिशाली लोग लगे हुए हों, भाषा की रीढ़ कहां होगी।ऐसे लोग अंततः प्रेम, धर्म, शिक्षा, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, विकास और जीवन के अस्तित्व की व्याख्या करने वाले अन्य शब्दों को पूरी तरह प्रदूषित कर दें, इससे पहले कुछ करना होगा।हम अपने शब्दों को ‘कृत्रिम चिह्नों’ में नहीं खो जाने देंगे।हमें अपनी भाषा के एक-एक शब्द की विशिष्टता और उसकी आत्मा की रक्षा करनी होगी।

मध्यवर्ग के लोगों की विवेकात्मा उनके भीतर अहर्निश जलने वाली एक पवित्र आग है, बहुतों के लिए आशा का स्रोत।यह आग कहीं न कहीं जलती रहती है।यहां नहीं तो वहां, इस व्यक्ति में नहीं तो उस व्यक्ति में।मनोरंजन और सुखों की चमकती रेत कभी उसे बुझा नहीं पाती।अतीत के प्रेत इस आग से भय खाते हैं।यह कभी न बुझने वाली पवित्र आग है, तभी आज पीठ पर हाथ रखकर पूछने वाले लोग हैं, ‘सकुशल हो?’ यह आग है, तभी उन्माद के साथ जो विध्वंस चल रहा है उसे देखकर बोलने की इच्छा होती है- ‘नहीं!’ यह ‘नहीं’ बोलने का अधिकार लोकतंत्र का चिह्न है।कोई भला आदमी नहीं चाहता अशांति, विद्वेष, घृणा और हिंसा का नृंशस संसार।बर्फ में भी आग होती है, अब भी कहा जा सकता है – नहीं!

स्वतंत्रता के इन 75 सालों ने क्या दिया

स्वंतंत्रता के इन 75 सालों ने हमें क्या दिया, इसके 75 जवाब हो सकते हैं।एक का जवाब दूसरे के लिए प्रीतिकर नहीं भी हो सकता है।इस तरह का जवाब भी हो सकता है कि कुछ नहीं दिया, जो अच्छा मिला वह अब मिला।चिंताजनक है कि  आज असहमत होना शत्रुता मोल लेना है, जबकि कोई भी लोकतंत्र पिछलग्गुओं से नहीं चलता।इस घटना को सभ्यता के सूर्यग्रहण के रूप में देखना चाहिए।

फिलहाल वैश्वीकरण संकट के दौर से गुजर रहा है।इसने जो आशा जगाई थी और प्रतिश्रुति दी थी – सभी को विकास की सीढ़ी पर एक न एक जगह खड़ा कर देने की, वह फेल कर गई है।हर शब्द के पीछे से वार हो रहा है।

पहले के ‘विनिवेश’ को सकारात्मक बनाकर अब ‘निजीकरण’ कहा जाने लगा है।निजीकरण ही वैश्वीकरण का पर्याय है।यह भी देखा जा सकता है कि स्पर्धा कहीं भी पारदर्शी नहीं है।सबकुछ ‘न्यूनतम सरकार-अधिकतम कारपोरेटतंत्र’ की धारणा के अधीन होता जा रहा है।इस परियोजना की सफलता के लिए विभाजित-विद्वेषपूर्ण समाज एक राजनीतिक ही नहीं, अर्थतंत्रीय जरूरत भी है।

इस समय आजादी का अर्थ है एकाधिकार, स्वेच्छाचारिता, किसी भी मूल्य की तिलांजलि देकर अधिक से अधिक दौलत कमाना, भोगवाद, एनआरआई हो जाना और ‘अदर्स’ के पीछे लगना।उन्हें लगातार ट्रोल करते रहना! हम इन दिनों शक्तिवानों के ‘भूमंडलीय कर्म और धार्मिक-स्थानीयतावादी सोच’ के भंवर में अपने भारत को गुम होता देख सकते हैं।आर्थिक उदारवाद बड़े पैमाने पर सामाजिक अनुदारवाद ला रहा है।एक पैर नवीनतम टेक्नोलॉजी में तो दूसरा पैर परित्यक्त खाइयों-भरे अतीत में है।

क्या इन 75 सालों की सबसे बड़ी देन है आत्मविलोप, अपने ही घर में खो जाना? क्या भारत ने अपने को पुनःउपलब्ध करते-करते अंततः अपने को खो दिया? हर तरफ है पैसे और भोग की असीम भुक्खड़ता और बगलगीर है धर्म, जाति और प्रांतीयता-आधारित बर्बरता! क्या अब इन्हीं चीजों के बीच जीना है?

भारत की सबसे बड़ी खूबी है, नियति से बार-बार मुठभेड़ और उसकी सबसे बड़ी शक्ति है विविधता।इस देश की विविधता स्वेच्छाचरिता के मार्ग में एक बड़ी रुकावट है।भारत के बचे होने का राज है विविधता! यह देश कभी थका नहीं है।पर इसकी विविधता में शक्ति तभी आ सकती है है, जब भिन्नता-भाव को हटाकर उसका शक्ति-सौंदर्य फूटे।इसी से लोकपरक राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की शक्ति मिलेगी और जैसी नृशंसता हर तरफ चल रही है, उसे ‘ना’ कहने की शक्ति भी!