सबाल्टर्न की अर्थवत्ता

महेश कुमार, बनारस :‘वागर्थ’ के मई अंक में शंभुनाथ जी ने ‘एलीट विमर्श और लोकमन’ संपादकीय लिखा है।एलीट समाज और लोक के बीच के प्रतिस्पर्धी संबंधों की पड़ताल की गई है।मिथकीय और संस्कृत साहित्य के अलावा आधुनिक ‘राष्ट्र और राष्ट्र-राज्य’ से भी संदर्भ लिए गए हैं। ‘लोक’ और ‘नागरिक समाज’ के बीच अंतर बताते हुए रेडफील्ड द्वारा किए गए ‘ग्रेट ट्रेडिशन बनाम लिटिल ट्रेडिशन’ की तुलना स्वातंत्र्योत्तर ‘सबाल्टर्न इतिहासकारों’ द्वारा किए गए विभाजन ‘मुख्यधारा और उपधारा’ से की गई है।पूरे लेख में कहीं एलीट समाज, जो ‘नागरिक समाज’ का हिस्सा है, के अंतर्विरोधों और कमियों की चर्चा है तो कहीं सबाल्टर्न पद्धति को नकारने की मंशा है।इसके लिए संपादक ने शुक्ल जी का सिद्धांत ‘लोक सामान्य भावभूमि’ का सहारा लिया है।यहां लेख में जो कुछ विचार व्यक्त किए गए हैं उसकी प्रतिक्रिया में कुछ बातें रख रहा हूँ।
लेख के शीर्षक में एक शब्द है ‘एलीट विमर्श’।क्या एलीट वर्ग का भी विमर्श होता है? क्या एलीट वर्ग का अस्तित्व, सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान खतरे में है? फिर तो भारतीय संदर्भ में ‘सवर्ण विमर्श’ और ‘पूंजीवादी विमर्श’ भी शुरू होना चाहिए! एलीट वर्ग अनिवार्य रूप से ‘नागरिक समाज’ से जुड़ा हुआ है।क्या इससे एलीट वर्ग का संबंध जीवन-मरण का संबंध है? क्या वह ‘राइट टू लाइफ’ से जुड़ा प्रसंग है? अगर जवाब ‘नहीं’ में है तो एलीट को ‘विमर्श’ के ढांचे से बाहर रखना चाहिए।
शुक्ल जी ‘लोक की सामान्य भावभूमि’ और ‘लोक हृदय में लीन’ होने की बात करते हैं।लेकिन इस ‘लोक हृदय’ में आदिवासियों के लिए शुक्ल जी के क्या विचार हैं, यह ‘श्रद्धा-भक्ति’ लेख में देखिए-‘सदा सत्य बोलो’,‘दूसरों की भलाई करो’, ‘क्षमा करना सीखो’— ऐसे-ऐसे सिद्धांत वाक्य किसी को बार-बार बकते सुन वैसा ही क्रोध आता है जैसे किसी बेहूदे की बात सुनकर।जो इस प्रकार की बातें करता चला जाए उसे चट कहना चाहिए—‘बस चुप रहो, तुम्हें बोलने की तमीज नहीं, तुम बच्चों या कोल-भीलों के पास जाओ। (चिंतामणि भाग-१, लोकभारती प्रकाशन, तेरहवां संस्करण, 2015, पृष्ठ- 20)
यहां ‘कोल-भील’ शुक्ल जी को मूर्ख, बर्बर और सभ्यता से दूर नजर आते हैं।शुक्ल जी का लोक या तो मुख्यधारा का लोक है या वे आदिवासी समाज को ‘लोक’ मानते ही नहीं हैं।यह भी हो सकता है कि वे आदिवासी समाज के बारे में उतना ही जानते हों जो अफवाह के रूप में उस समय का मुख्यधारा जानता रहा हो।यह आश्चर्य की बात है कि 1939 के लेख में शुक्ल जी ऐसी बातें कह रहे थे, जबकि 1912 में ही शरत चंद्र रॉय ने ‘मुंडाज एंड दियर कंट्री’ किताब लिख ली थी।जो आलोचक दुनिया भर के साहित्य और अन्य विधा को पढ़ते थे, ‘विश्व प्रपंच’ की भूमिका लिख रहे थे, वे अपने ही देश में लिखे जा रहे महत्वपूर्ण विषय से वंचित थे और इस समाज के प्रति पूर्वग्रह से ग्रस्त थे।
शुक्ल जी और द्विवेदी जी दोनों यह मानते हैं कि लोक के ‘व्यावहारिक ज्ञान’ का आधार पोथियां नहीं हैं।दोनों के लिए ‘लोक’ का मतलब ‘हिंदी जनता या जाति’ से है।ऐसे में ‘आदिवासी जनता’ स्वयं ही इस लोक से बाहर हो जाती है।आदिवासियों का ‘व्यावहारिक ज्ञान’ उनके वाचिक परंपरा में संचित है जो ‘हिंदी जाति’ से बाहर है और शुक्ल और द्विवेदी जी के संज्ञान से भी बाहर है।इसलिए उनका ‘लोक’ अधूरा है।जब तक यह लोक अधूरा है तब तक ‘राष्ट्र’ की साझी सोच की बात करना बेईमानी है।
लेख में कहा गया है कि कुछ विद्वान ‘लोक को अधिकारों के ज्ञान से शून्य’ मानते हैं, जबकि ‘नागरिक समाज व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति सचेत’ होता है।इस कथन को आदिवासी समाज पर लागू करेंगे तो वह अपर्याप्त लगेगा।यहां ‘अधिकार’ और ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ उस आधुनिक ‘राष्ट्र-राज्य’ की शब्दावली है जो प्रायः संविधान से संचालित होता है।आदिवासी समुदाय आज भी ‘ग्राम सभा’ और ‘पुरखा दर्शन’ से संचालित समाज है।यहां का लोक अपने अधिकार से भी परिचित होता है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले में ‘राष्ट्र-राज्य’ द्वारा प्रदत्त ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ से ज्यादा संवेदनशील और खुला है।यहां खास तरह के ‘नागरिक समाज’ की अवधारणा ही नहीं है, यह तो राष्ट्र-राज्य का समाज है जिससे घुलने-मिलने के बाद वहां भी ‘नागरिक समाज’ खड़ा कर रहा है।
शंभुनाथ जी ने लिखा है कि नागरिक समाज कूपमंडूक हो गया है और लोक को अपनी प्राचीन उच्च और आधुनिक परंपराओं से विच्छिन्न करके ‘प्रिमिटिविज्म’ की ओर धकेला जा रहा है।आदिवासियों का लोक आज भी अपनी प्राचीन उच्च पुरखा परंपरा के लिए संघर्षरत है।आज आदिवासी लोक जंगल और पर्यावरण बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।उनके यहां आज भी ‘इंडिजिनस आर्थिक व्यवस्था’ है जो जंगल और कॄषि के बीच संतुलन बनाकर काम करती है।उनके दर्शन में ‘श्रम’ को बेचने की संस्कृति नहीं रही है, बल्कि वह उत्सव में सहजीवी होने का अनिवार्य घटक है।उनकी इस महान परंपरा को मिटाने के लिए मुख्यधारा की ‘बुद्धि की मुक्तावस्था’ तत्पर है।इसलिए संपादक जब लोक और नागरिक समाज की बात कर रहे हैं तो उनकी बौद्धिकता पर मुख्यधारा की ज्ञान परंपरा का असर साफ दिखाई पड़ता है।
लेखक ने सबाल्टर्न पद्धति पर तीखी और खीझ भरी टिप्पणी है।रेडफील्ड के औपनिवेशिक विभाजन ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ और ‘लिटिल ट्रेडिशन’ को और सबाल्टर्न धारा के ‘मुख्यधारा और उपधारा’ को एक ही दृष्टि से देखते हैं।दरअसल वे खंड-खंड वाली उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि की जगह शुक्ल जी के ‘सामान्यीकरण’ को महत्व दे रहे हैं।साझे राष्ट्र की कल्पना के लिए वे इसे उचित मानते हैं।
रेडफील्ड के विभाजन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को यूरोप से कमतर बताना था।सबाल्टर्न स्टडी का उद्देश्य ‘आम जनता के औपनिवेशिक संघर्ष की स्वतंत्र वैचारिक परंपरा की खोज करना था।’ यह उन्होंने किया भी।सबाल्टर्न स्टडीज के चौथे भाग में ‘फॉरेस्ट्री एंड सोशल प्रोटेस्ट इन ब्रिटिश कुमाऊँ 1893-1921’ और ‘आदिवासी पॉलिटिक्स इन मिदनापुर 1760-1924’ में क्रमशः रामचंद्र गुहा और स्वप्न दासगुप्ता ने बताया है कि इन इलाकों में चले जंगल आंदोलन प्रायः अहिंसात्मक थे, जिनका गांधी के ‘सत्याग्रह’ से कोई लेना-देना नहीं था।क्या यह शोध करके बताना ‘सामान्यीकरण’ के विरुद्ध है?
सबाल्टर्न लेखक मुख्यधारा से संघर्ष नहीं कर रहे हैं, बल्कि सीमांत की जनता का पक्ष सामने ला रहे हैं।वह भी एक पुल ही बना रहे हैं।खंड-खंड का मतलब यहाँ बिखराव नहीं है, बल्कि अलग-अलग इतिहास परंपरा को मिलाकर सबके लिए बराबरी और न्याय की मांग है। ‘सामान्यीकरण’ का मतलब यदि ’पुल’ बनाना है तो सबाल्टर्न भी वही काम कर रहा है।वह नया पुल भी बना रहा है और पुराने पुल की कमियों को भी सामने ला रहा है।जैसे हरिराम मीणा जी ने ‘धूणी तपे तीर’ लिखकर किया और रणेंद्र ने ‘ग्लोबल गांव के देवता’ लिखकर किया।भील विद्रोह पर ‘गौरीशंकर हीराचंद ओझा’ की ओछी इतिहास दृष्टि को हरिराम मीणा ने जनता के सामने लाया, ठीक उसी तरह रणेंद्र ने ‘असुर’ समुदाय पर हुए क्रूर अत्याचार से हिंदी पट्टी को परिचित करवाया।दोनों लेखकों का खंड-खंड मिलकर नई इतिहास दृष्टि बनाने में मदद करता है।इसलिए रेडफील्ड की दृष्टि और सबाल्टर्न की दृष्टि को एक कहना एक वैचारिक विचलन ही लगता है।
साझा राष्ट्र बनाने के लिए जरूरी है कि यह जो खंड-खंड (अलग-अलग पुल) की समस्याएं हैं उनका समाधान हो।जब ये पुल आपस में जुड़कर एक बृहत राजमार्ग बना लेंगे, तब लेखक के ‘सामान्यीकरण’ का उद्देश्य स्वयंमेव सफल हो जाएगा।तब तक समस्याओं के समाधान के लिए ‘खंड-खंड’ मतलब ‘सबाल्टर्न पद्धति’ का ही सहारा लेना पड़ेगा।उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श होने के कारण सबाल्टर्न को खारिज करने का एक प्रचलन-सा चल पड़ा है कि यह अप्रासंगिक है।यहां लेखक ने सुदीप्त कविराज और गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक के मतों का नागरिक समाज और सामान्यीकरण के पक्ष में इस्तेमाल किया है।लेखक का वैचारिक विचलन तब खीझ में बदलता हुआ लगता है जब वह सबाल्टर्न लेखक-लेखिकाओं पर व्यक्तिगत आक्षेप करते हैं कि ‘ये लोग अंग्रेजी में लिखते हैं और विदेश में सुख से रहते हैं।’ अगर इसको किसी पद्धति को खारिज करने का पैमाना मान लिया जाए तब तो मार्क्सवादी, उदारवादी और तमाम बौद्धिक आंदोलन खारिज हो जाएंगे।अंग्रेजी लिखना अगर जनता से दूर होने का लक्षण है, तब तो भारत की बड़ी आबादी ठीक से हिंदी भी नहीं समझती है।इसका मतलब हिंदी में किए गए तमाम वैचारिक बहस बेकार हैं?
लेखक ने लिखा है कि ‘सबाल्टर्नवाद’ ने विद्वता के शॉर्टकट बनाए।चालीस साल से इसने साहित्यिक मेधाओं को कब्जे में रखा है।फास्टफूड की तरह हजारों लोग पीएच. डी. हो रहे हैं।यह आलोचकीय भाषा नहीं है।इससे खीझ का पता चलता है।
सबाल्टर्न अध्ययन ने किस प्रकार विद्वता का शॉर्टकट अपनाया? क्रिस्टोफर बेल ने कहा था कि सबाल्टर्न लेखकों ने ‘देशी दस्तावेजों का अध्ययन ठीक से नहीं किया है’।इसका जवाब सबाल्टर्न अध्ययन का भाग-4 ही है।हिंदी में अश्विन कुमार पंकज का उपन्यास ‘माटी-माटी अरकाटी’ (2016) देशी दस्तावेज के अध्ययन पर ही आधारित है।रही बात विद्वता की शॉर्टकट की तो लेखक को एक-दो उदाहरण देना चाहिए था।अन्यथा यह व्यक्तिगत खीझ के अलावा कुछ और नहीं माना जाएगा।जहां तक चालीस साल से साहित्यिक मेधाओं को कब्जे में लेने की बात है तो इस आधार पर यह भी कहा जाए कि प्रगतिवादियों ने पिछले 75 साल से साहित्यिक मेधाओं को कब्जे में रखा है।कब्जे में रखने का क्या मतलब है, यह लेखक को स्पष्ट करना चाहिए। ‘फास्टफूड टाइप पीएच डी’ का मतलब सबाल्टर्न पद्धति से किए गए शोध में गुणवत्ता नहीं है।बाकी अन्य पद्धतियों में होने वाले शोध खीर टाइप हैं, है न? अस्सी साल से तुलसी पर शोध हो तो वह खीर टाइप है और दलित, स्त्री, आदिवासी पर हजार शोध हो जाएं तो वह फास्टफूड हो गया! सवाल शोध की घटती गुणवत्ता पर करते तो ज्यादा बहस योग्य होता।एक खास पद्धति पर इस तरह के आरोप लेखक के चेतन पर हावी मुख्यधारा की प्रवृत्ति को बताता है।

चितरंजन भारती, पटना : वागर्थ का अप्रैल 2022 अंक।तेमसिला आओ की कहानी अंतिम गान बहुत पसंद आई।नगालैंड में चल रहे आतंकवाद और फिर फौज का कहर, बिलकुल यथार्थपरक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।हांसदा सौवेंद्र शेखर की कहानी ‘वे गोश्त खाते हैं’ को पढ़ना, आदिवासी समाज को आधुनिक समाज में मिसफिट होने की कहानी है।इन दोनों कहानियों की अनुवादक मंजु श्रीवास्तव का बहुत आभार, जिन्होंने इन कहानियों का अनुवाद किया।दरअसल हम विदेशी लेखकों के अनुवाद खूब देखते, पढ़ते हैं।परंतु पड़ोस के आदिवासी समुदाय उपेक्षित रह जाते हैं। ‘वागर्थ’ की यह पहल बहुत पसंद आई कि उसने पूर्वोत्तर की कविताओं को प्रमुखता दी है।

कुलदीप मोहन त्रिवेदी:‘वागर्थ’ बेहतरीन पत्रिका है।इसमें जो कहानियां छपती हैं, वे बिलकुल आधुनिक हैं, जबकि पहले के लेखकों की कहानियां बार बार पढ़ने को मन करता है।प्रेमचंद, प्रसाद आदि लेखकों की कहानियां आज भी लोग चाव से पढ़ते है।

ऋतु डिमरी नौटियाल:‘वागर्थ’ के जून 2022 अंक में हेमंत कुकरेती की दोनों कविताएं प्रेरित करती हैं, भीतरी संवाद को शुरू करने के लिए।पूरी जिंदगी हम यूं ही निकाल देते हैं एक लीक पर चलते हुए कि कहीं खुद से प्रश्न पूछते ही जीवन की दिशा न बदलनी पड़ जाए।

दूसरी कविता लाजवाब व्यंग्य है इतिहास में दर्ज किये जाने की महत्वाकांक्षा पर।सटीक अवजर्वेशन।हार्दिक बधाई, अंतर्मन को झकझोरती रचनाओं को इस मंच से प्रेषित करने के लिए।

बाबर खान: एक कवि दर्शन, इतिहास और राजनीतिक बोध के साथ ही जब समाज, इसके बदलते स्वरूप और समसामयिक विश्व के ऊपर अपनी पैनी नजर रखता है, तो उसकी रचनाओं का संसार व्यापक हो जाता है! ‘वागर्थ’ जून 2022 अंक में कविता ‘नए मगध में’ राकेशरेणु ने काफी खूबसूरत शैली में वर्तमान समाज और इसके बदलते स्वरूप को किसी शफ्फाफ दर्पण के समानांतर खड़ा करने का प्रयास किया है।इतिहास के पृष्ठों पर जमी धूल और कोहरे में ढक जाने वाले भविष्य, दोनों की ही पीड़ा को सहेजते हुए, नवीन कल्पनाओं को जाग्रत करने का इसे एक सफल प्रयोग कहा जा सकता है! राकेश रेणु में जिस प्रकार जटिल तथ्यों को भी सरलता से प्रस्तुत करने का कौशल दिखता है, वह अद्भुत है!

इस बेहतरीन कविता की प्रस्तुति के लिए ‘वागर्थ’ का आभार!

 गुरबख्श सिंह मोंगा, मोहाली:‘वागर्थ’ के मई अंक में ‘दातुन वाली बुढ़िया’ कहानी में इम्तियाज गदर ने एक साथ कई निशाने साधे हैं।गरीब और बजुर्ग देहात में कैसा जीवन यापन कर रहे हैं अथवा घिसटते चले जा रहे हैं, इसका सजीव चित्रण भरपूर तरीके से किया गया है।आदिवासी कन्या का भविष्य कितना करुणामय हो सकता है, यह पाठकों  के सामने नग्न करके रख दिया गया है।विमर्श को संजीदगी से आगे बढ़ाते हुए मध्यम वर्ग के लोगों द्वारा दातुन बेचने वाली महिला से सौदेबाजी की छिछोरी हरकतें और गरीबी रेखा के नीचे गुजारा करने वालों से हप्ता वसूली, नौजवानों का पथ भ्रमित हो जाना और वृद्ध दंपति का जंगली जानवरों के हमले में मारा जाना हमारे समाज के तथाकथित ‘विकास’ की पोल सशक्त ढंग से खोलने में कामयाब हैं।लेखक को साधुवाद।

संजय राय द्वारा अनूदित कहानी ‘वायरस’ को असमिया भाषा की कोरोना काल की अद्भुत कहानी कहा जा सकता है।मेरी नजर में यह सर्वश्रेष्ठ है।साहित्यिक प्रकृति वाला एक बेरोजगार व्यक्ति, सोशल मीडिया के माध्यम से अपराध की दुनिया में प्रवेश कर जाता है।हिंदी के सभी संजीदा पाठकों को यह कहानी अवश्य पढ़नी चाहिए।संजय राय को बांग्ला भाषा की चुनिंदा रचनाएं हिंदी के पाठकों तक पहुंचाने के लिए बहुत बधाई।

महेश आलोक की लघु कविता ‘मैंने चिड़िया से कहा’ शानदार है और वर्तमान पीढ़ी के कवियों को आत्मनिरीक्षण का संदेश देती है।नवोदित कवयित्री एकता प्रकाश ‘गांव की महक’ में बहुत संजीदगी से आज के बाजार का प्रभाव और जमीन से जुड़े रहने की जरूरत को जबरदस्त ढंग से प्रस्तुत करने में कामयाब हैं।खासी भाषा की स्ट्रीमलेट ड्खर कृत ‘पड़ोसन की बेटी’ नारी विमर्श को अदभुत ढंग से आगे बढ़ा रही है।अनुवादिका जीन एस. ड्खार को बधाई।मिजो भाषा की युवा कवयित्री अनीता वनललनुन्मवी की दोनों कविताएं बालिका विमर्श को संजीदगी से पेश करती हैं।लेप्चा भाषा से अनूदित कविता ‘मानव और पेड़’ पर्यावरण को समर्पित बेहतरीन रचना है।